# धनतेरस पर क्यों खूब खरीदे जाते हैं महारानी विक्टोरिया के सिक्के, जानिए इनके पीछे का इतिहास और असली-नकली की पहचान

> धनतेरस और लक्ष्मी पूजन पर महारानी विक्टोरिया की तस्वीर वाले ब्रिटिश कालीन सिक्कों की भारी मांग रहती है, लेकिन बाजार में नकली सिक्कों का जाल भी फैला है। जानिए इन सिक्कों का इतिहास और खुद को ठगी से बचाने के कानूनी व व्यावहारिक तरीके।

**Type:** article · **Category:** पड़ताल · **Published:** 2026-11-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/investigations/dhanteras-para-kyon-khuba-kharide-jate-hain-queen-victoria-ke-sikke-janie-inake-pichhe-ka-itihasa-aura-asali-nakali-ki-pahachana-56756 · **Language:** Hindi
**Tags:** महारानी विक्टोरिया सिक्के, धनतेरस खरीदारी, चांदी के सिक्के, ब्रिटिश कालीन मुद्रा, नकली सिक्कों की पहचान, उपभोक्ता संरक्षण कानून

दीपावली और धनतेरस के पावन मौके पर सोना और चांदी खरीदना भारतीय समाज में बेहद शुभ माना जाता है। समृद्धि और सौभाग्य की कामना के साथ लोग धातुओं की खरीदारी करते हैं, लेकिन सराफा बाजार में एक बेहद दिलचस्प चलन दशकों से बना हुआ है। महारानी विक्टोरिया के निधन को एक सदी से भी अधिक समय बीत चुका है, फिर भी भारतीय बाजारों में उनके चित्र वाले चांदी के सिक्कों की मांग त्योहारों पर आसमान छूने लगती है। कुछ खरीदार इन्हें ऐतिहासिक धरोहर और दुर्लभता के लिहाज से सहेजते हैं, जबकि कई लोग इन सिक्कों को सीधे तौर पर धन और सौभाग्य से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, बाजार में उपलब्ध हर विक्टोरिया सिक्का असली हो, यह बिल्कुल जरूरी नहीं है। ब्रिटिश कालीन असली सिक्कों के नाम पर हूबहू दिखने वाली आधुनिक प्रतिकृतियां भी धड़ल्ले से बिकती हैं।

## धनतेरस पर ब्रिटिश सिक्कों के आकर्षण की असल वजह
धनतेरस के पावन पर्व पर महारानी विक्टोरिया के सिक्कों के प्रति खरीदारों का रुझान मुख्य रूप से उनकी चांदी की मात्रा, ऐतिहासिक अहमियत और समृद्धि की लोकमान्यताओं के कारण होता है। पारंपरिक तौर पर इस त्योहार पर कीमती धातुओं का क्रय शुभ फलदायी माना गया है। कई परिवारों में यह गहरी आस्था बन चुकी है कि विक्टोरिया सिक्कों की खरीदारी करने या दीवाली पर लक्ष्मी पूजन में उनकी पूजा करने से घर में संपन्नता और खुशहाली आती है।

सिक्का संग्रहकर्ताओं यानी न्यूमिस्मैटिस्ट्स के लिए इन सिक्कों का महत्व उनकी उम्र, बनावट, दुर्लभता और भारत में ब्रिटिश हुकूमत के दौर से सीधे जुड़ाव की वजह से है। हालांकि, किसी भी सिक्के का असल बाजार मूल्य सिर्फ उस पर छपे चेहरे या पुराने साल से तय नहीं होता। सिक्के की वास्तविक कीमत उसकी चांदी की शुद्धता, वर्तमान भौतिक स्थिति, दुर्लभता और बाजार में मौजूद मांग पर निर्भर करती है। किसी सिक्के पर पुरानी तारीख या महारानी का चित्र होने भर से वह अपने आप बेशकीमती या असली साबित नहीं हो जाता।

## भारतीय सिक्कों पर महारानी का चेहरा और क्राउन शासन का बदलाव
भारतीय सिक्कों पर महारानी विक्टोरिया का चित्र पहली बार वर्ष 1840 में सामने आया था। उस दौर में भारत के बड़े भूभाग पर ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण था और ये सिक्के कंपनी शासन के तहत ही ढाले गए थे। इसके बाद 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ने सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल दिया। वर्ष 1858 में ब्रिटिश हुकूमत यानी क्राउन ने सीधे तौर पर भारत का शासन अपने हाथों में ले लिया। क्राउन शासन के तहत पहले आधिकारिक सिक्कों की ढलाई वर्ष 1862 में शुरू हुई।

साम्राज्य में महारानी विक्टोरिया के बदलते पद और रुतबे के साथ सिक्कों पर अंकित शब्दों और उपाधियों में भी सिलसिलेवार बदलाव किए गए

- **वर्ष 1840:** ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में पहली बार भारतीय सिक्कों पर महारानी विक्टोरिया का चित्र उकेरा गया।
- **वर्ष 1862:** ब्रिटिश क्राउन के प्रत्यक्ष नियंत्रण के बाद जारी किए गए नए सिक्कों पर ‘विक्टोरिया क्वीन’ की आधिकारिक उपाधि दर्ज की गई।
- **वर्ष 1877:** जब विक्टोरिया को औपचारिक तौर पर भारत की साम्राज्ञी घोषित किया गया, तब सिक्कों के डिजाइन बदले गए और उन पर ‘विक्टोरिया एम्प्रेस’ लिखा जाने लगा।

सिक्कों पर हुए ये उत्कीर्णन भारत पर ब्रिटेन के बढ़ते राजनीतिक और प्रशासनिक शिकंजे को दर्शाते हैं। इसके बावजूद संग्रह की दुनिया में हर विक्टोरिया सिक्का विरल नहीं माना जाता। उसकी ऐतिहासिक और मौद्रिक अहमियत धातु के वजन, शुद्धता, संरक्षण की स्थिति और उसकी कुल उपलब्धता पर ही निर्भर करती है।

## सिक्कों पर छेद, निशान और कट के पीछे की हकीकत
विक्टोरिया काल के अनेक सिक्कों पर विशेष प्रकार के निशान, कट या बीच में छेद देखने को मिलते हैं। आम लोग अक्सर इन्हें बनावट की खामी मान लेते हैं, लेकिन इसके पीछे ठोस ऐतिहासिक और व्यावहारिक कारण रहे हैं

- **टकसाल के निशान (मिंट मार्क्स):** सिक्कों पर बने छोटे बिंदु या अंग्रेजी अक्षर यह दर्शाते थे कि वह सिक्का किस विशिष्ट टकसाल में ढाला गया है। इसके अलावा कुछ विशेष संस्करणों की पहचान भी इनसे होती थी। उदाहरण के तौर पर 1862 की तारीख वाले कुछ सिक्कों पर उकेरे गए बिंदुओं की संख्या सिक्के के ढलाई के वास्तविक वर्ष की ओर संकेत करती थी।
- **जांच के निशान (श्रॉफ मार्क्स):** पुराने दौर में सर्राफ या मुद्रा बदलने वाले पैसे की शुद्धता परखने के लिए उस पर नुकीले औजार से निशान लगाते थे या हल्का सा कट लगाते थे। यह जांचने का तरीका था कि सिक्के के भीतर असली चांदी है या अंदर कोई मिलावटी धातु भरी है। भारत में इन निशानों को श्रॉफ मार्क्स के नाम से जाना जाता है।
- **छेद वाले सिक्के:** कई पुराने सिक्कों में आर-पार छेद नजर आते हैं। दरअसल, लोग इन ऐतिहासिक सिक्कों को धागे या जंजीर में पिरोकर आभूषण के तौर पर गले में पहनते थे अथवा सजावट की चीजों में इस्तेमाल करने के लिए उनमें सुराख कर देते थे।

## धन और समृद्धि से कैसे जुड़ी विदेशी शासक की छवि
धनतेरस पर सोने और चांदी के सिक्कों की खरीदारी तथा पूजा-अर्चना सदियों पुरानी भारतीय परंपरा है। राजस्थान से मिले 19वीं सदी के एक ऐतिहासिक विवरण में धनतेरस पर सोने और चांदी के सिक्कों के पूजन का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। यह ऐतिहासिक साक्ष्य प्रमाणित करता है कि सिक्का पूजन की यह रीत महारानी विक्टोरिया के सिक्कों के चलन में आने से पहले से ही समाज में पूरी तरह स्थापित थी।

समय बीतने के साथ, जब बाजार में विक्टोरिया कालीन चांदी के रुपयों का भारी प्रचलन हुआ, तो खरीदार उनकी उच्च चांदी गुणवत्ता, प्राचीनता और ऐतिहासिक मूल्य के कारण उन्हें शुभता का प्रतीक मानने लगे। दिल्ली के वर्ष 2014 के एक विवरण में एक खरीदार ने महारानी विक्टोरिया की तुलना देवी लक्ष्मी से तक कर दी थी। हालांकि, उसी समय एक जौहरी ने स्पष्ट किया था कि अधिकांश सामान्य ग्राहक महारानी के चेहरे से ज्यादा सिक्के में मौजूद ठोस चांदी की वजह से उसे खरीदने में रुचि रखते हैं।

## असली बनाम नकली: बाजार का यथार्थ और जांच के ठोस तरीके
मौजूदा समय में भारतीय बाजारों में मूल ब्रिटिश कालीन पुराने सिक्के और हाल ही में तैयार की गई नई प्रतिकृतियां (रेप्लिका) दोनों ही बेची जा रही हैं। बाजार में मौजूद कुल सिक्कों में से कितने असली हैं और कितने केवल नकल, इसका कोई सटीक या पुख्ता आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। वर्ष 2014 के एक विवरण के अनुसार दिल्ली-एनसीआर की दुकानों में पुराने विक्टोरिया सिक्के और उनकी आधुनिक प्रतिकृतियां दोनों बिक रही थीं। इसी तरह पटना से आए वर्ष 2010 के एक विवरण में सामने आया था कि नए ढाले गए सिक्कों को रासायनिक व अन्य तरीकों से जानबूझकर पुराना रूप देकर प्राचीन धरोहर के रूप में बेचा जा रहा था।

सिक्का खरीदते समय किसी भी प्रकार के धोखे से बचने के लिए ग्राहकों को कुछ आवश्यक सावधानियां बरतनी चाहिए

- **वर्ष और लिखावट का मिलान:** सिक्के पर दर्ज साल, महारानी विक्टोरिया की उपाधि (क्वीन अथवा एम्प्रेस) और अन्य बारीकियों का मिलान विश्वसनीय न्यूमिस्मैटिक कैटलॉग में दर्ज असली नमूनों से करें।
- **वजन और व्यास की जांच:** ब्रिटिश सरकार के मूल मानकों के अनुसार सिक्के के आधिकारिक वजन और उसके व्यास की सटीक माप करें कि वह मूल विनिर्देशों से मेल खाता है या नहीं।
- **टकसाल चिह्नों का सूक्ष्म निरीक्षण:** सिक्के पर मौजूद बारीक मिंट निशानों की जांच करें, जो यह स्पष्ट करते हैं कि सिक्का कब और किस टकसाल में तैयार किया गया था।
- **विशेषज्ञ की निष्पक्ष सलाह:** यदि आप कोई दुर्लभ या महंगा सिक्का खरीदने जा रहे हैं, तो अंतिम फैसला लेने से पहले किसी स्वतंत्र सिक्का विशेषज्ञ यानी न्यूमिस्मैटिस्ट से उसकी प्रामाणिकता अवश्य जांच करवाएं।
- **स्पष्ट पक्का बिल:** विक्रेता से खरीदारी का पक्का इनवॉइस जरूर मांगें, जिसमें स्पष्ट तौर पर लिखा हो कि सिक्का मूल ऐतिहासिक दस्तावेज है या आधुनिक प्रतिकृति, साथ ही उसमें धातु के प्रकार और उसकी शुद्धता का पूरा ब्योरा दर्ज होना चाहिए।

यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि आधुनिक प्रतिकृति भी असली चांदी से बनाई जा सकती है। केवल चांदी की जांच करा लेने से यह बिल्कुल सिद्ध नहीं होता कि सिक्का ब्रिटिश शासनकाल में ही ढाला गया था।

## नकली सिक्कों के खिलाफ खरीदारों के कानूनी अधिकार
उपभोक्ता संरक्षण कानून, 2019 (कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019) के तहत किसी आधुनिक प्रतिकृति को ब्रिटिश काल का असली सिक्का बताकर बेचना, या उसकी उम्र, चांदी की शुद्धता और ऐतिहासिक सत्यता को लेकर झूठे दावे करना अनुचित व्यापार व्यवहार (अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस) की श्रेणी में आता है।

हालांकि, किसी आधुनिक प्रतिकृति का विक्रय करना अपने आप में कोई गैरकानूनी कार्य नहीं है, बशर्ते दुकानदार ग्राहक को अंधेरे में न रखे और स्पष्ट करे कि वह प्रतिकृति बेच रहा है। यदि आप धोखाधड़ी के शिकार होते हैं, तो विक्रेता के बिल, विज्ञापन, संदेश और न्यूमिस्मैटिस्ट की जांच रिपोर्ट को पुख्ता सबूत के तौर पर सहेज कर रखें। विक्रेता द्वारा समाधान न किए जाने पर उपभोक्ता राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन नंबर 1915 पर संपर्क कर सकते हैं या संबंधित उपभोक्ता आयोग में औपचारिक शिकायत दर्ज करा सकते हैं। दोष सिद्ध होने पर आयोग धन वापसी, हर्जाना या भ्रामक व्यवहार पर रोक का आदेश दे सकता है, लेकिन कानून स्वचालित रिफंड नहीं देता, उपभोक्ता को भ्रामक दावों का प्रमाण प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है।

## इसका आप पर असर
धनतेरस पर चांदी और ऐतिहासिक सिक्के खरीदने वाले आम उपभोक्ताओं को वित्तीय नुकसान और कानूनी पेचीदगियों से बचने के लिए सतर्क रहने की जरूरत है।

- **भारत में:** धनतेरस पर चांदी के सिक्के खरीदते समय सिर्फ धातु की शुद्धता ही नहीं, बल्कि सिक्के के असली या रेप्लिका होने की पुष्टि जरूर करें। नए सिक्के भी शुद्ध चांदी में ढाले जाते हैं, इसलिए केवल चांदी की जांच से ब्रिटिश काल का सिक्का प्रमाणित नहीं होता।
- **खरीदारी का बिल:** विक्रेता से हमेशा विस्तृत बिल लें जिसमें सिक्के का काल और धातु की शुद्धता साफ लिखी हो। बिना लिखित प्रमाण के ठगी साबित करना और रिफंड हासिल करना कानूनी तौर पर बेहद मुश्किल हो जाता है।
- **शिकायत और हेल्पलाइन:** यदि कोई दुकानदार आधुनिक सिक्के को प्राचीन बताकर बेचता है, तो राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915 पर शिकायत दर्ज कराएं। साक्ष्य होने पर उपभोक्ता आयोग से पूरा रिफंड और मुआवजा प्राप्त किया जा सकता है।
- **विशेषज्ञ जांच:** अधिक कीमत वाले दुर्लभ सिक्के खरीदने से पहले किसी प्रमाणित न्यूमिस्मैटिस्ट से उसकी जांच करा लें। इससे नकली या रासायनिक रूप से पुराने दिखाए गए सिक्कों पर अपनी मेहनत की कमाई गंवाने से बचा जा सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
महारानी विक्टोरिया के सिक्कों की त्योहारों पर भारी मांग और बाजार में नकली सिक्कों के प्रसार के पीछे ऐतिहासिक आस्था, चांदी का विश्वसनीय मानक और अनुचित व्यापारिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति शामिल है।

- **सांस्कृतिक व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:** 19वीं सदी से ही भारत में धनतेरस पर सिक्कों के पूजन की परंपरा रही है, जो बाद में ब्रिटिश काल के उच्च शुद्धता वाले चांदी रुपयों से जुड़ गई। लोगों में यह धारणा बन गई कि विक्टोरिया के सिक्के समृद्धि लाते हैं, जिससे इनकी मांग लगातार बनी रही।
- **शासन परिवर्तन और सिक्कों का विकास:** 1840 में ईस्ट इंडिया कंपनी और 1858 के बाद ब्रिटिश क्राउन द्वारा बड़े पैमाने पर ये सिक्के जारी किए गए। 1862 और 1877 में उपाधियों में हुए बदलावों ने इन सिक्कों को ऐतिहासिक और संग्रहणीय पहचान दी।
- **मुनाफे के लिए आधुनिक प्रतिकृतियां:** बाजार में मांग अधिक होने और असली प्राचीन सिक्कों की सीमित आपूर्ति के कारण आधुनिक कार्यशालाओं द्वारा हूबहू दिखने वाली प्रतिकृतियां बनाई जाने लगीं। कुछ विक्रेता अधिक लाभ कमाने के लिए नए सिक्कों को कृत्रिम रूप से पुराना दिखाकर प्राचीन के नाम पर बेचने लगे।

## सवाल-जवाब

### 1. धनतेरस पर महारानी विक्टोरिया के सिक्कों की इतनी मांग क्यों रहती है?
इन सिक्कों की मांग उनकी चांदी की मात्रा, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और लोगों में धन व सौभाग्य लाने की लोकमान्यता के कारण रहती है।

### 2. भारतीय सिक्कों पर महारानी विक्टोरिया की तस्वीर पहली बार कब छपी थी?
विक्टोरिया का चित्र पहली बार 1840 में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल के दौरान ढाले गए सिक्कों पर आया था।

### 3. सिक्कों पर 'विक्टोरिया क्वीन' और 'विक्टोरिया एम्प्रेस' कब लिखा गया?
1862 में क्राउन शासन के सिक्कों पर 'विक्टोरिया क्वीन' और 1877 में साम्राज्ञी घोषित होने के बाद 'विक्टोरिया एम्प्रेस' लिखा गया।

### 4. पुराने विक्टोरिया सिक्कों पर बने छोटे निशानों या कट का क्या मतलब होता है?
ये निशान टकसाल की पहचान (मिंट मार्क) या सराफों द्वारा चांदी की शुद्धता जांचने के लिए लगाए गए कट (श्रॉफ मार्क) होते हैं।

### 5. क्या केवल चांदी की शुद्धता जांचकर असली विक्टोरिया सिक्के की पहचान हो सकती है?
नहीं, क्योंकि आधुनिक प्रतिकृतियां भी असली चांदी से बनाई जा सकती हैं, इसलिए सिर्फ चांदी की जांच से सिक्के की प्राचीनता साबित नहीं होती।

### 6. नकली या आधुनिक सिक्का प्राचीन बताकर बेचने पर ग्राहक के पास क्या कानूनी अधिकार हैं?
उपभोक्ता संरक्षण कानून 2019 के तहत यह अनुचित व्यापार है। ग्राहक हेल्पलाइन 1915 पर या उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

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