उत्तर कोरिया के बढ़ते परमाणु क्षमता और वैश्विक गठजोड़ के बीच किम जोंग उन से फिर मिलने के इच्छुक हैं डोनाल्ड ट्रंप डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग उन की पहली मुलाकात के वर्षों बाद अमेरिकी रुख में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। हालांकि, उत्तर कोरिया के विशाल परमाणु हथियार, मिसाइल प्रगति और रूस-चीन से मजबूत संबंधों ने प्योंगयांग को पहले से अधिक मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है। वर्ष 2018 में 12 जून के दिन सिंगापुर के शांत माहौल में इतिहास रचा गया था, जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के शीर्ष नेता किम जोंग उन एक मेज पर आमने-सामने बैठे थे। वह किसी पदस्थ अमेरिकी राष्ट्रपति और उत्तर कोरियाई राष्ट्रप्रमुख के बीच आयोजित पहली ऐतिहासिक शिखर वार्ता थी। उस वक्त दोनों देशों के बीच संबंधों के एक नए अध्याय की शुरुआत का दावा किया गया था। उस मुलाकात के लगभग आठ साल बीत जाने के बाद, डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर किम जोंग उन से मुलाकात करने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं। हालांकि, इस बार अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की बिसात पूरी तरह बदल चुकी है। वाशिंगटन ने हाल ही में दक्षिण कोरिया के साथ आयोजित होने वाले अपने वार्षिक संयुक्त सैन्य अभ्यासों के दायरे में कटौती की है। डोनाल्ड ट्रंप ने स्वयं इन अभ्यासों को किम जोंग उन के प्रति पूरी तरह अनुचित और आक्रामक करार दिया है। लेकिन दूसरी तरफ, उत्तर कोरिया का परमाणु जखीरा काफी विशाल हो चुका है, उसकी बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक अत्यधिक उन्नत हो चुकी है, और किम जोंग उन ने रूस तथा चीन के साथ अपने कूटनीतिक व सामरिक रिश्तों को अभूतपूर्व गहराई दी है। ऐसे में यह सवाल बेहद प्रासंगिक हो जाता है कि क्या 2018 की तुलना में 2026 में किम जोंग उन को डोनाल्ड ट्रंप की उतनी ही आवश्यकता है या समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। सिंगापुर से हनोई तक: पुरानी शिखर वार्ताओं का लेखा-जोखा डोनाल्ड ट्रंप समय-समय पर किम जोंग उन के साथ अपने व्यक्तिगत और मधुर संबंधों की चर्चा करते रहे हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से संकेत दिए हैं कि वे इस वर्ष के अंत तक उत्तर कोरियाई नेता से दोबारा व्यक्तिगत मुलाकात की योजना बना रहे हैं। यदि हम अतीत के पन्नों को पलटें, तो 12 जून 2018 को सिंगापुर में आयोजित पहली शिखर वार्ता में डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग उन ने कोरियाई प्रायद्वीप के पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए मिलकर काम करने और द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने पर सहमति जताई थी। हालांकि, वाशिंगटन और प्योंगयांग के बीच मुख्य विवाद यह था कि उत्तर कोरिया परमाणु हथियार नष्ट करने की दिशा में क्या ठोस कदम उठाएगा और बदले में अमेरिका उसे प्रतिबंधों से कितनी राहत प्रदान करेगा। यह मतभेद फरवरी 2019 में वियतनाम की राजधानी हनोई में आयोजित दूसरे शिखर सम्मेलन में पूरी तरह खुलकर सामने आ गया। हनोई में किम जोंग उन चाहते थे कि उनके देश पर लगाए गए कड़े अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों को तुरंत हटाया जाए, जबकि डोनाल्ड ट्रंप की मांग थी कि उत्तर कोरिया पहले अपने मुख्य परमाणु बुनियादी ढांचे को पूरी तरह ध्वस्त करे। दोनों पक्षों के बीच सहमति न बन पाने के कारण हनोई शिखर वार्ता बिना किसी समझौते के अचानक समाप्त हो गई। बाद में 30 जून 2019 को डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग उन ने असैन्यीकृत क्षेत्र (DMZ) पर एक संक्षिप्त मुलाकात अवश्य की, लेकिन उसके बाद अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच कोई गंभीर या औपचारिक कूटनीतिक बातचीत दोबारा शुरू नहीं हो सकी। आज जब डोनाल्ड ट्रंप एक और कूटनीतिक प्रयास की बात कर रहे हैं, तब किम जोंग उन 2018 की तुलना में कहीं अधिक मजबूत और सौदेबाजी की बेहतर स्थिति में नजर आ रहे हैं। सैन्य अभ्यासों में कटौती और वाशिंगटन के कूटनीतिक संकेत अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच आयोजित होने वाले वार्षिक सैन्य अभ्यास को लेकर हाल के दिनों में बड़े फैसले लिए गए हैं। अमेरिका और दक्षिण कोरियाई अधिकारियों ने घोषणा की कि उनके बहुचर्चित वार्षिक सैन्य अभ्यास 'उल्ची फ्रीडम शील्ड' (UFS) की अवधि को 11 दिनों से घटाकर मात्र 5 दिन कर दिया गया है, साथ ही इसके तहत होने वाली मैदानी सैन्य तैयारियों में भी भारी कटौती की गई है। यह कदम डोनाल्ड ट्रंप के उस स्पष्ट निर्देश के बाद उठाया गया, जिसमें उन्होंने अमेरिकी सैन्य भागीदारी को व्यापक रूप से कम करने का आदेश दिया था। उत्तर कोरिया लंबे समय से इन संयुक्त अभ्यासों का कड़ा विरोध करता आया है और इन्हें अपने ऊपर संभावित सैन्य हमले की पूर्व तैयारी करार देता रहा है। वाशिंगटन द्वारा सैन्य अभ्यासों के आकार को छोटा करने को एक कूटनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका यह संदेश देना चाहता है कि यदि उत्तर कोरिया बातचीत की मेज पर वापस लौटने के लिए तैयार होता है, तो वाशिंगटन उस पर से सैन्य दबाव कम करने के लिए तैयार है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम का उद्देश्य केवल उत्तर कोरिया को साधना नहीं है, बल्कि दक्षिण कोरिया पर दबाव बनाना भी हो सकता है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के योंग-चुल हा के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप इन सैन्य अभ्यासों के मुद्दे का उपयोग सेयोल के साथ व्यापक द्विपक्षीय रक्षा गठबंधन और आर्थिक शुल्कों के मुद्दों पर अपनी शर्तें मनवाने के लिए कर सकते हैं। दूसरी ओर, अमेरिका द्वारा अभ्यासों को सीमित किए जाने के बावजूद 20 अगस्त 2026 को दक्षिण कोरिया ने देशव्यापी नागरिक सुरक्षा अभ्यास आयोजित किया, जो यह दर्शाता है कि उत्तर कोरियाई खतरे को लेकर सेयोल अपनी तैयारियों में ढील देने के पक्ष में नहीं है। उल्ची फ्रीडम शील्ड (UFS) अभ्यास की शुरुआत 2022 में पुराने प्रारूपों को बदलकर की गई थी। यह एक विस्तृत अभ्यास है जिसमें सैन्य बलों के साथ-साथ सरकारी संस्थाएं भी भाग लेती हैं ताकि उत्तर कोरियाई हमले की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया दी जा सके। जहां अमेरिका इसे रक्षात्मक अभ्यास बताता है, वहीं उत्तर कोरिया के लिए यह उसकी संप्रभुता के लिए खतरा बना हुआ है। उत्तर कोरिया का रुख और हालिया मिसाइल परीक्षण अमेरिकी ढील और सैन्य अभ्यासों के सीमित होने के बावजूद उत्तर कोरिया की ओर से बातचीत को लेकर कोई विशेष उत्साह नहीं दिखाई दिया है। किम जोंग उन की प्रभावशाली बहन किम यो जोंग ने स्पष्ट किया कि उन्हें वाशिंगटन और प्योंगयांग के बीच हाल में हुई किसी प्रत्यक्ष कूटनीतिक बातचीत की जानकारी नहीं है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि अमेरिका द्वारा सैन्य अभ्यासों की अवधि कम कर देने से उनका उत्तेजक और आक्रामक स्वभाव नहीं बदल जाता, और इसे अमेरिका की सद्भावना के रूप में बिल्कुल नहीं देखा जाना चाहिए। इस बयान के तुरंत बाद 20 अगस्त 2026 को उत्तर कोरिया ने अपने आक्रामक तेवर दिखाते हुए समुद्र की ओर लगभग 10 कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का सफल प्रक्षेपण किया। दक्षिण कोरियाई सेना द्वारा दर्ज किए गए इन परीक्षणों ने यह साबित कर दिया कि डोनाल्ड ट्रंप भले ही वार्ता के लिए उत्सुक हों, लेकिन किम जोंग उन को किसी प्रकार की जल्दबाजी नहीं है। विशाल परमाणु जखीरा और उन्नत मिसाइल तकनीक वर्ष 2018 में जब डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग उन मिले थे, तब वाशिंगटन का प्राथमिक लक्ष्य उत्तर कोरिया का पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण था। लेकिन 2026 तक आते-आते उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुका है। उत्तर कोरिया के पास न केवल परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ी है, बल्कि उसकी मिसाइल प्रणालियों में भी क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। ठोस ईंधन आधारित मिसाइलों और आधुनिक रक्षा प्रणालियों को चकमा देने में सक्षम तकनीक ने उसकी सैन्य क्षमता को बहुगुणित कर दिया है। उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों की सटीक संख्या पर विभिन्न आकलन सामने आए हैं। 19 अगस्त 2026 को डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि किम जोंग उन के पास 57 बेहद शक्तिशाली परमाणु हथियार मौजूद हैं। इसके ठीक अगले दिन 20 अगस्त को दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री अहन ग्यू-बिएक ने अनुमान व्यक्त किया कि उत्तर कोरिया के पास 80 से लेकर 120 तक परमाणु वॉरहेड हो सकते हैं। वहीं, सिपरी (SIPRI) द्वारा जून 2026 में जारी किए गए मूल्यांकन के अनुसार, उत्तर कोरिया ने लगभग 60 वॉरहेड तैयार कर लिए हैं और उसके पास कम से कम 30 और वॉरहेड बनाने के लिए पर्याप्त विखंडनीय सामग्री (fissile material) मौजूद है। चूंकि उत्तर कोरिया अपने परमाणु जखीरे की आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं करता, इसलिए सटीक संख्या का सत्यापन कठिन है। किम जोंग उन के लिए ये हथियार केवल वार्ता के लिए मोहरे नहीं हैं, बल्कि यह उनके शासन की सुरक्षा की मुख्य गारंटी बन चुके हैं। रूस के साथ सामरिक संधि और युद्ध का अनुभव किम जोंग उन की भू-राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने में सबसे बड़ा योगदान रूस के साथ उनके बदलते संबंधों का रहा है। जून 2024 में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने उत्तर कोरिया की ऐतिहासिक यात्रा की थी। इस यात्रा के दौरान व्लादिमीर पुतिन और किम जोंग उन ने एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि में एक-दूसरे पर सशस्त्र आक्रमण की स्थिति में तत्काल सैन्य और अन्य सहायता प्रदान करने का प्रावधान शामिल है। पश्चिमी और यूक्रेनी विश्लेषकों के आकलन के अनुसार, उत्तर कोरिया ने रूस को यूक्रेन युद्ध के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य उपकरण, गोले और गोला-बारूद की आपूर्ति की है, साथ ही अपनी सैन्य टुकड़ियों को भी वहां भेजा है। इस सैन्य सहयोग के बदले उत्तर कोरियाई सैनिकों को आधुनिक युद्ध क्षेत्र का वास्तविक अनुभव प्राप्त हो रहा है, जिसमें ड्रोन तकनीक, तोपखाने का उपयोग और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली शामिल है। रूस के साथ इस प्रगाढ़ साझेदारी ने किम जोंग उन को वाशिंगटन के दबाव से मुक्त होने का एक मजबूत विकल्प दे दिया है। चीन का आर्थिक संबल और बहुकोणीय कूटनीति रूस के अलावा चीन भी उत्तर कोरिया की रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है। कोरिया कार्यक्रम की वरिष्ठ फेलो रेचल मिन-यंग ली का विश्लेषण है कि रूस और चीन के साथ उत्तर कोरिया के संबंधों की प्रकृति अलग-अलग है। जहां रूस प्योंगयांग का एक प्रमुख सैन्य और सामरिक साझेदार बनकर उभरा है, वहीं चीन आज भी उत्तर कोरिया की मुख्य आर्थिक जीवनरेखा और कूटनीतिक ढाल है। बीजिंग कभी नहीं चाहेगा कि किम जोंग उन के शासन का पतन हो या उसकी सीमाओं पर कोई युद्ध या अस्थिरता पैदा हो। साथ ही, रूस के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए चीन प्योंगयांग पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। इस प्रकार, किम जोंग उन को रूस से सैन्य सुरक्षा और चीन से आर्थिक सहारा मिल रहा है, जिससे उन्हें अमेरिका पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं रह गई है। दक्षिण कोरिया की सुरक्षा चिंताएं और भारत पर प्रभाव उत्तर कोरिया के बढ़ते परमाणु खतरे का सबसे सीधा असर दक्षिण कोरिया पर पड़ रहा है। वाशिंगटन और प्योंगयांग के बीच किसी भी संभावित समझौते से सेयोल की सुरक्षा सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। जब अमेरिका कूटनीतिक गुंजाइश बनाने के लिए सैन्य अभ्यासों को सीमित करता है, तो दक्षिण कोरिया को अपनी सैन्य तैयारी और कूटनीति के बीच नाजुक संतुलन बनाना पड़ता है। 20 अगस्त को 10 मिसाइलों के प्रक्षेपण और 80 से 120 वॉरहेड के अनुमान ने सेयोल की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। वहीं, भारत के दृष्टिकोण से देखा जाए तो कोरियाई प्रायद्वीप में शांति और स्थिरता का सीधा संबंध वैश्विक परमाणु अप्रसार से है। उत्तर कोरिया और पाकिस्तान के बीच अतीत में मिसाइल और परमाणु तकनीक के आदान-प्रदान का इतिहास रहा है, जिसमें ए.क्यू. खान नेटवर्क की भूमिका प्रमुख थी। यदि डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग उन के बीच कोई ऐसा समझौता होता है जो उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर प्रभावी रोक लगाता है, तो यह भारत के लिए सुरक्षा के लिहाज से सकारात्मक होगा। लेकिन यदि किम जोंग उन अपने परमाणु हथियारों को बरकरार रखते हुए अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से राहत पाने में सफल हो जाते हैं, तो इससे परमाणु अप्रसार के प्रयासों को भारी झटका लगेगा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन का प्रभाव बढ़ सकता है। इसका आप पर असर • वैश्विक स्तर पर: उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच नए कूटनीतिक प्रयासों तथा बढ़ते परमाणु जखीरे से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा संतुलन और व्यापारिक मार्गों पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा। • भारत में: उत्तर कोरिया के परमाणु व मिसाइल कार्यक्रमों पर लगाम लगने से पाकिस्तान के साथ संभावित अप्रसार जोखिमों पर अंकुश लगेगा, जबकि एशिया में रणनीतिक स्थिरता मजबूत होगी। सवाल-जवाब 1. डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग उन की पहली मुलाकात कब हुई थी? दोनों नेताओं की पहली ऐतिहासिक शिखर वार्ता 12 जून 2018 को सिंगापुर में आयोजित हुई थी। 2. अमेरिका और दक्षिण कोरिया के उल्ची फ्रीडम शील्ड अभ्यास में क्या बदलाव किया गया है? इस वार्षिक सैन्य अभ्यास की अवधि को 11 दिनों से घटाकर 5 दिन कर दिया गया है और मैदानी प्रशिक्षण में भी कटौती की गई है। 3. उत्तर कोरिया के पास कितने परमाणु हथियार होने का अनुमान है? डोनाल्ड ट्रंप ने 57 परमाणु हथियारों का दावा किया, जबकि दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री ने 80 से 120 और सिपरी (SIPRI) ने लगभग 60 तैयार वॉरहेड का अनुमान लगाया है। 4. रूस और उत्तर कोरिया के बीच जून 2024 में क्या समझौता हुआ था? राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और किम जोंग उन ने एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसमें सशस्त्र आक्रमण की स्थिति में तत्काल सैन्य सहायता का प्रावधान शामिल है। 5. 20 अगस्त 2026 को उत्तर कोरिया ने क्या कार्रवाई की? उत्तर कोरिया ने समुद्र की ओर लगभग 10 कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण किया। https://trendkia.com/investigations/north-korea-ke-barhate-paramanu-kshamata-aura-vaishvika-gathajora-ke-bicha-kim-jong-un-se-phira-milane-ke-ichchhuka-hain-donald-tr-19374 TrendKia — Har trend, sabse pehle.