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  "type": "article",
  "title": "E20 पेट्रोल पर मचे बवाल की असली कहानी, जांच में इंजन को नुकसान का कोई सबूत नहीं",
  "summary": "E20 पेट्रोल के देश भर में लागू होते ही इंजन खराब होने और माइलेज घटने के वायरल दावे फैल गए, लेकिन आईआईटी कानपुर की जांच में ईंधन से इंजन को नुकसान का कोई सबूत नहीं मिला और इन दावों को वैज्ञानिक रूप से निराधार बताया गया।",
  "content": "देश भर के पेट्रोल पंपों पर जब E20 पेट्रोल मिलना शुरू हुआ, तो शायद ही किसी ने सोचा था कि टंकी में डलने वाले ईंधन में हुआ यह बदलाव साल के सबसे बड़े उपभोक्ता विवादों में से एक बन जाएगा। पूरे देश में इस नए ब्लेंड के आते ही कुछ ही हफ्तों में ऐसे वीडियो वायरल होने लगे जिनमें दावा किया गया कि यह ईंधन इंजन खराब कर रहा है, माइलेज घटा रहा है और मरम्मत का खर्च बढ़ा रहा है। दूसरी तरफ गाड़ी बनाने वाली कंपनियां, वैज्ञानिक और बड़े मंत्री लगातार कह रहे थे कि यह डर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। आइए समझते हैं कि असल में हुआ क्या, सबूत क्या कहते हैं, और इस पूरी शुरुआत में सरकार से चूक कहां हुई।\n\nआखिर E20 पेट्रोल है क्या\nसीधे शब्दों में कहें तो E20 एक ऐसा ईंधन है जिसमें 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल मिला होता है। यह एथेनॉल खेती से जुड़े कच्चे माल और कृषि अपशिष्ट से बनता है, जिसमें गन्ना, मक्का और दूसरी फसलें शामिल हैं। यह पहले वाले E10 ब्लेंड की जगह लेता है, जिसमें सिर्फ 10 प्रतिशत एथेनॉल होता था। सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से देश भर के पेट्रोल पंपों पर E20 उपलब्ध कराया, और इसका मतलब यह हुआ कि ज्यादातर लोग अचानक ज्यादा एथेनॉल वाला ईंधन भरवाने लगे, चाहे उन्होंने इससे जुड़ी नीति पर हुई बहस पर ध्यान दिया हो या नहीं।\n\nईंधन नीति कैसे बनी बड़ा बवाल\nजो चीज ईंधन की बनावट को लेकर एक तकनीकी फैसले के तौर पर शुरू हुई थी, वह जल्दी ही राजनीतिक और उपभोक्ता विवाद में बदल गई। E20 के देश भर में आते ही आम लोग, मोहल्ले के मैकेनिक और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर इंजन की खराबी, घटते माइलेज और बढ़ते खर्च की शिकायत करने लगे। इनमें से कुछ शिकायतें आग की तरह फैलीं। दिक्कत यह रही कि इन दावों के पीछे कितना ठोस सबूत है, इस पर शोधकर्ता, गाड़ी बनाने वाली कंपनियां और सरकारी एजेंसियां आपस में सहमत नहीं हैं। वायरल धारणा और प्रयोगशाला की हकीकत के बीच का यही फासला इस पूरे मामले को लगातार चलने वाला विवाद बना गया।\n\nसौरव जोशी और मर्सिडीज वाला मामला\nइस विवाद की एक चिंगारी यूट्यूबर सौरव जोशी की तरफ से आई, जिन्होंने कहा कि E20 पेट्रोल पर स्विच करने के बाद उनकी मर्सिडीज-बेंज का माइलेज गिर गया। उनका व्लॉग यूट्यूब, इंस्टाग्राम और X पर तेजी से फैला और यह धारणा मजबूत हुई कि महंगी गाड़ियां भी सुरक्षित नहीं हैं। बाद में मर्सिडीज-बेंज इंडिया ने साफ किया कि उसकी BS-VI पेट्रोल कारें E20 ईंधन के साथ पूरी तरह अनुकूल हैं। आखिरकार जोशी ने खुद अपना दावा वापस ले लिया और कहा कि माइलेज में गिरावट दरअसल एक इंजन की दिक्कत की वजह से थी, ईंधन की वजह से नहीं। उन्होंने इसे E20 से जोड़ने के लिए माफी मांगी और वीडियो को एडिट कर दिया।\n\nइस विवाद में फंसने वाले वे अकेले कंटेंट क्रिएटर नहीं थे। एक और इन्फ्लुएंसर ने कई वीडियो डालकर आरोप लगाया कि E20 पेट्रोल गाड़ियों को नुकसान पहुंचा रहा है, और ये वीडियो पूरे मामले के सबसे ज्यादा शेयर होने वाले कंटेंट में शामिल हो गए। 15 जुलाई 2026 को मामले ने कानूनी मोड़ ले लिया, जब उनके और तीन अन्य इन्फ्लुएंसर के खिलाफ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को निशाना बनाकर कथित गलत जानकारी और मानहानिकारक कंटेंट फैलाने पर एफआईआर दर्ज हुई।\n\nजनता असल में क्या सोचती है\nE20 विवाद पर सी-वोटर के सर्वे बताते हैं कि सरकार के जोरदार बचाव के बावजूद लोगों के मन में शक बरकरार है। 55 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने कहा कि वे E20 का इस्तेमाल ही नहीं करना चाहेंगे, क्योंकि उन्हें गाड़ी को नुकसान और कम माइलेज का डर है। करीब 54 प्रतिशत लोगों को लगा कि यह ईंधन गाड़ियों को नुकसान पहुंचा सकता है, जबकि 53 प्रतिशत को लगा कि इससे माइलेज घटता है।\n\nये नतीजे राजनीतिक खेमों के आर-पार दिखे। करीब 53 प्रतिशत एनडीए समर्थकों ने E20 के इस्तेमाल का विरोध किया, और लगभग 60 प्रतिशत लोगों को लगा कि इस कार्यक्रम को पर्याप्त शोध के बिना बहुत जल्दबाजी में लागू किया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ, 43 प्रतिशत से ज्यादा बीजेपी समर्थकों ने माना कि एथेनॉल ब्लेंडिंग से भारत की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता घट सकती है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है। खास बात यह रही कि बड़ी संख्या में लोगों ने यह भी कहा कि पंप पर लोगों को सामान्य पेट्रोल और एथेनॉल मिले ईंधन में से चुनने का विकल्प मिलना चाहिए।\n\nसरकार ने E20 पर दांव क्यों लगाया\n1 अप्रैल की यह शुरुआत सिर्फ नोजल से निकलने वाले ईंधन की बात नहीं थी। यह भारत की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने और एक साफ-सुथरे, देश में बने ईंधन को बढ़ावा देने की बड़ी रणनीति का हिस्सा थी। समय भी अहम था, क्योंकि यह ऐसे वक्त आया जब अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच दुनिया भर के ऊर्जा बाजार दबाव में थे, जिससे ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता और जरूरी लगने लगी।\n\nसरकार के बताए मकसद कई परतों वाले थे। वह देश की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता घटाना चाहती थी और देश में बने ईंधन का इस्तेमाल बढ़ाकर ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना चाहती थी। वह ब्लेंड में एथेनॉल का हिस्सा बढ़ाकर कार्बन उत्सर्जन घटाना चाहती थी। वह कृषि कच्चे माल से बने देसी एथेनॉल की मांग बढ़ाना चाहती थी, ताकि गन्ने और मक्के जैसी फसलों के लिए बाजार तैयार हो। और सबसे अहम, उसने पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडिंग हासिल करने के अपने पुराने 2030 के लक्ष्य को आगे बढ़ाकर 2025 से 2026 कर दिया, यानी तय समय से कई साल पहले।\n\nमंत्री क्या कह रहे हैं\nकेंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया कि E20 गाड़ियों को नुकसान पहुंचाता है। उन्होंने कहा कि ऐसे आरोपों के समर्थन में कोई सबूत नहीं है। 15 जुलाई को एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि भारत में 2004 से पेट्रोल में एथेनॉल मिलाया जा रहा है, और ईंधन को इंजन के नुकसान से जोड़ने वाली बातों पर उन्होंने खुलकर सवाल उठाए।\n\nकेंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी एक कदम और आगे गए और उन्होंने इस पूरी बहस को एक गढ़ा हुआ विवाद बताया, और इसकी तुलना पिछले साल एलपीजी सिलेंडर को लेकर मची घबराहट से की। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि भारत का एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम 2005 से चल रहा है और इसने 2025 की शुरुआत में ही 20 प्रतिशत का लक्ष्य हासिल कर लिया, जो तय समय से पांच साल पहले था। उनका तर्क था कि E20 बिना किसी बड़ी दिक्कत के बिकता रहा और शिकायतें तभी सामने आईं जब E85 फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां आईं। उन्होंने यह भी कहा कि इस कार्यक्रम ने कच्चे तेल का आयात घटाकर 1.9 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाई है।\n\nE20 और E85 एक जैसे क्यों नहीं हैं\nजानकारों का कहना है कि भ्रम की एक बड़ी वजह यह है कि कई वायरल वीडियो E20 और E85 के बीच का फर्क मिटा देते हैं। E85 में 85 प्रतिशत तक एथेनॉल होता है और यह खास तौर पर उन फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों के लिए बना है जो इसे झेलने के हिसाब से डिजाइन की गई हैं। जंग लगने, इंजन ट्यूनिंग और फ्यूल सिस्टम में बदलाव को लेकर ज्यादातर चिंताएं इन्हीं ज्यादा एथेनॉल वाले ईंधनों से जुड़ी हैं, जिनमें E85 भी शामिल है। विशेषज्ञ जोर देकर कहते हैं कि इन चिंताओं को सीधे E20 पर नहीं थोपा जा सकता, और यही वजह है कि शोधकर्ता और गाड़ी बनाने वाली कंपनियां बार-बार कहती हैं कि इन दोनों ब्लेंड को कभी एक जैसा नहीं मानना चाहिए।\n\nमाइलेज का असली सच\nमाइलेज के मामले में तस्वीर उतनी काली-सफेद नहीं है जितनी गुस्से में दिखाई जाती है। ऑटो एक्सपर्ट अमित खरे, जो आस्क कारगुरु के एडिटर-इन-चीफ और संस्थापक हैं, के मुताबिक अप्रैल 2023 के बाद बनी गाड़ियां पहले से ही E20 ईंधन पर चलने के हिसाब से डिजाइन की गई हैं। उनका कहना है कि पुरानी गाड़ियों के मालिकों को टंकी, फ्यूल लाइन और गैसकेट जैसे फ्यूल सिस्टम के हिस्सों पर ज्यादा नजर रखनी पड़ सकती है। खरे मानते हैं कि माइलेज करीब 3 से 7 प्रतिशत तक घटता है, क्योंकि एथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले कम ऊर्जा होती है, और वे नियमित इंजन सर्विसिंग के साथ-साथ फ्यूल से जुड़े हिस्सों की समय-समय पर जांच की सलाह देते हैं।\n\nयह आकलन मोटे तौर पर तेल मंत्रालय की पिछले हफ्ते दी गई उस बात से मेल खाता है कि E20 पेट्रोल से माइलेज 5 प्रतिशत तक घट सकता है, और यह आईआईटी कानपुर के शोधकर्ताओं के हाल के एक अध्ययन के नतीजों से भी मेल खाता है। विशेषज्ञ बार-बार जिस बड़ी बात पर लौटते हैं, वह यह है कि ज्यादातर गंभीर चिंताएं E85 और E100 जैसे ज्यादा एथेनॉल वाले ब्लेंड से जुड़ी हैं। E20 में सिर्फ 20 प्रतिशत एथेनॉल होता है, और यही वजह है कि वैज्ञानिक और निर्माता कहते हैं कि इसके लिए बनी गाड़ियों में खतरा बहुत कम है।\n\nआईआईटी कानपुर की लैब में क्या मिला\nआईआईटी कानपुर ने E20 को लेकर उठ रहे दावों की सीधे जांच की, और उसके शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके अध्ययनों में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि यह ईंधन गाड़ियों में इंजन का नुकसान, जंग या कोई और बड़ी तकनीकी खराबी करता है। संस्थान की इंजन रिसर्च लैबोरेटरी के प्रोजेक्ट साइंटिस्ट ध्रुव राज कराना बताते हैं कि E20 से माइलेज में थोड़ी गिरावट आ सकती है, क्योंकि एथेनॉल में पेट्रोल से कम ऊर्जा होती है। फिर भी यह गिरावट आमतौर पर 5 प्रतिशत से कम रहती है, और यह ड्राइविंग की आदतों, ट्रैफिक की स्थिति, सड़क की हालत और गाड़ी की देखभाल जैसी रोजमर्रा की बातों से भी बदल सकती है।\n\nकराना एक अहम बात जोड़ते हैं जो इस घबराहट की हवा निकाल देती है, कि माइलेज में 5 प्रतिशत तक का अंतर तब भी आ सकता है जब एक ही गाड़ी को बार-बार एक ही ईंधन पर जांचा जाए। संस्थान के नतीजों के आधार पर शोधकर्ताओं ने E20 से गाड़ियों को नुकसान होने वाले वायरल दावों को वैज्ञानिक रूप से निराधार तक बता दिया।\n\nगाड़ी चलाने वालों के लिए जरूरी सावधानियां\nइसका मतलब यह नहीं कि मालिक लापरवाह हो जाएं, और ऑटो एक्सपर्ट अमित खरे कुछ अतिरिक्त सावधानियां गिनाते हैं, खासकर पुरानी गाड़ियों के लिए। सबसे पहले गाड़ी की ओनर्स मैनुअल देखकर पक्का करें कि वह E20 के अनुकूल है या नहीं। समय-समय पर फ्यूल टंकी साफ कराएं और तय अंतराल पर फ्यूल फिल्टर बदलें। E20 ईंधन को टंकी में 30 दिन से ज्यादा न रहने दें। टंकी को जितना हो सके भरा रखें, ताकि ईंधन कम से कम नमी सोखे। और पुरानी गाड़ियों के लिए पुरानी रबर की फ्यूल लाइनों को एथेनॉल झेलने वाले हिस्सों से बदलवाने पर विचार करें।\n\nखरे के पास नीति बनाने वालों के लिए भी सुझाव है। उनका कहना है कि सरकार E20 के साथ-साथ E10 पेट्रोल भी देती रहे, ताकि लोगों के पास सच में एक विकल्प बना रहे, और गाड़ी बनाने वाली कंपनियों से कहा जाए कि वे समय-समय पर फ्यूल टंकी की सफाई को अपनी सामान्य सर्विस में शामिल करें। कुल मिलाकर उनकी यह सूची उसी उभरती राय को दिखाती है, कि E20 उन गाड़ियों के लिए सुरक्षित है जो इसके लिए बनी हैं, माइलेज पर मामूली और काफी हद तक अनुमान लगाने लायक असर पड़ता है, और सबसे तेज आवाज वाले डर का इंजन और प्रयोगशाला की हकीकत से कम, वायरल रफ्तार से ज्यादा लेना-देना है।\n\nइसका आप पर असर\n• कार मालिकों के लिए: अगर आपकी गाड़ी अप्रैल 2023 के बाद बनी है तो वह E20 के लिए बनी हुई है और यह ईंधन भरवाना सुरक्षित माना गया है, जबकि पुरानी गाड़ियों में फ्यूल लाइन, फिल्टर और गैसकेट की जांच ज्यादा कराते रहें।\n• माइलेज पर असर: करीब 3 से 7 प्रतिशत की मामूली गिरावट की उम्मीद रखें, लैब के मुताबिक यह आमतौर पर 5 प्रतिशत से कम रहती है, इसलिए इंजन खराब होने का डर पालने के बजाय हर सफर में थोड़ा ज्यादा ईंधन का हिसाब रखें।\n• पंप पर: कई लोग E20 के साथ E10 का विकल्प भी चाहते हैं, और जानकार सलाह देते हैं कि E20 को टंकी में 30 दिन से ज्यादा न रहने दें।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. E20 पेट्रोल आखिर है क्या?\nयह एक ऐसा ईंधन है जिसमें 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल मिला होता है, और यह पहले के 10 प्रतिशत एथेनॉल वाले E10 ब्लेंड की जगह लेता है।\n\n2. क्या आईआईटी कानपुर की जांच में इंजन को नुकसान मिला?\nनहीं, शोधकर्ताओं को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि E20 से इंजन खराब होता है या जंग लगती है, और उन्होंने इन वायरल दावों को वैज्ञानिक रूप से निराधार बताया।\n\n3. सौरव जोशी वाले मामले में क्या हुआ?\nउन्होंने अपनी मर्सिडीज-बेंज का माइलेज गिरने के लिए E20 को जिम्मेदार ठहराया था, लेकिन बाद में कहा कि यह इंजन की दिक्कत थी, माफी मांगी और वीडियो एडिट कर दिया।\n\n4. E20 से माइलेज कितना घटता है?\nऑटो एक्सपर्ट के मुताबिक माइलेज करीब 3 से 7 प्रतिशत घटता है, जबकि लैब के नतीजों में यह गिरावट आमतौर पर 5 प्रतिशत से कम रहती है।\n\n5. 15 जुलाई 2026 को एफआईआर क्यों दर्ज हुई?\nएक इन्फ्लुएंसर और तीन अन्य के खिलाफ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को निशाना बनाकर कथित गलत जानकारी और मानहानिकारक कंटेंट फैलाने पर एफआईआर दर्ज हुई।\n\n6. क्या E20 और E85 एक जैसे हैं?\nनहीं, E85 में 85 प्रतिशत तक एथेनॉल होता है और यह खास फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों के लिए है, इसलिए उससे जुड़ी चिंताएं E20 पर लागू नहीं होतीं।\n\n7. इस कार्यक्रम से कितनी विदेशी मुद्रा बची?\nहरदीप सिंह पुरी के मुताबिक कच्चे तेल का आयात घटाकर इस कार्यक्रम ने 1.9 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाई है।",
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  "category": "पड़ताल",
  "publishedAt": "2026-07-17",
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