# प्रधानमंत्री के 'दिमागी नक्सल' बयान पर छिड़ी सियासी बहस, चिदंबरम और महबूबा मुफ्ती ने किया पलटवार

> स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 'दिमागी नक्सल' शब्द के इस्तेमाल के बाद देश में एक नई राजनीतिक और वैचारिक बहस छिड़ गई है।

**Type:** article · **Category:** पड़ताल · **Published:** 2026-08-18 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/investigations/political-storm-over-pm-modi-s-dimagi-naxal-remark-as-chidambaram-and-mehbooba-mufti-embrace-the-label-18047 · **Language:** Hindi
**Tags:** दिमागी नक्सल, नरेंद्र मोदी, पी चिदंबरम, महबूबा मुफ्ती, किरण रिजिजू, अनुच्छेद 370, राजनीतिक बहस

स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सामने एक नई चुनौती का जिक्र करते हुए 'दिमागी नक्सल' शब्द का प्रयोग किया। इस बयान के सामने आते ही भारतीय राजनीतिक गलियारों में एक तीखी बहस शुरू हो गई और विपक्ष के कई वरिष्ठ नेताओं ने इस शब्दावली पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे अपने ऊपर लिया।

## प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान और उसका संदर्भ

लाल किले से दिए गए अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए कहा कि हालांकि सशस्त्र नक्सलवाद को काफी हद तक हरा दिया गया है, लेकिन एक अन्य रूप में खतरा अभी भी बना हुआ है। उन्होंने 'दिमागी नक्सल' की अवधारणा पर बात करते हुए जोर दिया कि इस मानसिकता की पहचान कर इसे पूरी तरह अलग-थलग करने की आवश्यकता है। उनका तर्क था कि सशस्त्र हिंसा में कमी आने के बाद भी चरमपंथी विचार जीवित रह सकते हैं और संस्थाओं तथा नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं।

भारतीय राजनीति में इस प्रकार के नए राजनीतिक शब्दों का इस्तेमाल नया नहीं है। इससे पहले 'शहरी नक्सल', 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' और 'आंदोलनजीवी' जैसे शब्दों का उपयोग भी राजनीतिक बहसों में किया जाता रहा है। इन लेबलों का उपयोग अक्सर उन लोगों की आलोचना करने के लिए किया जाता है जिन पर कट्टरपंथी या सरकार विरोधी गतिविधियों के समर्थन का आरोप होता है। हालांकि इस बार यह शब्दावली सीधे प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस के भाषण का हिस्सा बनी, जिसके कारण यह तुरंत एक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई।

## विश्लेषकों की राय और वैचारिक बहस

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी का कहना है कि वह शुरुआती दौर में यह समझ नहीं पाई थीं कि इस शब्द का सटीक अर्थ क्या है और प्रधानमंत्री का इशारा किस ओर था। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या केवल किसी भिन्न विचारधारा को रखने वाले लोगों की पहचान कर उन्हें समाज से अलग-थलग करना उचित है। उनके अनुसार एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नए विचारों के पनपने के लिए सवाल पूछना और खुली बहस होना बहुत जरूरी है।

राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई वैचारिक मतभेद और आपराधिक कृत्यों के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचते हैं। उनका कहना है कि जो लोग हिंसा का सहारा लेते हैं या उसकी साजिश रचते हैं, उन पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन केवल कोई खास विचार रखना पूरी तरह अलग बात है। उन्होंने चेतावनी दी कि किसी विरोधी विचारधारा के कारण लोगों को अलग-थलग करना संविधान की मूल भावना के खिलाफ हो सकता है, क्योंकि लोकतंत्र में असहमति और बहस के लिए जगह होना अनिवार्य है।

## माओवादी आंदोलन का इतिहास और वैचारिक जड़ें

इस पूरी शब्दावली को गहराई से समझने के लिए देश में नक्सलवाद के इतिहास को देखना जरूरी है। इस आंदोलन की शुरुआत साल 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी इलाके से हुई थी, जिसे माओवादी क्रांतिकारी विचारों से प्रेरणा मिली थी। इसके बाद यह आंदोलन मध्य और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में फैल गया, जहां सशस्त्र समूहों ने राज्य सत्ता के खिलाफ बगावत की। अपने सबसे बड़े दौर में वामपंथी उग्रवाद से 200 से अधिक जिले प्रभावित थे।

सरकार का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में इस आंदोलन के भौगोलिक दायरे और हिंसा की घटनाओं में भारी कमी आई है। इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री ने सशस्त्र नक्सलवाद के कमजोर होने के बाद एक नए खतरे के रूप में इस बात को उठाया। रशीद किदवई यह भी याद दिलाते हैं कि इतिहास में कई ऐसे राजनीतिक आंदोलन रहे हैं जो कभी मुख्यधारा के लिए चुनौती माने जाते थे, लेकिन बाद में वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बन गए। उन्होंने इस संदर्भ में मिजोरम, असम और पंजाब जैसे राज्यों के उदाहरण भी दिए।

इस विषय पर चेन्नई स्थित वीआईटी के स्कूल ऑफ मीडिया आर्थ्स एंड टेक्नोलॉजी की सहायक प्रोफेसर डॉ. सितारा पुली वेंकटेश का कहना है कि बौद्धिक शब्द का ह्रास चिंताजनक है। उनके अनुसार, जो शब्द कभी सच्चाई और न्याय के लिए खड़े होने वालों के लिए सम्मान का प्रतीक हुआ करता था, उसे आज नकारात्मक रूप में देखा जाने लगा है। उन्होंने कहा कि वामपंथी क्रांतिकारी आंदोलनों को पूरी तरह से आतंकवादी नजरिए से देखना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है।

## किरण रिजिजू और भाजपा नेताओं का पक्ष

केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने इस मामले पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में किसी भी विपक्षी नेता का नाम नहीं लिया था। उनके अनुसार यह शब्द उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया गया है जो माओवादी या चरमपंथी विचारधारा का समर्थन करते हैं। उन्होंने आलोचकों पर इस बात का आरोप लगाया कि वे प्रधानमंत्री के बर्ड्स-आई व्यू को राजनीतिक हमला बता रहे हैं, जबकि असल निशाना उग्रवादी विचारधारा के समर्थक हैं। किरण रिजिजू ने इस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उन बयानों का भी हवाला दिया जिसमें उन्होंने आंतरिक सुरक्षा के लिए नक्सलवाद को बड़ा खतरा बताया था।

प्रधानमंत्री के इस भाषण के बाद भारतीय जनता पार्टी के अन्य नेताओं ने भी इस शब्दावली का उपयोग करना शुरू कर दिया। भाजपा सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी बृजलाल ने दावा किया कि जंगलों में छिपे नक्सलियों की तुलना में 'दिमागी नक्सल' देश के लिए ज्यादा खतरनाक हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे लोग शहरों में प्रोफेसर, शिक्षक, एनजीओ प्रमुख, लेखक और बुद्धिजीवी के रूप में काम करते हैं और हथियारों की जगह विचारों का इस्तेमाल कर युवाओं को प्रभावित करते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ये लोग लोकतांत्रिक संस्थाओं, न्यायपालिका, सुरक्षा बलों और संविधान के प्रति अविश्वास पैदा करने की कोशिश करते हैं।

## विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रिया और टैग को अपनाना

सामान्य तौर पर राजनेता उन शब्दों या लेबल्स को खारिज करते हैं जो उनके विरोधी उन पर चस्पा करते हैं, लेकिन इस मामले में स्थिति अलग देखने को मिली। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्हें 'दिमागी नक्सल' कहलाने पर गर्व है। वहीं पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता महबूबा मुफ्ती ने भी इस लेबिल को अपनाते हुए कहा कि वह अनुच्छेद 370 का समर्थन करती हैं और इसलिए वह एक 'दिमागी नक्सल' हैं। उनकी यह टिप्पणी किरण रिजिजू के उस बयान के बाद आई थी जिसमें कहा गया था कि प्रधानमंत्री ने विपक्ष को यह संज्ञा नहीं दी थी।

इन नेताओं का मुख्य तर्क यह था कि सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना किसी भी तरह से उग्रवाद या आतंकवाद का समर्थन करना नहीं है। विश्लेषकों का मानना है कि आज की युवा पीढ़ी, जो अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रही है, वह प्रचलित राजनीतिक नैरेटिव से अलग विचार रखने में नहीं डरती। पत्रकार नीरजा चौधरी का मानना है कि इस पूरी बहस ने समाज में बुद्धिजीवियों की भूमिका को लेकर एक सकारात्मक और आवश्यक चर्चा को जन्म दिया है, जिससे विपक्ष को भी एक नया राजनीतिक मंच मिला है।

## अनुच्छेद 370 और भाजपा-पीडीपी गठबंधन का इतिहास

महबूबा मुफ्ती और भाजपा के बीच के संबंधों की पृष्ठभूमि भी इस राजनीति का एक अहम हिस्सा है। साल 2015 में एक ऐसा गठबंधन अस्तित्व में आया जिसकी कल्पना करना कुछ समय पहले तक असंभव लग रहा था, जब भारतीय जनता पार्टी और महबूबा मुफ्ती की पीडीपी ने मिलकर जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाई। भाजपा की पकड़ जहां जम्मू क्षेत्र में मजबूत थी, वहीं महबूबा मुफ्ती की पार्टी कश्मीर घाटी में एक बड़ी राजनीतिक ताकत थी। हालांकि यह गठबंधन वैचारिक मतभेदों के कारण शुरू से ही आसान नहीं था।

दोनों दलों के बीच अनुच्छेद 370, आफस्पा और जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता जैसे संवेदनशील मुद्दों पर पूरी तरह से अलग विचार थे। आखिरकार साल 2018 में भाजपा ने इस गठबंधन से अपना समर्थन वापस ले लिया, जिससे महबूबा मुफ्ती की सरकार गिर गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। इसके बाद साल 2019 में केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया। जिस राज्य में भाजपा ने पीडीपी के साथ मिलकर सरकार चलाई थी, उसी राज्य का विशेष दर्जा कुछ ही महीनों बाद हटा दिया गया। इसके बाद महबूबा मुफ्ती इस निर्णय की सबसे बड़ी आलोचक बन गईं और उन्हें हिरासत में भी लिया गया।

## सोशल मीडिया पर 'दिमागी नक्सल पार्टी' पेज की चर्चा

इस पूरे राजनीतिक विवाद के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर एक नया अकाउंट चर्चा का विषय बन गया है। 'दिमागी नक्सल पार्टी' नाम से बने इस पेज ने कुछ ही दिनों के भीतर 1.7 लाख से अधिक फॉलोअर्स हासिल कर लिए। अगस्त के महीने में बने इस पेज के बायो में 'सोचो, शोध करो, विरोध करो' का नारा लिखा है और इसे पार्टी का आधिकारिक खाता बताया गया है। इस अकाउंट के संस्थापक और सह-संस्थापक के रूप में केवल 'ए दिमागी इंडियन' और '56 इंच का' नाम दर्ज हैं, जिससे इसके पीछे असली व्यक्ति या समूह की पहचान अभी भी रहस्य बनी हुई है। कुछ समय पहले साइबर हमलों का शिकार होने का दावा करने के बाद यह पेज कुछ देर के लिए ऑफलाइन भी हो गया था, जो बाद में फिर से वापस आ गया।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** यह राजनीतिक बहस देश भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वैचारिक असहमति और उग्रवाद के बीच की रेखाओं को लेकर नए सवाल खड़े करती है।

**आम नागरिकों पर:** इस शब्दावली के तूल पकड़ने से राजनीतिक दलों और आम जनता के बीच वैचारिक ध्रुवीकरण और तेज हो सकता है।

## सवाल-जवाब

### 1. 'दिमागी नक्सल' शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले किसने और कब किया था?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण के दौरान 'दिमागी नक्सल' शब्द का प्रयोग किया था।

### 2. किन विपक्षी नेताओं ने इस शब्द को अपनाया है?
कांग्रेस नेता पी चिदंबरम और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि उन्हें 'दिमागी नक्सल' कहलाने पर गर्व है।

### 3. किरण रिजिजू ने इस बयान पर क्या स्पष्टीकरण दिया है?
केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में किसी भी विपक्षी नेता का नाम नहीं लिया था, बल्कि यह टिप्पणी चरमपंथी विचारधारा के समर्थकों के लिए थी।

### 4. अनुच्छेद 370 का इस विवाद से क्या संबंध है?
महबूबा मुफ्ती ने अपनी टिप्पणी में अनुच्छेद 370 का जिक्र किया और कहा कि वह इसके समर्थन के कारण खुद को 'दिमागी नक्सल' मानती हैं।

### 5. सोशल मीडिया पर चर्चा में आए 'दिमागी नक्सल पार्टी' पेज के कितने फॉलोअर्स हो गए हैं?
इंस्टाग्राम पर बने इस नए पेज ने कुछ ही दिनों में 1.7 लाख से अधिक फॉलोअर्स हासिल कर लिए हैं।

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