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  "type": "article",
  "title": "निठारी कांड में बरी होने के बाद हरिद्वार में चाय की दुकान चला रहे सुरेंद्र कोली की संदिग्ध मौत",
  "summary": "निठारी कांड के मामलों में बरी होने और करीब उन्नीस साल जेल में बिताने के बाद हरिद्वार में चाय की दुकान लगा रहे सुरेंद्र कोली मृत पाए गए।",
  "content": "उत्तराखंड के हरिद्वार में एक साधारण सी चाय की दुकान किसी व्यक्ति के लिए नए सिरे से जिंदगी शुरू करने की कोशिश बन चुकी थी। वहाँ चाय का ठेला संभालने वाला शख्स लोगों के बीच सादा राम के नाम से अपनी पहचान बता रहा था। वह काम की तलाश और सिर छिपाने के लिए एक कमरे की जरूरत के साथ इस शहर में पहुँचा था। कुछ ही समय में उसकी जिंदगी एक तयशुदा ढर्रे पर चलने लगी थी, जहाँ सुबह चाय बनाना, आने वाले ग्राहकों को चाय परोसना और दिन ढलने पर दुकान बंद कर लेना ही उसका पूरा संसार बन गया था। इसके बाद 18 सितंबर 2026 को उसी चाय की दुकान के भीतर वह मृत पाया गया। पुलिस के अनुसार परिस्थितियाँ आत्महत्या की ओर इशारा कर रही थीं और मौके से कोई भी सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ। जिस शख्स की पहचान सादा राम के तौर पर बनाई गई थी, उसका असली नाम सुरेंद्र कोली था।\n\n हरिद्वार में इस तरह मृत मिलने से कुछ महीने पहले ही कोली सलाखों के पीछे लगभग उन्नीस साल गुजारने के बाद जेल से रिहा होकर बाहर आया था। उसने अपने अतीत को पीछे छोड़ते हुए जिंदगी की नई शुरुआत करने के लिए हरिद्वार की धरती को चुना था। लेकिन इस व्यक्ति ने अपनी उम्र के करीब दो दशक जेल की चहारदीवारी के भीतर क्यों काटे थे और गौतम बुद्ध नगर के उस इलाके में वास्तव में ऐसा क्या घटित हुआ था जिसने पूरे मुल्क को हिलाकर रख दिया था, इसे गहराई से जानने के लिए दिसंबर 2006 के उन खौफनाक पन्नों को पलटना जरूरी है।\n\n \n\nनिठारी में मासूमों और युवतियों का रहस्यमयी ढंग से गायब होना\n\nयह घटनाक्रम साल 2005 का है जब नोएडा के बाहरी छोर पर बसे निठारी इलाके में अजीबोगरीब और डरावनी हलचल शुरू हुई थी। इलाके से अचानक छोटे-छोटे बच्चे गायब होने लगे और कुछ समय बाद युवतियों के लापता होने का सिलसिला भी शुरू हो गया। कोई बच्चा घर के बाहर खेलने के लिए कदम रखता और कभी वापस नहीं लौटता था, तो वहीं कोई लड़की काम के सिलसिले में घर से बाहर निकलती और हमेशा के लिए ओझल हो जाती थी। पीड़ित परिवार बदहवास होकर अपने बच्चों की तलाश में दर-दर भटकते रहे। कई परिजनों ने स्थानीय पुलिस के चक्कर काटे, जबकि कुछ परिवारों ने गलियों और खंभों पर लापता बच्चों के पोस्टर चिपकाए, मगर किसी भी सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं मिल पा रहा था।\n\n इसी खौफ के साए के बीच फरवरी 2005 में पंद्रह साल की एक किशोरी रहस्यमयी तरीके से लापता हो गई। काफी समय बीत जाने के बाद उसके पिता ने आखिरकार गुमशुदगी की आधिकारिक शिकायत दर्ज करवाई। उस वक्त किसी को इस बात का दूर-दूर तक अंदेशा नहीं था कि यही गुमशुदगी आगे चलकर देश की सबसे कुख्यात और भयानक आपराधिक जाँच की आखिरी कड़ी साबित होने वाली है।\n\n \n\nडी-5 कोठी की दीवारें और नाले से निकले कंकाल\n\nलापता होने के मामले लगातार बढ़ते जा रहे थे और इसी बीच पूरी जाँच का केंद्र एक खास मकान बन गया। यह ठिकाना था नोएडा के सेक्टर इकतीस में स्थित कोठी नंबर डी-5। निठारी के रहने वाले परिवारों के लिए उस बंगले में रहने वाले दो सामान्य पुरुष ही नजर आते थे। लेकिन जब जाँच एजेंसियों ने उस परिसर के भीतर कदम रखा तो सारी धारणाएं बदल गईं। सबसे पहले एक हाथ मिला और उसके बाद कंकालों और हड्डियों का ऐसा अंबार सामने आया जिसने सबको सन्न कर दिया।\n\n हालाँकि इलाके में पहले भी कुछ बेहद विचलित करने वाले सुराग सामने आ चुके थे। मार्च 2005 के दौरान क्रिकेट खेल रहे कुछ बच्चों को डी-5 के पास वाली संकरी जमीन की पट्टी में एक इंसानी हाथ दिखाई दिया था। इसके बाद 3 दिसंबर 2006 को नाले की सफाई के दौरान भी एक मानव हाथ देखा गया था। लेकिन 29 दिसंबर को जो कुछ हुआ, उसकी कल्पना उस इलाके के किसी भी बाशिंदे ने नहीं की थी। डी-5 के बाहर भारी भीड़ जुट गई और मकानों के पीछे खुली जमीन पर खुदाई का काम शुरू कराया गया।\n\n उस खुदाई के दौरान इंसानी खोपड़ियाँ, हड्डियाँ, कपड़े और जूते बरामद होने लगे। आगे चलकर घरों की कतार के ठीक सामने बने बरसाती पानी के नाले से भी बड़ी तादाद में इंसानी अवशेष निकाले गए। जिस जाँच की शुरुआत कुछ लापता बच्चों की खोजबीन के तौर पर हुई थी, अब वहाँ कई लोगों के कंकालों का भयानक मंजर पसरा हुआ था। पुलिस ने एक युवती के लापता होने के मामले में कोली को अपनी हिरासत में ले लिया, जबकि मोनिंदर सिंह पंढेर को डी-5 कोठी के बाहर से पकड़ा गया। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि कोली हत्या करने के बाद कुछ पीड़ितों का यौन उत्पीड़न भी करता था और आदमखोरी के आरोप भी लगाए गए, लेकिन अदालत में ये दावे कभी भी निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं हो सके और केवल आरोप बनकर ही रह गए।\n\n \n\nमजिस्ट्रेट के सामने बयान और फांसी की सजा का दौर\n\nइस पूरे मामले में सबसे सनसनीखेज पहलू कोली का वह कथित इकबालिया बयान था जो एक मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराया गया था। इसमें पंद्रह साल की किशोरी से जुड़ा मामला उसकी सजा का मुख्य आधार बना। उस बयान के अनुसार, कोली ने किशोरी को बहला-फुसलाकर डी-5 के अंदर बुलाया और कथित तौर पर चुन्नी से गला घोंटकर उसकी जान ले ली। बयान में आगे यह भी दावा किया गया था कि उसने मौत के बाद शव का यौन उत्पीड़न किया, शरीर के टुकड़े किए और उन अवशेषों को घर के आसपास तथा बरसाती नाले में फेंक दिया।\n\n जाँचकर्ताओं ने घटना से जुड़ी खोपड़ियाँ और हड्डियाँ बरामद कीं, परिजनों ने बरामद कपड़ों की शिनाख्त की और डीएनए परीक्षण में अवशेषों के नमूने किशोरी के परिवार से मेल खाने की बात सामने आई। साल 2009 में एक निचली अदालत ने कोली को उस किशोरी के बलात्कार और हत्या का दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई। कई वर्षों तक यह फैसला बरकरार रहा और 2011 में खुद सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस सजा की पुष्टि कर दी, जिससे ऐसा लगा कि कोली का फांसी के फंदे पर लटकना तय हो चुका है।\n\n \n\nतेरह मामले और बारह मामलों में मृत्युदंड\n\nपंद्रह वर्षीय किशोरी का मामला अकेला नहीं था। साल 2010 से 2021 के बीच निठारी जाँच से जुड़े बारह अन्य मामलों में भी कोली को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई गई। हर बार वही सिलसिला दोहराया गया: किसी व्यक्ति का गायब होना, डी-5 कोठी का नाम सामने आना, कोली का कथित बयान, इंसानी अवशेषों की बरामदगी और अंत में मृत्युदंड।\n\n दूसरी तरफ पंढेर की कानूनी लड़ाई का रास्ता काफी अलग रहा। उसे कुछ मामलों में बरी कर दिया गया, जिनमें से एक मामले में निचली अदालत ने पहले उसे दोषी पाया था। बाद में कई अन्य मामलों में भी वह आरोपों से मुक्त होता चला गया। वर्षों तक आम जनमानस में यही धारणा बनी रही कि कोली ही हत्यारा था, पंढेर मकान का मालिक था और डी-5 वह जगह थी जहाँ यह सारा खौफनाक खेल खेला गया। लेकिन साल 2023 आते-आते यह पूरी कानूनी कहानी ढहने लगी।\n\n \n\nफांसी के फंदे से बचने से लेकर पूरी तरह बरी होने तक का सफर\n\nहालात में आए इस बड़े बदलाव को समझने के लिए एक दशक पीछे जाना होगा। साल 2014 तक किशोरी के मामले में कोली की दया याचिका और पुनर्विचार याचिका दोनों खारिज हो चुकी थीं। मेरठ जेल में 8 सितंबर को उसकी फांसी की तारीख तय कर दी गई थी। तभी 7 सितंबर की रात एक नया मोड़ आया और कोली कुछ समय के लिए फंदे से बच गया। जनवरी 2015 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दया याचिका पर फैसला लेने में हुई अत्यधिक देरी के आधार पर उसकी फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया, जिसके बाद वह अगले दस साल तक जेल में ही बंद रहा।\n\n इसके बाद 2023 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के सबूतों में गंभीर खामियों और कमियों को रेखांकित करते हुए निठारी से जुड़े बारह अन्य मामलों में कोली को बरी कर दिया। साल 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इन बरी किए जाने के फैसलों पर अपनी मुहर लगा दी। अब केवल एक आखिरी मामला बाकी रह गया था। नवंबर 2025 में देश की शीर्ष अदालत ने उस अंतिम मामले में भी कोली की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। लगभग उन्नीस साल जेल की सलाखों के पीछे काटने के बाद कोली एक आजाद नागरिक बनकर बाहर आया। पंढेर भी अपने मामलों में बरी होने के बाद पहले ही जेल से बाहर आ चुका था। देश की सबसे चर्चित आपराधिक जाँच के केंद्र में रहे दोनों व्यक्ति अब कानूनी रूप से जेल से मुक्त हो चुके थे।\n\n \n\nहरिद्वार में अंत और अनसुलझा रह गया गहरा रहस्य\n\nजेल से छूटने के बाद कोली अपने पुराने ठिकाने पर वापस नहीं लौटा। उसने उत्तराखंड के हरिद्वार का रुख किया, रहने के लिए एक कमरा तलाशा और सादा राम नाम रखकर चाय की दुकान चलाने लगा। इसके बाद 18 सितंबर 2026 को उसने कथित तौर पर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली, जिससे सुरेंद्र कोली का नाम एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में आ गया। कोली की मौत के साथ ही भारत के सबसे विचलित करने वाले आपराधिक इतिहास का एक और अध्याय समाप्त हो गया, लेकिन इसके मूल में मौजूद सवाल आज भी अनसुलझा ही खड़ा है कि अगर अदालतें कोली या पंढेर को इन अपराधों का गुनाहगार साबित नहीं कर सकीं, तो फिर निठारी के उन बेकसूर बच्चों को किसने मारा था।\n\nइसका आप पर असर\nनिठारी कांड के मुख्य आरोपी की मौत और पूर्व में आए अदालती फैसलों से न्याय प्रणाली और पीड़ितों के अधिकारों पर सीधा असर पड़ता है।\n\n• न्याय और जवाबदेही: लगभग उन्नीस साल चली लंबी अदालती प्रक्रिया के बावजूद असली दोषियों की स्पष्ट पहचान न हो पाना आपराधिक जाँच प्रणाली की कमजोरियों को दर्शाता है। पीड़ितों के परिवारों के लिए यह स्थिति न्याय की उम्मीदों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।\n• फॉरेंसिक साक्ष्यों की महत्ता: गंभीर मामलों में केवल इकबालिया बयानों पर निर्भर रहने के बजाय वैज्ञानिक और ठोस सबूतों का होना बेहद जरूरी है। अदालतों द्वारा आरोपियों को बरी किया जाना यह साबित करता है कि जाँच में खामियों का सीधा लाभ आरोपियों को मिलता है।\n• पुनर्वास और सामाजिक पहचान: वर्षों जेल में बिताने के बाद बरी हुए व्यक्तियों के लिए समाज में पहचान छिपाकर जीना एक कड़वी हकीकत बन जाता है। इस मामले में सादा राम नाम रखकर चाय बेचना और फिर संदिग्ध परिस्थितियों में मौत सामाजिक अलगाव को उजागर करती है।\n• नागरिक सुरक्षा और लापता बच्चे: पुलिस थानों में गुमशुदगी की शिकायतों पर शुरुआती दौर में ही तत्परता दिखाना अत्यंत आवश्यक है। समय पर जाँच न होने से बड़े अपराधों की कड़ियाँ उलझ जाती हैं और सच्चाई कभी सामने नहीं आ पाती।\n\nऐसा क्यों हुआ\nनिठारी मामले में मृत्युदंड से लेकर सभी आरोपों से बरी होने और उसके बाद सुरेंद्र कोली की संदिग्ध मौत के पीछे कानूनी और परिस्थितिजन्य कारण रहे हैं।\n\n• अभियोजन के साक्ष्यों में भारी कमियाँ: उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि जाँच एजेंसियों द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों में गंभीर प्रक्रियागत खामियाँ थीं। केवल मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयानों और कमजोर कड़ियों के आधार पर दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सका।\n• दया याचिका पर निर्णय में देरी: वर्ष 2014 में दया याचिका खारिज होने के बाद फांसी पर रोक लगी क्योंकि संवैधानिक पीठ के नियमों के तहत याचिका निस्तारण में अत्यधिक देरी के आधार पर 2015 में फांसी को उम्रकैद में बदला गया था।\n• अदालती बरी और एकाकी जीवन: नवंबर 2025 में सभी मामलों से बरी होने के बाद कोली हरिद्वार चला गया और पहचान बदलकर चाय की दुकान चलाने लगा। 18 सितंबर 2026 को उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई, जिसकी प्राथमिक वजह पुलिस ने आत्महत्या बताई है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुरेंद्र कोली कौन था?\nसुरेंद्र कोली 2006 के कुख्यात निठारी कांड से जुड़े मामलों में आरोपी था, जिसे बाद में अदालतों ने सभी आरोपों से बरी कर दिया था।\n\n2. सुरेंद्र कोली की मौत कहाँ और कैसे हुई?\nकोली 18 सितंबर 2026 को हरिद्वार में अपनी चाय की दुकान के भीतर मृत पाया गया, जहाँ पुलिस के अनुसार परिस्थितियाँ आत्महत्या की ओर इशारा करती हैं।\n\n3. वह हरिद्वार में किस नाम से रह रहा था?\nजेल से रिहा होने के बाद वह हरिद्वार में सादा राम के नाम से एक छोटी सी चाय की दुकान चला रहा था।\n\n4. उसे जेल से कब और क्यों रिहा किया गया था?\nसबूतों के अभाव और जाँच की खामियों के चलते नवंबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंतिम मामले में बरी किए जाने के बाद वह लगभग 19 साल बाद जेल से छूटा था।\n\n5. निठारी कांड की शुरुआत कब हुई थी?\nनिठारी में बच्चों और महिलाओं के लापता होने का सिलसिला 2005 में शुरू हुआ था, जिसके बाद दिसंबर 2006 में डी-5 कोठी के पास से कंकाल बरामद हुए थे।\n\n6. मोनिंदर सिंह पंढेर का इस मामले से क्या संबंध था?\nपंढेर नोएडा के सेक्टर 31 स्थित डी-5 कोठी का मालिक था और उसे भी विभिन्न मामलों में बरी किए जाने के बाद जेल से रिहा कर दिया गया था।",
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  "publishedAt": "2026-09-20",
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