# एक कंगाल डच लड़की जो फायरिंग स्क्वॉड को फ्लाइंग किस देकर जासूस माता हारी के रूप में मौत के घाट उतरी

> 1917 में पेरिस के बाहर फायरिंग स्क्वॉड ने एक डांसर को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया, जिसने आंखों पर पट्टी बांधने से मना कर मुस्कुराते हुए मौत का सामना किया। यह कहानी है गरीबी और धोखे ने कैसे मार्गारेथा ज़ेले को यूरोप की सबसे मशहूर डांसर और सबसे ग्लैमरस जासूस माता हारी बना दिया।

**Type:** article · **Category:** पड़ताल · **Published:** 2026-07-18 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/investigations/eka-kngala-dacha-laraki-jo-phayaringa-skvoda-ko-phlainga-kisa-dekara-jasusa-mata-hari-ke-rupa-men-mauta-ke-ghata-utari-8430 · **Language:** Hindi
**Tags:** माता हारी, जासूस, फायरिंग स्क्वॉड, पेरिस, प्रथम विश्व युद्ध, मार्गारेथा ज़ेले, इतिहास

पेरिस पर अभी अंधेरा छाया हुआ था। 15 अक्टूबर 1917 की सुबह के करीब 4 बजे थे, जब सेंट लज़ार जेल के गलियारों में भारी बूटों की आवाज़ गूंज उठी। हाथों में जलती मशालें थामे 18 फ्रांसीसी अफसर कदम से कदम मिलाते हुए दूसरी मंज़िल पर पहुंचे और सेल नंबर 12 के बाहर रुक गए। एक अफसर ने दरवाज़े की तरफ हाथ बढ़ाया ही था कि पास खड़ी नन ने उसे रोक दिया। जेल की वॉर्डन रह चुकी इस नन ने कहा, "आप यहीं रुकिए, मैं खुद उसे बाहर लेकर आती हूं।"

अंदर जाकर नन ने माचिस जलाई और मेज़ पर रखे तेल के दीये को रोशन किया। लोहे के एक पलंग पर करीब 40 से 41 साल की एक औरत सो रही थी। उसके घुंघराले बाल तकिये पर बिखरे थे। नन ने उसके चेहरे से बाल हटाकर धीरे से जगाने की कोशिश की, लेकिन कोई हरकत नहीं हुई। घबराकर उसने बाहर खड़ी दूसरी नन को बुलाया और दोनों ने मिलकर औरत को झकझोरा। तब कहीं जाकर उस औरत ने अंगड़ाई ली, अपनी बड़ी काली आंखें मलीं और नींद भरी नज़रों से नन की ओर देखा।

नन का गला रुंध गया, आवाज़ कांपने लगी। उसने भारी मन से कहा, "तुम्हारी दया याचिका ठुकरा दी गई है। मौत का वारंट जारी हो चुका है। तुम्हारी फांसी आज, अभी तय है।" औरत के चेहरे पर डर की एक लकीर तक नहीं थी। वह आराम से पलंग पर उठकर बैठ गई और पूछा कि क्या उसे सीधे अभी ले जाया जाएगा, फिर खुद ही बोल पड़ी, "कोई बात नहीं, ले चलो। मैं तैयार हूं।"

## फांसी पर ऐसे तैयार हुई जैसे किसी शाही जलसे में जाना हो
नन ने घड़ी देखी और बताया कि उसके पास आधा घंटा है, और अगर किसी के लिए कोई संदेश छोड़ना चाहे तो लिख सकती है। इसके बाद उस औरत ने जो किया, उसने कमरे में मौजूद सबको हैरान कर दिया। वह किसी कैदी की तरह नहीं, बल्कि किसी शाही महफ़िल में जाने वाली शख्सियत की तरह सजने-संवरने लगी। उसने रेशमी मोज़े पहने, ऊंची एड़ी के जूते पहने, कीमती लंबा फर कोट ओढ़ा और सिर पर एक बड़ी हैट रखी। फिर उसने करीने से अपने बाल संवारे, पास खड़ी नन की ओर मुड़ी, मुस्कुराई और पूछा, "मैं कैसी लग रही हूं?" नन बस उसे देखती रह गई।

5 फीट 9 इंच लंबी, सांवली रंगत, बड़ी काली आंखें, घुंघराले बाल और छरहरा बदन, यही वह औरत थी जिस पर कभी पूरा यूरोप फिदा था। उसने नन से कहा कि उसके वकील एदुआर क्लूने को बुलाया जाए। क्लूने जब पहुंचे तो बुरी तरह हिले हुए थे, आंखें भीगी थीं और चेहरे पर इस बात का अपराधबोध साफ था कि वे उसे बचा नहीं पाए। औरत उनकी हालत तुरंत समझ गई। उसने नरमी से कहा, "खुद को दोष मत दो।" उसने बताया कि उसे न उनसे कोई शिकायत है और न ज़िंदगी से, बस उसके लिए एक सिगार का इंतज़ाम कर दिया जाए।

सिगार फौरन मंगवाया गया। वह उसके धीमे-धीमे कश लेने लगी, बिल्कुल इत्मीनान से, मानो किसी बड़े थिएटर के ग्रीन रूम में बैठकर परफॉर्मेंस की तैयारी कर रही हो। घड़ी की सुइयां आगे बढ़ती रहीं और 4 बजकर 45 मिनट हो गए। भारी मन से वॉर्डन ने पूछा कि उसकी कोई आखिरी इच्छा है क्या। औरत मुस्कुराई और बोली, "हां।" उसे कुछ कागज़ और एक कलम चाहिए थी, क्योंकि वह एक खत लिखना चाहती थी।

## आखिरी दो खत
उसे एक डायरी और कलम लाकर दी गई। उसने दो खत लिखे। पहला अपनी बेटी लुईस के नाम और दूसरा अपने प्रेमी, रूसी कैप्टन व्लादिमीर मास्लोव के नाम। लिखने के बाद वॉर्डन ने दोनों खत लेकर उसके वकील के हाथों में सौंप दिए।

ब्राज़ीली उपन्यासकार पाउलो कोएलो ने अपने उपन्यास 'द स्पाई' में आगे का मंज़र बयां किया है। सुबह 5 बजकर 15 मिनट तक वह औरत अपने सेल से बाहर आ चुकी थी। उसे नीचे लाकर एक आसमानी रंग की सैन्य गाड़ी में बिठाया गया, जिसमें कुल चार लोग थे, वह खुद, उसका वकील और दोनों नन। गाड़ी कोहरे में डूबी सुनसान पेरिस की सड़कों से गुज़रती रही और थोड़ी देर बाद शहर के बाहरी इलाके में मौजूद फोर्ट द विंसेन पहुंच गई।

## "मुझे खुली आंखों से मौत का सामना करना है"
फ्रांस की तीनों सेनाओं के सौ से ज़्यादा हथियारबंद सैनिकों ने फांसी के मैदान को घेर रखा था। मैदान के बीचोंबीच लकड़ी का एक खंभा गड़ा था। औरत गाड़ी से उतरी और बिना किसी सहारे के खुद चलकर उस खंभे तक पहुंची। जब एक सैनिक उसे रस्सी से बांधने आगे बढ़ा तो उसने मना कर दिया। सैनिक के ज़ोर देने पर आखिरकार वह इतना ही मानी कि सिर्फ एक हाथ बांधा जाए। उसका बायां हाथ खंभे से बांध दिया गया।

इसके बाद एक और सैनिक काली पट्टी लेकर आगे आया और उसकी आंखों पर बांधने लगा। औरत ने उसे सख्ती से रोका, "रुको। मुझे किसी पट्टी की ज़रूरत नहीं। मुझे खुली आंखों से मौत का सामना करना है।" सैनिक पीछे हट गया। उससे ठीक 20 कदम की दूरी पर 12 फ्रांसीसी सैनिकों का फायरिंग स्क्वॉड खड़ा था, बंदूकें उठाए और उसी की तरफ ताने हुए। कमांडर ने अपनी चमचमाती तलवार हवा में उठाई, जो सैनिकों को तैयार होने का इशारा थी।

ठीक 5 बजकर 30 मिनट पर एक बड़ा घंटा बजा, जिसकी गूंज पूरे मैदान में फैल गई। फ्रांस में इसे मौत का घंटा, यानी डेथ बेल कहा जाता था। इन आखिरी पलों में औरत ने अपने सामने खड़े सैनिकों और रो रहे अपने वकील की ओर देखा और मुस्कुरा दी। फिर उसने उन्हें एक फ्लाइंग किस दी। तभी कमांडर की आवाज़ गूंजी, "फायर!" बारह बंदूकें एक साथ चलीं और गोलियों की गड़गड़ाहट ने पूरा मैदान हिला दिया। तीन गोलियां औरत के जिस्म में धंस गईं और वह वहीं ढेर हो गई। एक सैनिक दौड़कर आगे आया, अपनी पिस्तौल निकाली और बिल्कुल नज़दीक से उसके सिर में गोली दाग दी। उसकी खोपड़ी चकनाचूर हो गई।

## जिस लाश को किसी ने नहीं अपनाया
फांसी के बाद एक भी शख्स उसकी लाश लेने आगे नहीं आया। उसका शव पेरिस के एक मेडिकल कॉलेज को सौंप दिया गया, जहां छात्रों ने उसका इस्तेमाल शरीर रचना यानी एनाटॉमी की चीर-फाड़ के लिए किया। उसका कटा हुआ सिर एक एनाटॉमी म्यूज़ियम में सुरक्षित रखा गया, और फिर 1990 के दशक में एक दिन वह भी चोरी हो गया, जो कभी बरामद नहीं हुआ।

कोहरे में डूबे उस मैदान में मरी पड़ी यह औरत कभी एक ऐसी डांसर थी, जो नाचते-नाचते धीरे-धीरे अपने कपड़े उतार देती थी। बीसवीं सदी के शुरुआती सालों में यूरोप के राजनेता, अभिनेता, सेना के जनरल और रईस कारोबारी उसके साथ एक शाम बिताने के लिए हज़ारों डॉलर लुटा देते थे। उसकी एक और पहचान थी, दुनिया की सबसे ग्लैमरस जासूस की। और प्रथम विश्व युद्ध में फ्रांस की हार के बाद यही देश उसके खून का प्यासा हो गया। तो आखिर यह औरत थी कौन, और एक डांसर जासूस कैसे बन गई? इसे समझने के लिए हमें कुछ साल पीछे लौटना होगा।

## ल्यूवार्डन के रईस की लाडली बेटी
कहानी शुरू होती है नीदरलैंड्स के शहर ल्यूवार्डन से, जहां 7 अगस्त 1876 को एक बच्ची पैदा हुई और उसका नाम रखा गया मार्गारेथा ज़ेले। वह चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। उसके पिता एडम ज़ेले की कपड़े और सिलाई का सामान बेचने की दुकान थी, और कुछ साल बाद उन्होंने तेल के कारोबार में हाथ आज़माया। किस्मत ने साथ दिया और वे शहर के सबसे अमीर लोगों में गिने जाने लगे।

सबसे बड़ी संतान होने के नाते मार्गारेथा को सबसे ज़्यादा लाड़-प्यार मिला। पिता ने उसे शहर के सबसे महंगे स्कूल में दाखिल कराया। वह रेशमी कपड़े पहनती, महंगे खिलौनों से खेलती और बाकी बच्चों के मुकाबले कहीं ज़्यादा शानदार ज़िंदगी जीती थी। कुछ साल सब कुछ बेहतरीन रहा। लेकिन 1885 आते-आते हालात पलटने लगे।

एडम ज़ेले को कारोबार में भारी नुकसान होने लगा। उनकी कमाई का ज़्यादातर हिस्सा कर्ज़ चुकाने में चला जाता। 1889 तक हालत इतनी बिगड़ गई कि बैंक ने उन्हें दिवालिया घोषित कर दिया, और वे कर्ज़ और धोखाधड़ी के कई मुकदमों में उलझ गए। जल्द ही परिवार के पास खाने तक के लाले पड़ गए। बच्चों की पढ़ाई छूट गई। उन्हें शहर छोड़कर एक छोटे, तंग अपार्टमेंट में रहने को मजबूर होना पड़ा।

पैसा जैसे-जैसे खत्म होता गया, मार्गारेथा के माता-पिता के बीच तनाव उतना ही बढ़ता गया। झगड़े, चीख-पुकार और मारपीट रोज़ का किस्सा बन गए, और 1890 में दोनों का तलाक हो गया। मार्गारेथा ने अपनी मां के साथ रहना चुना, लेकिन यह सहारा भी ज़्यादा दिन नहीं टिका। कुछ ही महीनों बाद उसकी मां चल बसी। 14 साल की उम्र में वह अकेली और कंगाल रह गई। रिश्तेदारों ने कुछ वक्त उसे संभाला, लेकिन जल्द ही उन्होंने भी मुंह मोड़ लिया, और सबसे बुनियादी सवाल, यानी ज़िंदा रहने के लिए पैसा कहां से आए, उसकी सबसे बड़ी जंग बन गया।

## टीचर की नौकरी और बदनामी
मार्गारेथा ज़्यादातर डच लड़कियों से अलग दिखती थी। उसकी रंगत सांवली थी और वह उस दौर में ही करीब 5 फीट 9 इंच लंबी हो चुकी थी, जब औसत डच लड़की मुश्किल से पांच फीट की होती थी। वह चंचल स्वभाव की थी और खूब बातें करना पसंद करती थी, यह भी एक वजह थी कि कई रिश्तेदार उससे दूरी बनाए रखते थे।

1892 तक वह 16 साल की हो गई और लाइडन शहर आ गई। उसी दौरान एक ट्रेनिंग स्कूल ने छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए नौजवान लड़के-लड़कियों की भर्ती का विज्ञापन निकाला। मार्गारेथा ने तुरंत आवेदन किया, इंटरव्यू दिया और चुन ली गई। पढ़ाने के बाद बचा हुआ ज़्यादातर वक्त वह स्कूल की लाइब्रेरी में किताबें पढ़ते हुए बिताती थी। इन्हीं दिनों वह स्कूल के हेडमास्टर के करीब आ गई, जो उससे 35 साल बड़ा था, और उनका पेशेवर रिश्ता धीरे-धीरे एक बेहद निजी रिश्ते में बदल गया।

ब्रिटिश पत्रकार मैरी डब्ल्यू. क्रेग ने अपनी किताब 'अ टैंगल्ड वेब: माता हारी' में लिखा है कि मार्गारेथा और हेडमास्टर के बीच शारीरिक संबंध थे, लेकिन यह कभी तय नहीं हो पाया कि वह सचमुच उससे प्रेम करती थी, या हेडमास्टर ने उसकी कमज़ोर हालत का फायदा उठाया, या फिर दोनों बस इसलिए एक-दूसरे की ओर खिंचे क्योंकि हर कोई दूसरे की ज़रूरत पूरी कर रहा था।

इस रिश्ते की अफवाहें स्कूल में फैलते देर नहीं लगी। जैसे-जैसे विवाद बढ़ा, प्रबंधन ने 1893 में मार्गारेथा को नौकरी से निकाल दिया, जबकि हेडमास्टर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। 17 साल की उम्र में वह बुरी तरह फंस चुकी थी, एक तरफ गरीबी और दूसरी तरफ सरेआम बदनामी, और शहर में कोई उसके साथ दिखना तक नहीं चाहता था।

## अखबार में पत्नी की तलाश का विज्ञापन
फिर आया साल 1894 और एक अखबार का विज्ञापन। डच औपनिवेशिक सेना के कैप्टन रुडोल्फ जॉन मैक्लॉड को एक पत्नी की तलाश थी। वे इंडोनेशिया में तैनात थे और छुट्टी पर नीदरलैंड्स लौटे थे। मार्गारेथा कैप्टन से मिलने पहुंची, जो उससे 20 साल बड़ा था, और पहली ही मुलाकात में सैनिक को वह पसंद आ गई। मन ही मन उसने मान लिया कि अब उसकी पैसों की तंगी खत्म होने वाली है, और खुद को एक नामी अफसर की पत्नी बनकर दुनिया घूमते हुए देखने लगी। 11 जुलाई 1895 को दोनों की शादी हो गई।

शादी के बाद कैप्टन रुडोल्फ उसे इंडोनेशिया ले गए, जहां उनके दो बच्चे हुए, एक बेटा और एक बेटी। शुरू में सब कुछ ठीक लगा। लेकिन जल्द ही शादी की असल सच्चाई सामने आ गई। उसका पति शराबी, चिड़चिड़ा और हिंसक इंसान था। वह अक्सर उसे पीटता और दूसरी औरतों से भी संबंध रखता था। एक दिन उनके छोटे बेटे की अचानक मौत हो गई, और बाद में पता चला कि उसे ज़हर दिया गया था। बेटे की मौत के बाद यह रिश्ता पूरी तरह टूट गया और 1902 में दोनों अलग हो गए। अपने पैसे और रसूख का इस्तेमाल कर पति ने बेटी की कस्टडी भी अपने पास रख ली।

मार्गारेथा डिप्रेशन में चली गई और महीनों तक इधर-उधर भटकती रही। इसी दौरान वह इंडोनेशिया की स्थानीय आदिवासी औरतों के साथ वक्त बिताने लगी। उसने मलय भाषा सीखी और पारंपरिक व धार्मिक नृत्यों का अध्ययन किया, यह गौर से देखते हुए कि वहां की औरतें शरीर की भावभंगिमाओं के ज़रिए अपने देवताओं की पूजा कैसे करती हैं।

## पेरिस, और वह ऑफर जिसे पहले उसने ठुकराया
1903 में मार्गारेथा इंडोनेशिया छोड़कर पेरिस आ गई। उन दिनों पेरिस के कई बड़े चित्रकार अपनी कलाकृतियों के लिए निर्वस्त्र या अर्धनग्न मॉडलों को काम पर रखते थे, और मार्गारेथा भी इसी पेशे में उतर गई, एक नया नाम अपनाते हुए, लेडी मैक्लॉड। एक दिन एक चित्रकार ने उसके चेहरे पर छाई उदासी को भांप लिया और पूछा कि वह हमेशा इतनी परेशान और गुमसुम क्यों रहती है। उसकी आंखें भर आईं। उसने कहा, "मुझे पैसे चाहिए।" उसने बताया कि वह इस काम में रोज़ी-रोटी की उम्मीद से आई थी, लेकिन यहां भी कुछ नहीं बन पाया। थोड़ा रुककर उसने जोड़ा कि वह सब कुछ खो चुकी है, अपना घर, अपना बेटा, अपनी बेटी, और शायद खुद को भी।

चित्रकार ने एक कुर्सी खींची, उसके सामने बैठ गया और धीमे स्वर में कहा कि उसके पास एक बढ़िया ऑफर है, जिससे पैसा बरसने लगेगा। जब उसने पूछा कि कैसा ऑफर, तो चित्रकार ने सीधे उसकी आंखों में देखते हुए कहा कि वह बेहद खूबसूरत है, और कपड़ों में अपना जिस्म छिपाने के बजाय उसे रंग-बिरंगे पंखों और मोतियों से ढककर मॉडल बन जाना चाहिए, और यकीन दिलाया कि पेरिस में उसे लगातार काम मिलेगा और वह जो चाहे कीमत मांग सकती है।

मार्गारेथा तुरंत खड़ी हो गई। उसने कहा कि अगर उसके प्रस्ताव का मतलब सरेआम कपड़े उतारना है, तो वह कान खोलकर सुन ले, वह ऐसा घटिया काम कभी नहीं कर सकती, और यह कहकर वह चल दी। चित्रकार पीछे से चिल्लाता रहा कि वह जितना चाहे उतना पैसा कमा सकती है। उस रात वह सो नहीं पाई और घंटों रोती रही, बार-बार यही सोचते हुए कि अगर वह यह ऑफर मान ले तो उसकी हर मुसीबत एक रात में दूर हो जाएगी और वह अपनी बेटी को खुद पाल भी सकेगी, और फिर खुद से यही पूछते हुए कि क्या वह सचमुच इसके लिए अपनी इज़्ज़त दांव पर लगा सकती है।

वरिष्ठ ब्रिटिश पत्रकार जूली व्हीलराइट ने लिखा है कि कई दिनों की भीतरी उलझन के बाद मार्गारेथा आखिरकार झुक गई। एक जान-पहचान वाले को लिखे खत में उसने अपनी बेबसी बयां की, यह मानते हुए कि वह जानती है कि बेइज़्ज़ती भरी ज़िंदगी अक्सर दुख और तकलीफ में खत्म होती है, लेकिन साथ ही यह कि वह उस मोड़ को पार कर चुकी है जहां ज़रूरत उसके पास कोई चारा छोड़ती है, और यह गुज़ारिश करते हुए कि कोई उसे स्वभाव से बुरी या चरित्रहीन न समझे, क्योंकि उसने यह अंधेरी राह सिर्फ गरीबी की वजह से चुनी।

## सर्कस के मैदान से एक नए नाम तक
मार्गारेथा ने चित्रकार का ऑफर मान लिया और कई साल पेरिस में मॉडल के तौर पर काम किया, फिर एक और पेशे में उतर गई। उसके नए करतब में वह मॉलिए सर्कस में घोड़ों पर सवार होकर दिलेराना अंदाज़ में पोज़ देती थी। घोड़े पर उसके निडर, सुंदर और शाही अंदाज़ ने पहली बार पेरिस के रईस तबके का ध्यान अपनी ओर खींचा।

'माता हारी: द ट्रू स्टोरी' किताब के मुताबिक, एक शाम परफॉर्मेंस के बाद वह धूल से सने कपड़ों में, हांफते हुए और चेहरे से पसीना पोंछते हुए लौट रही थी, तभी सर्कस के मालिक मॉलिए ने उसे बुलाया। थकी-हारी वह उसके पास पहुंची। सिगार का धुआं उड़ाते हुए मॉलिए ने संजीदगी से कहा कि वह इन खतरनाक करतबों में अपनी जान जोखिम में डाल रही है, और पूछा कि आखिर वह कब तक मौत से खेलती रहेगी। वह बस मुस्कुराई और बोली कि उसके पास सचमुच कोई और चारा नहीं है। उसने उसे एक कुर्सी की तरफ इशारा किया, आवाज़ धीमी की, और सुझाया कि वह इंडोनेशिया में सीखे नृत्य पेश करे, लेकिन इन रईसों के लिए उन्हें एक नए अंदाज़ में ढालकर। मॉलिए ने कहा, "इन भेड़ियों को खूबसूरती चाहिए, सर्कस के करतब नहीं।" हैरान होकर उसने खुद को संभाला, अपनी शॉल कंधों पर लपेटी और कहा कि अभी वह घर जा रही है और कभी और इस पर सोचेगी।

कुछ हफ्तों बाद मार्गारेथा ने एक बिल्कुल नई ज़िंदगी शुरू करने का फैसला किया और एक नया नाम अपनाया, माता हारी, जिसका इंडोनेशिया की मलय भाषा में मतलब होता है 'सुबह के सूरज की पहली किरण'।

## गीमे म्यूज़ियम की वह रात
तारीख थी 13 मार्च 1905 और जगह थी पेरिस का मशहूर गीमे म्यूज़ियम। हॉल को किसी प्राचीन भारतीय और जावानी मंदिर जैसा सजाया गया था, जावानी मंदिर यानी इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर बने हिंदू और बौद्ध मंदिर। हॉल में मोमबत्तियों की मद्धम रोशनी फैली थी और हवा में अगरबत्ती की हल्की खुशबू तैर रही थी। दर्शकों में पेरिस के सबसे रसूखदार सैन्य अफसर, सबसे अमीर कारोबारी और सबसे बड़े राजनेता बैठे थे।

रात 8 बजे माता हारी हॉल में दाखिल हुई, कपड़ों से ज़्यादा गहनों में लिपटी हुई। संगीत शुरू होते ही वह लहराते हुए स्टेज के बीचोंबीच पहुंची, और जैसे-जैसे ताल तेज़ होती गई, वह अपने रंग-बिरंगे कपड़े एक-एक कर उतारकर फेंकती गई। दर्शक मंत्रमुग्ध बैठे थे, किसी की पलक तक नहीं झपक रही थी। परफॉर्मेंस के चरम पर उसने अपने बदन का हर कपड़ा उतार दिया, सिर्फ कुछ गहने बाकी रह गए। नाचते हुए ही वह स्टेज पर रखी भगवान शिव की एक मूर्ति के पास पहुंची, हाथ जोड़े और उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई। संगीत धीरे-धीरे खामोशी में डूब गया। वह उठी, आंखें बंद कीं और हाथ जोड़े, और अगले ही पल पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा, "माता हारी! माता हारी!" की आवाज़ें पूरे सभागार में गूंजने लगीं।

अगली सुबह पेरिस के अखबारों में उसकी तस्वीरें और परफॉर्मेंस की खबरें छपीं। जल्द ही वह पूरे यूरोप की सबसे महंगी और सबसे मशहूर कलाकार बन गई, और सेना के जनरल, ताकतवर अफसर और राजनेता उसके साथ एक शाम बिताने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। यह चौंधियाने वाली शोहरत कैसे जासूसी के इल्ज़ाम में बदली, और उसे आखिरकार फोर्ट द विंसेन के उस खंभे तक ले गई, यह अगली कड़ी की कहानी है।

## सवाल-जवाब

### 1. माता हारी असल में कौन थी?
नीदरलैंड्स में जन्मी मार्गारेथा ज़ेले, जो पेरिस की सबसे मशहूर डांसर बनी और बाद में दुनिया की सबसे ग्लैमरस जासूस कही गई।

### 2. उसे फांसी कब और कहां दी गई?
15 अक्टूबर 1917 को पेरिस के बाहरी इलाके फोर्ट द विंसेन में फायरिंग स्क्वॉड ने उसे गोली मारकर मौत के घाट उतारा।

### 3. उसने आंखों पर पट्टी बांधने से क्यों मना किया?
वह खुली आंखों से मौत का सामना करना चाहती थी, इसलिए उसने पट्टी बांधने वाले सैनिक को रोक दिया।

### 4. अपने आखिरी वक्त में उसने क्या किया?
उसने अपनी बेटी लुईस और प्रेमी रूसी कैप्टन व्लादिमीर मास्लोव के नाम दो खत लिखे, और फायरिंग स्क्वॉड को मुस्कुराते हुए फ्लाइंग किस दी।

### 5. 'माता हारी' नाम का मतलब क्या है?
इंडोनेशिया की मलय भाषा में इसका मतलब है 'सुबह के सूरज की पहली किरण'।

### 6. उसकी लाश और सिर का क्या हुआ?
किसी ने उसकी लाश नहीं ली; उसे पेरिस के मेडिकल कॉलेज को दे दिया गया और उसका कटा सिर एनाटॉमी म्यूज़ियम में रखा गया, जो 1990 के दशक में चोरी हो गया।

### 7. वह पेरिस में मशहूर कैसे हुई?
13 मार्च 1905 को गीमे म्यूज़ियम में उसके निर्वस्त्र नृत्य ने उसे रातोंरात यूरोप की सबसे महंगी और मशहूर कलाकार बना दिया।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._