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  "type": "article",
  "title": "मॉस्को ने तालिबान के साथ बढ़ाई सैन्य नजदीकी, इस्लामाबाद और नई दिल्ली के लिए बदले क्षेत्रीय समीकरण",
  "summary": "रूस द्वारा तालिबान को सैन्य प्रशिक्षण और रक्षा साजो-सामान दिए जाने के संकेतों के बीच मॉस्को फॉर्मेट बैठक आयोजित हो रही है, जिससे दक्षिण और मध्य एशिया की भू-राजनीति में बड़े बदलाव के आसार हैं।",
  "content": "दक्षिण और मध्य एशिया के रणनीतिक पटल पर एक नया भू-राजनीतिक मोड़ देखने को मिल रहा है, जहां मॉस्को ने काबुल के मौजूदा हुक्मरानों के साथ अपनी साझेदारी को कूटनीतिक दायरे से आगे बढ़ाकर सुरक्षा और सैन्य तालमेल तक पहुंचा दिया है। लगभग एक महीने पहले बिश्केक में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ चर्चा के लिए उत्सुक दिखे थे। इसके बावजूद, अब रूस तेजी से पाकिस्तान के सबसे बड़े सिरदर्द बन चुके तालिबान के नजदीक जाता दिख रहा है। इसी पृष्ठभूमि में रूस अफगानिस्तान पर केंद्रित आठवें मॉस्को फॉर्मेट बैठक की मेजबानी कर रहा है, जिसमें भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, ईरान और मध्य एशियाई देश शिरकत कर रहे हैं। इस बदलते घटनाक्रम में रूस न केवल तालिबान के साथ कूटनीतिक संवाद बनाए हुए है, बल्कि वह सैन्य साजो-सामान और प्रशिक्षण के स्तर पर भी सहयोग को विस्तार दे रहा है, जहां तालिबान लड़ाकों ने रूसी सैन्य अभ्यास में प्रत्यक्ष भागीदारी भी की है।\n\nतालिबान के साथ मॉस्को के बढ़ते रक्षा संबंध और अभ्यास\nरूस और तालिबान के रिश्ते अब मात्र औपचारिक बंद कमरों की बैठकों तक सीमित नहीं रहे हैं। अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने इस बात की आधिकारिक पुष्टि की है कि मॉस्को के निमंत्रण पर एक उच्चस्तरीय तालिबानी सैन्य प्रतिनिधिमंडल रूस में आयोजित सैन्य अभ्यास में शामिल हुआ था। अक्टूबर के महीने में तालिबान के एक वरिष्ठ सैन्य प्रतिनिधिमंडल को रूस के सेंटर-2026 रणनीतिक सैन्य अभ्यास का गवाह बनने के लिए आमंत्रित किया गया था। इस अभ्यास के दौरान अफगान प्रतिनिधिमंडल ने भारी हथियारों, उन्नत ड्रोन्स, लंबी दूरी की मिसाइलों और रोबोटिक युद्धक प्रणालियों के संचालन का गहराई से मुआयना किया। इसके साथ ही दोनों पक्षों के बीच सैन्य अनुभव साझा करने, पेशेवर प्रशिक्षण मुहैया कराने और भविष्य के रक्षा सहयोग के प्रारूप पर विस्तृत चर्चाएं आयोजित की गईं।\n\nयह रणनीतिक जुड़ाव यहीं नहीं थमा, बल्कि 27 मई 2026 को दोनों पक्षों के बीच एक बड़ा कदम उठाया गया, जब रूस और तालिबान ने एक द्विपक्षीय सैन्य-तकनीकी सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए। यद्यपि इस समझौते के तमाम गोपनीय पहलुओं को सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन इसके तहत रूसी रक्षा उपकरणों की देखरेख और मरम्मत के लिए तालिबानी तकनीकी कर्मियों को तैयार करने हेतु विशेष प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने पर भी विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही ऐसे घटनाक्रम भी सामने आए हैं जिनमें दावा किया गया है कि रूस तालिबान लड़ाकों को उन्नत सैन्य प्रशिक्षण और आधुनिक हथियार उपलब्ध करा रहा है। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो एक दौर ऐसा भी था जब मॉस्को तालिबान को अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा मानता था, और इस ऐतिहासिक कटुता की जड़ें करीब पांच दशक पहले छिड़े युद्ध से जुड़ी हैं।\n\nदुश्मनी से रणनीतिक साझेदारी तक का ऐतिहासिक सफर\nलगभग पांच दशक पहले सोवियत दौर में रूस ने अफगानिस्तान की धरती पर अपनी सेना उतारी थी, जिसके चलते दोनों पक्षों के बीच खूनी संघर्ष का लंबा इतिहास रहा। रूस दशकों तक तालिबान को गहरे संदेह की दृष्टि से देखता रहा और उसे हमेशा यह चिंता सताती रही कि अफगानिस्तान से पनपने वाली इस्लामी चरमपंथ की लहर कहीं पूर्व सोवियत प्रभाव वाले मध्य एशियाई देशों में अस्थिरता न फैला दे। हालांकि अगस्त 2021 में अमेरिकी सेना की अचानक वापसी और काबुल की सत्ता पर तालिबान के दोबारा काबिज होने के बाद पूरे क्षेत्र के भू-राजनीतिक समीकरण नाटकीय रूप से बदल गए। रूस ने भली-भांति भांप लिया कि तालिबान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग रखने से अफगानिस्तान के भीतर मॉस्को का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।\n\nइसी व्यावहारिक सोच के तहत मॉस्को ने काबुल के नए शासकों के साथ सीधे संपर्क साधने की नीति अपनाई। शुरुआती दौर में यह संपर्क कूटनीतिक वार्ताओं तक सीमित था, जो धीरे-धीरे सुरक्षा और आर्थिक साझेदारी में तब्दील होता चला गया। इस रणनीतिक तालमेल का सबसे निर्णायक पड़ाव जुलाई 2025 में देखने को मिला, जब रूस ने तालिबान सरकार को औपचारिक राजनयिक मान्यता प्रदान कर दी और ऐसा कदम उठाने वाला वह दुनिया का पहला देश बन गया। वर्तमान में यह रिश्ता किसी वैचारिक समानता पर नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से सुरक्षा, क्षेत्रीय प्रभाव और सामरिक हितों के संतुलन पर टिका हुआ है।\n\nमॉस्को की रणनीतिक महत्वाकांक्षाएं और क्षेत्रीय नियंत्रण\nतालिबान को राजनयिक और सैन्य सहायता प्रदान करने के पीछे मॉस्को के अपने ठोस भू-राजनीतिक हित छिपे हैं। पहली प्राथमिकता अपनी सीमाओं और मध्य एशिया की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। रूस चाहता है कि काबुल की सत्ता आईएसआईएस-के जैसे खूंखार आतंकी संगठनों पर कड़ा नियंत्रण रखे, ताकि आतंकी तत्व अफगान जमीन को ठिकाना बनाकर मध्य एशिया और रूसी सीमाओं में घुसपैठ न कर सकें। दूसरा बड़ा पहलू शक्ति शून्यता को भरना है। वर्ष 2021 में अमेरिकी सैनिकों की रवानगी के बाद अफगानिस्तान में जो खालीपन पैदा हुआ, मॉस्को उसे पूरी तरह चीन, पाकिस्तान या अन्य क्षेत्रीय ताकतों की झोली में नहीं जाने देना चाहता। काबुल के शासकों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखकर मॉस्को यह सुनिश्चित करता है कि अफगान नीति निर्धारण में उसकी निर्णायक आवाज बनी रहे।\n\nइसके अतिरिक्त पाकिस्तान के साथ चल रहा भू-राजनीतिक पेंच भी इसका अहम हिस्सा है। इस्लामाबाद और काबुल के बीच गहराते सीमाई और सुरक्षा विवादों के बीच रूस खुद को एक तटस्थ और मजबूत मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है, और मॉस्को फॉर्मेट जैसी बैठकें उसे इस कूटनीतिक संतुलन को साधने का मुफीद मंच प्रदान करती हैं। रूस का सीधा मकसद एक शांत अफगानिस्तान, समूचे क्षेत्र में मजबूत रूसी दबदबा और काबुल पर राज करने वाली शक्ति के साथ अटूट साझेदारी कायम रखना है।\n\nपाकिस्तान की बेचैनी और इस्लामाबाद के लिए खतरे की घंटी\nरूस और तालिबान के बीच इस रक्षा तालमेल से पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ना स्वाभाविक हैं। इस्लामाबाद को यह डर नहीं है कि रूस उसका सीधा दुश्मन बन जाएगा, बल्कि उसकी सबसे बड़ी बेचैनी काबुल पर से अपने ऐतिहासिक प्रभुत्व के खात्मे को लेकर है। दशकों से पाकिस्तान का अफगान सत्ता तंत्र पर गहरा सुरक्षा और राजनीतिक असर रहा है, लेकिन 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद से दोनों पड़ोसियों के रिश्ते बदतरीन दौर में पहुंच चुके हैं। इस तनातनी का सबसे बड़ा केंद्र तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) है। इस्लामाबाद लगातार आरोप लगाता रहा है कि तालिबान प्रशासन टीटीपी आतंकियों को अफगान सरजमीं से पाकिस्तान के खिलाफ हमले करने की खुली छूट दे रहा है। दूसरी ओर काबुल इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए पाकिस्तान पर अफगान संप्रभुता का उल्लंघन करने का पलटवार करता है। अब जब रूस तालिबानी लड़ाकों को आधुनिक सैन्य साजो-सामान और उन्नत प्रशिक्षण से लैस कर रहा है, तो इससे तालिबान की सैन्य क्षमता मजबूत होगी। सैन्य रूप से अधिक आत्मनिर्भर होने के बाद तालिबान की पाकिस्तान पर निर्भरता खत्म हो जाएगी, जिससे काबुल पर इस्लामाबाद की पकड़ ढीली पड़ेगी और मॉस्को का प्रभाव सीधे तौर पर स्थापित हो जाएगा।\n\nभारत के लिए कूटनीतिक मायने और नई दिल्ली की रणनीति\nयदि पाकिस्तान काबुल पर अपना प्रभाव खोने से भयभीत है, तो भारत के लिए भी इन बदलते समीकरणों पर पैनी निगाह रखना बेहद आवश्यक है। हालांकि इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि रूस और तालिबान का यह कदम भारत के खिलाफ कोई सैन्य गठजोड़ है। नई दिल्ली ने 2021 में तालिबान के सत्ता संभालने के बाद भी अफगान जनता के साथ अपने मानवीय और विकासात्मक संबंधों को लगातार बनाए रखा है। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त 2021 के बाद से भारत ने अफगानिस्तान को 50,000 टन गेहूं और 300 टन जीवनरक्षक दवाएं व चिकित्सा सामग्री भेजी हैं। चूकि मॉस्को भारत का ऐतिहासिक और सबसे विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार रहा है, इसलिए काबुल में रूस की बढ़ती मौजूदगी भारत के लिए विशेष महत्व रखती है।\n\nइस पूरे घटनाक्रम में नई दिल्ली को मुख्य रूप से तीन अहम पहलुओं पर नजर रखनी होगी। पहला यह कि क्या इस प्रशिक्षण और साजो-सामान से तालिबान की सैन्य मारक क्षमता में बड़ा इजाफा हो रहा है। दूसरा यह कि क्या तालिबान से नजदीकी के चलते रूस के पाकिस्तान के साथ रिश्तों की दिशा और प्राथमिकताओं में कोई बदलाव आ रहा है। तीसरा पहलू यह है कि क्या मॉस्को अपने कूटनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल अफगानिस्तान को आतंकवाद विरोधी क्षेत्रीय सहयोग की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए करेगा। भारत के पास इन तमाम प्रक्रियाओं का हिस्सा बनने और स्थिति की निगरानी करने के लिए पहले से ही एक मजबूत मंच मौजूद है। रूस में चल रही मॉस्को फॉर्मेट बैठक का मुख्य केंद्र क्षेत्रीय सहयोग, आतंकवाद के खात्मे और मादक पदार्थों की तस्करी पर लगाम लगाने पर है। ऐसे में भारत को किसी एक पक्ष का चुनाव करने की जरूरत नहीं है, बल्कि बदलते क्षेत्रीय गठबंधनों पर बारीकी से नजर रखते हुए अपने राष्ट्रीय और सुरक्षा हितों को पूरी मजबूती से सुरक्षित रखना है।\n\nइसका आप पर असर\nरूस और तालिबान के बीच बढ़ते सैन्य और कूटनीतिक सहयोग से दक्षिण एशियाई सुरक्षा समीकरणों में बड़ा बदलाव आ सकता है, जिसका सीधा असर क्षेत्रीय कूटनीति और व्यापारिक गलियारों पर पड़ेगा।\n\n• भारत में: नई दिल्ली को अपनी अफगान कूटनीति और मानवीय सहायता कार्यक्रमों को बदलते रक्षा समीकरणों के अनुसार ढालना होगा। इससे मध्य एशिया तक भारतीय संपर्क मार्गों और सुरक्षा प्राथमिकताओं पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।\n• पाकिस्तान सीमा पर: तालिबान के सैन्य रूप से मजबूत होने से डूरंड रेखा पर इस्लामाबाद की सुरक्षा चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। यदि सीमाई तनाव गहराता है तो इसका असर क्षेत्रीय व्यापार और सीमावर्ती सुरक्षा पर साफ नजर आएगा।\n• वैश्विक कूटनीति पर: मॉस्को द्वारा तालिबान को मान्यता और सैन्य समर्थन दिए जाने से पश्चिमी देशों की प्रतिबंध नीति कमजोर हो सकती है। अन्य क्षेत्रीय देश भी काबुल के साथ प्रत्यक्ष आर्थिक और कूटनीतिक सौदे करने के लिए प्रेरित हो सकते हैं।\n• आतंकवाद विरोधी अभियानों पर: इस साझेदारी से आईएसआईएस-के जैसे समूहों के खिलाफ अभियानों में तेजी आने की संभावना है। यदि अफगान धरती से आतंकी गतिविधियां नियंत्रित होती हैं तो पूरे मध्य और दक्षिण एशिया में स्थिरता बढ़ेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nरूस द्वारा तालिबान को सैन्य प्रशिक्षण और मान्यता देने का कदम ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्विता को भुलाकर व्यावहारिक सुरक्षा और भू-राजनीतिक हितों को साधने की रणनीति का परिणाम है। अमेरिकी सेना की वापसी के बाद पैदा हुए रणनीतिक खालीपन ने मॉस्को को काबुल के साथ सीधा संवाद स्थापित करने के लिए बाध्य किया।\n\n• सुरक्षा और चरमपंथ की रोकथाम: रूस को आशंका है कि आईएसआईएस-के जैसे आतंकी संगठन अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल करके मध्य एशियाई देशों में घुसपैठ कर सकते हैं। तालिबान के साथ सुरक्षा तालमेल बिठाकर मॉस्को अपनी दक्षिणी सीमाओं पर सुरक्षा कवच तैयार करना चाहता है।\n• अमेरिकी वापसी से उत्पन्न शक्ति शून्यता: वर्ष 2021 में अमेरिकी सैनिकों की रवानगी के बाद अफगानिस्तान में बड़ा राजनीतिक खालीपन आ गया था। रूस इस पूरे रणनीतिक क्षेत्र को केवल चीन या पाकिस्तान के प्रभाव में छोड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहता था।\n• कूटनीतिक मान्यता और कानूनी आधार: जुलाई 2025 में रूस ने तालिबान सरकार को औपचारिक राजनयिक मान्यता प्रदान की, जिसके बाद 27 मई 2026 को द्विपक्षीय सैन्य-तकनीकी सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। यह औपचारिक ढांचा दोनों पक्षों के बीच सैन्य अभ्यास और प्रशिक्षण की राह आसान बनाता है।\n• पाकिस्तान-अफगान विवाद में मध्यस्थता: इस्लामाबाद और काबुल के बीच टीटीपी के मुद्दे पर बढ़ते तनाव के बीच रूस खुद को क्षेत्र के प्रमुख शांति मध्यस्थ के रूप में स्थापित करना चाहता है। मॉस्को फॉर्मेट के जरिए रूस सभी हितधारकों को एक मंच पर लाकर अपना क्षेत्रीय दबदबा बनाए रखना चाहता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. रूस और तालिबान के बीच कौन सा सैन्य समझौता हुआ है?\nरूस और तालिबान ने 27 मई 2026 को एक द्विपक्षीय सैन्य-तकनीकी सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत प्रशिक्षण और उपकरण सहयोग शामिल है।\n\n2. तालिबान के प्रतिनिधिमंडल ने रूस में किस सैन्य अभ्यास में भाग लिया?\nतालिबान के वरिष्ठ सैन्य प्रतिनिधिमंडल ने अक्टूबर में रूस के सेंटर-2026 रणनीतिक सैन्य अभ्यास में भाग लिया और आधुनिक हथियारों का मुआयना किया।\n\n3. रूस ने तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता कब दी थी?\nरूस ने जुलाई 2025 में तालिबान सरकार को औपचारिक राजनयिक मान्यता प्रदान की थी और ऐसा करने वाला वह पहला देश बना।\n\n4. रूस तालिबान के साथ अपने संबंध क्यों मजबूत कर रहा है?\nरूस आईएसआईएस-के जैसे आतंकी समूहों पर लगाम लगाने, मध्य एशिया की सुरक्षा सुनिश्चित करने और क्षेत्र में अपना भू-राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने के लिए यह कदम उठा रहा है।\n\n5. पाकिस्तान को रूस-तालिबान रक्षा सहयोग से क्या चिंता है?\nपाकिस्तान को डर है कि आधुनिक हथियारों और प्रशिक्षण से लैस होने के बाद तालिबान उस पर निर्भर नहीं रहेगा, जिससे काबुल पर इस्लामाबाद का प्रभाव खत्म हो जाएगा।\n\n6. भारत ने 2021 के बाद अफगानिस्तान को कितनी मानवीय सहायता दी है?\nविदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत ने अगस्त 2021 के बाद से अफगानिस्तान को 50,000 टन गेहूं और 300 टन दवाएं व चिकित्सा सामग्री भेजी हैं।\n\n7. मॉस्को फॉर्मेट बैठक में कौन-कौन से देश भाग ले रहे हैं?\nआठवें मॉस्को फॉर्मेट बैठक में भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, ईरान और मध्य एशियाई देश हिस्सा ले रहे हैं।",
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  "category": "पड़ताल",
  "publishedAt": "2026-10-05",
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    "रूस तालिबान संबंध",
    "मॉस्को फॉर्मेट",
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    "पाकिस्तान अफगानिस्तान विवाद",
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