# ईरान से सैन्य टकराव के बावजूद राष्ट्रपति को अमेरिकी वीज़ा, जानिए संयुक्त राष्ट्र मंच पर विरोधी नेताओं को बोलने देने की कूटनीतिक मजबूरी

> ईरान के सर्वोच्च नेता की मौत और जारी सैन्य तनाव के बीच राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने न्यूयॉर्क पहुंच रहे हैं। 1947 के मुख्यालय समझौते के कानूनी प्रावधानों के तहत अमेरिका अपने कड़े विरोधियों को भी मंच देने के लिए बाध्य है।

**Type:** article · **Category:** पड़ताल · **Published:** 2026-09-23 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/investigations/irana-se-sainya-takarava-ke-bavajuda-rashtrapati-masoud-pezeshkian-ko-us-viza-janie-un-mncha-para-virodhi-netaon-ko-bolane-dene-ki-37000 · **Language:** Hindi
**Tags:** संयुक्त राष्ट्र महासभा, ईरान अमेरिका संबंध, मसूद पेज़ेशकियन, मुख्यालय समझौता 1947, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, वीज़ा विवाद

ईरान के साथ सैन्य टकराव के चरम पर होने के बावजूद राजनयिक गलियारों से एक असाधारण घटनाक्रम सामने आया है। कुछ महीने पहले सैन्य कार्रवाई के शुरुआती दिन में ईरानी सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और उनके परिवार के चार करीबी सदस्यों की मौत हो गई थी। इस पूरे युद्ध में ईरान के आधे से अधिक नेतृत्व सहित 8,000 से अधिक ईरानी नागरिकों की जान जा चुकी है, जबकि नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई अभी तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं। इसके ठीक सात महीने बाद, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन अपने विदेश मंत्री अब्बास अराघची के साथ वार्षिक संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र में भाग लेने के लिए न्यूयॉर्क पहुंच रहे हैं। जिन नेताओं को अमेरिका अपना सीधा विरोधी मानता है, उन्हें खुद अमेरिकी प्रशासन ने वीज़ा जारी कर संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय आने की अनुमति दी है।

यह पहला अवसर नहीं है जब वाशिंगटन ने उन विश्व नेताओं को अपनी धरती पर आने की कानूनी अनुमति दी है, जिन्होंने बाद में उसी मंच से अमेरिकी नीतियों की तीखी आलोचना की। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के इतिहास में ऐसे कई महत्वपूर्ण मोड़ आए हैं जब धुर विरोधी नेताओं ने न्यूयॉर्क पहुंचकर वैश्विक मंच से कड़ा संदेश दिया है।

## फ़िदेल कास्त्रो का ऐतिहासिक संबोधन और न्यूयॉर्क में ठहरने का विवाद
जनवरी 1959 में क्यूबा की क्रांति के बाद फ़िदेल कास्त्रो ने सत्ता संभाली थी। इस सत्ता परिवर्तन से नाराज़ होकर मार्च 1960 में अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर ने सीआईए को कास्त्रो की सरकार को उखाड़ फेंकने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद, उसी वर्ष सितंबर 1960 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए अमेरिका को कास्त्रो और उनके पूरे प्रतिनिधिमंडल को वीज़ा जारी करना पड़ा।

कास्त्रो 19 सितंबर 1960 को न्यूयॉर्क पहुंचे। मैनहट्टन के शेल्बर्न होटल में उनके लिए कमरा आरक्षित था, परंतु होटल प्रबंधन ने उन्हें ठहराने से इनकार कर दिया। इसके बाद वे हार्लेम स्थित थेरेसा होटल चले गए। थेरेसा होटल में प्रवास के दौरान कास्त्रो ने सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव, मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर और भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की। इसके अतिरिक्त मानवाधिकार कार्यकर्ता मैल्कम एक्स और कई अफ्रीकी अमेरिकी नेता भी उनसे मिलने पहुंचे।

संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर 26 सितंबर 1960 को कास्त्रो ने अपना संबोधन यह कहकर शुरू किया था कि उनके बारे में लंबे भाषण देने की बात कही जाती है, लेकिन प्रतिनिधि चिंता न करें क्योंकि वे संक्षिप्त भाषण देंगे। इसके विपरीत, उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतिहास का सबसे लंबा भाषण दिया, जो 269 मिनट यानी 4 घंटे 29 मिनट तक चला। अपने संबोधन में कास्त्रो ने अमेरिका पर लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप करने और तानाशाही व्यवस्था को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि क्यूबा की क्रांति सिर्फ एक तानाशाह बतिस्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था के विरुद्ध थी जिसने क्यूबा को अमेरिका का गुलाम बनाए रखा था। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों जॉन एफ कैनेडी और रिचर्ड निक्सन की भी तीखी आलोचना की। उन्होंने कैनेडी को एक अनपढ़ और अज्ञानी करोड़पति करार दिया, जबकि निक्सन को राजनीतिक रूप से कमज़ोर बताया।

## यासिर अराफ़ात की पहली उपस्थिति और जैतून की शाखा का संदेश
वर्ष 1974 में फ़लस्तीनी राज्य की मांग को लेकर संघर्षरत फ़लस्तीन मुक्ति संगठन यानी पीएलओ को अमेरिका और इसराइल आतंकवादी संगठन मानते थे। इसके बावजूद 14 अक्टूबर 1974 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पीएलओ को फ़लस्तीनी जनता का आधिकारिक प्रतिनिधि स्वीकार किया और सभा को संबोधित करने का निमंत्रण दिया। इसराइल और अमेरिका के कड़े विरोध के बाद भी वाशिंगटन को वीज़ा की मंज़ूरी देनी पड़ी।

इसके एक महीने बाद, 13 नवंबर 1974 को पीएलओ नेता यासिर अराफ़ात संयुक्त राष्ट्र पहुंचे। यह पहला अवसर था जब किसी गैर सदस्य संगठन के प्रतिनिधि को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने की अनुमति मिली थी। अपने 80 मिनट के संबोधन में अराफ़ात ने फ़लस्तीनियों के लिए एक स्वतंत्र राज्य की जोरदार मांग रखी। उन्होंने कहा कि वे एक विद्रोही हैं और आज़ादी उनका लक्ष्य है, साथ ही तर्क दिया कि क्रांतिकारी और आतंकवादी में केवल उद्देश्य का अंतर होता है। उन्होंने कहा कि कब्ज़ा करने वाले और शोषण करने वाले असली आतंकवादी हैं, आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले नहीं।

अपने भाषण के अंत में अराफ़ात ने विश्व समुदाय से अपील करते हुए कहा कि वे एक हाथ में जैतून की शाखा और दूसरे हाथ में स्वतंत्रता सेनानी की बंदूक लेकर आए हैं, इसलिए उनके हाथ से जैतून की शाखा को गिरने न दिया जाए। उस समय की एक तस्वीर भी अत्यंत चर्चित रही, जिसमें उनकी जैकेट से पिस्तौल का होल्स्टर दिखाई दे रहा था, जिसे लेकर यह विवाद रहा कि क्या उन्होंने मंच पर जाने से पहले अपनी पिस्तौल उतारी थी या नहीं। इस भाषण के नौ दिन बाद, 22 नवंबर 1974 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पीएलओ को पर्यवेक्षक का दर्जा प्रदान किया, जिसे फ़लस्तीनी मुद्दे की वैश्विक स्वीकार्यता का आरंभ माना गया।

## ह्यूगो शावेज़ का तीखा हमला और सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग
वर्ष 2006 में 19 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया। बुश ने इराक और अफगानिस्तान में जारी सैन्य अभियानों को स्वतंत्रता और लोकतंत्र की लड़ाई बताया, जबकि उस समय दोनों देश अमेरिकी सैन्य नियंत्रण के अधीन थे। ठीक अगले दिन, 20 सितंबर 2006 को वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज़ उसी मंच पर पहुंचे।

मंच पर आते ही शावेज़ ने ईसाई परंपरा के अनुसार क्रॉस का निशान बनाया और कहा कि पिछले दिन यहां शैतान आया था और आज भी यहां गंधक की दुर्गंध आ रही है। उन्होंने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति, जिन्हें वे शैतान कहते हैं, यहां आकर ऐसे बोले मानो वे पूरी दुनिया के मालिक हों। शावेज़ ने अमेरिकी नीति को बमों और गोलियों के ज़रिये थोपा गया लोकतंत्र करार दिया। इसके साथ ही उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में तत्काल सुधार करने और वीटो शक्ति को पूरी तरह समाप्त करने का आह्वान किया।

उस दिन महासभा कक्ष में कोई वरिष्ठ अमेरिकी राजदूत उपस्थित नहीं था और केवल एक कनिष्ठ अधिकारी नोट्स ले रहा था। बाद में संयुक्त राष्ट्र में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत जॉन बोल्टन ने शावेज़ के इस बयान को अपमानजनक बताया और अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रति उनके नज़रिये को कॉमिक स्ट्रिप जैसा यानी बचकाना करार दिया।

## मुअम्मर गद्दाफ़ी का लंबा भाषण और चार्टर की प्रति फाड़ना
सितंबर 1969 में लीबियाई सेना के कैप्टन मुअम्मर गद्दाफ़ी ने शाह इदरीस प्रथम को अपदस्थ कर सत्ता पर कब्ज़ा किया था। गद्दाफ़ी ने अमेरिका विरोधी रुख अपनाते हुए परमाणु कार्यक्रम शुरू किया, जिसके चलते अमेरिका ने लीबिया को आतंकवाद प्रायोजक देश घोषित कर दिया था। सत्ता में आने के चालीस साल बाद गद्दाफ़ी ने पहली बार अमेरिका का दौरा किया और 23 सितंबर 2009 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपना पहला भाषण दिया।

भूरे रंग का बदू चोगा, काली टोपी, काला चश्मा, सीने पर अफ्रीकी महाद्वीप के आकार का ब्रोच और लाल स्कार्फ़ पहने गद्दाफ़ी ने खुद को अफ्रीकी राजाओं का राजा बताया। गद्दाफ़ी ने आरोप लगाया कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से दुनिया भर में हुए 65 युद्धों को रोकने में यह संस्था विफल रही है। उन्होंने कहा कि इसे सुरक्षा परिषद नहीं, बल्कि आतंक परिषद कहा जाना चाहिए।

गद्दाफ़ी को बोलने के लिए 15 मिनट का समय दिया गया था, परंतु वे एक नोटबुक से फटे मुड़े हुए पीले पन्नों को पढ़ते हुए 96 मिनट तक बोलते रहे। उनके लंबे भाषण के दौरान सभागार आधा खाली हो गया। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत सुज़ैन राइस वॉकआउट कर बाहर निकल गईं, जबकि पीछे केवल कनिष्ठ अधिकारी बैठे रहे। गद्दाफ़ी का दुभाषिया भी अत्यधिक थक जाने के कारण बीच में ही काम छोड़कर चला गया, जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों को उसकी जगह दूसरा अनुवादक लगाना पड़ा।

भाषण के अंत में गद्दाफ़ी ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर की एक प्रति हाथ में ली, उसके कुछ अंश पढ़े, फिर उसे हल्का सा फाड़कर अपने पीछे फेंक दिया। उन्होंने तर्क दिया कि सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों को दिया गया वीटो अधिकार चार्टर की मूल भावना के खिलाफ है और इसे खत्म किया जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की प्रशंसा करते हुए उन्हें अपना बेटा कहा और टिप्पणी की कि अफ्रीका के लोगों को गर्व है कि अफ्रीका का एक बेटा अमेरिका पर शासन कर रहा है। उसी दिन बाद में ब्रिटिश प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने महासभा में बोलते हुए कहा कि वे संयुक्त राष्ट्र चार्टर की पुष्टि करने आए हैं, उसे फाड़ने नहीं। संयुक्त राष्ट्र की प्रवक्ता मिशेल मोंटास ने भी चार्टर के प्रति इस अनादर को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया।

## महमूद अहमदीनेजाद का बयान और 33 देशों का वॉकआउट
वर्ष 2010 में 23 सितंबर की सुबह अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने संयुक्त राष्ट्र में सुलह का संदेश देते हुए ईरान के साथ वार्ता का प्रस्ताव रखा था। इसके कुछ ही घंटों बाद जब ईरानी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद मंच पर आए तो माहौल पूरी तरह बदल गया। अहमदीनेजाद ने 11 सितंबर 2001 के हमलों को लेकर तीन अलग सिद्धांत पेश किए।

पहला सिद्धांत यह था कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों से बचते हुए एक शक्तिशाली आतंकवादी समूह ने इसे अंजाम दिया। दूसरा सिद्धांत यह था कि अमेरिकी सरकार के भीतर के कुछ लोगों ने अपनी कमज़ोर अर्थव्यवस्था को उभारने, पश्चिम एशिया पर अमेरिकी नियंत्रण मजबूत करने और इसराइल की रक्षा के लिए यह हमला करवाया। तीसरा सिद्धांत यह था कि हमला एक आतंकवादी गुट ने किया, लेकिन अमेरिकी सरकार ने अपने फायदे के लिए इसका इस्तेमाल किया।

हमलों के लिए सीधे तौर पर अमेरिकी प्रशासन को ज़िम्मेदार ठहराते हुए अहमदीनेजाद ने दावा किया कि अधिकांश अमेरिकी, दुनिया के कई देश और उनके नेता दूसरे सिद्धांत से सहमत हैं। उन्होंने इस घटना की निष्पक्ष जांच के लिए एक अंतरराष्ट्रीय तथ्यान्वेषी दल गठित करने की मांग की। जैसे ही उन्होंने दूसरा सिद्धांत पेश किया, अमेरिका सहित 33 देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने हॉल से वॉकआउट कर दिया। इनमें कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कोस्टा रिका और यूरोपीय संघ के सभी 27 सदस्य देश शामिल थे। अमेरिकी मिशन के प्रवक्ता मार्क कॉर्नब्लाउ ने इसे घृणित साज़िश और यहूदी विरोधी कूड़ा करार दिया। व्हाइट हाउस ने भी एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि राष्ट्रपति ओबामा को यह बयान अत्यंत आपत्तिजनक लगा, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि यह टिप्पणी उसी न्यूयॉर्क शहर में की गई थी जहां वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारतें गिरी थीं।

## 1947 का मुख्यालय समझौता और अमेरिका की कानूनी सीमाएं
यह सवाल बार बार उठता है कि अमेरिका अपने धुर विरोधी नेताओं को अपने क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति क्यों देता है। इसका सीधा उत्तर 79 वर्ष पुराने एक कानूनी समझौते में छिपा है। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद वर्ष 1945 में भविष्य के युद्धों को रोकने के उद्देश्य से 51 देशों ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की थी। जिनेवा, लंदन, सैन फ्रांसिस्को और न्यूयॉर्क जैसे शहरों पर विचार करने के बाद अंततः न्यूयॉर्क को स्थायी मुख्यालय के रूप में चुना गया।

मुख्यालय की मेज़बानी स्वीकार करने के साथ ही अमेरिका पर यह कानूनी दायित्व आ गया कि वह सदस्य देशों के प्रतिनिधियों को अपने देश में आने की अनुमति देगा, चाहे उन देशों के साथ अमेरिका के संबंध कैसे भी हों। इसके लिए 26 जून 1947 को संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका के बीच मुख्यालय समझौता हस्ताक्षरित हुआ। इस पर तत्कालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव ट्रिगवे ली और अमेरिकी विदेश मंत्री जॉर्ज सी मार्शल ने हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता 21 नवंबर 1947 को कानून बन गया।

इस समझौते की धारा 11 से 13 के तहत यह प्रावधान है कि सदस्य देशों के प्रतिनिधियों को अमेरिकी आव्रजन नियमों की परवाह किए बिना संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय तक आने जाने का पूर्ण अधिकार है। इसी कानूनी बाध्यता के कारण मौजूदा सैन्य संघर्ष के बावजूद अमेरिका ईरानी प्रतिनिधिमंडल को देश में आने से नहीं रोक सकता।

हालांकि अमेरिका इस प्रतिनिधिमंडल की आवाजाही को कड़े नियमों में बांध सकता है। इस वर्ष के सत्र के लिए ईरानी प्रतिनिधियों को केवल संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, ईरान के स्थायी मिशन, राजदूत के आवास और जॉन एफ कैनेडी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के बीच ही आवागमन की अनुमति दी गई है। किसी भी अन्य स्थान पर जाने के लिए उन्हें अमेरिकी सरकार से विशेष अनुमति लेनी होगी। इसके अलावा अमेरिका ने ईरान को अपना प्रतिनिधिमंडल सीमित रखने का निर्देश दिया है तथा क्लबों, सामान्य बाज़ारों में जाने और विलासितापूर्ण खरीदारी करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।

## सुरक्षा अपवाद और सदस्य बनाम गैर सदस्य का अंतर
मुख्यालय समझौते के तहत अमेरिकी सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि वह किसी भी ऐसे व्यक्ति के प्रवेश को रोक सकती है जिसे वह अमेरिकी सुरक्षा के लिए सीधा खतरा मानती हो। इसी प्रावधान का सहारा लेकर वर्ष 1988 में अमेरिका ने यासिर अराफ़ात को वीज़ा देने से इनकार कर दिया था। उस समय अमेरिकी विदेश विभाग ने तर्क दिया था कि पीएलओ के आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के पुख्ता प्रमाण हैं। अमेरिकी फैसले के विरोध में संयुक्त राष्ट्र महासभा को उस वर्ष अपना पूरा सत्र जिनेवा स्थानांतरित करना पड़ा था, जिससे अमेरिका को भारी अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ा।

इसी कानूनी आधार पर अमेरिका ने फ़लस्तीनी प्राधिकरण के राष्ट्रपति महमूद अब्बास को वर्ष 2025 और 2026 में वीज़ा देने से मना किया। वाशिंगटन का कहना है कि पीएलओ और फ़लस्तीनी प्राधिकरण अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में विफल रहे हैं तथा वे अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के ज़रिये विवाद का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का प्रयास कर रहे हैं। पिछली बार की तरह इस बार भी अब्बास महासभा को केवल वर्चुअल माध्यम से ही संबोधित करेंगे।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि महमूद अब्बास और पीएलओ के अधिकारी किसी पूर्ण संयुक्त राष्ट्र सदस्य राष्ट्र के प्रमुख नहीं हैं, बल्कि एक गैर सदस्य इकाई का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए उन पर वीज़ा प्रतिबंध लगाना राजनीतिक और कानूनी रूप से आसान होता है। इसके विपरीत ईरान जैसे पूर्ण सदस्य राष्ट्र के निर्वाचित राष्ट्रपति को रोकना एक बहुत बड़ा कूटनीतिक कदम माना जाएगा, जिससे अमेरिका पर सीधे तौर पर 1947 के मुख्यालय समझौते के उल्लंघन का आरोप लग सकता है।

## इसका आप पर असर
यह घटनाक्रम दिखाता है कि गंभीर युद्ध के दौरान भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संधियां द्विपक्षीय पाबंदियों से ऊपर मानी जाती हैं।

- **राजनयिक नियमों पर प्रभाव:** संयुक्त राष्ट्र के 1947 के मुख्यालय समझौते की अनिवार्यता के कारण अमेरिका युद्धरत देश के राष्ट्रपति को भी आने से नहीं रोक सकता। इससे यह तय होता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में संवाद के कानूनी रास्ते हमेशा खुले रहते हैं।
- **यात्रा और सुरक्षा प्रोटोकॉल:** ईरानी प्रतिनिधिमंडल को केवल हवाई अड्डे, आवास और संयुक्त राष्ट्र परिसर तक सीमित रखा गया है। इसका अर्थ है कि विरोधी नेताओं को वीज़ा मिलने पर भी कड़ी सुरक्षा निगरानी और आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध लागू रहते हैं।
- **वैश्विक मंच की तटस्थता:** न्यूयॉर्क में होने वाली बैठक में सभी मान्यता प्राप्त देशों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाती है। आम नागरिकों और कूटनीतिक विश्लेषकों के लिए यह इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक संस्थाओं की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए कानूनी समझौते प्रभावी रहते हैं।
- **गैर सदस्य देशों के लिए सीमाएं:** पूर्ण सदस्य देशों के विपरीत गैर सदस्य संस्थाओं जैसे फ़लस्तीनी नेतृत्व के वीज़ा पर अमेरिका आसानी से रोक लगा सकता है। यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी देश की पूर्ण सदस्यता का दर्जा कितना महत्वपूर्ण होता है।

## ऐसा क्यों हुआ
सक्रिय सैन्य संघर्ष और गंभीर जानमाल के नुकसान के बावजूद अमेरिका द्वारा ईरानी राष्ट्रपति को वीज़ा देना 1947 के अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय समझौते की कानूनी बाध्यताओं का सीधा परिणाम है।

- **1947 के मुख्यालय समझौते की बाध्यता:** जब न्यूयॉर्क को संयुक्त राष्ट्र का स्थायी मुख्यालय चुना गया, तब अमेरिका ने एक संधि पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते की धारा 11 से 13 के अनुसार सदस्य देशों के प्रतिनिधियों को अमेरिकी आव्रजन नियमों की परवाह किए बिना मुख्यालय तक आने जाने की गारंटी दी गई है।
- **पूर्ण सदस्य बनाम गैर सदस्य का दर्जा:** ईरान संयुक्त राष्ट्र का पूर्ण सदस्य राष्ट्र है, जिसके चलते उसके राष्ट्रपति का वीज़ा रोकना संधि का सीधा उल्लंघन माना जाता। वहीं पीएलओ या फ़लस्तीनी प्राधिकरण जैसे गैर सदस्य दर्जे वाले नेताओं पर प्रतिबंध लगाना कानूनी तौर पर आसान होता है।
- **कड़े प्रतिबंधों के साथ अनुमति:** वीज़ा देने के बावजूद अमेरिका ने ईरानी प्रतिनिधियों की आवाजाही को केवल हवाई अड्डे, मिशन और मुख्यालय तक सीमित कर दिया है। इसके अतिरिक्त प्रतिनिधिमंडल के आकार को छोटा रखने और बाज़ारों या क्लबों में जाने पर रोक लगाकर सुरक्षा चिंताओं को संतुलित किया गया है।

## सवाल-जवाब

### 1. ईरान और अमेरिका में तनाव के बावजूद राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन को वीज़ा क्यों दिया गया?
अमेरिका 1947 के संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय समझौते के तहत सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधियों को सभा में भाग लेने के लिए आने देने को कानूनी रूप से बाध्य है।

### 2. ईरानी प्रतिनिधिमंडल के न्यूयॉर्क दौरे पर क्या पाबंदियां लगाई गई हैं?
ईरानी प्रतिनिधियों को केवल संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, ईरानी मिशन, राजदूत के आवास और हवाई अड्डे के बीच जाने की अनुमति है, जबकि खरीदारी और क्लब जाने पर रोक है।

### 3. संयुक्त राष्ट्र महासभा में अब तक का सबसे लंबा भाषण किसने दिया था?
क्यूबा के नेता फ़िदेल कास्त्रो ने 26 सितंबर 1960 को 269 मिनट यानी 4 घंटे 29 मिनट का भाषण दिया था, जो इतिहास में सबसे लंबा है।

### 4. क्या अमेरिका ने पहले कभी किसी नेता का वीज़ा रोका है?
हां, अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर 1988 में यासिर अराफ़ात और 2025 तथा 2026 में महमूद अब्बास को वीज़ा देने से इनकार किया था।

### 5. वर्ष 2006 में वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज़ ने मंच से क्या कहा था?
शावेज़ ने जॉर्ज डब्ल्यू बुश को शैतान बताते हुए कहा था कि मंच से अभी भी गंधक की बदबू आ रही है, और सुरक्षा परिषद से वीटो खत्म करने की मांग की थी।

### 6. मुअम्मर गद्दाफ़ी ने 2009 के अपने भाषण में क्या किया था?
गद्दाफ़ी ने 96 मिनट का भाषण दिया, सुरक्षा परिषद को आतंक परिषद कहा और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के पन्नों को हल्का सा फाड़कर फेंक दिया था।

### 7. ईरानी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के किस बयान पर देशों ने वॉकआउट किया था?
उन्होंने 9/11 हमलों के लिए अमेरिकी सरकार के तत्वों को ज़िम्मेदार ठहराया था, जिसके बाद अमेरिका और यूरोपीय संघ सहित 33 देशों ने वॉकआउट किया था।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._