# संयुक्त राष्ट्र महासभा में शहबाज शरीफ के भाषण से पहले पाकिस्तान ने फिर उठाया सिंधु जल संधि और कश्मीर का मुद्दा

> संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के संबोधन से ठीक पहले पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद को ताजा पत्र भेजकर सिंधु जल समझौते और कश्मीर मसले पर हस्तक्षेप की मांग दोहराई है।

**Type:** article · **Category:** पड़ताल · **Published:** 2026-09-24 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/investigations/snyukta-rashtra-mahasabha-men-shehbaz-sharif-ke-bhashana-se-pahale-pakistan-ne-phira-uthaya-indus-waters-treaty-aura-kashmir-ka-mu-37710 · **Language:** Hindi
**Tags:** सिंधु जल समझौता, शहबाज शरीफ, संयुक्त राष्ट्र, कश्मीर विवाद, भारत पाकिस्तान संबंध, सुरक्षा परिषद, पहलगाम हमला

संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक अधिवेशन में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के 25 सितंबर के निर्धारित संबोधन से पहले इस्लामाबाद ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत विरोधी कूटनीतिक सक्रियता तेज कर दी है। पाकिस्तानी नेतृत्व ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को सिंधु जल संधि के मुद्दे पर एक नया पत्र भेजा है, साथ ही जम्मू और कश्मीर के विषय को भी अपने कूटनीतिक प्रचार का प्रमुख हिस्सा बनाए रखा है। अप्रैल 2025 में भारत द्वारा सिंधु जल समझौते को स्थगित करने के बाद से पाकिस्तान लगातार वैश्विक संस्थाओं का दरवाजा खटखटा रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय नियमों और मौजूदा संधियों के ढांचे को देखते हुए इस तरह के पत्राचार के वास्तविक असर पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

## सुरक्षा परिषद को भेजे गए पत्र और पंचाट के आदेश का संदर्भ
पाकिस्तान द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को प्रेषित ताजा औपचारिक पत्राचार 31 अगस्त 2026 को स्थायी मध्यस्थता अदालत द्वारा दिए गए उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें न्यायाधिकरण ने कहा था कि वर्ष 1960 की सिंधु जल संधि अभी भी प्रभावी है। पाकिस्तान ने इस निष्कर्ष का स्वागत करते हुए अंतरराष्ट्रीय पटल पर यह तर्क रखा है कि भारत एकतरफा तरीके से इस द्विपक्षीय समझौते को स्थगित नहीं रख सकता। इस्लामाबाद ने इसी कानूनी आदेश का हवाला देकर सुरक्षा परिषद के आधिकारिक रिकॉर्ड में अपना रुख दर्ज कराया है।

कूटनीतिक स्तर पर यह कोई पहला प्रयास नहीं है। इससे पहले भी पाकिस्तान ने अप्रैल 2025, जून 2025 तथा अप्रैल 2026 में सुरक्षा परिषद को इसी जल संधि के संदर्भ में पत्र लिखे थे। इन पत्रों का तात्कालिक मकसद स्पष्ट रूप से यही है कि संयुक्त राष्ट्र इस बात का संज्ञान ले कि भारत ने संधि को रोक रखा है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र में किसी विषय पर औपचारिक शिकायत दर्ज कराना और उस विश्व संस्था से कोई बाध्यकारी कार्रवाई करवा लेना, दोनों पूरी तरह अलग-अलग बातें हैं।

## सिंधु जल समझौते पर बढ़ते तनाव की मूल वजहें
वर्ष 1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों तक युद्ध और गंभीर भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद कायम रहा था। हालांकि, पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने इस ऐतिहासिक संधि को एक निश्चित अवधि के लिए स्थगित यानी निलंबित करने की आधिकारिक घोषणा कर दी। भारत ने उस समय पूरी दृढ़ता से स्पष्ट किया था कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार से होने वाले आतंकवाद को पूरी तरह, विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से समाप्त नहीं करता, तब तक यह रोक प्रभावी रहेगी।

पाकिस्तान ने भारत के इस रणनीतिक कदम का कड़ा विरोध करते हुए इसे अवैध बताया और कहा कि द्विपक्षीय समझौते को कोई एक पक्ष अकेले निलंबित नहीं कर सकता। सितंबर 2026 में हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह समझौता अब भी लागू है और भारत का इसे स्थगित रखने का निर्णय संधि व अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत स्वीकार्य नहीं है। इसके जवाब में भारत ने मध्यस्थता अदालत की पूरी कार्यवाही को सिरे से खारिज कर दिया और स्पष्ट कर दिया कि वह इस मामले में उक्त पंचाट के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं करता है।

## क्या संयुक्त राष्ट्र भारत को पानी छोड़ने का निर्देश दे सकता है?
संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर पानी का रोना रोने से पाकिस्तान को मैदानी स्तर पर कोई व्यावहारिक राहत मिलने की संभावना नहीं है। सिंधु जल समझौते के मूल दस्तावेज में विवादों के निपटारे की अपनी एक स्वायत्त और पूर्व-निर्धारित त्रि-स्तरीय कानूनी व्यवस्था बनाई गई है। मतभेदों और विवादों की प्रकृति के अनुसार दोनों देशों के बीच आपसी द्विपक्षीय वार्ता, निष्पक्ष विशेषज्ञ की नियुक्ति अथवा मध्यस्थता अदालत के गठन का प्रावधान है, जिसमें विश्व बैंक की एक निश्चित और परिभाषित भूमिका तय की गई है।

इस कानूनी स्थिति के कारण संयुक्त राष्ट्र महासभा के पास ऐसा कोई प्रत्यक्ष अधिकार नहीं है कि वह एक सामान्य प्रस्ताव पारित करके भारत को पाकिस्तान की ओर पानी छोड़ने का कानूनी आदेश दे सके। विश्व संस्था का सामान्य मंच जल बंटवारे की इस तकनीकी और द्विपक्षीय संधि की कानूनी धाराओं को दरकिनार करके कोई जबरन निर्देश जारी नहीं कर सकता।

## कश्मीर के सवाल पर अंतरराष्ट्रीय मंचों का पुराना रुख
पानी के विवाद के साथ-साथ पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर के मसले को भी संयुक्त राष्ट्र में लगातार उठाता आ रहा है। अगस्त 1947 में विभाजन और आजादी के बाद उसी साल जम्मू और कश्मीर को लेकर दोनों देशों के बीच पहला सैन्य संघर्ष हुआ था। इसके उपरांत भारत स्वयं जनवरी 1948 में इस विवाद को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के समक्ष लेकर गया था। सुरक्षा परिषद ने अप्रैल 1948 में ऐतिहासिक प्रस्ताव 47 पारित किया, जिसमें क्षेत्र में शांति बहाली और जनमत संग्रह से जुड़ी प्रक्रियात्मक रूपरेखा सुझाई गई थी।

भारत का सुस्पष्ट और निरंतर रुख रहा है कि वर्ष 1972 के शिमला समझौते के तहत दोनों देशों के बीच के सभी लंबित मुद्दों को पूरी तरह द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से ही सुलझाया जाना चाहिए, जिसमें किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता पूरी तरह अस्वीकार्य है। इसके विपरीत, पाकिस्तान हर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के पुराने प्रस्तावों और उसके ऐतिहासिक दखल की दुहाई देकर तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप कराने की नाकाम कोशिश करता रहता है।

## क्षेत्रीय विवाद और जल बंटवारे के बुनियादी फर्क
कूटनीतिक विश्लेषण में इन दोनों मुद्दों के बीच का तकनीकी अंतर समझना बेहद महत्वपूर्ण है। कश्मीर का मसला संप्रभुता, सीमा और क्षेत्रीय नियंत्रण से जुड़ा भू-राजनीतिक विषय है, जबकि सिंधु जल संधि विशुद्ध रूप से छह साझा नदियों के जल प्रवाह के उपयोग और प्रबंधन से संबंधित एक तकनीकी और ढांचागत समझौता है।

संयुक्त राष्ट्र इन दोनों संवेदनशील मामलों पर चर्चा का अवसर दे सकता है, कूटनीतिक संवाद को सुगम बना सकता है और शांतिपूर्ण समाधान की अपील कर सकता है। लेकिन उसके पास ऐसा कोई न्यायिक अधिकार नहीं है कि वह भारत को अपनी क्षेत्रीय नीतियों में बदलाव करने अथवा पाकिस्तान के लिए अतिरिक्त जल छोड़ने का आदेश जारी कर सके। संयुक्त राष्ट्र ने ऐतिहासिक रूप से केवल प्रस्ताव पारित किए हैं और पर्यवेक्षक मिशन तैनात रखे हैं, जो किसी भी प्रकार से भू-भाग के मालिकाना हक को तय करने वाला अंतिम अदालती फैसला नहीं हो सकते। इसी प्रकार, जल संधि के विवाद निपटान तंत्र पर भी संयुक्त राष्ट्र का कोई प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है।

## कूटनीतिक दांवपेंच और ज़मीनी हकीकत
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ श्रीश के पाठक के अनुसार, शहबाज शरीफ का यह भाषण जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं लाएगा, बल्कि इसे देने वाले नेता की कमजोर राजनीतिक स्थिति को ही उजागर करेगा। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तानी नेतृत्व कश्मीर का जिक्र केवल पुरानी आदत और घरेलू राजनीति को साधने के लिए करता है। वहीं, सिंधु जल समझौते के मुद्दे पर शरीफ की बातें हताशा भरी हैं, क्योंकि उनकी सरकार के पास अपने कोई ठोस तर्क नहीं बचे हैं और वे एक विदेशी अदालत के शब्दों का सहारा लेने को विवश हैं। शांति के उद्देश्य से बने किसी भी वैश्विक मंच पर कोई भी देश अपने पड़ोसी के खिलाफ सीमा पार हिंसा को जारी रखते हुए समझौते की उम्मीद नहीं कर सकता। दिल्ली इसे आतंकी गतिविधियों का तार्किक परिणाम मानती है, जबकि इस्लामाबाद इसे रुकावट बताता है।

## इसका आप पर असर
भारत द्वारा सिंधु जल समझौते को स्थगित रखे जाने और संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के कूटनीतिक पत्रों का सीधा असर क्षेत्रीय सुरक्षा नीतियों और जल प्रबंधन की प्राथमिकताओं पर पड़ता है।

- **भारत में:** सीमा पार आतंकवाद पर नकेल कसने के लिए भारत की सख्त कूटनीतिक स्थिति पूरी तरह बरकरार रहेगी। आम नागरिकों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच के बयानों का कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
- **जम्मू और कश्मीर में:** रणनीतिक जल परियोजनाओं और बांधों के निर्माण की दिशा में भारतीय योजनाएं बिना किसी तीसरे पक्ष के दबाव के आगे बढ़ सकेंगी। स्थानीय प्रशासन को सीमा पार से आने वाले अशांति के प्रयासों के खिलाफ कड़े सुरक्षा उपायों का लगातार समर्थन मिलता रहेगा।
- **कृषि और जल आपूर्ति:** उत्तरी राज्यों में जल संसाधनों के समुचित उपयोग और घरेलू भंडारण क्षमताओं को बढ़ाने की योजनाएं मजबूती से जारी रहेंगी। किसानों को नदियों के प्रवाह में किसी अप्रत्याशित बाहरी हस्तक्षेप की चिंता करने की आवश्यकता नहीं होगी।
- **कूटनीतिक स्तर:** अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की मांग खारिज होने से भारत का द्विपक्षीय रुख और पुख्ता होगा। पाकिस्तान द्वारा बार-बार पत्र भेजने के बावजूद वैश्विक मंचों से भारत पर कोई बाध्यकारी कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।

## ऐसा क्यों हुआ
पाकिस्तान द्वारा संयुक्त राष्ट्र में ताजा पत्र भेजने और कश्मीर तथा जल समझौते का मुद्दा उठाने के पीछे हालिया कानूनी घटनाक्रम और घरेलू राजनीतिक दबाव प्रमुख कारण हैं। भारत द्वारा आतंकवाद के खिलाफ उठाए गए कड़े कदमों ने इस्लामाबाद को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समर्थन तलाशने के लिए मजबूर किया है।

- **पहलगाम आतंकी हमला:** पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए अप्रैल 2025 में सिंधु जल समझौते को स्थगित कर दिया था। भारत ने शर्त रखी थी कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह और अपरिवर्तनीय रूप से बंद नहीं करता, यह रोक जारी रहेगी।
- **मध्यस्थता अदालत का हालिया फैसला:** हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता अदालत ने 31 अगस्त 2026 को कहा था कि 1960 की संधि अभी भी प्रभावी है और भारत का इसे रोकना अनुचित है। पाकिस्तान इसी कानूनी आदेश को ढाल बनाकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सामने अपना पक्ष मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
- **संयुक्त राष्ट्र महासभा का कूटनीतिक मंच:** 25 सितंबर को प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के संबोधन से पहले पाकिस्तान वैश्विक ध्यान खींचने के लिए जल और कश्मीर दोनों मसलों को एक साथ उछालने की पुरानी रणनीति पर काम कर रहा है। सुरक्षा परिषद में पहले से लंबित याचिकाओं के जरिए वह भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है।

## सवाल-जवाब

### 1. पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को ताजा पत्र क्यों लिखा है?
पाकिस्तान ने 31 अगस्त 2026 को मध्यस्थता अदालत के उस फैसले के बाद पत्र लिखा है जिसमें 1960 की जल संधि को प्रभावी बताया गया था, ताकि भारत द्वारा समझौते को स्थगित रखने पर आपत्ति दर्ज कराई जा सके।

### 2. भारत ने सिंधु जल समझौते को कब और क्यों स्थगित किया था?
भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद अप्रैल 2025 में इस समझौते को स्थगित कर दिया था और कहा था कि सीमा पार आतंकवाद पूरी तरह खत्म होने तक यह निर्णय लागू रहेगा।

### 3. क्या संयुक्त राष्ट्र भारत को पाकिस्तान के लिए पानी छोड़ने का आदेश दे सकता है?
नहीं, संयुक्त राष्ट्र महासभा के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है क्योंकि सिंधु जल समझौते के तहत विवाद समाधान का अपना स्वतंत्र तंत्र और विश्व बैंक की तय भूमिका है।

### 4. कश्मीर मसले पर भारत का आधिकारिक रुख क्या है?
भारत का स्पष्ट रुख है कि 1972 के शिमला समझौते के तहत पाकिस्तान के साथ सभी विवादों को किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के बिना केवल द्विपक्षीय बातचीत से हल किया जाना चाहिए।

### 5. मध्यस्थता अदालत के फैसले पर भारत की क्या प्रतिक्रिया रही?
भारत ने मध्यस्थता अदालत की कार्यवाही को पूरी तरह खारिज कर दिया है और इस विवाद में उस अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं करता है।

### 6. शहबाज शरीफ संयुक्त राष्ट्र महासभा को कब संबोधित करेंगे?
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का संयुक्त राष्ट्र महासभा में संबोधन 25 सितंबर को निर्धारित है।

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