जीबी रोड की 90 फीसदी महिलाओं के नाम मतदाता सूची से गायब, पहचान और सम्मान के अधिकार पर गहराया संकट दिल्ली के जीबी रोड स्थित पोलिंग बूथ पर लगभग नब्बे प्रतिशत सेक्स वर्कर्स के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए हैं, जिससे पहचान और नागरिक अधिकारों का गंभीर संकट पैदा हो गया है। देश की राजधानी दिल्ली में जहां एक तरफ लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व का बखान होता है, वहीं जीबी रोड के अंधेरे कमरों में रहने वाली महिलाओं के नागरिक अस्तित्व पर सवालिया निशान लग गया है। अजमेरी गेट के पोलिंग स्टेशन नंबर 7 पर पिछले साल तक कुल 1,350 मतदाताओं के नाम दर्ज थे, लेकिन एसआईआर (SIR) यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद इस फेहरिस्त में केवल 182 नाम ही बचे हैं। इस ऐतिहासिक गिरावट ने जीबी रोड की करीब 90 प्रतिशत महिलाओं को मताधिकार से वंचित कर दिया है। वर्षों से यहां रह रही महिलाएं पूछ रही हैं कि क्या उनके वोट पर भी समाज का कोई कलंक लगा हुआ है। 36 वर्षीय सुरैया का दर्द इस पूरी त्रासदी की बानगी पेश करता है। वह राजस्थान के एक गांव से ताल्लुक रखती थीं और साल 2002 में गांव के बाहर से उनका अपहरण कर लिया गया था। जब उन्हें होश आया तो वह खुद को दिल्ली में पा चुकी थीं। भागने की हर कोशिश के बदले उन्हें बेरहमी से पीटा जाता था, और आखिरकार उन्हें जीबी रोड की अंधेरी गलियों में देह व्यापार के दलदल में धकेल दिया गया। सुरैया ने दिल्ली में दो विधानसभा और एक लोकसभा चुनाव में मतदान किया है, लेकिन इस बार उनका नाम वोटर लिस्ट से गायब है। उनके पास अपने गांव या पैतृक घर का कोई कागजात मौजूद नहीं है, जिससे वह अपनी पुरानी रिहायश साबित कर सकें। सपनों की चोरी और बंद कमरों की जिंदगी: मालती की दास्तान सेंट्रल दिल्ली की चौड़ी सड़कें, आलीशान बंगले और चमकती गाड़ियों की दुनिया के ठीक बगल में बदहाल जीबी रोड स्थित है। यहां की टूटी सड़कें, जर्जर इमारतें और खिड़कियों से झांकती लाचार आंखें इस इलाके की असली पहचान हैं। कोठा नंबर 58 की सीढ़ियां चढ़ते ही एक अजीबोगरीब गंध हवा में महसूस होती है। यहीं एक छह गुणा चार फीट के छोटे से कमरे में मालती रहती हैं। इस संकरी जगह की सबसे ऊपरी मंजिल पर उनका अतिथि कक्ष बना हुआ है। मालती की आपबीती शोषण की एक भयानक दास्तान है। अपने ही घर में माता-पिता की प्रताड़ना का शिकार होने के बाद वह भाग निकली थीं। उनके माता-पिता उन्हें लगभग हर रोज कमरे में बंद कर देते थे। ट्रेन में मिले एक अजनबी ने नौकरी का झांसा देकर उन्हें पुणे में बेच दिया। इसके बाद एक दूसरी महिला ने उन्हें खरीदा और अंततः तीसरी बार उन्हें जीबी रोड के इस कोठे पर बेच दिया गया। मालती ने वहां से भागने के लिए कई बार छतों से छलांग लगाई, लेकिन हर बार पकड़ ली गईं। आज उसी बदहाल छत के नीचे उनका पूरा परिवार बस चुका है, जिसमें उनके पति, बेटा और बेटी शामिल हैं। दिलचस्प बात यह है कि उनके पति का नाम वोटर लिस्ट में सुरक्षित है, मगर मालती का नाम एसआईआर की प्रक्रिया में काट दिया गया। कुछ महीने पहले एक प्रशासनिक कर्मचारी कुछ कागजात लेकर आया था और बड़ी बहन को सभी में बांटने को कहकर चला गया। कम पढ़ी-लिखी होने के कारण वहां की महिलाएं उन पन्नों पर लिखी तकनीकी बातें समझ नहीं पाईं। बाद में एक गैर-सरकारी संगठन के कार्यकर्ता ने उन्हें जानकारी दी कि उनका नाम सूची से हट चुका है। रोजी-रोटी की जद्दोजहद में लगी मालती कहती हैं कि यदि वे एक दिन भी काम छोड़कर दफ्तरों के चक्कर काटेंगी तो पेट भरना मुश्किल हो जाएगा। उनके पास पहचान के तौर पर केवल पैन और आधार कार्ड हैं, और उन्हें नहीं मालूम कि ये दस्तावेज उनका हक दिलाने के लिए काफी हैं या नहीं। पहचान का संकट और गांव लौटने की मजबूरी: असमा की व्यथा कोठा नंबर 58 में ही काम करने वाली असमा पश्चिम बंगाल की रहने वाली हैं। बचपन में ही घर छूट जाने की वजह से उन्हें अब अपने जिले का नाम तक याद नहीं है। उनके जेहन में केवल अपने माता-पिता के चेहरे धुंधले से बचे हैं, जबकि उनके माता-पिता का अब देहांत हो चुका है। असमा का अपने भाइयों से भी कोई संपर्क नहीं रह गया है। एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान एक कर्मचारी केवल एक फॉर्म देकर चला गया था और बाद में तस्वीरें तथा दस्तावेज जमा करने को कहा गया था। असमा को यह भी ठीक से याद नहीं कि उन्हें किस दफ्तर में बुलाया गया था। उनके पास सिर्फ आधार कार्ड और राशन कार्ड हैं, जिन पर मौजूदा ठिकाने का पता दर्ज है। चौथी कक्षा तक पढ़ीं असमा बताती हैं कि जिस काम में वे फंसी हैं, उस हालत में गांव जाकर पुराने स्कूल या पंचायत से कागजात मांगना नामुमकिन है। उन्हें यह भी नहीं पता कि उनका पुराना स्कूल अब बचा भी है या बंद हो चुका है। असमा का कहना है कि जब वे मतदान केंद्र पर कतार में खड़ी होती थीं, तो उन्हें हर आम नागरिक की तरह बराबरी का अहसास होता था। उन्होंने पूर्व में अरविंद केजरीवाल के नाम पर भी वोट डाला था, क्योंकि उनकी सरकार ने बुनियादी स्तर पर कुछ राहत दी थी। लेकिन अब नाम कट जाने के बाद वह व्यथित मन से सवाल करती हैं कि क्या समाज उनके वोट को भी अछूत मानता है। बदनामी का साया और पते का पेंच: कोठे से नाम हटाने की मजबूरी कोठा नंबर 58 की बुजुर्ग महिला और वहां की व्यवस्था संभालने वाली संगीता ने इस मामले का एक दूसरा पहलू सामने रखा। संगीता के अनुसार प्रशासनिक अधिकारी उनसे मिलने आए थे और उन्होंने नाम दोबारा जुड़वाने की बात भी कही थी। संगीता मानती हैं कि कई महिलाओं के पास पात्रता साबित करने वाले कागजात नहीं हैं, तो वहीं कई महिलाएं दूसरी जगहों पर रहने चली गई हैं। इसके अलावा एक बड़ा कारण सामाजिक बदनामी भी है। कई महिलाओं ने अपने नाम मतदाता सूची से खुद कटवाए हैं। इसकी मुख्य वजह उनके बच्चे हैं जो अब बड़े हो रहे हैं। माताएं नहीं चाहतीं कि उनके बच्चों के पहचान पत्रों या शैक्षणिक अभिलेखों पर कुख्यात जीबी रोड का पता हमेशा के लिए दर्ज रहे। सामाजिक कलंक के डर से महिलाएं अपने आवासीय पते को छुपाने का प्रयास करती हैं, जिसके कारण सत्यापन प्रक्रिया में उनके नाम सूची से अलग हो जाते हैं। प्रशासनिक उलझनें और बीएलओ की जवाबदेही पर सवाल नेशनल नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्कर्स (एनएनएसडब्ल्यू) की समन्वयक किरण देशमुख का कहना है कि जीबी रोड पर दशकों से रहने के बावजूद इन महिलाओं के पास अपने पैतृक पते या पारिवारिक संबंधों का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है। यदि कोई महिला संकोचवश अपना नाम कटवाती भी है, तो यह समाज की विफलता है जिसने उन्हें हीनता के इस स्तर पर पहुंचा दिया है। बचपन में तस्करी कर लाई गई लड़कियों के परिजनों ने उनसे हमेशा के लिए नाता तोड़ लिया होता है, ऐसे में उनसे एसआईआर के कड़े नियम पूरे करने की उम्मीद करना पूरी तरह अव्यावहारिक है। वोटर राइट्स फोरम से जुड़ी शोधकर्ता सागरिका राजोरा बताती हैं कि जिन नागरिकों के पास वैध पहचान पत्र और स्थायी पते का अभाव होता है, उनके लिए एसआईआर प्रक्रिया बेहद जटिल साबित होती है। सेक्स वर्कर्स अक्सर बेहतर आजीविका या अन्य कारणों से कमरे बदलती रहती हैं। ऐसे हालात में बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) जांच करने की मशक्कत से बचने के लिए सीधे फॉर्म पर 'शिफ्टेड' लिख देते हैं। अधिकतर बीएलओ मूल रूप से अन्य विभागों के कर्मचारी होते हैं, जिन्हें चुनाव के दौरान यह अतिरिक्त जिम्मेदारी दी जाती है। बहुत कम समय में भारी तादाद में मतदाताओं के सत्यापन का दबाव भी इस लापरवाही की बड़ी वजह बनता है। अधिकारियों के दावे और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी जीबी रोड का इलाका मटिया महल विधानसभा क्षेत्र के तहत आता है। मटिया महल के सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (एईआरओ) प्रदीप कुमार का दावा है कि प्रशासन ने इन महिलाओं की समस्याओं को समझते हुए कई विशेष शिविर लगाए थे। हर कोठे पर जागरूकता पोस्टर लगाए गए और गैर-सरकारी संगठनों की मदद भी ली गई। प्रदीप कुमार के अनुसार बीएलओ अकेले नहीं गए थे, बल्कि वे खुद उनके साथ मौके पर पहुंचे थे। अधिकारियों ने महिलाओं को बुनियादी दस्तावेज मुहैया कराने को कहा था और बीएलओ को खुद फॉर्म भरने के निर्देश दिए थे, लेकिन आवश्यक कागजात नहीं मिले। एईआरओ ने यह भी खुलासा किया कि कई महिलाओं ने जीबी रोड के असली पते के बजाय उसके पीछे स्थित रिहायशी गलियों का पता दर्ज कराया था, क्योंकि वे जीबी रोड के नाम से बचना चाहती थीं। इस विसंगति के कारण भी नाम खारिज हुए। दूसरी ओर मटिया महल से आम आदमी पार्टी के विधायक मोहम्मद इकबाल से जब जीबी रोड के वोटरों के नाम बड़े पैमाने पर कटने को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने पूरे क्षेत्र में जागरूकता फैलाने की बात कही, लेकिन जीबी रोड के विशिष्ट हालात पर कोई जानकारी न होने का हवाला देते हुए फोन काट दिया। सोनागाछी से कमाठीपुरा तक नागरिकता की यह जंग मताधिकार से बेदखल किए जाने की यह त्रासदी सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है। एशिया के सबसे बड़े रेड-लाइट इलाके कोलकाता के सोनागाछी में करीब 4,200 सेक्स वर्कर्स रहती हैं, जिनमें से 1,300 महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए हैं। यहां भी अधिकतर महिलाओं के पास अपने पैतृक परिवारों से जुड़े दस्तावेज नहीं हैं। ऑल इंडिया नेटवर्क फॉर सेक्स वर्कर्स की कार्यकर्ता रिंकी सिंह ने बताया कि दिसंबर 2025 में सोनागाछी में विशेष शिविर आयोजित किए गए थे, जहां 800 से अधिक महिलाएं पहुंची थीं। इसके बावजूद जरूरी कागजात दिखाने के बाद भी अधिकांश महिलाओं के नाम सूची में नहीं जोड़े गए और अधिकारी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं हुए। वहीं मुंबई के कमाठीपुरा में 5,000 से अधिक सेक्स वर्कर्स निवास करती हैं। यहां 31 अगस्त को एसआईआर की पहली ड्राफ्ट सूची जारी की गई थी, जबकि अंतिम सूची 16 नवंबर को प्रकाशित की जानी है। हालांकि ड्राफ्ट सूची से कितने नाम हटे हैं, इसका कोई स्पष्ट आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है। मुंबई शहर जिला चुनाव कार्यालय के एक अधिकारी ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि सेक्स वर्कर्स की कोई अलग सूची नहीं बनाई जाती, इसलिए अलग आंकड़े मौजूद नहीं हैं। कमाठीपुरा में कई शिविर लगाए गए थे और किसी पात्र मतदाता का नाम नहीं काटा गया है। महिलाओं के लिए काम करने वाली संस्था विमेन कलेक्टिव की पूनम ने बताया कि उनके रिकॉर्ड से किसी का नाम नहीं हटा क्योंकि उन्होंने पहले ही जरूरी कागजात तैयार करवा लिए थे। तस्करी के जरिए आई युवतियों के दस्तावेज भी पहले ही बनवा लिए गए थे। मुंबई में केवल उन्हीं लोगों के नाम हटाए गए हैं जिनके नाम पैतृक गांव और कमाठीपुरा दोनों जगह दर्ज थे, और उनकी दोहरी प्रविष्टि को समाप्त किया गया है। इसका आप पर असर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के कारण हाशिए पर रहने वाले नागरिकों के मताधिकार पर सीधा असर पड़ा है। • भारत में प्रभाव: असंगठित और विस्थापित श्रमिकों को वोटर लिस्ट में नाम बनाए रखने के लिए अपने गृह राज्य या वर्तमान पते के पुख्ता प्रमाण पत्र अनिवार्य रूप से जुटाने होंगे। यदि पते में कोई अंतर आता है या दस्तावेज अधूरे रहते हैं तो नाम कटने का जोखिम बढ़ जाता है। • दिल्ली और अन्य रेड-लाइट इलाकों में प्रभाव: जीबी रोड जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को बीएलओ के विशेष शिविरों में सक्रियता से फॉर्म 6 और आवश्यक पहचान पत्र जमा करने होंगे। अपने बच्चों को सामाजिक कलंक से बचाने के साथ-साथ नागरिक अधिकार बनाए रखने के लिए उन्हें गैर-सरकारी संगठनों की कानूनी सहायता लेनी चाहिए। • दस्तावेजीकरण की अनिवार्यता: पहचान पत्र के रूप में केवल आधार या पैन कार्ड होना कई बार पर्याप्त नहीं माना जाता, इसलिए स्थानीय निवास प्रमाण जुटाना बेहद जरूरी है। इसके लिए स्थानीय निर्वाचन कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से जाकर पते का सत्यापन कराना अनिवार्य हो जाता है। • दोहरे पंजीकरण पर सख्ती: पैतृक गांव और मौजूदा कार्यस्थल दोनों जगह वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होने पर अब एक जगह से नाम स्वतः हटा दिया जाएगा। नागरिकों को चाहिए कि वे अपने सही और वर्तमान मतदान केंद्र की पुष्टि चुनाव आयोग के पोर्टल पर समय रहते जांच लें। ऐसा क्यों हुआ जीबी रोड और अन्य रेड-लाइट इलाकों में बड़े पैमाने पर नाम कटने के पीछे कड़े दस्तावेजी नियम, सामाजिक कलंक और प्रशासनिक विसंगतियां मुख्य कारण रही हैं। अधिकारियों द्वारा पैतृक पते के प्रमाण मांगने और बीएलओ द्वारा पते पर अनुपस्थित पाए जाने वाले लोगों को सीधे स्थानांतरित श्रेणी में डालने से यह स्थिति पैदा हुई। • दस्तावेजों की भारी कमी: मानव तस्करी या पारिवारिक उत्पीड़न के कारण घर छोड़ चुकी महिलाओं के पास अपने पैतृक पते या स्कूल के पुराने अभिलेख मौजूद नहीं होते। एसआईआर के तहत पुराने पारिवारिक लिंक साबित करने की अनिवार्यता के कारण अधिकांश महिलाएं शर्तें पूरी नहीं कर पाईं। • सामाजिक बदनामी का डर: कई महिलाओं ने अपने बच्चों के भविष्य और सामाजिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए जानबूझकर जीबी रोड का पता हटवाया या पीछे की गलियों का गलत पता दिया। पते के इस बेमेल होने की वजह से चुनाव अधिकारियों ने उनके आवेदन स्वतः रद्द कर दिए। • बीएलओ पर काम का भारी दबाव: अन्य विभागों से प्रतिनियुक्त किए गए बूथ लेवल अफसरों के पास कम समय में हजारों मतदाताओं के भौतिक सत्यापन का जिम्मा होता है। कमरे बदलने वाली या कार्यस्थल पर न मिलने वाली महिलाओं के नाम खोजने के बजाय उन्होंने सीधे उनके आगे 'शिफ्टेड' दर्ज कर दिया। • राजनीतिक और प्रशासनिक अनदेखी: विशेष सहायता शिविर लगाने के दावों के बावजूद स्थानीय जन प्रतिनिधियों और प्रशासनिक अमले के बीच समन्वय का अभाव रहा, जिससे पात्र मतदाता प्रक्रिया से छूट गए। सवाल-जवाब 1. जीबी रोड के पोलिंग स्टेशन नंबर 7 पर मतदाताओं की संख्या में कितनी गिरावट आई है? अजमेरी गेट स्थित पोलिंग स्टेशन नंबर 7 पर मतदाताओं की संख्या 1,350 से घटकर मात्र 182 रह गई है, यानी करीब 90 फीसदी नाम कट गए हैं। 2. सुरैया कौन हैं और उनका नाम मतदाता सूची से क्यों हटाया गया? सुरैया 36 वर्षीय महिला हैं जिन्हें 2002 में राजस्थान से अगवा कर जीबी रोड लाया गया था। उनके पास राजस्थान के पैतृक घर का कोई दस्तावेज न होने के कारण उनका नाम एसआईआर के दौरान हटा दिया गया। 3. मालती के पति का नाम सूची में रहने के बावजूद उनका नाम क्यों कटा? मालती आवश्यक फॉर्म और पहचान के जरूरी कागजात समय पर जमा नहीं कर सकी थीं, जिसके चलते उनके पति का नाम तो बचा रहा लेकिन उनका नाम सूची से बाहर हो गया। 4. क्या कुछ महिलाओं ने खुद अपने नाम मतदाता सूची से हटवाए हैं? हां, कई महिलाओं ने अपने बड़े हो रहे बच्चों के पहचान पत्रों पर जीबी रोड का बदनाम पता दर्ज होने से बचाने के लिए स्वेच्छा से अपने नाम हटवाए हैं। 5. कोलकाता के सोनागाछी में कितने वोटरों के नाम काटे गए हैं? सोनागाछी में रहने वाली करीब 4,200 महिलाओं में से लगभग 1,300 महिलाओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। 6. मुंबई के कमाठीपुरा में मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर क्यों नहीं कटे? कमाठीपुरा में गैर-सरकारी संस्थाओं ने पहले ही महिलाओं के पहचान पत्र तैयार करवा लिए थे, जिससे वहां केवल दोहरी प्रविष्टि वाले नाम ही हटाए गए। https://trendkia.com/investigations/gb-road-ki-90-phisadi-mahilaon-ke-nama-matadata-suchi-se-gayaba-pahachana-aura-sammana-ke-adhikara-para-gaharaya-snkata-52453 TrendKia — Har trend, sabse pehle.