काठमांडू और नई दिल्ली के बीच सिक्के तथा सीमा विवाद से खुली सरहद के प्रबंधन पर गहराया सुरक्षा मंथन नेपाल में ग्रेटर नेपाल के नक्शे वाले एक रुपये के सिक्के को लेकर विवाद फिर गर्मा गया है, जिससे भारत के साथ उसके द्विपक्षीय संबंधों और सीमा सुरक्षा प्रबंधन पर नए सवाल उठने लगे हैं। नेपाल सरकार द्वारा एक रुपये के नए सिक्के पर 'ग्रेटर नेपाल' का विवादास्पद नक्शा बरकरार रखने के फैसले ने भारत और नेपाल के बीच कूटनीतिक हलचल तेज कर दी है। शुरुआत में नेपाल के मंत्रिमंडल ने इस विवादित नक्शे को हटाकर उसकी जगह प्रसिद्ध लो घ्याकर मठ की तस्वीर छापने की मंजूरी दी थी। हालांकि, देश के भीतर विभिन्न राजनीतिक दलों के विरोध और जन दबाव के कारण काठमांडू को अपना फैसला बदलना पड़ा। भले ही यह नया सिक्का अभी केवल ढलाई के लिए स्वीकृत हुआ है और आम प्रचलन में नहीं आया है, लेकिन इसने दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे क्षेत्रीय और कूटनीतिक मतभेदों को एक बार फिर सतह पर ला दिया है। खुली सीमा का लाभ उठाकर अतीत में हुए आपराधिक व असामाजिक गतिविधियों के संदर्भ में नई दिल्ली में इस घटनाक्रम को बेहद संवेदनशीलता से देखा जा रहा है। सिक्के का नया विवाद और सुगौली संधि की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ग्रेटर नेपाल की अवधारणा उस ऐतिहासिक दौर से जुड़ी है जब 18वीं सदी के उत्तरार्ध में राजा पृथ्वी नारायण शाह और उनके उत्तराधिकारियों के नेतृत्व में नेपाल साम्राज्य का तेजी से विस्तार हुआ था। उस समय नेपाल का नियंत्रण वर्तमान सीमाओं से कहीं अधिक विशाल भूभाग पर था। हालांकि, वर्ष 1814 से 1816 के बीच हुए आंग्ल-नेपाल युद्ध में पराजय के बाद नेपाल को 1816 में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सुगौली संधि पर हस्ताक्षर करने पड़े थे। इस ऐतिहासिक समझौते के तहत नेपाल को अपने अधिकार वाले कई बड़े इलाके छोड़ने पड़े थे, जो वर्तमान समय में भारत का अभिन्न हिस्सा हैं। नेपाल के कुछ राजनीतिक समूह समय-समय पर इन इलाकों पर अपना दावा ठोकते हुए इन्हें वापस पाने की मांग करते रहते हैं, जबकि भारत ऐसे सभी दावों को सिरे से खारिज करता रहा है। हालिया घटनाक्रम में जब काठमांडू ने एक रुपये के सिक्के पर इस नक्शे को फिर से स्थान देने का रुख अपनाया, तो घरेलू राजनीति में राष्ट्रवाद का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया। कालापानी क्षेत्र का विवाद और 2015 की नाकेबंदी के प्रभाव भारत और नेपाल के संबंध सदियों पुराने सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने पर टिके हैं, लेकिन पिछले एक दशक में सीमा से जुड़े मुद्दों ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक दूरी बढ़ाई है। मुख्य रूप से कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर दोनों पक्षों के बीच खींचतान बनी हुई है। नेपाल के परराष्ट्र मंत्रालय का रुख है कि ये तीनों क्षेत्र नेपाल की संप्रभुता के अंतर्गत आते हैं। इसके विपरीत, भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि ये इलाके ऐतिहासिक और कानूनी रूप से भारत का अटूट हिस्सा हैं। वर्ष 2020 में नेपाल की संसद ने अपने संविधान में संशोधन करके एक नया राजनीतिक नक्शा अपनाया था, जिसमें इन विवादित क्षेत्रों को अपनी सीमा के भीतर दर्शाया गया था। इसके अलावा, वर्ष 2015 में नया संविधान लागू होने के बाद नेपाल में उत्पन्न हुए सीमा गतिरोध के लिए वहां का एक बड़ा वर्ग भारत द्वारा की गई नाकेबंदी को जिम्मेदार मानता है। यद्यपि भारत सरकार ने किसी भी प्रकार की नाकेबंदी से इनकार करते हुए कहा था कि आपूर्ति में बाधा नेपाल की ओर हुए उग्र प्रदर्शनों का परिणाम थी, फिर भी इस घटना के बाद से दोनों देशों के बीच परस्पर विश्वास में कमी आई है। 1950 की संधि से लेकर ऑपरेशन मैत्री तक के अटूट द्विपक्षीय रिश्ते ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो भारत और नेपाल के बीच दक्षिण एशिया के सबसे गहरे और दोस्ताना संबंध रहे हैं। वर्ष 1950 में दोनों देशों ने शांति और मित्रता संधि पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत दोनों राष्ट्रों के नागरिकों को एक-दूसरे के देश में बिना किसी रोक-टोक के रहने, काम करने और संपत्ति रखने का समान अधिकार मिला। भारत के विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में लगभग 32,000 नेपाली नागरिक भारतीय सेना की प्रतिष्ठित गोरखा रेजीमेंटों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। विपत्ति के समय में भी भारत ने हमेशा प्रथम उत्तरदाता की भूमिका निभाई है। वर्ष 2015 में नेपाल में आए भीषण भूकंप के दौरान भारत के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के समन्वय से 'ऑपरेशन मैत्री' चलाया गया था, जिसके तहत महज कुछ ही घंटों के भीतर राहत दल, विमान, इंजीनियर और खाद्य सामग्री काठमांडू पहुंचा दी गई थी। इसी प्रकार, वर्ष 2021 में वैश्विक महामारी के दौरान 'वैक्सीन मैत्री' पहल के तहत भारत से मुफ्त कोविड-19 टीके प्राप्त करने वाले शुरुआती देशों में नेपाल शामिल था। दोनों देशों के नागरिक बिना वीजा के सीमा पार करके रिश्तेदारियों, रोजगार, शिक्षा और धार्मिक तीर्थयात्राओं के लिए आते-जाते रहते हैं। नेपाल की घरेलू राजनीति और चीन का बढ़ता कूटनीतिक प्रभाव नेपाल के इस आक्रामक रुख के पीछे अक्सर पड़ोसी देश चीन की शह होने की बात कही जाती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ श्रीश के पाठक का मानना है कि असली वजह नेपाल की आंतरिक राजनीति में छिपी है। नेपाल के राजनीतिक दल अक्सर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने और जनसमर्थन जुटाने के लिए सीमा विवाद और क्षेत्रीय राष्ट्रवाद का सहारा लेते हैं। जब वर्ष 2020 में कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को संवैधानिक नक्शे में शामिल किया गया, तो यह मुद्दा नेपाल की राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ गया। एक रुपये के सिक्के पर विवादित नक्शा बरकरार रखने का निर्णय भी इसी राजनीतिक दबाव का परिणाम है, जहां सरकार को जन आक्रोश के डर से अपना पिछला फैसला वापस लेना पड़ा। दूसरी ओर, चीन ने नेपाल में सड़कों, बुनियादी ढांचे के निर्माण और राजनीतिक संपर्क के माध्यम से अपना प्रभाव काफी बढ़ाया है। हालांकि, बीजिंग ने नेपाल के इन क्षेत्रीय दावों का आधिकारिक तौर पर समर्थन नहीं किया है और इसे भारत व नेपाल के बीच का द्विपक्षीय मामला बताया है। फिर भी, नई दिल्ली और काठमांडू के बीच तनाव बढ़ने से चीन को हिमालयी क्षेत्र में अपनी रणनीतिक पैठ मजबूत करने का सीधा अवसर मिल जाता है। सुरक्षा चुनौतियों का मूल्यांकन: क्या नेपाल बन सकता है दूसरा पाकिस्तान? नेपाल के साथ जारी तनाव की तुलना पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों से करना सुरक्षा दृष्टि से सही नहीं है। पाकिस्तान का इतिहास भारत के साथ सीधे युद्धों और सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने का रहा है, जबकि नेपाल के पास न तो वैसी सैन्य क्षमता है और न ही उसकी ऐसी कोई मंशा रही है। भारत के लिए असली चिंता 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सरहद का सुचारू प्रबंधन है। यदि दोनों देशों के बीच राजनीतिक विश्वास कमजोर होता है, तो जाली मुद्रा, मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी और अवैध घुसपैठ जैसी समस्याओं पर रोक लगाना कठिन हो जाएगा। विशेषज्ञ श्रीश के पाठक के अनुसार, नेपाल भारत के लिए पाकिस्तान जैसी सैन्य चुनौती नहीं है, बल्कि असली चुनौती घटते राजनीतिक विश्वास के बीच खुली सीमा की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। दोनों देशों के बीच दशकों से बने संस्थागत और सामाजिक रिश्ते इतने मजबूत हैं कि उन्हें किसी अन्य देश के साथ हुए टकराव के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। द्विपक्षीय संबंधों में तनाव का क्षेत्रीय विकास और आम जनता पर असर यदि भारत और नेपाल के रिश्ते बिगड़ते हैं, तो इसका सबसे बड़ा खमियाजा नेपाल की अर्थव्यवस्था और वहां की आम जनता को भुगतना पड़ेगा। भू-वेष्टित देश होने के कारण नेपाल अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक बाजारों तक पहुंच के लिए भारतीय बंदरगाहों और पारगमन मार्गों पर निर्भर है। दोनों देशों के सहयोग से चलने वाली जलविद्युत परियोजनाएं, नदी जल बंटवारा और सीमा पार कनेक्टिविटी के काम धीमे पड़ सकते हैं। वहीं भारत को भी अपनी उत्तरी सीमा पर सुरक्षा सतर्कता बढ़ाने के लिए अतिरिक्त संसाधन तैनात करने पड़ेंगे। कूटनीतिक दूरी का सबसे ज्यादा लाभ चीन को मिलेगा, जो इस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व बढ़ा सकेगा। हालांकि, भौगोलिक निकटता और सांस्कृतिक संबंधों को रातों-रात खत्म नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञ श्रीश के पाठक का कहना है कि यह केवल एक सिक्के या नक्शे का विवाद नहीं है, बल्कि यह नेपाल की आंतरिक राजनीति, क्षेत्रीय होड़ और दक्षिण एशिया में बदलते शक्ति संतुलन का प्रतीक है। इस विवाद का सबसे दुखद पहलू यह है कि इससे सीमावर्ती इलाकों के निवासियों, तीर्थयात्रियों और कामगारों की दैनिक जिंदगी प्रभावित होगी, जबकि कूटनीतिक गतिरोध से किसी भी पक्ष को स्थायी लाभ नहीं मिलेगा। इसका आप पर असर भारत में: खुली सीमा पर कड़े सुरक्षा इंतजामों और जांच के कारण सीमावर्ती राज्यों के व्यापार और आवाजाही पर समय लग सकता है। नेपाल में: भारत के साथ व्यापारिक व पारगमन मार्गों में बाधा आने पर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति और दैनिक सामानों की कीमतों पर असर पड़ सकता है। सवाल-जवाब 1. नेपाल के एक रुपये के सिक्के पर क्या विवाद है? नेपाल सरकार ने नए 1 रुपये के सिक्के पर 'ग्रेटर नेपाल' का नक्शा छापने का फैसला लिया है, जिसमें उन इलाकों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया है जो सुगौली संधि के तहत भारत का हिस्सा हैं। 2. सुगौली संधि क्या है और यह कब हुई थी? सुगौली संधि 1816 में नेपाल साम्राज्य और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई थी, जिसके तहत पराजय के बाद नेपाल को अपने कई पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्र छोड़ने पड़े थे। 3. भारत और नेपाल के बीच कौन से मुख्य सीमा क्षेत्र विवादित हैं? कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा मुख्य विवादित क्षेत्र हैं, जिन्हें दोनों देश अपनी संप्रभुता का हिस्सा बताते हैं। 4. क्या नेपाल भारत के लिए पाकिस्तान जैसी सुरक्षा चुनौती बन सकता है? विशेषज्ञों के अनुसार नेपाल भारत के लिए पाकिस्तान जैसा सैन्य खतरा नहीं है; मुख्य चुनौती खुली सीमा के घटते राजनीतिक विश्वास के बीच प्रभावी प्रबंधन की है। https://trendkia.com/investigations/kathmandu-aura-new-delhi-ke-bicha-sikke-tatha-sima-vivada-se-khuli-sarahada-ke-prabndhana-para-gaharaya-suraksha-mnthana-11652 TrendKia — Har trend, sabse pehle.