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  "type": "article",
  "title": "धान पैदावार में 17 वर्षों की सबसे बड़ी गिरावट के आसार, सरकारी गोदामों में छह गुना अनाज के बावजूद बढ़ रहीं कीमतें",
  "summary": "कम मानसूनी बारिश और सूखे के चलते देश में चावल उत्पादन में 1 करोड़ टन की गिरावट का अनुमान है। केंद्रीय गोदामों में तय कोटे से छह गुना अधिक स्टॉक होने के बाद भी खुले बाजार में कई किस्मों के दाम 7 से 30 फीसदी तक चढ़ गए हैं।",
  "content": "खरीफ सत्र में मॉनसून की बेरुखी और सूखे के असर से देश में चावल की कुल पैदावार में पिछले 17 वर्षों की सबसे भारी गिरावट दर्ज होने का अनुमान जताया गया है। चालू वर्ष में धान का उत्पादन बीते वर्ष के मुकाबले 1 करोड़ टन कम रहने का आकलन है। इससे पूर्व वर्ष 2009 में चावल उत्पादन में 10.1 फीसदी की भारी कमी देखी गई थी, जिसके चलते खुले बाजार में कीमतें 20 फीसदी तक उछल गई थीं। हालांकि केंद्र सरकार के गोदामों में तय सीमा से लगभग छह गुना अधिक अनाज जमा है, फिर भी मंडियों और खुदरा दुकानों पर रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली गैर-बासमती और प्रीमियम किस्मों के भाव तेजी से चढ़ने लगे हैं।\n\nउत्पादन आंकड़ों में 10 साल बाद पहला संकुचन\nकृषि विशेषज्ञों और आधिकारिक आकलनों के मुताबिक वर्ष 2026 में देश का कुल चावल उत्पादन 14.4 करोड़ टन रहने की संभावना है। यह आंकड़ा वर्ष 2025 में दर्ज 15.4 करोड़ टन उत्पादन से लगभग 6.5 फीसदी कम है। पिछले एक दशक में यह पहला मौका होगा जब देश में धान की कुल पैदावार में सीधे तौर पर कमी आ रही है। चूंकि खेतों में फसलों की कटाई का दौर अभी जारी है, इसलिए यह अंतिम आंकड़ा न होकर प्राथमिक अनुमान माना जा रहा है।\n\nउत्पादन घटने के पीछे ये चार बड़े कारण\nचावल की पैदावार में इस तेज गिरावट के पीछे मौसम और सिंचाई से जुड़े कई गंभीर कारक जिम्मेदार माने जा रहे हैं\n\n1. मुख्य उत्पादक राज्यों में 40 फीसदी तक कम वर्षा: धान की फसल को भरपूर पानी की आवश्यकता होती है। जुलाई तक मध्य प्रशांत महासागर में अल नीनो की परिस्थितियां बन गई थीं, जिसका सीधा असर 1 जून से शुरू हुए चार महीने के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर पड़ा। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जून से सितंबर के दौरान पूरे देश में सामान्य से 12 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। वहीं पंजाब, बिहार, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, केरल और तेलंगाना जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में बारिश की कमी 40 फीसदी तक पहुंच गई। ये सातों राज्य मिलकर देश के कुल चावल उत्पादन में 45 फीसदी का योगदान देते हैं।\n\n2. धान के बुवाई रकबे में 3.6 फीसदी की कमी: देश की कुल कृषि उपज में खरीफ फसलों की हिस्सेदारी करीब 80 फीसदी है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 25 सितंबर तक खरीफ धान का कुल रकबा 4.31 करोड़ हेक्टेयर दर्ज किया गया, जो पिछले वर्ष के 4.47 करोड़ हेक्टेयर की तुलना में 3.6 फीसदी कम है।\n\n3. दाना पकने के समय सूखे की मार: जब खेतों में धान की बालियां पकने और दाना बनने की अवस्था में थीं, उस वक्त बारिश सामान्य से काफी कम रही। राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष बी.वी. कृष्ण राव के अनुसार, हालिया हफ्तों में लंबे समय तक चले सूखे दौर ने दक्षिणी और पूर्वी राज्यों में प्रति हेक्टेयर उपज की संभावनाओं को बड़ा झटका दिया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि केवल बुवाई का क्षेत्रफल ही नहीं घटा, बल्कि प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में भी कमी आने की पूरी आशंका है।\n\n4. जलाशयों का खाली रहना और रबी पर खतरा: कृषि व्यापार कंपनी ओलम एग्री इंडिया के डिप्टी कंट्री हेड नितिन गुप्ता के मुताबिक, जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य से काफी नीचे रहने के कारण सर्दियों में बोए जाने वाले रबी धान के रकबे और उत्पादन में भी गिरावट आने की आशंका है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार 24 सितंबर को देश के 178 प्रमुख जलाशयों में जलस्तर 70.8 फीसदी था, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 89.7 फीसदी भरा हुआ था।\n\nबाजार में क्या दिख रहा है असर\nयद्यपि वर्तमान समय में अनाज मंडियों में चावल की आपूर्ति सामान्य बनी हुई है, परंतु पैदावार कम होने की आशंकाओं के कारण कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। उपभोक्ता मामलों के विभाग के अनुसार, चावल के खुदरा भाव पिछले वर्ष की तुलना में 7 फीसदी तक चढ़ चुके हैं। 27 सितंबर को चावल की औसत कीमत 45.77 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई।\n\nप्रीमियम गैर-बासमती चावल की दरों में भी बड़ा उछाल आया है। दक्षिण भारत में लोकप्रिय सोना मसूरी की कीमत 25 फीसदी बढ़कर 58 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई है, जबकि पूर्वी राज्यों में व्यापक तौर पर खाया जाने वाला स्वर्ण चावल 10 फीसदी महंगा होकर 35 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रहा है। वहीं मंडियों में बासमती धान की नई आवक शुरू हो चुकी है, जिसका वर्तमान भाव पिछले साल से 30 फीसदी अधिक यानी 4,000 रुपये प्रति क्विंटल चल रहा है।\n\nभारत वैश्विक स्तर पर चावल उत्पादन में 28 फीसदी और निर्यात में 45 फीसदी हिस्सेदारी रखता है, जिससे यह दुनिया का शीर्ष निर्यातक देश है। भारत के बाद सबसे बड़े निर्यातक देश थाईलैंड और वियतनाम में भी कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं। ऐसे में भारत में उपज घटने और दाम बढ़ने का असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है, जो ईरान युद्ध के चलते पहले से ही तनाव में है। बी.वी. कृष्ण राव बताते हैं कि जब किसानों को खुले बाजार में बेहतर किस्मों के ऊंचे दाम मिलेंगे, तो वे सरकारी खरीद केंद्रों पर कम अनाज बेचेंगे, जिसका सीधा असर सरकारी खरीद पर पड़ेगा।\n\nगोदामों में छह गुना भंडार, फिर भी चिंता क्यों?\nकम पैदावार का तात्पर्य यह कतई नहीं है कि देश में तत्काल कोई गहरा खाद्यान्न संकट आ जाएगा, क्योंकि केंद्रीय गोदामों में लगभग 6 करोड़ टन का बफर स्टॉक मौजूद है। सरकार हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP पर किसानों से धान खरीदती है, जो वर्ष 2026-27 के लिए 2,441 रुपये प्रति क्विंटल तय है। खरीदा गया धान भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों में रखा जाता है, जहां से इसे घरेलू उपभोग, एथेनॉल निर्माण, निर्यात और अन्य जरूरतों के लिए आवंटित किया जाता है।\n\nसरकार का लक्ष्य 1 अक्टूबर 2026 तक 1.03 करोड़ टन का आरक्षित स्टॉक बनाए रखने का था, जबकि 1 सितंबर 2026 तक धान का वास्तविक स्टॉक 5.96 करोड़ टन दर्ज किया गया, जो अनिवार्य जरूरत से लगभग छह गुना ज्यादा है। इतना बड़ा भंडार इसलिए एकत्र हुआ क्योंकि जुलाई 2023 से अक्टूबर 2024 के बीच सरकार ने बासमती को छोड़कर अन्य सभी किस्मों के निर्यात पर रोक लगा दी थी, क्योंकि उस दौरान घरेलू कीमतें 11 फीसदी बढ़ चुकी थीं। इस निर्यात प्रतिबंध से गोदामों में स्टॉक बढ़ता चला गया।\n\nइतने विशाल भंडार के बावजूद विशेषज्ञों और उद्योग जगत में चिंता के तीन प्रमुख कारण हैं\n\n1. पूरा भंडार तत्काल खाने योग्य चावल नहीं: केंद्रीय भंडार के 6 करोड़ टन स्टॉक में से एक बड़ा हिस्सा बिना पिसा हुआ धान है। यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर की भारत रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2026 तक सरकारी स्टॉक में लगभग 3.5 करोड़ टन कच्चा धान था। इसे मिलों में भेजकर खाने योग्य चावल में बदलने में अतिरिक्त समय लगता है। इसके अलावा गोदामों में बासमती, सामान्य सफेद चावल के साथ-साथ मोटा और टूटा हुआ चावल भी शामिल है, जबकि आम घरों में दैनिक भोजन के लिए चुनिंदा किस्मों का ही उपयोग किया जाता है।\n\n2. एथेनॉल उत्पादन में भारी खपत: पेट्रोल में मिश्रण के लिए बनाए जाने वाले एथेनॉल में एफसीआई के चावल की बड़ी मात्रा खपाई जा रही है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, एथेनॉल निर्माण में 24.64 फीसदी चावल एफसीआई के स्टॉक से आता है। वर्ष 2024-25 में इसके लिए करीब 50 लाख टन चावल आवंटित किया गया था। वहीं 2025-26 में 72 लाख टन चावल आरक्षित रखा गया, जिसमें से जून 2025 से जून 2026 के बीच डिस्टिलरी कंपनियों को 63.5 लाख टन चावल की आपूर्ति की जा चुकी है।\n\n3. सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लिए कोटा: गोदामों में रखे अनाज को सीधे खुले बाजार में आम जनता को नहीं बेचा जा सकता। इसका एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और मुफ्त राशन योजनाओं के लिए सुरक्षित रहता है। नियमों के तहत पीडीएस और आपातकालीन जरूरतों का कोटा अलग रखने के बाद जो अधिशेष बचता है, केवल वही खुले बाजार में उतारा जा सकता है।\n\nपोल्ट्री और सहयोगी उद्योगों पर भी असर\nबारिश की कमी का प्रभाव केवल खरीफ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रबी बुवाई पर भी इसके असर से आगामी वर्ष के स्टॉक पर दबाव बन सकता है। इसके अतिरिक्त, टूटे हुए चावल पर निर्भर सहयोगी उद्योगों पर संकट गहराने लगा है। उदाहरण के लिए पोल्ट्री उद्योग में मुर्गियों के आहार पर कुल खर्च का लगभग 70 फीसदी खर्च होता है, जिसमें मुख्य घटक टूटा हुआ चावल होता है। पंजाब के प्रमुख बासमती निर्यातक जैसन ग्रेंस के सीएमडी रणजीत सिंह जैसन का कहना है कि अक्टूबर के पहले हफ्ते तक उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा की मंडियों में चावल की आवक बढ़ जाएगी। इससे बासमती की कीमतों में नरमी आने की उम्मीद है, जिसके बाद ही बाजार की सटीक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।\n\nइसका आप पर असर\nधान के कम उत्पादन से खुदरा बाजारों में चावल की कीमतों में इजाफा हो रहा है, जिससे आम परिवारों के मासिक बजट पर सीधा असर पड़ रहा है।\n\n• भारत में: गैर-बासमती और बासमती चावल की खुदरा कीमतों में 7 से 30 फीसदी तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उपभोक्ताओं को अपनी दैनिक रसोई के लिए चावल की सामान्य और प्रीमियम किस्मों के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है।\n• धान उत्पादक राज्यों में: पंजाब, हरियाणा, बिहार, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में 40 फीसदी तक कम वर्षा के चलते किसानों की प्रति हेक्टेयर उपज पर मार पड़ी है। पैदावार घटने से छोटे और सीमांत किसानों की आय प्रभावित हो सकती है, हालांकि मंडियों में अच्छे दाम मिलने से कुछ राहत भी है।\n• पोल्ट्री एवं डेयरी कारोबारियों के लिए: मुर्गियों के चारे में मुख्य रूप से इस्तेमाल होने वाले टूटे चावल की उपलब्धता कम होने से लागत बढ़ेगी। पोल्ट्री फार्मिंग में लगभग 70 फीसदी खर्च आहार पर होता है, जिससे आने वाले दिनों में अंडे और चिकन की उत्पादन लागत बढ़ सकती है।\n• वैश्विक खाद्य बाजार: भारत से चावल का कुल निर्यात 45 फीसदी होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी आपूर्ति की कमी महसूस हो सकती है। थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में कीमतें पहले ही बढ़ रही हैं, जिससे वैश्विक खाद्य व्यापार पर अतिरिक्त दबाव रहेगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nचालू खरीफ सत्र में धान उत्पादन में भारी कमी मुख्य रूप से मॉनसून की विफलता, अल नीनो के प्रभाव और बुवाई क्षेत्र में संकुचन के कारण हुई है। इसके साथ ही फसल पकने के नाजुक समय में पड़े सूखे ने प्रति हेक्टेयर पैदावार को गहरा नुकसान पहुंचाया है।\n\n• अल नीनो और कमजोर मॉनसून: जुलाई में प्रशांत महासागर में अल नीनो प्रणाली सक्रिय होने के कारण दक्षिण-पश्चिम मॉनसून कमजोर पड़ गया। इसके चलते देश भर में 12 फीसदी कम वर्षा हुई और प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में यह कमी 40 फीसदी तक पहुंच गई।\n• बुवाई रकबे में गिरावट: पानी की कमी और मानसूनी अनिश्चितता के कारण किसानों ने पिछले साल के 4.47 करोड़ हेक्टेयर के मुकाबले केवल 4.31 करोड़ हेक्टेयर में धान बोया। कुल रकबे में 3.6 फीसदी की इस कमी ने सीधे तौर पर कुल पैदावार को सीमित कर दिया।\n• फसल पकने के समय सूखा: जब धान की बालियों में दाना भर रहा था, तब दक्षिणी और पूर्वी राज्यों में लंबे समय तक बारिश नहीं हुई। इस सूखे ने खड़ी फसलों की उत्पादकता को गंभीर नुकसान पहुंचाया, जिससे प्रति हेक्टेयर उत्पादन गिर गया।\n• जलाशयों में कम जलस्तर: देश के 178 प्रमुख जलाशयों में जलभराव घटकर 70.8 फीसदी रह गया, जो पिछले साल 89.7 फीसदी था। सिंचाई नहरों में पानी की कमी ने न केवल खरीफ को प्रभावित किया, बल्कि आगामी रबी सत्र की बुवाई पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. वर्ष 2026 में देश में चावल उत्पादन में कितनी कमी आने का अनुमान है?\nइस वर्ष चावल उत्पादन में 1 करोड़ टन की गिरावट का अनुमान है, जिससे कुल पैदावार घटकर 14.4 करोड़ टन रह सकती है।\n\n2. क्या सरकारी गोदामों में चावल का पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है?\nहां, 1 सितंबर 2026 तक सरकारी गोदामों में 5.96 करोड़ टन धान का स्टॉक था, जो 1.03 करोड़ टन के अनिवार्य बफर लक्ष्य से लगभग छह गुना अधिक है।\n\n3. गोदामों में पर्याप्त अनाज होने के बावजूद खुदरा बाजार में कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?\nसरकारी स्टॉक का बड़ा हिस्सा कच्चा धान है जिसे मिलिंग की आवश्यकता होती है, साथ ही यह अनाज कल्याणकारी योजनाओं और एथेनॉल निर्माण के लिए आरक्षित है, जिससे खुले बाजार में तत्काल आपूर्ति सीमित रहती है।\n\n4. किन प्रमुख राज्यों में बारिश की कमी का सबसे बुरा असर पड़ा है?\nपंजाब, बिहार, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, केरल और तेलंगाना में सामान्य से 40 फीसदी तक कम बारिश हुई है, जो देश का 45 फीसदी चावल पैदा करते हैं।\n\n5. खुले बाजार में चावल की कीमतों पर कितना असर देखा गया है?\nचावल की औसत खुदरा कीमतें 7 फीसदी बढ़कर 45.77 रुपये प्रति किलो हो गई हैं, जबकि सोना मसूरी जैसी प्रीमियम किस्में 25 फीसदी तक महंगी हो चुकी हैं।\n\n6. धान उत्पादन में गिरावट का पोल्ट्री उद्योग पर क्या असर पड़ेगा?\nपोल्ट्री फार्मिंग में मुर्गियों के चारे पर कुल लागत का 70 फीसदी खर्च होता है, जो मुख्य रूप से टूटे हुए चावल से तैयार होता है। चावल महंगा होने से पोल्ट्री फीड की लागत बढ़ सकती है।",
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  "publishedAt": "2026-09-29",
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