मध्य पूर्व में बारूदी तनाव: अमेरिकी मध्यावधि मतदान के तुरंत बाद ईरान पर सबसे बड़े सैन्य प्रहार की आशंका मतदान प्रक्रिया खत्म होते ही वॉशिंगटन की ओर से तेहरान पर अब तक की सबसे भीषण सैन्य कार्रवाई शुरू होने की आशंका गहराई है, जबकि ईरानी सेना भी नए हथियारों के साथ जवाबी वार की तैयारी में जुटी है। अमेरिकी सियासी हलकों में मध्यावधि चुनाव प्रक्रिया के समापन के साथ ही मध्य पूर्व में एक अभूतपूर्व सैन्य टकराव की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी लड़ाकू दस्तों, युद्धपोतों और घातक एयर डिफेंस प्रणालियों की रिकॉर्ड तैनाती इस बात का सीधा संकेत दे रही है कि किसी भी क्षण तेहरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर हवाई और मिसाइल अभियान छेड़ा जा सकता है। इससे पहले 8 अक्टूबर के अपने संबोधन में डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया था कि मतदान पूरा होने से पूर्व वाशिंगटन सैन्य कार्रवाई का कदम नहीं उठाएगा। हालांकि अब वह सार्वजनिक तौर पर कह रहे हैं कि यह पूरा मामला बहुत जल्द खत्म होने जा रहा है, जिससे कयास लगाए जा रहे हैं कि 4 नवंबर से यह व्यापक हमला जमीन पर उतर सकता है। पेंटागन के रणनीतिकारों ने इस संभावित सैन्य मुहिम को लेकर अपनी तैयारियां अंतिम चरण में पहुंचा दी हैं। ट्रंप के तीखे तेवर और 96 घंटे की सैन्य मोहलत बीते एक सप्ताह के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक बयानों के जरिए तेहरान को लगातार चार बार खुली चेतावनी जारी की है। फ्लोरिडा में 23 अक्टूबर को आयोजित चुनावी जनसभा में उन्होंने स्पष्ट कहा कि हम एक और एपिक फ्यूरी जैसी कार्रवाई को अंजाम देंगे। यह नाम फरवरी 2026 में ईरान पर हुए संयुक्त अमेरिकी और इजरायली हमले को दिया गया था। ट्रंप ने आगे जोड़ा कि यदि ईरानी नेतृत्व समझदारी दिखाता है तो समझौते की मेज पर आएगा, लेकिन उन्हें ऐसा होने की उम्मीद नहीं दिखती। इसके बाद 25 अक्टूबर को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने स्थिति को निर्णायक बताते हुए कहा कि अब केवल एक ही सवाल बाकी है कि क्या समझौता किया जाए या फिर ईरान को पूरी तरह तबाह कर दिया जाए। उनका तर्क था कि अमेरिका खेल नहीं खेलता और ईरान को नष्ट करना बेहद सरल कार्य है। तेहरान पर हमले की संभावना पर जब 28 अक्टूबर को पत्रकारों ने सवाल पूछे, तो ट्रंप ने कहा कि कुछ भी हो सकता है क्योंकि वे समझौते को जबरन खींच रहे हैं जिसका कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकलेगा। 30 अक्टूबर के एक अन्य बयान में उन्होंने दोहराया कि सब कुछ बहुत जल्द समाप्त होने वाला है और वे परमाणु हथियारों से मुक्त ईरान का निर्माण करने जा रहे हैं। सैन्य योजनाओं की गोपनीयता पर व्हाइट हाउस के एक प्रशासनिक प्रतिनिधि ने स्पष्ट किया कि संभावित या गैर-मौजूद संवेदनशील सैन्य योजनाओं पर टिप्पणी नहीं की जाती, लेकिन राष्ट्रपति यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि ईरान कभी परमाणु हथियार हासिल न कर सके, इसलिए सभी विकल्प पूरी तरह खुले रखे गए हैं। मध्य पूर्व में तैनात केंद्रीय कमान के सैन्य हलकों से जुड़े दो अधिकारियों ने संकेत दिया है कि सर्वोच्च कमांडर का आदेश मिलते ही सेना महज 96 घंटे के भीतर अपने इतिहास का सबसे बड़ा अभियान शुरू करने में सक्षम है। सैन्य रणनीतिकारों के अनुसार यह हमला केवल रडार तंत्र या मिसाइल प्रक्षेपण केंद्रों तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि इसका दायरा कहीं अधिक संहारक और व्यापक होगा। योजनाकारों ने जो संभावित सूची बनाई है, उसमें ईरानी ऊर्जा के बुनियादी ढांचे, रणनीतिक सैन्य अड्डे और संवेदनशील परमाणु केंद्र सबसे ऊपर रखे गए हैं। खाड़ी में व्यापक युद्ध जमावड़ा और कूटनीतिक हलचल अरब की खाड़ी में अमेरिकी उपस्थिति को रिकॉर्ड स्तर पर मजबूत किया जा रहा है। सैन्य ठिकानों पर भारी संख्या में सैनिकों की आमद के अलावा पैट्रियट मिसाइल रोधी प्रणालियां और आधुनिक लड़ाकू विमान तैनात किए जा चुके हैं। इसके साथ ही एक पूरा विमानवाहक पोत हमलावर दस्ता और 20 जंगी जहाज खाड़ी के जलक्षेत्र में मोर्चा संभाल चुके हैं। अमेरिकी प्रशासन ने कूटनीतिक और रक्षा संपर्कों के माध्यम से खाड़ी सहयोगियों को पहले ही सतर्क कर दिया है कि वे ईरान के खिलाफ एक संक्षिप्त लेकिन बेहद आक्रामक व तेज सैन्य अभियान का सामना करने के लिए तैयार रहें। हालात की गंभीरता को देखते हुए ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब में तैनात सभी गैर-जरूरी सरकारी कर्मचारियों और उनके आश्रितों को तुरंत स्वदेश लौटने के निर्देश जारी कर दिए हैं। राजधानी रियाद में स्थित अमेरिकी दूतावास के समूचे गैर-आवश्यक कर्मचारियों को पहले ही वापस बुलाया जा चुका है। खाड़ी के कई अन्य देशों में भी तैनात अमेरिकी अमले की संख्या में कटौती करने के सख्त फरमान दिए गए हैं। इजरायल के भीतर 27 अक्टूबर को हुए चुनावों से ठीक पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ईरान पर धावा बोलने के पक्ष में थे, लेकिन उस समय ट्रंप ने इस सैन्य कदम को हरी झंडी देने से इनकार कर दिया था। ईरानी सेना का पलटवार का दावा और नए हथियारों का जखीरा अमेरिकी दबाव के बावजूद ईरानी सेना और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) पीछे हटने के मूड में नहीं दिखते। आईआरजीसी के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल हुसैन मोहेबी ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि बीते 40 दिनों के संघर्ष के दौरान ईरान ने अपनी पूरी सैन्य ताकत का इस्तेमाल ही नहीं किया था। उनका कहना है कि सेना युद्ध के अगले चरण के लिए पूरी तरह मुस्तैद है और इस बार ऐसे नए व अप्रत्याशित हथियार मैदान में उतारे जाएंगे जो विरोधी खेमे को हैरान कर देंगे। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने 30 सितंबर को बयान दिया था कि अमेरिकी हमलों ने ईरान की सैन्य औद्योगिक क्षमता को पूरी तरह जमींदोज कर दिया है। इसके विपरीत 22 अक्टूबर को ईरानी प्रवक्ता हुसैन मोहेबी ने दावा किया कि ईरान का मिसाइल भंडार जून 2025 की तुलना में 1.5 गुना अधिक हो चुका है। इसके अतिरिक्त ईरान अपने एक गोपनीय महाहथियार को दागने की तैयारी में है जिसे 'फादर ऑफ ऑल बॉम्ब्स' कहा जा रहा है, हालांकि इसकी वास्तविक मारक क्षमता और तकनीक के बारे में बाहरी दुनिया को कोई ठोस जानकारी नहीं है। फरवरी में हुए हमलों से पूर्व ईरान के पास 420 मिसाइल लॉन्चर मौजूद थे, जिनमें से 400 आज भी पूरी तरह काम कर रहे हैं। मिसाइलों और ड्रोन का घरेलू उत्पादन लगातार जारी है और देश की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता 75 प्रतिशत के स्तर पर बरकरार है। ताकत की नुमाइश के तौर पर 11 अक्टूबर को आईआरजीसी ने करीब 30 मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का सफल परीक्षण भी किया था। मॉस्को और बीजिंग की परोक्ष मदद क्षेत्रीय समीकरणों में ईरान को बाहरी महाशक्तियों का कूटनीतिक और साजोसामान संबंधी सहयोग भी मिल रहा है। प्राप्त विवरणों के अनुसार रूस न केवल ईरान को अत्याधुनिक मिसाइलों की आपूर्ति कर रहा है, बल्कि अमेरिकी जहाजों और सैन्य चौकियों की सटीक भौगोलिक स्थिति तलाशने में भी तेहरान की मदद कर रहा है। यमन में सक्रिय ईरान समर्थित हूती विद्रोही सऊदी अरब पर सटीक हमले करने के लिए रूसी उपग्रह नेविगेशन नेटवर्क का सहारा ले रहे हैं। दूसरी ओर चीन की ओर से भी ड्रोन और मिसाइल विनिर्माण से जुड़ा जरूरी सामान तेहरान पहुंचता रहा है। जून 2026 तक चीन से ईरान के लिए 1,300 ऐसी खेपें भेजी जा चुकी हैं, जिनमें हाई-टेक जीपीएस सिस्टम, इलेक्ट्रिक मोटर और विमानों में लगने वाले इंजन शामिल थे। इस बाहरी मदद ने ईरान को अपनी सैन्य आपूर्ति श्रृंखला को फिर से खड़ा करने में काफी मदद पहुंचाई है। आक्रामक रणनीति और जलमार्गों पर चौतरफा घेराबंदी ईरानी रणनीतिकारों ने अब अपनी रक्षा नीति को बदलते हुए आक्रामक और असममित युद्ध सिद्धांत पर काम करना शुरू किया है। इस सिद्धांत का सीधा अर्थ है कि विरोधी के हमले का इंतजार करने और फिर प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले ही वार किया जाए, साथ ही किसी एक मोर्चे के बजाय एक साथ कई अलग-अलग दिशाओं से जंग छेड़ दी जाए। वाशिंगटन ने होर्मुज जलडमरूमध्य की पूर्ण नाकाबंदी कर रखी है, जिसके जवाब में हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के मुहाने पर स्थित रणनीतिक बाब-अल-मंदेब जलमार्ग पर अपना शिकंजा कस दिया है। हूती लड़ाके सऊदी अरब के तेल संयंत्रों और नागरिक बुनियादी ढांचों पर लगभग हर रोज हमले कर रहे हैं। वे सऊदी एयर डिफेंस नेटवर्क को चकमा देने के लिए एक साथ कई ड्रोन, क्रूज मिसाइलें और बैलिस्टिक हथियार दागने की तकनीक अपना रहे हैं। इसी क्रम में 10 अक्टूबर को रियाद हवाई अड्डे पर किए गए एक बड़े मिसाइल व ड्रोन हमले में 10 लोगों की जान चली गई थी। हालांकि रणनीतिक मजबूती के बावजूद आर्थिक मोर्चे पर ईरान की हालत बेहद खस्ता हो चुकी है। बीते 10 वर्षों के कठोर आर्थिक प्रतिबंधों और हालिया युद्ध ने तेहरान की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। ईरानी सरकार के कुल बजट का एक-तिहाई हिस्सा तेल की बिक्री से आता है। जुलाई 2025 से ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नाकाबंदी के चलते सितंबर के दूसरे हफ्ते तक देश का तेल निर्यात घटकर लगभग शून्य पर पहुंच गया। इस आर्थिक झटके से ईरान को करीब 25 अरब डॉलर का सीधा वित्तीय नुकसान झेलना पड़ा है। देश में मुद्रास्फीति की दर 88.7 प्रतिशत के खतरनाक आंकड़े को छू चुकी है। नकदी के गंभीर संकट के कारण सरकार को ऊर्जा, विनिर्माण, निर्माण और सुरक्षा क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन और पेंशन तक पर रोक लगानी पड़ी है। टकराव का नतीजा और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा ईरान अब तक 20,000 से अधिक हमलों का सामना कर चुका है, लेकिन उसने झुकने के बजाय पलटवार किए हैं और वार्ता की मेज पर कड़ी शर्तें रखी हैं। रक्षा जानकारों का मानना है कि एक और सैन्य अभियान भी तेहरान को आसानी से घुटने टेकने पर मजबूर नहीं कर पाएगा। इजरायली खुफिया तंत्र के पूर्व अधिकारी डैनी सिट्रिनोविज का विश्लेषण है कि बमबारी से मौजूदा हुकूमत और ज्यादा कट्टरपंथी हो जाएगी तथा उसका मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम और तेज होगा। सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के विश्लेषक सेथ जोन्स के मुताबिक ट्रंप इस हमले के बाद त्वरित जीत का ऐलान कर सकते हैं और दावा करेंगे कि ईरान का परमाणु ढांचा कई साल पीछे धकेल दिया गया है, लेकिन हकीकत में ऐसा होना मुमकिन नहीं दिखता। फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के ईरान कार्यक्रम के निदेशक बेहनम बेन तालेब्लू का तर्क है कि यदि अमेरिका को मिसाइल कार्यक्रम से आपत्ति है तो उसे इसे स्पष्ट करना चाहिए और फिलहाल प्रतिबंधों व नाकाबंदी के रास्ते पर ही टिके रहना चाहिए। खुफिया विशेषज्ञ जोनाथन पैनिकोफ के अनुमान के अनुसार इस संकट के बेकाबू होकर बड़े युद्ध में बदलने की आशंका 55 प्रतिशत है, जबकि कूटनीतिक समाधान की संभावना मात्र 25 प्रतिशत है। करीब 10 प्रतिशत उम्मीद इस बात की है कि मौजूदा स्थिति जस की तस बनी रहेगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत में अन्य आकस्मिक परिस्थितियां शामिल हैं। यह सैन्य तनातनी पूरे पश्चिम एशिया के तेल प्रवाह को तहस-नहस कर सकती है। फरवरी में हुई बमबारी के बाद कच्चे तेल की कीमतें 72 डॉलर प्रति बैरल से छलांग लगाकर 120 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थीं, जिससे दुनिया भर में ईंधन संकट गहरा गया था। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का आकलन है कि वैश्विक बाजार में तेल की यह किल्लत 2027 तक खिंच सकती है। संभावित वैश्विक संकट को भांपते हुए ब्रिटेन ने अपने आम नागरिकों को आपात स्थिति से निपटने के लिए कम से कम तीन दिनों का भोजन और पीने का पानी जमा करने का परामर्श दिया है। उधर पेंटागन अपने प्रमुख अग्रिम सैन्य अड्डों को बिना किसी बाहरी आपूर्ति के लगातार 90 दिनों तक स्वतंत्र रूप से संचालित करने की तैयारी कर रहा है, जबकि यूरोपीय देश रूस-यूक्रेन संघर्ष के समय से ही आपातकालीन प्रोटोकॉल लागू करने में जुटे हैं। इसका आप पर असर मध्य पूर्व में छिड़ने वाले इस संभावित महायुद्ध का सीधा और तात्कालिक असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और आपकी दैनिक जीवन लागत पर पड़ेगा। • ईंधन की कीमतें: कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आने से भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से परिवहन लागत बढ़ेगी और रोजमर्रा के सामान महंगे होंगे। • रसोई गैस और बिजली: होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जलमार्ग बाधित होने से एलपीजी और प्राकृतिक गैस की घरेलू आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। सरकार को ऊर्जा सब्सिडी का बोझ बढ़ाना पड़ सकता है जिससे आम आदमी के बजट पर सीधा दबाव आएगा। • शेयर बाजार में गिरावट: युद्ध की आशंका से भारतीय शेयर बाजार और वैश्विक इक्विटी सूचकांकों में तेज बिकवाली देखने को मिल सकती है। अनिश्चितता के माहौल में निवेशक जोखिम वाली संपत्तियों से पैसा निकालकर सोने की तरफ रुख करेंगे। • खाड़ी में भारतीय कामगार: सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात सहित खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और नौकरियों पर खतरा मंडराएगा। वहां तैनात अमेरिकी दूतावासों द्वारा अमला वापस बुलाए जाने से नागरिक उड़ानों और यात्रा पर सख्त पाबंदियां लग सकती हैं। ऐसा क्यों हुआ यह संकट वाशिंगटन और तेहरान के बीच दशकों पुरानी रणनीतिक दुश्मनी, परमाणु समझौते के टूटने और हालिया सैन्य हमलों के बदले की भावना से उपजा है। • परमाणु कार्यक्रम पर गतिरोध: डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का मुख्य उद्देश्य ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु बम बनाने से रोकना है। बातचीत में लगातार हो रही देरी और तेहरान की सख्त शर्तों के कारण कूटनीतिक रास्ते पूरी तरह बंद होते दिख रहे हैं। • फरवरी 2026 के हमलों का सिलसिला: फरवरी में अमेरिका और इजरायल द्वारा चलाए गए एपिक फ्यूरी अभियान के बाद से दोनों पक्षों के बीच अघोषित युद्ध छिड़ा हुआ है। ईरान ने अपने मिसाइल भंडार को डेढ़ गुना बढ़ाकर जवाबी कार्रवाई की तैयारी की है, जिससे नया हमला अनिवार्य माना जा रहा है। • क्षेत्रीय जलमार्गों पर नाकाबंदी: अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी करने से ईरान का तेल निर्यात शून्य हो गया है और उसे 25 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। इस आर्थिक दमघोंटू स्थिति से उबरने के लिए ईरान अपने सहयोगियों के जरिए लाल सागर और खाड़ी में जवाबी हमले करा रहा है। • विदेशी हथियारों का प्रवाह: रूस और चीन से ड्रोन घटकों, मिसाइल तकनीक और उपग्रह नेविगेशन डेटा की आपूर्ति ने ईरान की सैन्य शक्ति को फिर से खड़ा कर दिया है। इसी बाहरी मदद ने तेहरान के हौसले बुलंद किए हैं और अमेरिका को निर्णायक सैन्य प्रहार करने पर मजबूर किया है। सवाल-जवाब 1. क्या अमेरिका 4 नवंबर के तुरंत बाद ईरान पर हमला कर सकता है? अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार मध्यावधि चुनाव समाप्त होते ही आदेश मिलने के 96 घंटों के भीतर सेना बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू करने के लिए तैयार है। 2. ट्रंप ने ईरान के खिलाफ क्या सख्त बयान दिए हैं? ट्रंप ने कहा है कि या तो ईरान के साथ समझौता होगा या उसे पूरी तरह नष्ट कर दिया जाएगा, और यह पूरा मामला बहुत जल्द खत्म होने जा रहा है। 3. युद्ध की स्थिति में ईरान के पास कितनी सैन्य तैयारी है? ईरान का दावा है कि उसका मिसाइल भंडार जून 2025 के मुकाबले 1.5 गुना बढ़ चुका है और उसके 400 मिसाइल लॉन्चर पूरी तरह सक्रिय हैं। 4. ईरान को किन देशों से सैन्य मदद मिल रही है? रूस ईरान को मिसाइलें और अमेरिकी जहाजों की सैटेलाइट लोकेशन दे रहा है, जबकि चीन ने ड्रोन और मिसाइल बनाने के लिए 1,300 खेपें भेजी हैं। 5. इस तनाव का वैश्विक तेल बाजार पर क्या असर पड़ेगा? फरवरी के हमलों के बाद कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया था, और विशेषज्ञों के अनुसार यह संकट 2027 तक तेल की कमी बनाए रख सकता है। 6. सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी नागरिकों के लिए क्या कदम उठाए गए हैं? रियाद स्थित अमेरिकी दूतावास के सभी कर्मचारियों और सऊदी अरब में तैनात गैर-जरूरी सरकारी अमले को वापस अमेरिका बुला लिया गया है। https://trendkia.com/investigations/us-iran-attack-plans-after-midterm-elections-trump-strategy-analysis-54016 TrendKia — Har trend, sabse pehle.