# इंदिरा गांधी की हत्या के बाद रॉ का गुप्त ऑपरेशन हॉरनेट, लाहौर में आईएसआई एजेंट ढेर

> 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ ने 'ऑपरेशन हॉरनेट' शुरू किया था, जिसका मकसद पाकिस्तान की आईएसआई और खालिस्तानी चरमपंथियों के गठजोड़ को तबाह करना था।

**Type:** article · **Category:** पड़ताल · **Published:** 2026-08-29 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/investigations/indira-gandhi-ki-hatya-ke-bada-raw-ka-gupta-pareshana-hornet-lahore-men-isi-ejenta-dhera-23935 · **Language:** Hindi
**Tags:** रॉ, ऑपरेशन हॉरनेट, इंदिरा गांधी, जीबीएस सिद्धू, आईएसआई, लाहौर, खुफिया एजेंसी, पंजाब उग्रवाद

जून 1987 की तपा देने वाली एक चिलचिलाती दोपहर में पाकिस्तान के ऐतिहासिक शहर लाहौर की मुख्य सड़क पर एक पीली टैक्सी आकर रुकी। दिन के करीब 12 बज रहे थे और कड़ाके की धूप में सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ था। उस भीषण गर्मी के बावजूद टैक्सी से उतरा 40-42 साल का एक व्यक्ति भारी-भरकम ओवरकोट पहन रखा था। उसके एक हाथ में चमड़े का एक बड़ा बैग था और दूसरे हाथ से वह जेब से रुमाल निकालकर बार-बार अपने चेहरे पर आया पसीना पोंछ रहा था। उसके चेहरे पर अत्यधिक थकान और सफर की शिकन साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन उसकी गहरी आँखें लगातार सतर्क थीं और वह मुड़-मुड़कर अपने आसपास के माहौल का बारीक मुआयना कर रहा था। टैक्सी से उतरते ही वह बिना पलक झपकाए एक पतली संकरी गली की तरफ बढ़ा और कुछ ही मिनटों की पैदल दूरी तय करके एक विशाल, हवेलीनुमा मकान के दरवाजे पर जा पहुँचा। हवेली के मुख्य लकड़ी के दरवाजे पर एक बड़ा ताला लटका हुआ था। उस व्यक्ति ने अपनी पेंट की जेब में हाथ डालकर चाबियों का गुच्छा निकाला और धीरे से अपने आप से बुदबुदाया कि गुल साहब से मिलने से पहले वह अंदर जाकर थोड़ा आराम कर लेगा। लेकिन ठीक उसी क्षण गली के मोड़ से एक तेज रफ्तार मोटरसाइकिल दाखिल हुई, जिस पर दो युवक सवार थे। उन दोनों के चेहरे काले रंग के कपड़े से पूरी तरह ढके हुए थे। मोटरसाइकिल ठीक हवेली के दरवाजे के सामने आकर रुकी। बाइक की पिछली सीट पर बैठे नकाबपोश ने पलक झपकते ही अपनी जैकेट से एक पिस्टल निकाली और ताला खोल रहे व्यक्ति की कनपटी पर निशाना साधकर सीधे गोली चला दी। पहली ही गोली उस व्यक्ति के सिर को चीरती हुई निकल गई और वह लहूलुहान होकर दरवाजे की चौखट पर गिर पड़ा। दरवाजे की संगमरमरी फर्श पर खून की धार बह निकली। इतने में मोटरसाइकिल चलाने वाले दूसरे हमलावर ने भी अपनी पिस्टल निकाली और जमीन पर बेसुध पड़े उस शख्स के शरीर पर एक के बाद एक लगातार आठ और गोलियाँ दाग दीं। गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरी गली गूँज उठी और हमले के बाद दोनों हमलावर तेज रफ्तार में मोटरसाइकिल भगाकर गायब हो गए। इस दुस्साहसिक हत्याकांड की खबर आग की तरह पूरे लाहौर शहर में फैल गई, जिससे चारों तरफ अफरा-तफरी और दहशत का माहौल बन गया। आखिर लाहौर में सरेआम गोलियों से भूना गया वह रहस्यमयी शख्स कौन था और उसका भारत के साथ क्या गहरा संबंध था? यह पूरी कहानी भारत की गुप्तचर संस्था रॉ द्वारा चलाए गए गुप्त मिशन 'ऑपरेशन हॉरनेट' की परतें खोलती है।

 

## 31 अक्टूबर 1984: नई दिल्ली में सुरक्षा चूक और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर जानलेवा हमला

लाहौर की इस सनसनीखेज वारदात का ताना-बाना असल में करीब ढाई साल पहले नई दिल्ली में घटी एक ऐतिहासिक और दर्दनाक घटना से बुना गया था। 31 अक्टूबर 1984 की वह सुबह नई दिल्ली में गुलाबी ठंड की दस्तक लेकर आई थी, लेकिन देश के राजनीतिक गलियारों में तापमान लगातार बढ़ रहा था क्योंकि अगले एक महीने के भीतर लोकसभा चुनाव होने तय थे। हमेशा की तरह देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सुबह ठीक 6 बजे सोकर उठीं। उनके नाश्ते की मेज पर दो टोस्ट की स्लाइस, ताजा संतरे का जूस और उबले अंडे रखे थे। नाश्ता पूरा करने के बाद वे मेज पर रखे सुबह के राष्ट्रीय समाचार पत्रों को ध्यान से पढ़ने लगीं। उस दिन सुबह 8:30 बजे ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन यानी बीबीसी की एक विशेष वृत्तचित्र टीम उनका साक्षात्कार लेने आने वाली थी। प्रधानमंत्री को टीवी कैमरे के सामने जाने के लिए तैयार करने हेतु एक पेशेवर मेक-अप आर्टिस्ट सुबह ही उनके सरकारी निवास स्थान पर पहुँच चुका था। सुबह 8 बजे प्रधानमंत्री के निजी सचिव आरके धवन 1 सफदरजंग रोड स्थित निवास पर पहुँचे और उन्होंने इंदिरा गांधी को जानकारी दी कि बीबीसी टीम का इंटरव्यू थोड़ा टल गया है और अब वह सुबह 9:20 बजे शुरू होगा।

सुबह 9:10 बजे के आसपास इंदिरा गांधी अपने निवास के मुख्य द्वार से बाहर निकलीं। उन्होंने हल्के नारंगी रंग की खूबसूरत हथकरघा सूती साड़ी पहन रखी थी। उन्हें महज 50 मीटर की दूरी पर स्थित 1 अकबर रोड वाले दफ्तर पहुँचना था, जहाँ बीबीसी की टीम कैमरों के साथ उनका इंतजार कर रही थी। 1 सफदरजंग रोड और 1 अकबर रोड के बीच परिसर के अंदर ही एक सुंदर हरा-भरा पैदल मार्ग बना हुआ था। इंदिरा गांधी धीमी और नपी-तुली चाल से चल रही थीं। उनके ठीक बगल में सुरक्षाकर्मी कांस्टेबल नारायण सिंह हाथ में एक बड़ा छाता लिए चल रहा था ताकि प्रधानमंत्री को सुबह की धूप न लगे, जबकि उनके निजी सचिव आरके धवन कुछ कदम पीछे चल रहे थे। जैसे ही इंदिरा गांधी 1 अकबर रोड वाले लोहे के कनेक्टिंग गेट पर पहुँचीं, वहाँ ड्यूटी पर तैनात दो सुरक्षा गार्डों- सब-इंस्पेक्टर बेअंत सिंह और कांस्टेबल सतवंत सिंह ने अपने हाथ जोड़कर सम्मान में 'नमस्ते' कहा। इंदिरा गांधी ने भी अपनी चिरपरिचित शैली में थोड़ा मुस्कुराते हुए सिर झुकाकर अभिवादन का जवाब दिया। लेकिन ठीक उसी पल बेअंत सिंह ने अपनी सरकारी 38 कैलिबर की सर्विस रिवाल्वर निकाली और सीधे इंदिरा गांधी के पेट की तरफ तान दी। आश्चर्यचकित होकर इंदिरा गांधी के मुंह से केवल इतना निकला कि बेअंत यह क्या कर रहे हो, लेकिन बेअंत सिंह ने बिना झिझके तुरंत ट्रिगर दबा दिया। पहली गोली सीधे उनके पेट में जा लगी। बेअंत यहीं नहीं रुका, उसने बिना एक सेकंड गँवाए लगातार चार और गोलियाँ इंदिरा गांधी के शरीर में उतार दीं।

इस अचानक हुए हमले को देखकर कुछ ही दूरी पर खड़ा दूसरा गार्ड सतवंत सिंह घबराहट में पूरी तरह जम गया। बेअंत सिंह ने गुस्से में चिल्लाकर सतवंत को आदेश दिया कि गोली चलाओ। बेअंत की आवाज सुनते ही सतवंत सिंह ने अपनी ऑटोमैटिक स्टेन सबमशीन गन की नली इंदिरा गांधी की तरफ घुमाई और मैगजीन की पूरी 25 गोलियाँ उनके निढाल शरीर पर बरसा दीं। गोलियों की बौछार खत्म होने के बाद दोनों हमलावरों ने अपनी-अपनी बंदूकें फर्श पर फेंक दीं। बेअंत सिंह ने पंजाबी भाषा में गर्व से कहा कि हमें जो करना था हमने कर दिया, अब तुम्हें जो करना है कर लो। घटना की आवाज सुनते ही परिसर में तैनात भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवान और कमान्डो दौड़ते हुए मौके पर पहुँचे। इसके बाद हुई त्वरित मुठभेड़ में जवानों ने बेअंत सिंह को मौके पर ही गोलियों से भून दिया, जिससे उसकी मौत हो गई, जबकि सतवंत सिंह गंभीर रूप से घायल हो गया और उसे दबोच लिया गया। प्रधानमंत्री निवास पर मौजूद डॉक्टरों ने बदहवास होकर चिल्लाना शुरू किया कि तुरंत एम्बुलेंस लाओ। लेकिन दुर्भाग्य से एम्बुलेंस का नियमित ड्राइवर उस समय अपनी गाड़ी खड़ी करके बाहर चाय पीने गया हुआ था। डॉक्टर ने फिर चिल्लाकर कहा कि तो तुरंत कोई कार लाओ, तुरंत कोई गाड़ी लाओ।

आनन-फानन में परिसर में खड़ी एक सफेद रंग की एम्बेसेडर कार को बुलाया गया। आरके धवन और पुलिसकर्मियों ने मिलकर खून से लथपथ इंदिरा गांधी को गाड़ी की पिछली सीट पर लिटाया और धवन खुद आगे की सीट पर बैठ गए। उसी समय अपने कमरे के बाथरूम में मौजूद सोनिया गांधी ने नौकरों की चीख-पुकार सुनी और वे घबराहट में बाहर निकलीं। वे सफेद रंग का नाइट गाउन पहने हुए थीं और उनके गीले बाल खुले हुए थे। सोनिया सीधे दौड़कर कार के पास पहुँचीं और बिना कुछ सोचे-समझे पीछे की सीट पर इंदिरा गांधी के पास बैठ गईं। उन्होंने अपनी सास का सिर अपनी गोद में रख लिया और उनके चेहरे से लगातार बह रहे खून को अपने गाउन की आस्तीन से पोंछने लगीं। सोनिया रोते हुए बार-बार कह रही थीं कि ओ मम्मी, ओ गॉड मम्मी, और उनसे बातें करने की कोशिश कर रही थीं ताकि वे होश में बनी रहें। कार बहुत तेजी से ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस यानी एम्स अस्पताल की तरफ भागी। रास्ते भर सोनिया गांधी के मन में ढेरों सवाल कौंध रहे थे कि राजीव कहाँ हैं, मैं उन्हें यह खबर कैसे दूँगी, बच्चे कहाँ हैं, हमें तुरंत उन्हें बुलाना होगा। वे बार-बार मन ही मन प्रार्थना कर रही थीं कि हे भगवान कार और तेज चलाओ, मम्मी बस जिंदा बच जाएँ। सुबह 9:32 बजे कार एम्स के इमरजेंसी गेट पर पहुँची, जहाँ स्थिति देखकर डॉक्टरों में हड़कंप मच गया। वरिष्ठ सर्जनों की टीम तुरंत ऑपरेशन थियेटर पहुँची, जहाँ इंदिरा गांधी को फेफड़ों के लिए ऑक्सीजन दी गई और शरीर में रक्त प्रवाह बनाए रखने के लिए ड्रिप लगाई गई। आठवीं मंजिल के मुख्य ऑपरेशन थियेटर में जाँच के दौरान पाया गया कि उनका दिल बहुत धीमी गति से धड़क रहा था, जिससे सोनिया गांधी की आँखों में उम्मीद की एक छोटी सी किरण जगी, लेकिन डॉक्टरों की पूरी कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।

 

## रॉ मुख्यालय में हलचल, जीबीएस सिद्धू का पछतावा और आरएन काव की दूरदर्शिता

प्रधानमंत्री पर हमले की खबर जंगल की आग की तरह फैली और नई दिल्ली के लोधी रोड स्थित रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ के मुख्यालय में फोन की घंटियाँ लगातार बजने लगीं। रॉ दफ्तर में मौजूद संयुक्त सचिव जीबीएस सिद्धू इस खबर को सुनकर सन्न रह गए। उनका दिमाग तुरंत 10 दिन पुरानी एक घटना में चला गया। वह 21 अक्टूबर 1984, रविवार का दिन था। दोपहर के करीब 1 बज रहे थे और सिद्धू अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ अपनी कार से जिमखाना क्लब के पास से गुजर रहे थे। सफदरजंग चौराहे के पास अचानक उनकी नजर प्रधानमंत्री निवास के बाहरी सुरक्षा गेट पर पड़ी, जहाँ स्टेन गन लिए दो युवा सिख सुरक्षाकर्मी खड़े थे। उनमें से एक 25 साल का गठीले बदन का लगभग 5 फीट 8 इंच लंबा सिख जवान था, जिसकी दाढ़ी करीने से कटी हुई थी। सिद्धू ने अपनी पत्नी की तरफ देखते हुए गहरी चिंता में कहा था कि ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद सिख सुरक्षाकर्मियों को प्रधानमंत्री की नजदीकी सुरक्षा से हटा दिया गया था, इन्हें वापस यहाँ किसने तैनात किया? यह तो प्रधानमंत्री की हत्या कराने का सबसे आसान और सीधा रास्ता है।

अगली सुबह सोमवार को रॉ दफ्तर पहुँचते ही सिद्धू ने एक कागज उठाया और उस पर लिखा कि प्रधानमंत्री आवास पर तैनात सभी सिख सुरक्षाकर्मियों को तुरंत प्रभाव से हटाया जाना चाहिए और इस बात की उच्चस्तरीय जाँच की जानी चाहिए कि उनकी बहाली की सिफारिश किस अधिकारी ने की थी। उन्होंने अपने सहायक को बुलाकर एक लिफाफा मँगवाया और उस पर साफ अक्षरों में लिखा कि इसे केवल वही व्यक्ति खोले जिसके नाम यह संबोधित है। सहायक लिफाफा तैयार करने चला गया। लेकिन अपनी मेज पर अकेले बैठे सिद्धू गहरे धर्मसंकट में फँस गए। वे सोचने लगे कि गाँव की पृष्ठभूमि से आने वाले ये जवान पुराने विचारों से प्रभावित हैं और स्वर्ण मंदिर पर हुई सैन्य कार्रवाई का बदला लेने की भावना रख सकते हैं। लेकिन अगर मैंने यह पत्र भेजा और भविष्य में कोई अनहोनी हो गई, तो इन गार्डों को वापस ड्यूटी पर भेजने वाला अधिकारी खुद को बचाने के लिए मुझ पर ही साजिश का हिस्सा होने का आरोप लगा सकता है, क्योंकि माहौल ऐसा है कि एक सिख होने के नाते मुझे आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। तभी सहायक लिफाफा लेकर आया, जो रॉ प्रमुख गैरी सक्सेना के नाम से संबोधित था। जैसे ही सहायक कमरे से बाहर गया, सिद्धू ने अपने लिखे उस नोट और लिफाफे को उठाया, उसके टुकड़े-टुकड़े किए और डस्टबिन में फेंक दिया। 31 अक्टूबर की दोपहर बीबीसी रेडियो पर जब इंदिरा गांधी के निधन की आधिकारिक घोषणा हुई, तो सिद्धू कमरे में अकेले बैठकर खुद को कोस रहे थे कि काश उन्होंने वह नोट नहीं फाड़ा होता। हालांकि, उन्हें यह भी याद आया कि भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के संस्थापक और तत्कालीन प्रधानमंत्री के सुरक्षा सलाहकार आरएन काव (जिन्हें सभी काव साहब कहते थे) ने भी प्रधानमंत्री को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि वे अपनी सुरक्षा से सिख गार्ड्स को तुरंत हटा दें।

 

## ऑपरेशन हॉरनेट की नींव: पेरिस के कैफे डी फ्लोरे में अनुज भारद्वाज और संजीव जिंदल की मुलाकात

1980 का दशक भारत के लिए बेहद संवेदनशील समय था। पंजाब में खालिस्तानी उग्रवाद अपने पैर पसार चुका था और भारतीय खुफिया एजेंसियों को ठोस इनपुट मिले थे कि पड़ोसी देश पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई इन उग्रवादियों को ट्रेनिंग, भारी मात्रा में धन और अत्याधुनिक हथियार मुहैया करा रही है। रॉ की शीर्ष कमान ने फैसला किया कि पाकिस्तान और खालिस्तानी आतंकियों के इस नापाक गठजोड़ को हर कीमत पर ध्वस्त करना होगा। रॉ की हिट लिस्ट में दो नाम सबसे ऊपर थे- अब्दुल खान और संधू, जो यूरोप और पाकिस्तान से इस पूरे नेटवर्क का संचालन कर रहे थे। रॉ का स्पष्ट आदेश था कि इन दोनों का सफाया किया जाए। 3 नवंबर 1984 को एक तरफ नई दिल्ली में इंदिरा गांधी की अंतिम यात्रा की तैयारियाँ चल रही थीं, दुनिया भर से राष्ट्राध्यक्ष पहुँच रहे थे और उनके बेटे राजीव गांधी ने नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। वहीं दूसरी तरफ दिल्ली और आसपास के इलाकों में भयंकर सिख विरोधी दंगे भड़क चुके थे, जिनमें सैकड़ों बेकसूरों की जान जा रही थी।

उसी वक्त फ्रांस की राजधानी पेरिस के प्रसिद्ध कैफे डी फ्लोरे में 40 वर्ष के एक भारतीय सज्जन अकेले बैठकर कॉफी पी रहे थे। उनका नाम संजीव जिंदल था, जो रॉ के एक बेहद काबिल और सीक्रेट ऑपरेशनल ऑफिसर थे। संजीव अपनी कॉफी की चुस्कियाँ लेते हुए गहरे विचारों में खोए थे कि तभी कैफे का लैंडलाइन फोन बजा। कैफे के वेटर ने आकर संजीव को बताया कि उनके लिए दिल्ली से एक बेहद जरूरी कॉल है। संजीव ने जैसे ही रिसीवर कान से लगाया, दूसरी तरफ से एक गंभीर और जानी-पहचानी आवाज सुनाई दी। फोन पर रॉ के वरिष्ठ अधिकारी अनुज भारद्वाज थे, जिन्हें जासूसी की दुनिया में 'पॉप स्टार' के नाम से जाना जाता था। अनुज भारद्वाज ने कड़क आवाज में कहा कि संजीव, मुझे उस रिपोर्ट की पूरी डिटेल चाहिए जिसका जिक्र तुमने कुछ महीने पहले किया था, तुरंत पहली फ्लाइट पकड़कर दिल्ली आओ। अगले ही दिन संजीव दिल्ली में रॉ मुख्यालय के एक सुरक्षित कमरे में अनुज भारद्वाज के सामने बैठे थे। भारद्वाज ने पूछा कि क्या तुम वह रिपोर्ट लाए हो, मुझे विस्तार से बताओ कि उसमें क्या है। संजीव ने मेज पर एक मोटी फाइल रखते हुए कहा कि सर, लंदन में हमारे सीक्रेट सोर्स ने खबर दी थी कि आईएसआई भारत के खिलाफ बहुत बड़ा षड्यंत्र रच रही है। इसका सीधे तौर पर प्रधानमंत्री की हत्या से संबंध भले न हो, लेकिन रिपोर्ट पढ़ने के बाद आपको समझ आ जाएगा कि चेतावनी में कितनी सच्चाई है। भारद्वाज ने कहा कि मैं पुरानी रिपोर्टें नहीं पढ़ना चाहता, मुझे सीधे बताओ कि तुम्हारी ऐक्शन योजना क्या है। संजीव ने निडर होकर कहा कि हमें तुरंत एक सीक्रेट ऑपरेशन लॉन्च करना होगा और अब्दुल खान व संधू दोनों को खत्म करना होगा, तभी हम आईएसआई और खालिस्तानी नेटवर्क की रीढ़ तोड़ पाएंगे। अनुज भारद्वाज ने पहले तो एजेंट पर अविश्वास जताया, लेकिन संजीव के बार-बार भरोसा दिलाने पर वे मान गए। भारद्वाज ने कहा कि अगले साल प्रधानमंत्री राजीव गांधी का फ्रांस दौरा प्रस्तावित है, इसलिए मैं चाहता हूँ कि इस ऑपरेशन का मुख्य बेस लंदन रहे, लेकिन पूरे मिशन की निगरानी पेरिस के एक सेफ हाउस से की जाए। संजीव ने मुस्कुराते हुए इस पर सहमति दी। इस बेहद गुप्त और खतरनाक मिशन को कोडनेम दिया गया- 'ऑपरेशन हॉरनेट'।

 

## यूरोपीय नेटवर्क का विस्तार: मोहन नारायणन और एजेंट क्लार्क की रणनीति

दिसंबर 1984 में रॉ दफ्तर को एक गुप्त कोडेड संदेश मिला कि अचानक गायब हो चुका उग्रवादी संधू अब पाकिस्तान के इस्लामाबाद शहर में देखा गया है। संदेश मिलते ही अनुज भारद्वाज ने तुरंत संजीव जिंदल को भारत बुलवाया। संजीव ने दिल्ली पहुँचकर भारद्वाज को बताया कि पाकिस्तान की आईएसआई का प्रमुख जनरल अख्तर अब्दुल रहमान खुद इस पूरे ऑपरेशन की मॉनिटरिंग कर रहा है। उसने संधू को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले रखा है और संधू उसकी उँगलियों पर नाच रहा है। संजीव ने चेतावनी दी कि आईएसआई संधू का इस्तेमाल करके भारत में 1971 के बांग्लादेश जैसा संकट खड़ा करना चाहती है। भारद्वाज ने पूछा कि फिर इस ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए तुम्हारी क्या योजना है? संजीव ने अपनी योजना रखी कि उन्हें लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग में एक ऐसे अंडरकवर अधिकारी की जरूरत है जो लंदन में रॉ के सबसे भरोसेमंद एजेंट 'क्लार्क' के साथ तालमेल बिठा सके। क्लार्क वही एजेंट था जो यूरोप में रॉ के गुप्त अभियानों को जमीन पर अंजाम देता था। भारद्वाज ने मुस्कुराते हुए संजीव की योजना को मंजूरी दे दी।

संजीव ने लंदन एम्बेसी में तैनाती के लिए एक अनुभवी जासूस का चयन किया, जिसे कोडनेम दिया गया 'मोहन नारायणन'। नारायणन को आतंकवाद की गहरी समझ थी, वे यूरोपीय माहौल और कायदे-कानूनों से भली-भांति वाकिफ थे और अपनी पहचान छिपाकर कहानियाँ गढ़ने में माहिर थे। सबसे खास बात यह थी कि वे पंजाबी के अलावा जर्मन और फ्रेंच भाषाएँ धाराप्रवाह बोलते थे। 'ऑपरेशन हॉरनेट' को दो हिस्सों में बाँटा गया- पहला, खुफिया जानकारी जुटाना और उसका विश्लेषण करना, जिसकी जिम्मेदारी मोहन नारायणन और क्लार्क को दी गई; और दूसरा, पूरे ऑपरेशन की रणनीतिक कमान और एग्जीक्यूशन, जिसे खुद संजीव जिंदल संभाल रहे थे।

अब जनवरी 1985 का महीना आ चुका था। संजीव ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना के एक शांत कैफे में बैठकर अपनी महिला सहयोगी सोफी का इंतजार कर रहे थे। सोफी इतिहास में स्नातक थी और विएना के एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) में काम करती थी। संजीव की उससे पहली मुलाकात मानव अधिकार आयोग के एक सम्मेलन में हुई थी, जहाँ सोफी ने पाकिस्तान की मानवाधिकार विरोधी नीतियों की तीखी आलोचना की थी। संजीव उसके विचारों से काफी प्रभावित हुए थे, वहीं सोफी भी संजीव की राजनीतिक समझ और व्यक्तित्व की कायल थी। धीरे-धीरे दोनों में दोस्ती हो गई और संजीव ने चतुराई से सोफी को अपने सीक्रेट मिशन का हिस्सा बना लिया। सोफी रॉ के अंडरकवर एजेंटों तक गुप्त रूप से पैसा पहुँचाती थी, नए रिक्रूट्स को ट्रेनिंग देती थी और जरूरत पड़ने पर हैंडलर के रूप में काम करती थी। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह थी कि सोफी को कभी यह भनक तक नहीं लगी कि वह भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के लिए काम कर रही है। वह केवल पाकिस्तान से नफरत करती थी और संजीव के प्रति भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई थी।

 

## विएना का गुप्त सौदा, माली तारिक सिद्दीकी का सुराग और लाहौर में अंत

संजीव अभी सोफी के बारे में सोच ही रहे थे कि वह कैफे के दरवाजे से अंदर दाखिल हुई। नीली आँखों वाली सोफी ने कंधे तक कटे बाल, बड़ा गोल चश्मा, काले रंग की लेदर जैकेट, कार्गो पैंट और लेदर बूट्स पहन रखे थे। वह सीधे संजीव की टेबल पर आकर बैठ गई। संजीव ने मुस्कुराते हुए कहा कि आखिरकार तुम्हारे सोशलिस्ट नेता को जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार मिल ही गया। सोफी ने थोड़ा चिढ़कर जवाब दिया कि तुम ऑस्ट्रिया के विकास में ब्रूनो के योगदान को नजरअंदाज नहीं कर सकते। वह डॉ. ब्रूनो क्रैस्की का जिक्र कर रही थी, जो 13 सालों तक ऑस्ट्रिया के चांसलर रहे थे। संजीव ने थोड़ा मजाक के अंदाज में कहा कि मुझे पता है कि उन्होंने पुरस्कार समारोह में नेहरू की बहुत तारीफ की थी। सोफी ने सिगरेट सुलगाई और संजीव की आँखों में देखते हुए कहा कि हम पूरे दो साल बाद मिल रहे हैं, मुझे तो यह भी नहीं पता कि तुम अभी भी मेरे दोस्त हो या नहीं। तुम्हारी इस तरह अचानक वापसी मुझे डरा रही है। संजीव ने बात घुमाने के बजाय सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा कि क्या तुम जानती हो कि हरप्रीत अहूजा इस समय कहाँ है?

सोफी ने याद करते हुए कहा कि अच्छा, वही भारतीय जो हमारे एनजीओ में काम करता था? उसने तो एक साल पहले ही एनजीओ छोड़ दिया था, तुम उसे क्यों ढूँढ रहे हो? संजीव ने बिना कुछ बोले अपनी जैकेट की जेब से एक मोटा लिफाफा निकालकर मेज पर रख दिया और कहा कि इसमें 10,000 अमेरिकी डॉलर हैं, तुम चाहो तो गिन सकती हो। मुझे बस हरप्रीत का पता चाहिए। सोफी ने आँख मारते हुए मुस्कुराकर लिफाफा उठाया और कहा कि फिक्र मत करो, हरप्रीत मेरा पुराना दोस्त रहा है। वह लिफाफा लेकर कैफे से बाहर निकल गई, लेकिन जाने से पहले उसने टेबल पर एक छोटा सा कागज का टुकड़ा छोड़ दिया था। संजीव ने उस कागज को चुपचाप उठाकर अपनी जेब में रख लिया, जिस पर हरप्रीत और उसके नेटवर्क से जुड़ा एक अहम सुराग लिखा था।

दो दिन बाद संजीव पेरिस लौट आए। उन्होंने पेरिस के एक पब्लिक टेलीफोन बूथ से लंदन स्थित भारतीय दूतावास के एक सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड नंबर पर कॉल किया। रॉ एजेंट मोहन नारायणन ने फोन उठाया। संजीव ने पूछा कि क्या काम हो गया? नारायणन ने कोडेड भाषा में जवाब दिया कि सर, अब्दुल खान के लाहौर स्थित बंगले पर एक माली काम करता है जिसका नाम तारिक सिद्दीकी है। वह भारी रकम के बदले अपने मालिक अब्दुल खान से गद्दारी करने और उसकी पल-पल की लोकेशन देने को तैयार हो गया है। फोन कटते ही संजीव ने राहत की सांस ली और मन ही मन धीरे से बुदबुदाए कि "डियर सोफी... बस तुम मुझे धोखा मत देना।" आखिरकार इसी खुफिया नेटवर्क और माली तारिक सिद्दीकी से मिली सटीक मुखबिरी के दम पर जून 1987 में रॉ के हिट स्क्वाड ने लाहौर में आईएसआई एजेंट अब्दुल खान की घेराबंदी की और उसकी हवेली के बाहर उसे नौ गोलियाँ मारकर हमेशा के लिए खामोश कर दिया।

## सवाल-जवाब

### 1. ऑपरेशन हॉरनेट क्या था?
ऑपरेशन हॉरनेट भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ द्वारा 1980 के दशक में शुरू किया गया एक बेहद गुप्त अभियान था, जिसका मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान की आईएसआई और खालिस्तानी चरमपंथियों के नापाक नेटवर्क को पूरी तरह तबाह करना था।

### 2. लाहौर में मारे गए व्यक्ति की पहचान क्या थी?
लाहौर में जून 1987 में मारा गया व्यक्ति अब्दुल खान था, जो पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का एक प्रमुख एजेंट था और भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल था।

### 3. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कब और किसने की थी?
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या 31 अक्टूबर 1984 को नई दिल्ली स्थित उनके आवास पर उनके ही सुरक्षाकर्मियों बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने गोलियाँ मारकर की थी।

### 4. रॉ के अधिकारी जीबीएस सिद्धू ने इंदिरा गांधी की हत्या से पहले क्या चेतावनी देखी थी?
जीबीएस सिद्धू ने हत्या से 10 दिन पहले प्रधानमंत्री आवास के बाहर तैनात सिख सुरक्षाकर्मियों को देखा था और उन्हें हटाने के लिए एक गोपनीय नोट तैयार किया था, जिसे अनहोनी के डर से उन्होंने फाड़ दिया था।

### 5. लाहौर में आईएसआई एजेंट तक पहुँचने के लिए रॉ ने किसकी मदद ली थी?
रॉ ने अब्दुल खान के घर पर काम करने वाले माली तारिक सिद्दीकी को पैसों का लालच देकर अपना मुखबिर बनाया था, जिसने अब्दुल खान की सटीक आवाजाही की जानकारी दी थी।

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