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  "type": "article",
  "title": "त्रिशूल की तबाही: 30 हजार आबादी वाला पूरा नेपाली कस्बा मलबे में दफन",
  "summary": "नेपाल के त्रिशूल कस्बे में हिमनद फटने के बाद अचानक आई बाढ़ से करीब 30 हजार लोगों की आबादी संकट में है और मलबे के नीचे पूरा बाजार और बुनियादी ढांचा ढह गया है। राहत कार्यों में भूभाग और मौसम की बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।",
  "content": "पानी ने सब कुछ अपनी आगोश में ले लिया और पीछे केवल बर्बादी, नुकसान और लाचारी छोड़ गया। नेपाल के नुवाकोट जिले में स्थित त्रिशूल नाम का पर्वतीय कस्बा अब पूरी तरह से कीचड़ और मलबे के नीचे दब चुका है। गत 26 अगस्त को हिमनद फटने से अचानक आए सैलाब ने इस पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लिया। लगभग 30 हजार की आबादी वाले इस क्षेत्र में कभी चहल-पहल से भरा बाजार हुआ करता था, लेकिन अब वहां केवल चट्टानें और गाद ही नजर आती हैं। सड़कें पूरी तरह गायब हो चुकी हैं और घर, दुकानें, स्कूल, अस्पताल, वन विभाग का कार्यालय तथा बैंक सब कुछ मलबे के ढेर में तब्दील हो चुके हैं। इस भयंकर आपदा के बाद जो लोग जिंदा बचने में कामयाब रहे, वे इस समय सेना के एक शिविर में शरण लिए हुए हैं। अभी बड़े पैमाने पर बचाव अभियान शुरू होना बाकी है और जिन परिवारों के लोग अब भी लापता हैं, वे हाथों में तस्वीरें थामे हर मिलने वाले से अपनों का पता पूछ रहे हैं।\n\n \n\nकाठमांडू से त्रिशूल तक का सफर और तबाही का मंजर\n\nकाठमांडू से लगभग 70 किलोमीटर की दूरी तय करके तीन घंटे के सफर के बाद जब टीम मौके पर पहुंची, तो सबसे पहली आवाज नदी की तेज गड़गड़ाहट की सुनाई दी। पानी आज भी भारी वेग के साथ बह रहा है। यह कस्बा आसपास के ग्रामीण इलाकों और पर्वतीय बस्तियों के लोगों के लिए मुख्य व्यापारिक केंद्र था। इसके अलावा यह काठमांडू के रास्ते कैलाश मानसरोवर जाने वाले मार्ग पर भी स्थित है। इस तबाही के सही पैमाने को समझने के लिए केवल मलबे को देखना काफी नहीं है, बल्कि उन 20 से 30 मिनटों में जाना होगा जब यहां के लोगों को बाढ़ आने की चेतावनी मिलने के बाद भागने को कहा गया था। सायरन बज रहे थे और पुलिसकर्मी लोगों को ऊंचे स्थानों पर जाने के निर्देश दे रहे थे। कुछ लोग तुरंत भाग निकले, जबकि कुछ लोग पीछे रुके रहे। कई लोग अपने सामान समेटने में लग गए, कुछ जरूरी कागजात उठाने लगे तो कुछ लोग अपनी नकदी बचाने की कोशिश करने लगे। कई लोगों को लगा कि पानी हमेशा की तरह बढ़ेगा और फिर उतर जाएगा, लेकिन कुछ ही पलों में पानी और मलबा बाजार तक पहुंच गया।\n\n \n\nस्थानीय लोगों और चश्मदीदों की जुबानी आपदा की कहानी\n\nत्रिशूल बाजार में दुकान चलाने वाले सुजान उन भाग्यशाली लोगों में शामिल हैं जो जान बचाने में सफल रहे। कस्बे के पास ही त्रिशूल नदी बहती है और इस कस्बे का नाम भी उसी नदी के नाम पर पड़ा है। यहां पहले भी बाढ़ जैसी स्थितियां आ चुकी हैं। सुजान ने बताया कि उस दिन सुबह करीब 9 से 9:30 बजे के बीच अचानक बाढ़ का पानी आ गया था और उससे पहले भी पुलिस लोगों को वहां से हटने के लिए लगातार कह रही थी। उनके मुताबिक चेतावनी मिलने के बाद लोगों के पास लगभग 15 से 20 मिनट का वक्त था। जो लोग वहां से भाग गए, वे बच गए लेकिन जो लोग यह सोचकर रुक गए कि थोड़ा सा पानी आएगा और चला जाएगा, वह विश्वास उनके लिए घातक साबित हुआ। लोगों ने पहले भी नदी का जलस्तर कई बार बढ़ते देखा था। आमतौर पर पानी पुल के नीचे से निकल जाता था और इस बार भी लोगों को यही उम्मीद थी। सुजान का कहना है कि दो-तीन पुलिसकर्मी लोगों को पुल से हटाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वे अपनी गाड़ी समेत बह गए।\n\n \n\nअलग-अलग बयानों में छिपी है हादसे की भयावहता\n\nमनोज चौधरी उस समय एक गोदाम में सामान लादने का काम कर रहे थे, जब उन्हें त्रिशूल से ऊपर की तरफ स्थित रसुवागढ़ी से फोन आया। उन्होंने बताया कि जिन लोगों के साथ वे काम करते हैं, उन्होंने ऊपर से फोन करके एक भयंकर बाढ़ आने की सूचना दी थी, जिससे उन्हें करीब एक घंटा पहले ही जानकारी मिल गई थी और वे पहाड़ों की तरफ भागकर सुरक्षित स्थान पर पहुंच गए। उधर, ब्रजेश कुमार उस दिन काम पर नहीं थे और अपने कमरे में सो रहे थे, तभी उनके मकान मालिक ने आकर उन्हें तुरंत बाहर निकलने को कहा। उन्होंने सोचा कि मकान मालिक मजाक कर रहे हैं, लेकिन जब बाहर शोरगुल सुना और पुलिस की आवाजें आईं तो वे बाहर निकले और महज 30 मीटर की दूरी पर देखा कि घर और दुकानें बह चुकी हैं। तामांग नाम के एक अन्य स्थानीय निवासी ने बताया कि पानी टेलीविजन पर दिखने वाले दृश्यों की तरह भयानक रफ्तार से आया था और किसी के पास भी भागने का पर्याप्त समय नहीं था। कई युवा जो कस्बे के एक कैंपस में ठहरे हुए थे और छुट्टियों के बाद घर जाने वाले थे, वे पुल पर बैठकर पानी का वीडियो बनाने लगे और देखते ही देखते सभी सैलाब में समा गए।\n\n \n\nसंचार सेवाओं का ठप होना और सेना का राहत अभियान\n\nमोबाइल नेटवर्क पूरी तरह ठप हो जाने और कई गांवों तक पहुंच न होने के कारण परिवार अपने प्रियजनों की तलाश में जुटे हुए हैं। पास ही नेपाल सेना और अन्य सुरक्षा बलों का एक शिविर बना हुआ है, जहां मलबे से निकाले जाने वाले शवों को एक जगह पर रखा जा रहा है। नेपाल टेलीकॉम के एक अधिकारी नवराज राय माझी काठमांडू से एक टीम के साथ वहां पहुंचे और बताया कि बाढ़ के बाद बिजली आपूर्ति ठप हो गई थी और मोबाइल टावर बंद हो गए थे। नेपाल सेना के हेलीकॉप्टर काठमांडू से ईंधन और जनरेटर लेकर पहुंचे, जिससे मोबाइल नेटवर्क को बहाल करने का काम शुरू किया जा सका। हालांकि, इस बचाव अभियान के सामने सबसे बड़ी चुनौती दुर्गम भूभाग की है। लगातार बारिश, अवरुद्ध सड़कें और ऊंचे पहाड़ प्रभावित इलाकों तक पहुंचना मुश्किल बना रहे हैं। जिन जगहों पर हेलीकॉप्टर उतर सकते हैं, वहां राहत सामग्री जल्दी पहुंच जाती है, लेकिन जहां उतरने की जगह नहीं है, वहां बचाव दलों को पहले पहाड़ों पर पहुंचना पड़ता है और फिर नीचे उतरना होता है।\n\n \n\nलंबा अनुभव और परिवारों पर टूटा दुखों का पहाड़\n\nइस बड़ी तबाही के बीच उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के मूल निवासी अशोक कुमार चौबे से मुलाकात हुई, जो पिछले 20 वर्षों से त्रिशूल में कपड़ों का कारोबार चला रहे थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी, दो बच्चे, भाई, भाभी और भतीजे थे। इस आपदा में उनकी भाभी और 18 साल का भतीजा नदी के तेज बहाव में बह गए। अशोक ने बताया कि सब कुछ ठीक चल रहा था और वे वहां अपनी आजीविका चला रहे थे, लेकिन उस दिन पानी इतनी तेजी से आया कि सोचने तक का मौका नहीं मिला। उनकी छह दुकानें थीं और वे सभी पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं। नेपाल में इस आपदा की वजह से अब तक कम से कम 669 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि तिब्बत में सात मौतें होने की पुष्टि हुई है। इसके अलावा करीब 2,500 लोग अभी भी लापता हैं, जिनमें 320 भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। वहीं, 400 अन्य भारतीय नागरिक अब भी तिब्बत में फंसे हुए हैं।\n\nइसका आप पर असर\nनेपाल के त्रिशूल में आए विनाशकारी सैलाब और बाढ़ का असर सीमावर्ती क्षेत्रों तथा राहत एवं बचाव कार्यों से जुड़े तमाम पहलुओं पर सीधा पड़ा है।\n\n• भारत में: आपदा की चपेट में आए सैकड़ों भारतीय नागरिकों के परिवारों और उनके प्रवासियों पर सीधा असर पड़ा है, क्योंकि इस हादसे में 320 भारतीय लापता बताए जा रहे हैं और 400 अन्य तिब्बत में फंसे हुए हैं। इससे सीमा पार यात्रा और व्यापारिक गतिविधियों पर भी अस्थायी रोक लग गई है।\n\n• उत्तरी राज्यों में: उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे नेपाल सीमा से सटे राज्यों के कई परिवारों के लोग वहां रोजगार या व्यापार करते हैं, जिससे उनके संरक्षकों और परिजनों में गहरी चिंता और अनिश्चितता का माहौल बन गया है।\n\n• स्थानीय स्तर पर: नुवाकोट जिले के त्रिशूल कस्बे में 30 हजार लोगों की आबादी पूरी तरह विस्थापित हो गई है, जिनके घर, बाजार और बुनियादी सेवाएं नष्ट हो चुकी हैं और वे सेना के शिविरों में शरण लेने को मजबूर हैं।\n\n• यातायात और संपर्क: काठमांडू से कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग और स्थानीय संपर्क मार्ग पूरी तरह बाधित हो गए हैं, जिससे तीर्थयात्रियों और स्थानीय लोगों की आवाजाही ठप पड़ गई है।\n\n• संचार सेवाएं: बिजली आपूर्ति और मोबाइल नेटवर्क पूरी तरह ध्वस्त होने से प्रभावित परिवारों को अपनों की सुइयां और हालचाल जानने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।\n\n• राहत एवं पुनर्वास: दुर्गम भूभाग और लगातार बारिश के कारण राहत सामग्री पहुंचाने में हो रही देरी से जीवन रक्षा और बुनियादी जरूरतों की आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. त्रिशूल में आपदा कब आई थी?\nत्रिशूल में अचानक बाढ़ 26 अगस्त को आई थी।\n\n2. इस आपदा का मुख्य कारण क्या था?\nयह आपदा ऊपरी क्षेत्रों में हिमनद फटने के कारण आई थी।\n\n3. त्रिशूल कस्बे की अनुमानित आबादी कितनी थी?\nत्रिशूल कस्बे में लगभग 30,000 लोग रहते थे।\n\n4. नेपाल में इस आपदा से अब तक कुल कितनी मौतें हुई हैं?\nनेपाल में इस आपदा के कारण अब तक कम से कम 669 लोगों की जान जा चुकी है।\n\n5. इस आपदा में कितने भारतीय नागरिक लापता हैं?\nइस आपदा में लगभग 320 भारतीय नागरिक लापता बताए जा रहे हैं।\n\n6. तिब्बत में कितने भारतीय नागरिक फंसे हुए हैं?\nतिब्बत में 400 भारतीय नागरिक अब भी फंसे हुए हैं।\n\n7. त्रिशूल में जीवित बचे लोगों को कहां ठहराया गया है?\nबाढ़ से बचे हुए लोग इस समय एक सेना के शिविर में रह रहे हैं।\n\n8. अशोक कुमार चौबे त्रिशूल में क्या काम करते थे?\nअशोक कुमार चौबे त्रिशूल में पिछले 20 वर्षों से कपड़ों का कारोबार चला रहे थे।",
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  "category": "पड़ताल",
  "publishedAt": "2026-08-30",
  "tags": [
    "त्रिशूल बाढ़",
    "नेपाल आपदा",
    "नुवाकोट जिला",
    "हिमनद बाढ़",
    "लापता लोग"
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  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
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