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  "type": "article",
  "title": "कनॉट प्लेस मार्च से पहले अभिजीत दिपके हिरासत में, अमेरिकी गायिका मैरी मिलबेन ने लगाया विदेशी फंडिंग का आरोप",
  "summary": "दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके को हिरासत में लिया, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी गायिका मैरी मिलबेन ने पार्टी पर विदेशी चंदे और जॉर्ज सोरोस से संबंधों के आरोप लगाए हैं।",
  "content": "राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक राजनीतिक प्रदर्शन को लेकर प्रशासनिक सख्ती और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बयानों की तीखी जंग देखने को मिली है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके को दिल्ली पुलिस ने कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क में आयोजित होने वाले उनके कार्यक्रम से ठीक पहले हिरासत में ले लिया। दिपके की अगुवाई में यह दल मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ एक प्रतीकात्मक तिरंगा मार्च निकालने की तैयारी में था। हालांकि, जमीन पर पुलिस की इस कार्रवाई के समानांतर सोशल मीडिया पर एक अलग ही अंतरराष्ट्रीय विवाद खड़ा हो गया, जब अमेरिका की जानी-मानी गायिका मैरी मिलबेन ने इस दल पर विदेशी फंडिंग हासिल करने और अरबपति निवेशक जॉर्ज सोरोस के नेटवर्क से जुड़े होने के गंभीर आरोप लगाए।\n\nडिटेंशन और झंडेवालान से शुरू हुआ गतिरोध\nइस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 16 अक्टूबर की सुबह उस समय हुई जब दिल्ली पुलिस के अधिकारी अभिजीत दिपके के झंडेवालान स्थित आवास पर पहुंचे। पुलिस ने उन्हें एक आधिकारिक नोटिस थमाया, जिसमें स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि वे प्रस्तावित 'लहरा दो तिरंगा' कार्यक्रम में शामिल होने के लिए कनॉट प्लेस की ओर न जाएं। पुलिस का तर्क था कि इस आयोजन के लिए कोई वैधानिक अनुमति नहीं ली गई है और इलाके में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू की गई है। पुलिस ने अपने नोटिस में यह भी उल्लेख किया कि इस तरह के जमावड़े से मध्य दिल्ली के व्यस्त व्यापारिक क्षेत्र में भारी ट्रैफिक जाम लग सकता है, आपातकालीन सेवाओं के संचालन में रुकावट आ सकती है और पूर्व के प्रदर्शनों के दौरान भी नियमों के उल्लंघन देखे गए थे।\n\nनोटिस मिलने के बाद दिपके ने पुलिस के रुख पर कड़ा एतराज जताया। उन्होंने पुलिस अधिकारियों को यह चुनौती दी कि वे कोई ऐसा प्रमाण प्रस्तुत करें जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने कभी किसी हिंसा या उपद्रव की अपील की थी। उन्होंने कहा कि उनका इरादा कोई उग्र प्रदर्शन करने का नहीं है, न ही वहां लाउडस्पीकर का इस्तेमाल किया जाएगा। उनका मकसद सिर्फ शांतिपूर्ण तरीके से तिरंगा फहराना है। जब पुलिस ने अपनी पाबंदियों को अनिवार्य बताया, तो दिपके तल्ख लहजे में सवाल उठाते हुए यह कहते सुने गए कि अगर तिरंगा फहराना भी जुर्म है तो उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया जाए।\n\nइसके कुछ ही समय बाद जब दिपके अपने आवास से पैदल ही सेंट्रल पार्क की दिशा में आगे बढ़ने लगे, तो पुलिस बल ने उन्हें रोक लिया। दिपके ने तर्क दिया कि अकेले सड़क पर पैदल चलने से किसी भी नियम या कानून का उल्लंघन नहीं होता है। लेकिन पुलिस ने एहतियाती कदम और सार्वजनिक शांति व्यवस्था बनाए रखने का हवाला देते हुए उन्हें अपनी गाड़ी में बिठा लिया। इस दौरान उनके कुछ समर्थकों ने पुलिस वाहन का रास्ता रोकने की भी कोशिश की, जिससे मौके पर काफी देर तक तनाव बना रहा।\n\nचुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग और मार्च की योजना\nकॉकरोच जनता पार्टी ने इस 'लहरा दो तिरंगा' मार्च की योजना 16 अक्टूबर की शाम 5 बजे कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में तय की थी। इस मार्च का मुख्य उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करना था। पार्टी का आरोप था कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया में कई तरह की गंभीर अनियमितताएं बरती गई हैं, जिससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हुई है। इसी मुद्दे को रेखांकित करने के लिए पार्टी ने राजधानी के केंद्र में अपने कार्यकर्ताओं को जुटने का आह्वान किया था।\n\nहालांकि, प्रशासनिक और अदालती स्तर पर भी इस आयोजन को लेकर पहले से ही संशय बना हुआ था। आयोजन से एक दिन पहले, 15 अक्टूबर को दिल्ली उच्च न्यायालय में इस मार्च को रोकने के लिए एक याचिका पर सुनवाई हुई थी। अदालत ने मार्च पर पूरी तरह से रोक लगाने से इनकार कर दिया था, लेकिन स्पष्ट किया था कि दिल्ली पुलिस कानून के दायरे में रहते हुए आवश्यक नियंत्रण और विनियमन के कदम उठाने के लिए स्वतंत्र है। इसके ठीक बाद नई दिल्ली नगर पालिका परिषद यानी एनडीएमसी ने भी प्रशासनिक कारणों का हवाला देते हुए सेंट्रल पार्क को 16 और 17 अक्टूबर, दोनों दिनों के लिए आम जनता और सभी गतिविधियों के लिए बंद करने की सार्वजनिक घोषणा कर दी थी।\n\nअमेरिकी गायिका मैरी मिलबेन के आरोप और चेतावनी\nएक तरफ जहां दिल्ली की सड़कों पर पुलिस और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच खींचतान चल रही थी, वहीं दूसरी तरफ वाशिंगटन से मैरी मिलबेन के बयानों ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय रंग दे दिया। मैरी मिलबेन ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि इस आंदोलन और संगठन के पीछे विदेशी फंडिंग काम कर रही है। उन्होंने अभिजीत दिपके को सीधे संबोधित करते हुए आगाह किया कि अमेरिकी दानदाता अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के बाद उन्हें पूरी तरह से अकेला छोड़ देंगे।\n\nमिलबेन ने इस मामले में अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस का नाम भी घसीटा। उन्होंने आरोप लगाया कि सोरोस और उनके सहयोगी नेटवर्क भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के खिलाफ काम करने वाले समूहों को संसाधन मुहैया करा रहे हैं। मिलबेन ने भारतीय युवाओं से भी अपील की कि वे ऐसे विदेशी प्रभाव वाले अभियानों से दूर रहें। हालांकि, इन बड़े आरोपों के साथ मिलबेन ने अपनी बातों के समर्थन में कोई पुख्ता बैंकिंग दस्तावेज या लेन-देन का सबूत साझा नहीं किया।\n\nकौन हैं मैरी मिलबेन और भारत से उनका जुड़ाव\nमैरी मिलबेन अमेरिका की एक प्रमुख गायिका और मीडिया हस्ती हैं, जिन्हें बड़े राष्ट्रीय आयोजनों और राजनीतिक सम्मेलनों में राष्ट्रगान प्रस्तुत करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने अमेरिका के पांच राष्ट्रपतियों के कार्यकालों के दौरान अपनी प्रस्तुतियां दी हैं, जिनमें जॉर्ज डब्ल्यू बुश, डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडन जैसे बड़े नाम शामिल हैं। अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में उनकी पहचान एक प्रभावशाली सांस्कृतिक आवाज के तौर पर मानी जाती है।\n\nभारतीय दर्शकों और प्रवासियों के बीच मिलबेन वर्ष 2022 में चर्चा में आईं, जब उन्होंने भारत के स्वतंत्रता दिवस और दिवाली के अवसरों पर 'जन गण मन' और 'ओम जय जगदीश हरे' की संगीतमय प्रस्तुति दी थी। इसके बाद जून 2023 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के आधिकारिक राजकीय दौरे पर गए थे, तब मिलबेन ने उनके स्वागत कार्यक्रम में भारत का राष्ट्रगान गाया था और मंच पर उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया था। इसके अलावा उन्होंने भारत के नागरिकता संशोधन कानून और किसान आंदोलन जैसे आंतरिक मुद्दों पर भी अपनी राय खुलकर रखी है। वे अगस्त 2026 में न्यूयॉर्क में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के प्रस्तावित कार्यक्रम के समर्थन में भी अपनी बात रख चुकी हैं।\n\nरिहाना के ट्वीट और मिलबेन के बयानों का अंतर\nमैरी मिलबेन के इस हस्तक्षेप की तुलना कई लोग फरवरी 2021 में किसान आंदोलन के दौरान अमेरिकी पॉप स्टार रिहाना द्वारा किए गए ट्वीट से कर रहे हैं। उस समय रिहाना ने आंदोलन स्थल पर इंटरनेट बंद किए जाने की खबर साझा करते हुए सवाल उठाया था कि दुनिया इस विषय पर चर्चा क्यों नहीं कर रही है। रिहाना के उस कदम के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए विदेशी हस्तियों को सलाह दी थी कि वे देश के आंतरिक मामलों की पूरी जानकारी के बिना गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियां करने से बचें। उस समय कई भारतीय खेल और सिनेमा जगत की हस्तियों ने सरकार के समर्थन में एकजुटता वाले अभियान चलाए थे।\n\nहालांकि, मिलबेन का मौजूदा कदम रिहाना के रुख से बिल्कुल उलट प्रकृति का है। रिहाना ने भारत सरकार के कानूनों के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन का समर्थन किया था, जबकि मिलबेन ने सरकार के विरोध में खड़े दल की मंशा और उसके वित्तीय स्रोतों पर सवाल खड़े किए हैं। मिलबेन ने सीधे तौर पर विदेशी दखल का मुद्दा उठाया है, यद्यपि दोनों ही मामलों में जमीनी हकीकत की स्वतंत्र पुष्टि के लिए ठोस सबूतों की आवश्यकता होती है।\n\nजॉर्ज सोरोस का संदर्भ और सियासी टकराव\nइस विवाद में जॉर्ज सोरोस का नाम आना अपने आप में कई पुरानी राजनीतिक बहसों को ताजा करता है। हंगरी में जन्मे अमेरिकी निवेशक और परोपकारी सोरोस ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस के संस्थापक हैं। यह संस्था दुनिया भर में मानवाधिकार, न्याय, शिक्षा और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने के नाम पर विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों को भारी वित्तीय अनुदान देती रही है।\n\nफरवरी 2023 में सोरोस ने एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर बोलते हुए कहा था कि एक बड़े भारतीय कॉरपोरेट समूह से जुड़े विवाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक स्थिति कमजोर हो सकती है और इससे देश में लोकतांत्रिक पुनरुत्थान की संभावना बनेगी। इस बयान के बाद सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने सोरोस पर भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संप्रभुता को अस्थिर करने की साजिश रचने का सीधा आरोप लगाया था। बीजेपी लगातार यह तर्क देती रही है कि सोरोस से जुड़े नेटवर्क भारतीय संस्थाओं और नीतियों को निशाना बनाने के लिए विदेशी धन का इस्तेमाल करते हैं।\n\nअभिजीत दिपके का खंडन और जवाबी हमला\nमैरी मिलबेन के आरोपों पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए अभिजीत दिपके ने विदेशी फंडिंग के दावों को पूरी तरह से मनगढ़ंत और बेबुनियाद करार दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि एक विदेशी नागरिक को भारत के भीतर चल रहे घरेलू राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दों पर अनर्गल टिप्पणी करने का क्या अधिकार है। दिपके ने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष अपने ही नागरिकों की जायज मांगों को दबाने के लिए विदेशी हस्तियों का सहारा ले रहा है।\n\nदिपके ने स्पष्ट किया कि कॉकरोच जनता पार्टी की गतिविधियों का खर्च उन्होंने और उनके निजी मित्रों ने अपनी जेब से उठाया है और किसी भी विदेशी स्रोत से कोई धन नहीं लिया गया है। हालांकि, पार्टी के वित्तीय खातों और आंतरिक चंदे के इन दावों का किसी स्वतंत्र वित्तीय एजेंसी द्वारा आधिकारिक सत्यापन नहीं किया गया है। राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी से भी इस विषय पर संपर्क कर संगठन के वित्तीय स्वरूप के बारे में राय ली गई।\n\nभारत में विदेशी फंडिंग के कड़े नियम और एफसीआरए\nराजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों के लिए विदेश से धन प्राप्त करने के संबंध में भारत में अत्यंत सख्त कानूनी ढांचा मौजूद है। देश में आने वाले किसी भी विदेशी चंदे को गृह मंत्रालय द्वारा संचालित फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट यानी एफसीआरए के तहत नियंत्रित किया जाता है। कानून के अनुसार कोई भी पंजीकृत राजनीतिक दल या उसका कोई पदाधिकारी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से विदेशी योगदान स्वीकार नहीं कर सकता है।\n\nइसके अलावा एफसीआरए की धारा 5 के अंतर्गत केंद्र सरकार के पास यह अधिकार है कि वह किसी भी ऐसे संगठन को, जिसकी विचारधारा, गतिविधियां या राजनीतिक दलों के साथ जुड़ाव संदिग्ध हों, राजनीतिक प्रकृति का संगठन घोषित कर सकती है। केवल वही गैर-सरकारी संस्थाएं विदेशों से कानूनी रूप से धन प्राप्त कर सकती हैं जिनके पास वैध एफसीआरए पंजीकरण या सरकार की पूर्व अनुमति हो, और उन्हें उस धन के उपयोग की पाई-पाई का ब्योरा नियमित रूप से सरकार को देना पड़ता है।\n\nवित्तीय आरोपों को साबित करने के कानूनी मापदंड\nविशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी संगठन पर विदेशी चंदे के आरोप केवल सोशल मीडिया पोस्ट या राजनीतिक बयानों के आधार पर कानूनी रूप से सिद्ध नहीं माने जा सकते। ऐसे आरोपों को अदालत या जांच एजेंसियों के समक्ष साबित करने के लिए ठोस और दस्तावेजी साक्ष्यों की आवश्यकता होती है।\n\nइसके लिए जांच एजेंसियों को सबसे पहले संबंधित विदेशी दाता से लेकर संगठन के आधिकारिक बैंक खातों तक हुए धन हस्तांतरण के आधिकारिक बैंकिंग रिकॉर्ड निकालने होते हैं। इसके साथ ही ग्रांट समझौते, दान की रसीदें और दोनों पक्षों के बीच हुए पत्राचार जैसे दस्तावेज होने आवश्यक हैं जो दानदाता और प्राप्तकर्ता की स्पष्ट पहचान स्थापित कर सकें। यदि धनराशि किसी बिचौलिए या तीसरे पक्ष के जरिए घुमाकर भेजी गई हो, तो जांचकर्ताओं को उस मध्यस्थ और मूल विदेशी दाता के बीच के लिंक को वित्तीय फोरेंसिक के जरिए प्रमाणित करना होता है। जब तक अधिकृत जांच एजेंसियां ऐसे ठोस सबूत पेश नहीं करतीं, तब तक इस तरह के दावे केवल राजनीतिक बयानबाजी के दायरे में ही गिने जाते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nइस घटनाक्रम का सीधा असर राजधानी के सार्वजनिक आवागमन और देश में राजनीतिक संगठनों के चंदे से जुड़े कानूनी नियमों पर पड़ता है।\n\n• कनॉट प्लेस और दिल्ली में: सेंट्रल पार्क के बंद होने और पुलिस की निषेधाज्ञा से कनॉट प्लेस आने-जाने वाले व्यापारियों और आम नागरिकों को असुविधा का सामना करना पड़ा। भविष्य में भी मध्य दिल्ली के संवेदनशील इलाकों में बिना अनुमति होने वाले राजनीतिक आयोजनों पर कड़ी प्रशासनिक निगरानी और पाबंदियां जारी रहेंगी।\n• देशभर के नागरिकों के लिए: यह मामला स्पष्ट करता है कि किसी भी राजनीतिक या विरोध प्रदर्शन के लिए चंदा जुटाने में कानून के कड़े नियम लागू होते हैं। राजनीतिक संगठनों से जुड़े लोगों को विदेशी स्रोतों से किसी भी तरह की वित्तीय मदद लेने से पूरी तरह बचना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना सीधे तौर पर एफसीआरए कानून का उल्लंघन माना जाता है।\n• मतदाता सूची सुधार के संदर्भ में: चुनाव आयोग की मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों के बीच नागरिकों को अपने नाम का सत्यापन आधिकारिक पोर्टल पर स्वयं कर लेना चाहिए। इससे किसी भी प्रकार की विसंगति होने पर समय रहते सुधार की अर्जी दी जा सकती है।\n• सोशल मीडिया दावों पर सतर्कता: विदेशी हस्तियों और डिजिटल माध्यमों पर लगाए जाने वाले वित्तीय आरोपों को बिना आधिकारिक जांच और प्रमाण के स्वीकार करने से बचना चाहिए। किसी भी वित्तीय अनियमितता की पुष्टि केवल अधिकृत जांच एजेंसियों के साक्ष्यों के आधार पर ही होती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह विवाद दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ प्रस्तावित एक राजनीतिक मार्च को पुलिस द्वारा रोके जाने और उसके तुरंत बाद अमेरिका से फंडिंग के गंभीर आरोप लगाए जाने के कारण पैदा हुआ।\n\n• मार्च का तात्कालिक कारण: कॉकरोच जनता पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर इस मार्च का आह्वान किया था। दल का आरोप था कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण में गड़बड़ी हुई है, जिसके विरोध में उन्होंने कनॉट प्लेस में तिरंगा फहराने का फैसला किया।\n• पुलिस की पाबंदी की वजह: दिल्ली पुलिस ने आयोजन के लिए पूर्व अनुमति न होने और बीएनएसएस की धारा 163 के तहत लागू निषेधाज्ञा का हवाला दिया। पुलिस का कहना था कि व्यस्त व्यापारिक इलाके में भीड़ जुटने से कानून-व्यवस्था और यातायात संचालन बिगड़ सकता था।\n• अमेरिकी गायिका के आरोपों की पृष्ठभूमि: मैरी मिलबेन ने दावा किया कि संगठन को अमेरिकी दानदाताओं और जॉर्ज सोरोस के नेटवर्क से वित्तीय सहायता मिल रही है। सोरोस पहले भी भारतीय सरकार और नीतियों की आलोचना कर चुके हैं, जिससे यह विषय राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया।\n• फंडिंग दावों की कानूनी स्थिति: विदेशी फंडिंग के ये आरोप अभी तक किसी अधिकृत जांच एजेंसी या वित्तीय दस्तावेजों द्वारा साबित नहीं किए गए हैं। पार्टी संस्थापक ने इन्हें पूरी तरह नकारते हुए अपने मित्रों द्वारा निजी तौर पर संसाधन जुटाने की बात कही है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. दिल्ली पुलिस ने अभिजीत दिपके को हिरासत में क्यों लिया?\nदिल्ली पुलिस ने बीएनएसएस की धारा 163 के तहत लागू निषेधाज्ञा और बिना अनुमति कनॉट प्लेस में मार्च निकालने की योजना के चलते कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्हें एहतियातन हिरासत में लिया।\n\n2. कॉकरोच जनता पार्टी 'लहरा दो तिरंगा' मार्च क्यों निकाल रही थी?\nपार्टी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में कथित गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रही थी।\n\n3. मैरी मिलबेन ने अभिजीत दिपके और उनकी पार्टी पर क्या आरोप लगाए हैं?\nमैरी मिलबेन ने आरोप लगाया कि पार्टी को अमेरिकी दानदाताओं और जॉर्ज सोरोस के नेटवर्क से भारत सरकार के खिलाफ प्रदर्शन के लिए फंडिंग मिल रही है।\n\n4. क्या भारत में राजनीतिक संगठन विदेश से चंदा ले सकते हैं?\nनहीं, विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी एफसीआरए के तहत भारत में पंजीकृत राजनीतिक दलों और राजनीतिक प्रकृति के संगठनों को विदेशी चंदा लेने की कानूनी अनुमति नहीं है।\n\n5. अभिजीत दिपके ने फंडिंग के आरोपों पर क्या सफाई दी?\nदिपके ने विदेशी फंडिंग के दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनके संगठन का खर्च उन्होंने और उनके दोस्तों ने खुद अपनी जेब से उठाया है।",
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  "category": "पड़ताल",
  "publishedAt": "2026-10-17",
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