इज़राइली संसद में बहुमत से चूके बेंजामिन नेतन्याहू और आइजेनकोट, सत्ता की चाबी अब अरब दलों के हाथों में इज़राइल के संसदीय चुनाव में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के बाद 19 सीटों वाले अरब दल सरकार गठन में सबसे निर्णायक भूमिका में आ गए हैं। इज़राइल के संसदीय चुनावों के बाद देश में एक बार फिर राजनीतिक गतिरोध की स्थिति बन गई है, जहाँ किसी भी बड़े राजनीतिक धड़े को सरकार बनाने के लिए ज़रूरी संख्या बल हासिल नहीं हो सका है। वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का सत्ताधारी गठबंधन जादुई आंकड़े से 7 सीटें पीछे रह गया है, जबकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी विपक्षी नेता आइजेनकोट का गठबंधन बहुमत से 14 सीटें दूर है। कुल 120 सीटों वाली संसद में 19 सीटें जीतने वाले अरब दल इस समय सत्ता के सबसे बड़े निर्णायक यानी किंगमेकर बनकर उभरे हैं। चुनाव के आधिकारिक नतीजों की औपचारिक घोषणा 4 नवंबर को की जाएगी, लेकिन उससे पहले ही दोनों मुख्य खेमों के बीच समर्थन जुटाने की ज़ोरदार कवायद शुरू हो चुकी है। संसद का गणित और सरकार गठन की संवैधानिक प्रक्रिया इज़राइल की संसद को क्नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सीटें हैं। यहाँ किसी भी दल या गठबंधन को अपनी सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है। इज़राइल के 78 साल के समूचे राजनीतिक इतिहास में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी एक अकेले दल ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया हो। हर बार गठबंधन सरकारों का ही सहारा लेना पड़ा है और इस बार का जनादेश भी इसी परंपरा की पुष्टि करता दिखाई दे रहा है। ऐसे में नई सरकार के गठन के लिए मुख्य रूप से चार संवैधानिक और राजनीतिक चरण तय किए गए हैं। पहला चरण राष्ट्रपति की प्राथमिक भूमिका का होता है। राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग क्नेसेट में चुनकर आए सभी राजनीतिक दलों के नेताओं और प्रतिनिधियों के साथ औपचारिक विचार-विमर्श करेंगे। इस विमर्श के बाद वह उस नेता को सरकार बनाने का न्योता सौंपेंगे, जिसके पास 61 सांसदों का समर्थन जुटाने की सबसे ठोस और व्यावहारिक संभावना होगी। परंपरा के अनुसार आमतौर पर सबसे बड़े दल के नेता को ही यह पहला मौका मिलता है, लेकिन कानूनन ऐसा करना अनिवार्य नहीं है। मिसाल के तौर पर वर्ष 2009 में तत्कालीन राष्ट्रपति शिमोन पेरेज़ ने लिकुड पार्टी के नेता बेंजामिन नेतन्याहू को सरकार बनाने का अवसर दिया था, जबकि उस चुनाव में कादिमा पार्टी को लिकुड से अधिक वोट हासिल हुए थे। दूसरा चरण गठबंधन तैयार करने के लिए दी जाने वाली समय सीमा का है। राष्ट्रपति जिस नेता को सरकार बनाने के लिए नामित करते हैं, उसे अपने सहयोगी जुटाने और सहमति बनाने के लिए शुरुआत में 28 दिनों का समय मिलता है। यदि निर्धारित समय में बात पूरी नहीं हो पाती, तो राष्ट्रपति अपने विशेषाधिकार के तहत इसे 14 दिनों के लिए और बढ़ा सकते हैं। इस प्रकार नामित नेता को अधिकतम 42 दिन का समय मिल सकता है। इस तय अवधि के भीतर उस नेता को अपने मंत्रिमंडल और सरकार की साझा नीतियों का मसौदा क्नेसेट में पेश करना होता है, जहाँ उसे 61 सांसदों का भरोसा साबित करना पड़ता है। तीसरा चरण पहले प्रयास की विफलता से जुड़ा है। यदि राष्ट्रपति द्वारा चुना गया पहला नेता 42 दिनों के भीतर 61 सदस्यों का समर्थन जुटाने में नाकाम रहता है, तो राष्ट्रपति दूसरे सबसे मजबूत दावेदार को यह अवसर देते हैं। अगर दूसरा नेता भी बहुमत साबित करने में असफल रहता है, तो राजनीतिक समीकरणों के आधार पर अल्पसंख्यक सरकार के गठन का रास्ता भी अपनाया जा सकता है। ऐसा प्रयोग वर्ष 2021 में देखा गया था, जब केवल सात सांसदों वाली यामिना पार्टी के नेता नफ्ताली बेनेट ने विपक्ष के व्यापक सहयोग से देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। चौथा और अंतिम चरण नए सिरे से चुनाव कराने का है। गठबंधन की बातचीत अक्सर हफ्तों तक खिंचती है और अगर सरकार बनाने की सभी राजनीतिक कोशिशें पूरी तरह विफल हो जाती हैं, तो क्नेसेट को स्वतः भंग मान लिया जाता है। इसके बाद नियम के अनुसार 90 दिनों के भीतर देश में दोबारा आम चुनाव कराए जाते हैं। इसी राजनीतिक अस्थिरता के चलते वर्ष 2019 से 2022 के बीच इज़राइल में पांच बार संसदीय चुनाव कराने पड़े थे। जब तक नई कैबिनेट विधिवत कार्यभार नहीं संभाल लेती, तब तक बेंजामिन नेतन्याहू ही अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करते रहेंगे। हालांकि इस बार यह पूरी संभावना जताई जा रही है कि अरब दलों के समर्थन से संसद में एक स्थायी सरकार खड़ी की जा सकती है। चार प्रमुख अरब दल और उनका चुनावी सफर इज़राइल की कुल आबादी में लगभग 21 लाख अरब नागरिक रहते हैं, जिनका प्रतिनिधित्व मुख्य रूप से चार अरब दल करते हैं। इनमें हदाश, ताल, बालाद और राम शामिल हैं। इज़राइल के चुनावी इतिहास में इन दलों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण रही है। वर्ष 2015 के आम चुनाव में पहली बार इन चारों दलों ने मिलकर जॉइंट लिस्ट नाम से एक मजबूत चुनावी गठबंधन तैयार किया था। उस चुनाव में इस साझा मोर्चे को 4.46 लाख वोट मिले थे और उसने 13 सीटें जीतकर क्नेसेट में तीसरा सबसे बड़ा राजनीतिक गुट बनने का गौरव हासिल किया था। अप्रैल 2019 के चुनाव में यह एकता टूट गई और अरब दल दो अलग-अलग खेमों में बंटकर मैदान में उतरे। इनमें हदाश-ताल गठबंधन को 6 सीटें मिलीं, जबकि राम-बालाद गठबंधन ने 4 सीटों पर जीत दर्ज की। इसके बाद सितंबर 2019 के चुनाव में ये चारों दल एक बार फिर एकजुट हुए और उन्होंने कुल 5.81 लाख वोट हासिल करते हुए 13 सीटों पर जीत का परचम लहराया। मार्च 2020 में भी अरब दलों ने अपनी साझी ताकत बरकरार रखी और संयुक्त रूप से चुनाव लड़ते हुए अपनी सीटों की संख्या बढ़ाकर 15 तक पहुँचा दी। वर्ष 2021 के चुनाव में अरब राजनीति में एक नया मोड़ आया, जब हदाश, ताल और बालाद ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा और 6 सीटें जीतीं, जबकि मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली राम पार्टी ने अकेले दम पर उतरकर 4 सीटें हासिल कीं। वर्ष 2022 के पिछले चुनाव में हदाश और ताल ने गठबंधन में लड़ते हुए 5 सीटें हासिल कीं और राम पार्टी ने भी अकेले 5 सीटें जीतीं। उस चुनाव में अकेले उतरी बालाद पार्टी संसद में प्रवेश के लिए आवश्यक न्यूनतम 3.25 प्रतिशत मतों की सीमा को पार नहीं कर सकी थी। इस बार सभी अरब दलों ने मिलकर कुल 19 सीटें जीतकर चुनावी गणित में खुद को सबसे मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है। सत्ता समीकरण के तीन संभावित रास्ते संसद में 19 सीटों के साथ किंगमेकर बने अरब दलों के रुख को लेकर राजनीतिक हलकों में तीन बड़े समीकरण उभरकर सामने आ रहे हैं। पहला समीकरण यह है कि राम पार्टी के प्रमुख मंसूर अब्बास अरब और मुस्लिम आबादी के ज़मीनी मुद्दों पर ठोस काम के बदले विपक्षी नेता आइजेनकोट को अपना समर्थन दे दें। मंसूर अब्बास ने स्पष्ट किया है कि वह नेतन्याहू विरोधी खेमे के साथ जुड़कर 61 सीटों के बहुमत आंकड़े को पार कराने का पूरा प्रयास करेंगे। इसके अतिरिक्त जॉइंट लिस्ट ने अपने चुनावी घोषणापत्र में नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने को प्रमुख लक्ष्य बताया है। आइजेनकोट के गठबंधन में शामिल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता याइर गोलन ने भी आइजेनकोट से सार्वजनिक रूप से अपील की है कि वे अरब दलों के साथ मिलकर प्रगतिशील सरकार का गठन करें। दूसरा संभावित रास्ता जॉइंट लिस्ट द्वारा आइजेनकोट की सरकार को बाहर से समर्थन देने का है। जॉइंट लिस्ट की अगुआई कर रहे युसूफ जबरीन ने कहा है कि उनका गठबंधन इज़राइल में सत्ता परिवर्तन लाने के लिए पूरी तरह तैयार है और जो भी दल नेतन्याहू को हटाना चाहता है, उसे उनसे सीधी बातचीत करनी होगी। प्रमुख अरब नेता अहमद तीबी ने भी संकेत दिया है कि वे संभावित आइजेनकोट सरकार को बाहर से समर्थन दे सकते हैं। इसका सीधा अर्थ यह होगा कि जॉइंट लिस्ट के सांसद कैबिनेट में कोई मंत्री पद नहीं लेंगे, लेकिन नेतन्याहू को सत्ता से दूर रखने के लिए सदन में विश्वास मत के दौरान सरकार के पक्ष में खड़े रहेंगे। हालांकि अहमद तीबी ने साफ किया है कि यह समर्थन केवल मौखिक आश्वासनों पर आधारित नहीं होगा। उन्होंने मांग रखी है कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इज़राइल पर किए गए हमले और उसके बाद गाजा में इज़राइली सेना द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई की निष्पक्ष जांच के लिए एक स्वतंत्र सरकारी आयोग गठित किया जाए। विपक्षी दलों के साझा एजेंडे में भी ऐसे जांच आयोग की स्थापना का प्रस्ताव पहले से मौजूद है। इसके साथ ही तीबी ने इज़राइल में रहने वाले अरब मुस्लिम नागरिकों के आंतरिक विकास और नागरिक अधिकारों से जुड़ी कई जरूरी शर्तें भी रखी हैं। तीसरा समीकरण यह बन सकता है कि नेतन्याहू स्वयं राम जैसी पार्टियों का समर्थन जुटाकर सरकार बना लें। यदि जॉइंट लिस्ट के सहयोग के बावजूद आइजेनकोट 61 का आंकड़ा छूने से चूक जाते हैं, तो मंसूर अब्बास की राम पार्टी संतुलन साधने वाली सबसे अहम शक्ति बन जाएगी। अगर मंसूर अब्बास पाला बदलकर नेतन्याहू के खेमे में आ जाते हैं, तो सरकार बनाने का पूरा गणित एक झटके में बदल सकता है। इज़राइली राजनीति में ऐसा उलटफेर पहले भी देखा जा चुका है। वर्ष 2021 में दो वर्षों के भीतर जब चौथी बार चुनाव हुए थे, तब भी किसी बड़े गठबंधन को बहुमत नहीं मिला था। उस समय केवल सात सांसदों वाली यामिना पार्टी के नेता नफ्ताली बेनेट ने याइर लैपिड की येश अतीद पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। वे सभी दल वैचारिक रूप से एक-दूसरे के धुर विरोधी थे, लेकिन नेतन्याहू को सत्ता से बेदखल करने के एक सूत्री एजेंडे पर वे एक साथ आ गए थे। बाद में मंसूर अब्बास की राम पार्टी ने भी उस गठबंधन को समर्थन दिया था, और उसकी वही चार सीटें नेतन्याहू को प्रधानमंत्री की कुर्सी से हटाने में निर्णायक साबित हुई थीं। इस बार नेतन्याहू ने प्रचार के दौरान अरब दलों से समर्थन लेने से सार्वजनिक रूप से इनकार किया था, लेकिन राम पार्टी का रवैया जॉइंट लिस्ट की तुलना में उनके प्रति अधिक लचीला रहा है। वर्ष 2021 में भी नेतन्याहू ने बहुमत जुटाने के लिए मंसूर अब्बास से गुप्त बातचीत की थी, इसलिए इस बार भी दोनों के बीच किसी गुप्त समझौते की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। इज़राइल में अरब आबादी की ज़मीनी हकीकत इज़राइल की कुल आबादी लगभग एक करोड़ है, जिसमें अरब नागरिकों की हिस्सेदारी 21 प्रतिशत यानी करीब 21 लाख है। इस अरब आबादी में 18.5 लाख अरब मुस्लिम हैं, जबकि शेष लगभग 2.5 लाख लोग ईसाई, शिया और ड्रूज समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। वर्ष 1948 में जब इज़राइल राष्ट्र की स्थापना हुई थी, तब करीब 7 लाख फिलिस्तीनियों को अपने घरों से विस्थापित होना पड़ा था। उस दौरान लगभग 1.5 लाख अरब इज़राइल की नई सीमाओं के भीतर ही रह गए थे, और उनकी आने वाली पीढ़ियां आज इज़राइल की वैध नागरिक हैं। इज़राइली अरब नागरिकों का बड़ा हिस्सा मुख्य रूप से तीन प्रमुख क्षेत्रों में बसा हुआ है। इनमें उत्तरी इज़राइल का गैलीली क्षेत्र, मध्य इज़राइल का ट्रायंगल क्षेत्र और दक्षिणी हिस्से का रेगिस्तानी नेगेव इलाका शामिल है। इसके अलावा कुछ अरब नागरिक हाइफा, लोद, एकर और रामले जैसे मिश्रित शहरों में भी रहते हैं। पूर्वी येरुशलम में रहने वाले अरबों के पास इज़राइली नागरिकता नहीं है। दूसरी ओर, वेस्ट बैंक में रहने वाले यहूदियों को मतदान का अधिकार प्राप्त है, जबकि वहां के अरब नागरिकों को वोट डालने की इजाजत नहीं है। इज़राइल के भीतर रहने वाले बाकी अरबों को कानूनी तौर पर यहूदियों के समान मतदान और नागरिक अधिकार दिए गए हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनकी हालत काफी चिंताजनक है। इज़राइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के अध्ययनों के अनुसार, अरब बहुल इलाकों में सरकारी बजट आवंटन, आवास, शिक्षा व्यवस्था और बुनियादी ढांचे की स्थिति बेहद बदहाल है। इज़राइल के नागरिक अधिकार संगठन एसीआरआई के दस्तावेजों से खुलासा होता है कि अरब समुदाय के विकास के लिए बनी पांच वर्षीय योजनाओं के बजट में सरकार द्वारा बार-बार भारी कटौती की गई है। अरब बस्तियों में नया मकान बनाने के लिए सरकारी अनुमति मिलना बेहद कठिन है और यह प्रक्रिया पुलिस सत्यापन के बाद ही आगे बढ़ती है। इसके अलावा अरब इलाकों में अपराध और संगठित हिंसा की दर यहूदी क्षेत्रों की तुलना में काफी ज्यादा है, जिसमें नेगेव के बदूइन मुसलमानों की स्थिति सबसे ज्यादा दयनीय बनी हुई है। यहूदी और अरब संबंधों पर कार्य करने वाली प्रमुख सामाजिक संस्था गिवात हवीवा सेंटर फॉर शेयर्ड सोसायटी के रणनीतिक निदेशक मोहम्मद दरावाशे का कहना है कि इज़राइल में हाल के वर्षों में हुई हत्याओं के 80 प्रतिशत से अधिक शिकार अरब मुस्लिम ही रहे हैं। उनके अनुसार किसी सामान्य यहूदी नागरिक की तुलना में एक अरब नागरिक की हत्या होने का जोखिम आठ गुना अधिक रहता है। इसके साथ ही इज़राइल में अरब नागरिकों के लिए सेना में भर्ती होना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है, जिसके कारण इज़राइल डिफेंस फोर्सेज में अरब सैनिकों की संख्या नगण्य रहती है। इसके विपरीत, युवा यहूदियों के लिए सैन्य सेवा पूरी तरह अनिवार्य है और इसके बदले उन्हें वेतन के साथ-साथ कई विशेष सामाजिक सुविधाएं भी मिलती हैं। सेना में शामिल कुछ अरब सैनिक गदसर नाहल और ऑल-अरब यूनिट जैसी विशिष्ट इकाइयों में सेवा देते हैं, जिन्हें मुख्य रूप से वेस्ट बैंक और नेगेव के सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात किया जाता है। मतदान प्रतिशत में उछाल और भविष्य की दिशा परंपरागत रूप से इज़राइल के चुनावों में अरब मतदाताओं की भागीदारी यहूदी मतदाताओं के मुकाबले काफी कम देखने को मिलती रही है। वर्ष 2022 के आम चुनाव में जहाँ देश भर में औसत मतदान 70 प्रतिशत रहा था, वहीं अरब बहुल इलाकों में केवल 53 प्रतिशत वोट पड़े थे। लेकिन इस बार के चुनाव में अरब क्षेत्रों में मतदाताओं का उत्साह ऐतिहासिक रहा और मतदान का यह आंकड़ा बढ़कर 80 प्रतिशत तक पहुँच गया। मतदान में आए इस भारी उछाल पर प्रतिक्रिया देते हुए राम पार्टी के नेता मंसूर अब्बास ने कहा है कि अरब जनता का यह अभूतपूर्व मतदान निराशा को नई आशा में बदलने का जीवंत प्रमाण है। सामाजिक विश्लेषक मोहम्मद दरावाशे का मानना है कि अरब नागरिकों के लिए इस राजनीतिक भागीदारी का मुख्य उद्देश्य देश में पूर्ण और समान नागरिकता के अधिकार हासिल करना है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि अरब लोग इज़राइल में कोई मेहमान नहीं हैं, बल्कि वे इस मिट्टी के मूल निवासी हैं। दरावाशे का आकलन है कि यदि अरब दलों के समर्थन से आइजेनकोट की सरकार बन भी जाती है, तो कोई रातोंरात चमत्कार नहीं होगा और न ही अरबों की दशकों पुरानी समस्याएं एकदम खत्म होंगी, लेकिन इससे अरब नागरिकों के नागरिक अधिकारों, कानूनी सुरक्षा और बजटीय हिस्सेदारी में ठोस सुधार की शुरुआत ज़रूर हो सकती है। इसका आप पर असर इस चुनाव परिणाम के बाद इज़राइल में रहने वाले नागरिकों और मध्य पूर्व के कूटनीतिक परिदृश्य पर सीधा असर पड़ेगा। • भारत और वैश्विक व्यापार पर: इज़राइल में बनने वाली नई सरकार की स्थिरता भारत के साथ द्विपक्षीय रक्षा और तकनीकी समझौतों की रफ्तार तय करेगी। सत्ता में अनिश्चितता रहने से मध्य पूर्व के कूटनीतिक गलियारों में नीतिगत फैसलों में देरी देखने को मिल सकती है। • इज़राइल के अरब नागरिकों पर: अरब दलों के किंगमेकर बनने से स्थानीय अरब इलाकों में बुनियादी ढांचे और आवास बजट में बढ़ोतरी की मजबूत संभावना बनेगी। इससे अरब बहुल बस्तियों में अपराध नियंत्रण और भवन निर्माण परमिट मिलने की प्रक्रिया आसान हो सकती है। • इज़राइली मतदाताओं पर: यदि गठबंधन वार्ताएं विफल होती हैं, तो देश को 90 दिनों के भीतर फिर से छठे चुनाव का सामना करना पड़ सकता है। आम जनता को राजनीतिक अनिश्चितता के कारण नीतिगत बजट और प्रशासनिक योजनाओं के रुकने की समस्या झेलनी पड़ सकती है। • सुरक्षा और विदेश नीति पर: सरकार में अरब दलों का प्रभाव बढ़ने से 7 अक्टूबर की घटनाओं और गाजा संघर्ष की स्वतंत्र जांच के लिए आयोग बनने का रास्ता साफ हो सकता है। यह कदम देश की आंतरिक सुरक्षा और सैन्य नीतियों के संचालन में नई जवाबदेही ला सकता है। ऐसा क्यों हुआ इज़राइली संसद में त्रिशंकु जनादेश आने का मुख्य कारण देश के पारंपरिक राजनीतिक खेमों का गंभीर ध्रुवीकरण और अरब मतदाताओं की ऐतिहासिक रूप से बढ़ी हुई लामबंदी है। • गठबंधन में मतभेद और सीटों की कमी: बेंजामिन नेतन्याहू का धड़ा बहुमत से 7 सीटें और आइजेनकोट का गठबंधन 14 सीटें पीछे रह गया। दोनों ही मुख्य धारा के यहूदी खेमे 61 के जादुई आंकड़े तक पहुँचने के लिए पर्याप्त सीटें जीतने में असमर्थ रहे। • अरब मतदाताओं की रिकॉर्ड भागीदारी: अरब बहुल इलाकों में मतदान प्रतिशत 53 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत तक पहुँच गया। इस अप्रत्याशित लामबंदी ने चार प्रमुख अरब दलों को मिलकर 19 सीटों का मजबूत आंकड़ा दिला दिया। • सख्त चुनावी सीमा और खंडित जनादेश: इज़राइल के 78 वर्षों के इतिहास में किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है, और 3.25 प्रतिशत की सीमा के बावजूद छोटे दल संतुलन साधने की ताकत बनाए रखते हैं। इसी गतिरोध के चलते 2019 से 2022 के बीच देश में पांच बार चुनाव कराने पड़े थे। • नेतन्याहू को हटाने का साझा एजेंडा: विपक्षी दलों और जॉइंट लिस्ट ने नेतन्याहू को प्रधानमंत्री पद से हटाने को अपना मुख्य राजनीतिक लक्ष्य बनाया है। इसी साझा एजेंडे के कारण वैचारिक मतभेदों के बावजूद पार्टियां एक साथ मिलकर नई सरकार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। सवाल-जवाब 1. इज़राइल की संसद में सरकार बनाने के लिए कितनी सीटों की ज़रूरत होती है? इज़राइल की संसद यानी क्नेसेट में कुल 120 सीटें हैं, और किसी भी दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए न्यूनतम 61 सीटों के समर्थन की आवश्यकता होती है। 2. इस चुनाव में नेतन्याहू और आइजेनकोट के गठबंधन को कितनी सीटें कम पड़ी हैं? बेंजामिन नेतन्याहू का सत्ताधारी गठबंधन बहुमत के आंकड़े से 7 सीटें पीछे रह गया है, जबकि विपक्षी नेता आइजेनकोट का गठबंधन बहुमत से 14 सीटें दूर है। 3. संसद में अरब दलों की कुल सीटें कितनी हैं और वे किंगमेकर क्यों बन गए हैं? अरब दलों ने कुल 19 सीटें जीती हैं, जिसके कारण उनके समर्थन के बिना न तो नेतन्याहू और न ही आइजेनकोट 61 सीटों का जादुई आंकड़ा हासिल कर सकते हैं। 4. यदि कोई भी नेता बहुमत साबित नहीं कर पाता, तो क्या होगा? यदि सरकार बनाने के सभी प्रयास विफल हो जाते हैं, तो क्नेसेट को भंग कर दिया जाएगा और 90 दिनों के भीतर देश में नए सिरे से आम चुनाव कराए जाएंगे। 5. अहमद तीबी ने समर्थन देने के लिए क्या प्रमुख शर्त रखी है? अहमद तीबी ने 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले और उसके बाद गाजा में की गई सैन्य कार्रवाई की जांच के लिए एक स्वतंत्र सरकारी आयोग के गठन की मांग रखी है। 6. इज़राइल में अरब नागरिकों की आबादी कितनी है? इज़राइल की लगभग एक करोड़ आबादी में 21 प्रतिशत यानी करीब 21 लाख अरब नागरिक हैं, जिनमें 18.5 लाख अरब मुस्लिम शामिल हैं। https://trendkia.com/investigations/israeli-sansad-mein-bahumat-se-chuke-benjamin-netanyahu-aur-eisenkot-satta-ki-chabi-ab-arab-dalon-ke-hathon-mein-52927 TrendKia — Har trend, sabse pehle.