ढाका के गवर्नर हाउस पर रॉकेट से मालदीव तख्तापलट तक, जानिए वायुसेना के चार सबसे हैरतअंगेज विदेशी मिशन भारतीय वायुसेना ने अपने 94वें स्थापना वर्ष में प्रवेश कर लिया है। इस ऐतिहासिक मौके पर पढ़िए सीमा पार के वे चार साहसिक अभियान, जिन्होंने 1971 के युद्ध से लेकर मालदीव और श्रीलंका के भू-राजनीतिक परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया। भारतीय वायुसेना ने अपने गौरवशाली 94वें वर्ष में कदम रखा है। करीब नौ दशकों के अपने समृद्ध सफर में इस हवाई ताकत ने केवल देश के आसमान की हिफाजत ही नहीं की, बल्कि जरूरत पड़ने पर सुदूर विदेशी सीमाओं के पार जाकर असाधारण साहस, सूझबूझ और सटीक मारक क्षमता का प्रदर्शन भी किया है। चाहे वह साधारण पर्यटन नक्शे के सहारे दुश्मन के सत्ता केंद्र को धुआं-धुआं कर देना हो, एक ही रात में ढाई हजार किलोमीटर दूर पहुंचकर पड़ोसी मुल्क की संप्रभुता बचाना हो, या फिर बिना किसी रडार की पकड़ में आए दुश्मन की राजधानी के ऊपर ध्वनि से तीन गुना तेज उड़कर सनसनी फैला देना हो, भारतीय वायुसेना के खाते में दर्जनों ऐसे हैरतअंगेज अभियान दर्ज हैं। इनमें से चार ऐसे बड़े अभियानों पर विस्तार से नजर डालते हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और युद्ध के नतीजों को पूरी तरह बदलकर रख दिया। 1. ढाका के गवर्नर हाउस पर 128 रॉकेटों का प्रहार और पाकिस्तान का आत्मसमर्पण यह घटना 14 दिसंबर 1971 की है, जब भारत और पाकिस्तान के बीच छिड़े भीषण युद्ध को दस दिन बीत चुके थे। पूर्वी मोर्चे पर भारतीय थलसेना तेजी से ढाका की ओर कदम बढ़ा रही थी। थलसेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ ने पाकिस्तानी सेना को हथियार डालने का खुला प्रस्ताव दिया था, लेकिन पाकिस्तानी कमान की ओर से कोई आधिकारिक जवाब नहीं मिला था। उसी दिन अलसुबह ढाका के इंटरकॉन्टिनेंटल होटल में स्थित संयुक्त राष्ट्र के दफ्तर में एक फोन बजा। पूर्वी पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर डॉक्टर एएम मलिक ने संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि जॉन केली को दोपहर 12 बजे गवर्नर हाउस में आयोजित एक आपातकालीन कैबिनेट बैठक में शामिल होने का बुलावा दिया। भारतीय सेना की खुफिया निगरानी इकाई ने इस फोन कॉल को बीच में ही पकड़ लिया। इससे यह साफ हो गया कि इस गुप्त बैठक में पूर्वी पाकिस्तान के मार्शल लॉ प्रशासक और वहां के वायुसेना प्रमुख भी उपस्थित रहेंगे। भारतीय कमान ने तुरंत भांप लिया कि यदि इस बैठक को बीच में ही भंग कर दिया जाए, तो पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान पर आत्मसमर्पण का मनोवैज्ञानिक दबाव कई गुना बढ़ जाएगा। बैठक शुरू होने से ठीक एक घंटा पहले भारतीय वायुसेना के गुवाहाटी और हाशिमारा सैन्य हवाई अड्डों पर अचानक कार्रवाई के आदेश पहुंचे। पायलटों को निर्देश दिया गया कि वे ठीक सुबह 11 बजकर 50 मिनट पर ढाका के आसमान में पहुंचें और बिना किसी नागरिक या अनचाहे नुकसान के सीधे बैठक स्थल पर सटीक प्रहार करें। हालांकि, भारी आपाधापी के कारण शुरुआत में पायलटों को गवर्नर हाउस के बजाय सर्किट हाउस का निशाना सौंपा गया था। इस मिशन के लिए गुवाहाटी स्थित 28वीं स्क्वाड्रन 'फर्स्ट सुपरसोनिक्स' के चार मिग-21 लड़ाकू विमान और हाशिमारा स्थित 37वीं स्क्वाड्रन 'ब्लैक पैंथर्स' के दो हंटर लड़ाकू जेट तैयार किए गए। गुवाहाटी दल का नेतृत्व विंग कमांडर बीके बिश्नोई कर रहे थे, जबकि हाशिमारा दल की कमान विंग कमांडर आरवी सिंह के हाथों में थी। उस समय विंगमैन के रूप में तैनात रहे हरीश मसान्द के अनुसार, मिशन पर निकलने वाले सभी वैमानिकों को बर्मा शैल कंपनी द्वारा बनाए गए ढाका के साधारण टूरिस्ट मैप दिए गए थे, जिन्हें उन्होंने अपनी जेबों में रख लिया। दोनों ठिकानों से ढाका तक का हवाई सफर महज 20 मिनट का था। सुबह 11 बजकर 26 मिनट पर लड़ाकू विमान रनवे पर उड़ान भरने को पूरी तरह तैयार खड़े थे। जैसे ही विमानों के इंजन चालू हुए, कॉकपिट में बैठे विंग कमांडर बिश्नोई ने देखा कि रनवे पर खड़ा एक सैनिक हाथ में कागज का टुकड़ा लहराते हुए तेजी से इशारा कर रहा है। उस संदेश में स्पष्ट किया गया कि बैठक सर्किट हाउस में नहीं, बल्कि गवर्नर हाउस में हो रही है। विंग कमांडर बिश्नोई के मुताबिक, उस वक्त पायलटों के पास इतना भी समय नहीं बचा था कि वे नक्शे पर नए लक्ष्य की जांच कर सकें। सुबह 11 बजकर 55 मिनट तक सभी छह विमान ढाका के आकाश में दाखिल हो गए। एक भव्य सरकारी इमारत के बाहर खड़ी कई लंबी लिमोजिन गाड़ियों को देखकर पायलटों ने तुरंत पहचान लिया कि यही गवर्नर हाउस है और भीतर उच्चस्तरीय बैठक चल रही है। इमारत के शीर्ष पर एक विशाल गुंबद बना हुआ था। विंग कमांडर बिश्नोई ने अपने विमान का सीधा निशाना उस गुंबद पर साधा। कुछ ही क्षणों में भारतीय जेट विमानों से कुल 128 रॉकेट दागे गए, जबकि ठीक पीछे आ रहे हंटर विमानों ने अपनी तोपों से अंधाधुंध गोलाबारी शुरू कर दी। चारों तरफ धूल, मलबे और धुएं का गुबार छा गया, हालांकि इस हमले में कोई भी व्यक्ति हताहत नहीं हुआ। गवर्नर मलिक, संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधि केली और उपस्थित तमाम बड़े अधिकारी जान बचाने के लिए बदहवास होकर इधर-उधर भागने लगे। बांग्लादेश में भारत के पहले उप उच्चायुक्त रहे जेएन दीक्षित ने अपनी किताब 'इंडिया-पाकिस्तान इन वॉर एंड पीस' में लिखा है कि इन रॉकेटों ने बैठक कक्ष और उसकी मेज को तहस-नहस कर दिया, जिससे पूर्वी पाकिस्तान के शासक बुरी तरह घबरा गए और वे झुकने को मजबूर हो गए। इस अप्रत्याशित हवाई हमले से गवर्नर मलिक इतने सहम गए कि उन्होंने कांपते हाथों से एक सादे कागज पर तुरंत अपना इस्तीफा लिख दिया। इसके साथ ही पूर्वी पाकिस्तान की तथाकथित नागरिक सरकार का अंत हो गया। इसके बाद मलिक और उनकी पूरी कैबिनेट ने संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले इंटरकॉन्टिनेंटल होटल में शरण ली। इस हमले के ठीक दो दिन बाद, 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी ने अपने 90,000 सैनिकों के साथ भारतीय सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष ऐतिहासिक आत्मसमर्पण कर दिया। इसी के साथ दुनिया के नक्शे पर एक नए संप्रभु राष्ट्र बांग्लादेश का उदय हुआ। वायुसेना द्वारा निशाना बनाया गया वह ऐतिहासिक गवर्नर हाउस आज बांग्लादेश के राष्ट्रपति का आधिकारिक निवास 'बंगभवन' है। 2. ऑपरेशन पुमलाई: जाफना में फंसे तमिलों के लिए जब आसमान से बरसी राहत साल 1987 के दौरान श्रीलंका में 'लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम' यानी एलटीटीई एक स्वतंत्र तमिल राष्ट्र की मांग को लेकर श्रीलंकाई सेना के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में जुटा था। श्रीलंका का उत्तरी जाफना प्रायद्वीप उस समय पूरी तरह से एलटीटीई के नियंत्रण में था। इस विद्रोह को कुचलने के लिए श्रीलंकाई सेना ने 'ऑपरेशन लिबरेशन' शुरू करते हुए जाफना की चारों तरफ से नाकेबंदी कर दी थी। इस घेराबंदी की वजह से जाफना में रहने वाली विशाल तमिल आबादी के लिए भोजन, जरूरी दवाओं और ईंधन की आपूर्ति पूरी तरह बंद हो गई। मानवीय संकट गहराने से भारत में भारी आक्रोश फैल गया। राजीव गांधी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने श्रीलंकाई प्रशासन से सैन्य अभियान रोकने की अपील की, परंतु कोलंबो ने इसे अनसुना कर दिया। इसके बाद 2 जून 1987 को भारत ने औपचारिक घोषणा की कि वह जाफना के आम नागरिकों तक मानवीय सहायता पहुंचाएगा। इस कड़ी में तटरक्षक बल के एक जहाज की सुरक्षा में 19 भारतीय नौकाएं 38 टन खाद्य सामग्री, दवाएं और ईंधन लेकर जाफना की ओर रवाना हुईं। मगर कच्चाथीवू द्वीप के पास श्रीलंकाई नौसेना ने इस राहत काफिले को जबरन रोक लिया। चार घंटे तक समुद्र में गतिरोध चला और अंततः भारतीय नौकाओं को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा। भारत ने इसे अपने कूटनीतिक और राष्ट्रीय स्वाभिमान पर आघात माना और तय किया कि अब मदद हर हाल में हवाई मार्ग से सीधी पहुंचाई जाएगी। इसके बाद डिप्टी एयर चीफ मार्शल एस राघवन के निर्देशन में 'ऑपरेशन पुमलाई' की रूपरेखा तैयार की गई। तमिल भाषा में पुमलाई का शाब्दिक अर्थ 'फूलों की माला' होता है। इस विशेष वायु सैन्य मिशन को 'ईगल मिशन 4' कोडनेम भी दिया गया था। इस साहसिक कार्य के लिए ग्वालियर बेस से कुछ मिराज-2000एच लड़ाकू विमान और आगरा से पांच एएन-32 मालवाहक विमान बेंगलुरु पहुंचे। 4 जून की दोपहर 3 बजे नई दिल्ली में श्रीलंकाई उच्चायुक्त बर्नार्ड तिलकरत्ने को तलब किया गया और उन्हें कड़ा संदेश दिया गया कि ठीक एक घंटे बाद भारतीय वायुसेना जाफना के ऊपर राहत सामग्री गिराएगी। उन्हें यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि यदि इस मानवीय मिशन में कोई बाधा डाली गई, तो साथ उड़ रहे आधुनिक मिराज-2000एच लड़ाकू विमान तुरंत सैन्य कार्रवाई करेंगे। हर मिराज-2000एच विमान में माट्रा मैजिक 2 हवा-से-हवा में मार करने वाली मिसाइलें, 250 राउंड गोला-बारूद और लंबी दूरी तय करने के लिए तीन अतिरिक्त ड्रॉप टैंक लगाए गए थे। दूसरी तरफ, पांचों एएन-32 विमानों में लगभग 25 टन राहत सामग्री भरी गई, जिसमें चावल, दूध पाउडर, ताजी सब्जियां, मिट्टी का तेल और जीवनरक्षक दवाएं शामिल थीं। प्रत्येक बक्से के साथ एक पैराशूट सुरक्षित रूप से बांधा गया था। दोपहर 3 बजकर 55 मिनट पर बेंगलुरु से एएन-32 विमानों ने उड़ान भरी, जिनके दोनों किनारों पर मिराज लड़ाकू विमान सुरक्षा घेरा बनाए हुए थे। मालवाहक विमानों के बेड़े का नेतृत्व ग्रुप कैप्टन बीके सुंदर कर रहे थे, जबकि लड़ाकू दस्ते की कमान विंग कमांडर अजीत भवनानी के हाथों में थी। इस ऐतिहासिक घटना को दुनिया के सामने रखने के लिए 35 भारतीय और विदेशी पत्रकार भी इन जहाजों में सवार थे। शाम 4 बजकर 47 मिनट पर ग्रुप कैप्टन सुंदर ने कोलंबो हवाई यातायात नियंत्रण केंद्र से संपर्क साधने की कोशिश की, मगर वहां से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। लगभग 5 बजे यह बेड़ा जाफना शहर के करीब पहुंच गया। आसमान में 12,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे मालवाहक विमान नीचे 1,500 फीट तक उतरे और शहर से 7 किलोमीटर दूर निर्धारित खुले इलाके में पैराशूटों की मदद से पूरी राहत सामग्री सुरक्षित रूप से गिरा दी गई। अपना काम पूरा करने के बाद यह पूरा बेड़ा शाम 6 बजकर 13 मिनट पर बेंगलुरु वापस लौट आया। श्रीलंका सरकार ने भारत पर अपनी संप्रभुता का उल्लंघन करने का आरोप मढ़ दिया, जबकि भारत ने इसे विशुद्ध रूप से मानवीय दायित्व करार दिया। इस साहसिक कदम का सीधा कूटनीतिक असर दिखा। श्रीलंकाई राष्ट्रपति जेआर जयवर्धने ने राजीव गांधी सरकार के साथ बातचीत की मेज पर आने की पेशकश की और जाफना की नाकेबंदी में ढील दी जाने लगी। इसके बाद 29 जुलाई 1987 को ऐतिहासिक भारत-श्रीलंका समझौता संपन्न हुआ, जिसके तहत भारतीय शांति सेना श्रीलंका भेजी गई। हालांकि, इस समझौते से नाराज होकर एलटीटीई ने बाद में 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या कर दी। 3. ऑपरेशन कैक्टस: जब 16 घंटे में मालदीव की सरकार को तख्तापलट से बचाया मालदीव हिंद महासागर में करीब 1,200 छोटे-बड़े द्वीपों का एक समूह है। उसकी राजधानी माले क्षेत्रफल में इतनी छोटी है कि कोई भी व्यक्ति एक छोर से दूसरे छोर तक पैदल टहल सकता है। देश का मुख्य हवाई अड्डा माले में न होकर पास के हुलहुले द्वीप पर स्थित है, जहां आने-जाने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है। साल 1988 में जब मौमून अब्दुल गयूम मालदीव के राष्ट्रपति थे, तब अब्दुल्ला लुथुफी नामक एक स्थानीय कारोबारी ने उनकी वैध सरकार का तख्तापलट करने का षड्यंत्र रचा। इस बगावत को अंजाम देने के लिए लुथुफी ने श्रीलंका के तमिल अलगाववादी संगठन 'पीएलओटीई' के दर्जनों हथियारबंद लड़ाकों को अपने साथ मिला लिया था। 3 नवंबर की तड़के 3 बजकर 30 मिनट पर हमलावर समुद्री रास्ते से माले में दाखिल हो गए। उन्होंने देखते ही देखते सरकारी रेडियो और टेलीविजन स्टेशनों पर कब्जा कर लिया, नेशनल सिक्योरिटी सर्विस के मुख्यालय पर हमला बोला और राष्ट्रपति भवन को घेर लिया। सरकार के कई मंत्रियों को बंधक बना लिया गया, जबकि राष्ट्रपति गयूम जान बचाने के लिए एक गुप्त स्थान पर छिप गए। सुबह होते-होते राष्ट्रपति गयूम ने भारत, श्रीलंका, सिंगापुर, पाकिस्तान, अमेरिका और ब्रिटेन सहित कई देशों से तत्काल सैन्य मदद की गुहार लगाई। पाकिस्तान और श्रीलंका ने साफ हाथ खड़े कर दिए, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर ने कहा कि सेना भेजने में लंबा वक्त लगेगा। भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने स्थिति की गंभीरता को समझा। उनका मानना था कि यह केवल एक पड़ोसी मुल्क की मदद का सवाल नहीं है, बल्कि भारत के समुद्री इलाके में किसी बाहरी या विद्रोही ताकत के पैर पसारने का बड़ा खतरा है। उन्होंने बिना देर किए थल, जल और वायुसेना के संयुक्त अभियान 'ऑपरेशन कैक्टस' को हरी झंडी दे दी। सुबह 7 बजे भारतीय वायुसेना को इस आपातकालीन मिशन का पहला निर्देश मिला। आगरा एयरबेस पर तैनात 44वीं स्क्वाड्रन 'माइटी जेट्स' के तीन विशाल इल्यूशिन आईएल-76 मालवाहक विमानों को तैयार करने का काम शुरू हुआ, जिसकी कमान ग्रुप कैप्टन अनंत गोपाल बेऊर को दी गई। सुबह 10 बजे भारतीय थलसेना की 50वीं स्वतंत्र पैराशूट ब्रिगेड को अलर्ट पर रखा गया और 6 पैरा बटालियन को मुख्य स्ट्राइक फोर्स बनाया गया। शुरुआत में सैनिकों को पैराशूट के सहारे सीधे जमीन पर उतारने का विचार बना था। लेकिन जांच में पता चला कि मालदीव के द्वीपों पर जमीन इतनी सीमित है कि यदि सैनिक हवा से कूदते, तो करीब 60 फीसदी जवानों को समुद्र के पानी में गिरना पड़ता। इसलिए यह जोखिम भरा फैसला लिया गया कि विमानों को सीधे हुलहुले हवाई अड्डे के छोटे रनवे पर उतारा जाएगा और वहीं से सैनिक नावों के जरिए राजधानी माले में प्रवेश करेंगे। शाम 6 बजे दो आईएल-76 विमान पैराट्रूपर्स, भारी गोला-बारूद और मालदीव में भारत के उच्चायुक्त अरुण बनर्जी को लेकर आगरा से उड़े। उनकी सुरक्षा के लिए छह मिराज-2000एच लड़ाकू विमान भी साथ चल रहे थे। लगभग 2,500 किलोमीटर से अधिक की दूरी और करीब चार घंटे की लगातार उड़ान के बाद यह दल हुलहुले के पास पहुंचा। आईएल-76 जैसे भीमकाय जहाज के लिए हुलहुले का रनवे सामान्य से काफी छोटा था। ग्रुप कैप्टन अनंत गोपाल बेऊर ने गुप्त कोडवर्ड 'हदिया' का प्रयोग कर हुलहुले हवाई नियंत्रण से संपर्क किया। रनवे की बत्तियां केवल 10 सेकंड के लिए जलाई गईं और भारतीय पायलटों ने बेहद सधे हुए अंदाज में विमान नीचे उतार दिए। पहला आईएल-76 रात 9 बजकर 48 मिनट पर उतरा और ठीक 10 मिनट बाद दूसरा विमान भी रनवे को छू गया। जवानों ने तेजी दिखाते हुए केवल 40 से 45 मिनट के भीतर पूरे हुलहुले हवाई अड्डे पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके तुरंत बाद वे सात तेज रफ्तार स्पीडबोटों में सवार होकर माले पहुंचे और वहां विद्रोही आतंकियों से सीधा मोर्चा ले लिया। रात 2 बजे तक राष्ट्रपति गयूम को सुरक्षित ढूंढ निकाला गया और तड़के 4 बजकर 30 मिनट पर उन्होंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी से फोन पर बात कर राहत की सांस ली। सुबह 11 बजे तक भारतीय सेना ने पूरे माले को नियंत्रण में लेकर पूरी तरह सुरक्षित घोषित कर दिया। महज 16 घंटे के भीतर भारतीय सेना ने मालदीव में तख्तापलट की पूरी साजिश को नाकाम कर दिया। इस बीच, जब बचे हुए हमलावर कुछ बंधकों को साथ लेकर 'एमवी प्रोग्रेस लाइट' नामक व्यापारिक जहाज पर सवार होकर श्रीलंका की तरफ भागने लगे, तो भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस गोदावरी और आईएनएस बेतवा ने समुद्र में उनका रास्ता रोक लिया। नौसेना ने रॉकेट दागे और सभी 68 बंधकों को सुरक्षित छुड़ा लिया। इस बीच 4 नवंबर की सुबह 44वीं स्क्वाड्रन ने तीन और चक्कर लगाकर अतिरिक्त सैनिकों की खेप पहुंचाई। हालात सामान्य होते ही भारतीय सैनिकों को सम्मानपूर्वक वापस बुला लिया गया। इस सफल अभियान की दुनिया भर में सराहना हुई। अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण योगदान बताया, वहीं ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने भारतीय कार्रवाई की तारीफ करते हुए 'थैंक गॉड फॉर इंडिया' कहकर आभार जताया। 4. इस्लामाबाद के ऊपर सोनिक बूम: 60 हजार फीट की ऊंचाई पर 'गरुड़' का अजेय जलवा यह बात मई 1997 की है। 'द हिंदू' अखबार के कूटनीतिक संवाददाता अमित बरुआ की नई-नई पोस्टिंग पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई थी। 27 मई की सुबह अचानक पूरा इस्लामाबाद एक कानफोड़ू धमाके से दहल उठा। अमित बरुआ ने अपनी चर्चित किताब 'डेटलाइन इस्लामाबाद' में लिखा है कि विस्फोट की भयानक आवाज सुनकर वे घबराकर अपने घर से बाहर सड़क पर भाग आए थे। बरुआ ने मामले की हकीकत जानने के लिए स्थानीय पुलिस थानों और एंबुलेंस सेवाओं को फोन घुमाए, लेकिन कहीं से भी विस्फोट के कारण की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी। शाम ढलते-ढलते पाकिस्तान वायुसेना ने एक चौंकाने वाला बयान जारी किया। उन्होंने स्वीकार किया कि भारतीय वायुसेना के एक मिग-25आर जासूसी विमान ने पाकिस्तानी हवाई सीमा का उल्लंघन किया है। इसी विमान की रफ्तार के कारण इस्लामाबाद के ऊपर कई सोनिक बूम यानी सुपरसोनिक धमाकों की आवाजें सुनाई दी थीं। जब कोई लड़ाकू विमान हवा में ध्वनि की गति से भी तेज रफ्तार से उड़ान भरता है, तो उसके पीछे हवा का भारी दबाव कटने से जो जोरदार गर्जना पैदा होती है, उसे सोनिक बूम कहा जाता है। पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारियों ने अमित बरुआ को बताया कि भारतीय जासूसी विमान करीब 60,000 फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर उड़ रहा था। उस दौर में पाकिस्तानी वायुसेना का कोई भी लड़ाकू विमान, यहां तक कि उसका सबसे उन्नत एफ-16 जेट भी उस बेपनाह ऊंचाई तक पहुंच पाने में सक्षम नहीं था। पाकिस्तानी रणनीतिक विश्लेषक डॉक्टर समीना अहमद ने भी माना कि पाकिस्तान का कोई भी इंटरसेप्टर जेट भारतीय विमान को पकड़ने या रोकने की स्थिति में नहीं था। हालांकि, भारतीय वायुसेना ने इस सनसनीखेज उड़ान को लेकर कभी कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की। दावा किया जाता है कि यह टोही विमान इस्लामाबाद और उसके आसपास स्थित कई बेहद संवेदनशील सामरिक ठिकानों की तस्वीरें लेने आया था। बरुआ अपनी किताब में लिखते हैं कि उन्हें बताया गया था कि भारत ने यह कदम पाकिस्तान को परेशान करने और अपनी हवाई श्रेष्ठता का अहसास कराने के लिए उठाया था। हकीकत तो यह है कि उस दौर में दुनिया को यह भनक तक नहीं थी कि भारतीय वायुसेना के पास सोवियत संघ द्वारा निर्मित शक्तिशाली मिकोयान-गुरेविच मिग-25 विमान मौजूद हैं। इस्लामाबाद के ऊपर हुए इस धमाके से करीब 16 साल पहले, 17 अगस्त 1981 को भारत ने इसके टोही संस्करण को अपनी वायुसेना में शामिल किया था। इन विमानों को बरेली स्थित 102वीं स्क्वाड्रन 'ट्राइसोनिक्स' द्वारा संचालित किया जाता था। इस स्क्वाड्रन में आठ सिंगल-सीट मिग-25आर और दो टू-सीट ट्रेनर जेट शामिल थे। भारतीय वायुसेना ने मिग-25 को 'गरुड़' नाम दिया था, जबकि पश्चिमी सैन्य संगठन नाटो इसे 'फॉक्सबैट' कहकर पुकारता था। सोवियत संघ ने इस विमान को मुख्य रूप से अमेरिकी लंबी दूरी के तेज गति वाले बॉम्बर और जासूसी विमानों का मुकाबला करने के लिए विकसित किया था। इस विमान को उड़ा चुके सेवानिवृत्त एयर मार्शल सुमित मुखर्जी के अनुसार, यह विमान आकाश में कलाबाजियां दिखाने के लिए नहीं बना था, परंतु रफ्तार और ऊंचाई के मामले में दुनिया का कोई भी जेट इसका मुकाबला नहीं कर सकता था। मिग-25 आमतौर पर 65,000 से 85,000 फीट के दायरे में गश्त करता था और जरूरत पड़ने पर यह 90,000 फीट से भी अधिक की ऊंचाई छू सकता था। यह ध्वनि की रफ्तार से करीब तीन गुना तेज यानी मैक 3 की गति से उड़ने में सक्षम था। लंबी दूरी की एक ही उड़ान में यह विमान लगभग 23,000 लीटर ईंधन की खपत करता था। इस टोही विमान में 1,200 मिलीमीटर के विशालकाय कैमरे लगे हुए थे। ये कैमरे इतने शक्तिशाली थे कि बरेली के आकाश में उड़ते हुए भी नई दिल्ली की स्पष्ट तस्वीरें खींच सकते थे। इस विमान के पूर्व पायलट रहे सेवानिवृत्त ग्रुप कैप्टन आलोक चौहान के मुताबिक, यह जेट कुछ ही उड़ानों में पाकिस्तान जैसे बड़े देश का संपूर्ण सामरिक नक्शा तैयार करने की क्षमता रखता था। भारतीय वायुसेना के इस जांबाज 'गरुड़' बेड़े को साल 2006 में पूरे राजकीय सम्मान के साथ सेवामुक्त कर दिया गया। इसका आप पर असर भारतीय वायुसेना के ऐतिहासिक विदेशी अभियानों का यह विवरण देश की रक्षा क्षमताओं और क्षेत्रीय सुरक्षा पर सीधा असर डालता है। • राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा जागरूकता: यह रिपोर्ट आम नागरिकों को भारतीय वायुसेना की लंबी दूरी की मारक क्षमता और तत्परता की जानकारी देती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि संकट के समय सेना कुछ ही घंटों में हजारों किलोमीटर दूर प्रभावी कार्रवाई कर सकती है। • क्षेत्रीय कूटनीति और स्थिरता: पड़ोसी देशों में संकट प्रबंधन की क्षमता से भारत की क्षेत्रीय महाशक्ति की छवि मजबूत होती है। यह दिखाता है कि भारत संकट के समय अपने पड़ोसियों के लिए पहला मददगार साबित होता है। • रक्षा तकनीक और ऐतिहासिक समझ: पाठकों को मिग-21, मिराज-2000 और मिग-25 जैसे विमानों की तकनीकी ताकत और ऐतिहासिक उपयोग का पता चलता है। इससे रक्षा नीति और आधुनिक सैन्य आधुनिकीकरण के महत्व को समझने में मदद मिलती है। • सैन्य सेवा के प्रति रुझान: युवाओं में वायुसेना और सशस्त्र बलों में शामिल होने के लिए जरूरी प्रेरणा और जानकारी मिलती है। यह साहसिक इतिहास सैन्य करियर चुनने वाले छात्रों के लिए प्रेरक साबित होता है। ऐसा क्यों हुआ भारतीय वायुसेना के इन चार ऐतिहासिक अभियानों के पीछे अलग-अलग सैन्य, मानवीय और रणनीतिक परिस्थितियां जिम्मेदार थीं, जिन्होंने भारत को अपनी सीमाओं से बाहर कार्रवाई करने के लिए प्रेरित किया। • 1971 में युद्ध का त्वरित समापन: पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना आत्मसमर्पण में देरी कर रही थी और ढाका में गवर्नर हाउस में उच्चस्तरीय बैठक हो रही थी। इस बैठक को रॉकेट हमलों से भंग कर पाकिस्तानी नेतृत्व पर भारी मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना जरूरी था ताकि युद्ध तुरंत समाप्त हो सके। • जाफना में गहराता मानवीय संकट: 1987 में श्रीलंकाई सेना की नाकेबंदी के कारण जाफना के तमिल नागरिक भोजन और दवाओं की भीषण कमी से जूझ रहे थे। समुद्री रास्ते से भेजी गई भारतीय राहत सामग्री को रोके जाने के बाद वायुसेना ने हवाई मार्ग से मदद गिराने का निर्णय लिया। • मालदीव में विदेशी भाड़े के सैनिकों का हमला: 1988 में श्रीलंका के पीएलओटीई लड़ाकों ने मालदीव के राष्ट्रपति भवन और प्रमुख ठिकानों पर कब्जा कर लिया था। राष्ट्रपति की सीधी अपील और हिंद महासागर में स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत ने ऑपरेशन कैक्टस शुरू किया। • सामरिक जासूसी और हवाई श्रेष्ठता: शीतयुद्ध के दौर में दुश्मन के संवेदनशील सैन्य ठिकानों की निगरानी के लिए मिग-25 जैसे अत्याधुनिक और अजेय विमान की जरूरत थी। इस्लामाबाद के ऊपर भरी गई सुपरसोनिक उड़ान भारत की तकनीकी बढ़त और निगरानी क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण थी। सवाल-जवाब 1. 1971 में ढाका के गवर्नर हाउस पर हमले में किस स्क्वाड्रन के विमान शामिल थे? इस हमले में गुवाहाटी की 28वीं स्क्वाड्रन के चार मिग-21 और हाशिमारा की 37वीं स्क्वाड्रन के दो हंटर लड़ाकू विमान शामिल थे। 2. ऑपरेशन पुमलाई के तहत जाफना में कितनी राहत सामग्री गिराई गई थी? पांच एएन-32 मालवाहक विमानों के जरिए लगभग 25 टन राहत सामग्री पैराशूट की मदद से जाफना के पास गिराई गई थी। 3. मालदीव में ऑपरेशन कैक्टस के दौरान भारतीय सेना ने किस हवाई अड्डे पर लैंडिंग की थी? भारतीय वायुसेना के आईएल-76 विमानों ने हुलहुले द्वीप के हवाई अड्डे पर रात के अंधेरे में सफल लैंडिंग की थी। 4. भारतीय वायुसेना में मिग-25 विमान को किस नाम से जाना जाता था? भारतीय वायुसेना में मिग-25 विमान को 'गरुड़' नाम दिया गया था, जबकि नाटो इसे 'फॉक्सबैट' कहता था। 5. 1997 में इस्लामाबाद के ऊपर सोनिक बूम क्यों सुनाई दिया था? भारतीय वायुसेना का मिग-25आर विमान ध्वनि की गति से तेज यानी सुपरसोनिक रफ्तार से उड़ रहा था, जिससे जोरदार सोनिक बूम पैदा हुआ। https://trendkia.com/investigations/dhaka-ke-gavarnara-hausa-para-roketa-se-maldives-takhtapalata-taka-janie-vayusena-ke-chara-sabase-hairataangeja-videshi-mishana-44844 TrendKia — Har trend, sabse pehle.