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  "type": "article",
  "title": "वोटर लिस्ट में बदलाव पर चुनाव आयोग में भारी रार, ज्ञानेश कुमार और साथी कमिश्नरों के बीच टकराव के 5 बड़े चेहरे",
  "summary": "मतदाता सूची संशोधन में कथित गड़बड़ियों और आंतरिक असहमतियों को लेकर निर्वाचन आयोग में आंतरिक खींचतान बढ़ गई है। ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर साथी कमिश्नरों ने 14 बार लिखित एतराज जताया है।",
  "content": "निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उपजा विवाद अब बेहद गंभीर मोड़ पर पहुंच चुका है। देश भर की मतदाता सूचियों में संशोधन के लिए चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर अभियान के बाद पैदा हुआ विवाद आयोग के भीतर ही दोफाड़ की स्थिति उजागर कर रहा है। शुरुआती मसौदे से लगभग 13 करोड़ से अधिक नाम कटने के बाद जहां राजनीतिक दलों ने तीखे आरोप लगाए, वहीं अब आयोग के आधिकारिक दस्तावेजों से साफ हुआ है कि अंदरूनी स्तर पर भी सब कुछ सामान्य नहीं था। दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 मौकों पर दर्जनों फैसलों पर कड़ा आधिकारिक एतराज दर्ज कराया। कई महत्वपूर्ण कदम तो ऐसे थे जिनकी जानकारी दोनों आयुक्तों को तब मिली जब वे आयोग के नाम पर पहले ही सार्वजनिक किए जा चुके थे।\n\nविवाद के केंद्र में खड़ी पांच बड़ी अनियमितताएं\nमतदाता सूची पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी और अधिकारों के अतिक्रमण के गंभीर आरोप सामने आए हैं। इन आपत्तियों में सबसे प्रमुख फॉर्म 6 के भीतर बिना विधायी मंजूरी के एक नई शर्त जोड़ना था। आमतौर पर 18 साल की उम्र पार करने वाले हर नए मतदाता को पंजीकरण के लिए फॉर्म 6 भरना पड़ता है। इस फॉर्म में अचानक एक अनिवार्य सवाल शामिल कर दिया गया कि क्या आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी का नाम किसी पिछले एसआईआर के तहत मतदाता सूची में मौजूद था या नहीं। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में स्पष्ट किया था कि बिना वैधानिक नियमों में संशोधन किए फॉर्म में मनमाना बदलाव नहीं किया जा सकता। संधू ने भी इस पर सहमति जताई और 13 अगस्त को लिखित आदेश देकर इस अवैध सवाल को तुरंत हटाने को कहा, लेकिन 21 सितंबर तक वह सवाल फॉर्म में जस का तस मौजूद रहा।\n\nदूसरा गंभीर मुद्दा जमीनी चुनाव अधिकारियों की डिजिटल पहुंच सीमित करने से जुड़ा है। हर विधानसभा या चुनावी क्षेत्र में स्थानीय मतदाता सूची तैयार करने का कानूनी अधिकार इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर यानी ईआरओ के पास होता है, जो सामान्य तौर पर संबंधित क्षेत्र के एसडीएम होते हैं। यह पूरा काम आयोग के विशेष सॉफ्टवेयर ईसीआईनेट पर होता है, जिसे पहले ईआरओनेट के नाम से जाना जाता था। अगस्त के महीने में कई राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों ने शिकायत दर्ज कराई कि फील्ड अधिकारियों को पोर्टल का पूरा नियंत्रण नहीं मिल पा रहा है। इस पर संधू ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी महानिदेशक सीमा खन्ना के पास वैधानिक अधिकारियों के काम की स्वतंत्रता और डिजिटल पहुंच को सीमित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।\n\nतीसरा बड़ा विवाद पश्चिम बंगाल में सामने आए लाखों बेनामी आवेदनों का है। राज्य में एसआईआर के दौरान 60 लाख मतदाताओं के आंकड़ों में तार्किक विसंगतियां पाई गई थीं। इसके बाद न्यायिक अधिकारियों ने पड़ताल की, लेकिन आयोग ने बाद में 27 लाख नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए। विवाद बढ़ने पर शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों वाले न्यायाधिकरणों को अपीलों की सुनवाई का जिम्मा सौंपा। आयोग ने अदालत को जानकारी दी कि कुल 38 लाख मामले लंबित हैं। इनमें से 22.21 लाख अपीलें उन नागरिकों की थीं जिनके नाम सूची से हट गए थे, जबकि 16.10 लाख अपीलें ऐसे मतदाताओं के खिलाफ की गई थीं जिन्हें न्यायिक अधिकारी पहले ही वैध मानकर शामिल कर चुके थे। चौंकाने वाली बात यह रही कि आयोग ने अदालत को यह नहीं बताया कि न्यायिक फैसलों के खिलाफ इन 16.10 लाख अपीलों को दायर करने वाला वास्तविक पक्ष कौन था।\n\nचौथी आपत्ति इसी रहस्यमयी अपील प्रक्रिया की वैधानिकता को लेकर उठी। आयोग ने अदालत में यह खुलासा नहीं किया कि इन अपीलों को दाखिल करने के लिए अधिकृत प्राधिकारी कौन था। संधू के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया की कोई पूर्व सूचना न तो उन्हें थी, न जोशी को और न ही पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्य निर्वाचन अधिकारी को। इसी बीच 25 मई 2026 को पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल को पद से हटाकर राज्य का मुख्य सचिव बना दिया गया, जिसके बाद नीलम मीना को नया सीईओ नियुक्त किया गया। संधू ने आयोग के अधिकारियों को पत्र लिखकर सवाल पूछा कि आखिर आयोग की तरफ से इन अपीलों को दायर करने का अधिकार किसे मिला था और इसकी इजाजत किसने दी थी।\n\nपांचवीं तकनीकी गड़बड़ी गोवा से सामने आई, जहां सॉफ्टवेयर की खामी के कारण पात्र नागरिकों के नाम सूची में नहीं जोड़े जा सके। शीर्ष अदालत ने 29 जनवरी को निर्देश दिया था कि तार्किक विसंगति वाले मामलों में नागरिकों को दस्तावेज पेश करने और अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए। गोवा के स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने सुनवाई पूरी करने और कागजात जांचने के बाद पाया कि 97 नागरिक पूरी तरह योग्य थे और उनका नाम अंतिम सूची में जुड़ना चाहिए था। हालांकि, ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर में ऐसा कोई विकल्प ही मौजूद नहीं था जिससे इन स्वीकृत नामों को दोबारा जोड़ा जा सके। गोवा के मुख्य निर्वाचन आयुक्त कार्यालय ने 11 से 17 फरवरी के बीच राज्य प्रभारी और वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त ज्ञानेश भारती को आठ बार चिट्ठी लिखकर सॉफ्टवेयर में रोलबैक विकल्प देने की मांग की। हर बार पत्र की प्रतिलिपि सीमा खन्ना को भी भेजी गई, लेकिन अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने तक कोई समाधान नहीं निकाला गया और वे 97 योग्य नागरिक वोट देने के अधिकार से वंचित रह गए।\n\nपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने इस पूरे प्रशासनिक संकट पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि निर्वाचन आयोग एक त्रिसदस्यीय वैधानिक संस्था है, यह मुख्य चुनाव आयुक्त का दूसरा नाम नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि बहुमत के बिना लिए गए फैसलों को कैसे लागू किया गया, फॉर्म 6 को नियमों के अनुरूप दोबारा तैयार किया जाए और ईसीआईनेट का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए ताकि ईआरओ अपने संसदीय अधिकारों का पूरी तरह इस्तेमाल कर सकें।\n\nइस खींचतान से जुड़े पांच प्रमुख किरदार\nइस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में पांच ऐसे वरिष्ठ प्रशासनिक चेहरे हैं, जिनकी भूमिकाएं और फैसले इस समय सार्वजनिक जांच के दायरे में हैं। इनमें सबसे पहला और प्रमुख नाम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का है, जिन पर बहुमत की अनदेखी कर मनमाने फैसले लेने के आरोप लग रहे हैं। आगरा से ताल्लुक रखने वाले ज्ञानेश कुमार केरल कैडर के 1988 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। आईआईटी कानपुर से बीटेक करने के बाद उन्होंने हार्वर्ड से पर्यावरण अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। वे मई 2022 से 31 जनवरी 2024 तक सहकारिता मंत्रालय में सचिव पद पर तैनात रहे। 15 मार्च 2024 को उन्हें और संधू को चुनाव आयुक्त बनाया गया था, जिसके बाद 19 फरवरी 2025 को राजीव कुमार के सेवानिवृत्त होने पर वे मुख्य चुनाव आयुक्त बने।\n\nअगस्त 2025 में जब राहुल गांधी ने वोट चोरी का आरोप लगाया था, तब ज्ञानेश कुमार ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि राहुल को हलफनामा देना होगा या देश से माफी मांगनी होगी, तीसरा कोई विकल्प नहीं है। ज्ञानेश संसदीय कार्य मंत्रालय में सचिव और वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के दौरान गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव थे, जहां उन्होंने प्रशासनिक बदलावों में अहम भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्त राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद गठित तीन सदस्यीय टीम का नेतृत्व करते हुए उन्होंने ट्रस्ट के गठन और सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन आवंटन की प्रक्रिया संभाली थी, जिसमें वे केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में नामित सदस्यों में शामिल रहे। 2007 से 2012 के दौरान वे रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव भी रहे। उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक निर्धारित है।\n\nदूसरे प्रमुख चेहरे चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू हैं, जिन्होंने आयोग के भीतर नियमों के उल्लंघन पर सबसे मुखर आवाज उठाई है। पंजाब से संबंध रखने वाले संधू उत्तराखंड कैडर के 1988 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। अमृतसर के सरकारी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री लेने के बाद उन्होंने इतिहास में परास्नातक और फिर कानून की पढ़ाई पूरी की। मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त बनने से पहले वे लोकपाल के सचिव रहे और जुलाई 2021 से जनवरी 2024 तक उत्तराखंड के मुख्य सचिव रहे। उन्होंने 2019 से 2021 तक भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अध्यक्ष और उच्च शिक्षा विभाग में अतिरिक्त सचिव के रूप में कार्य किया। वर्ष 2007 से 2014 के बीच वे तीन अलग-अलग दलों के चार मुख्यमंत्रियों के प्रमुख सचिव रहे। 2001 की जनगणना में अहम योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रपति पदक मिला था। आयोग के भीतर दर्ज 14 आधिकारिक आपत्तियों में से 7 आपत्तियां अकेले संधू ने और 2 आपत्तियां जोशी के साथ मिलकर दर्ज कराई थीं।\n\nतीसरे महत्वपूर्ण अधिकारी चुनाव आयुक्त विवेक जोशी हैं, जिन्होंने तकनीकी व विधिक आधार पर फैसलों पर असहमति जताई। हरियाणा कैडर के 1989 बैच के आईएएस अधिकारी जोशी ने 1987 में रुड़की विश्वविद्यालय (आईआईटी रुड़की) से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की और बाद में जिनेवा के ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट से अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री हासिल की। 19 फरवरी 2025 को चुनाव आयुक्त का पद संभालने से पहले वे हरियाणा के मुख्य सचिव रह चुके थे। इसके अलावा उन्होंने कपड़ा मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और वित्त मंत्रालय में सचिव के तौर पर जिम्मेदारी संभाली। वे हरियाणा के चार जिलों में डिप्टी कमिश्नर और डिविजनल कमिश्नर रहने के साथ भारतीय रिजर्व बैंक और भारतीय स्टेट बैंक के निदेशक मंडल के सदस्य भी रह चुके हैं।\n\nचौथी अहम शख्सियत निर्वाचन आयोग की सूचना प्रौद्योगिकी महानिदेशक सीमा खन्ना हैं, जो मतदाता सूची सॉफ्टवेयर के प्रबंधन को लेकर सवालों के घेरे में हैं। वर्ष 2025 में प्रतिनियुक्ति पर आयोग में आईटी महानिदेशक नियुक्त हुईं सीमा खन्ना ने इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री के बाद आईआईटी दिल्ली से सूचना सुरक्षा में पीएचडी की है। वे अप्रैल 2020 से 2025 तक राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र यानी एनआईसी में उप महानिदेशक के पद पर कार्यरत रहीं। 22 जनवरी 2026 को आयोग ने उनके नेतृत्व में 40 से अधिक पुराने एप्लिकेशनों को मिलाकर ईसीआईनेट लॉन्च किया था, जिसके बारे में खन्ना ने कहा था कि इससे पारदर्शिता और भरोसा मजबूत होगा। करीब 25 वर्षों का आईटी अनुभव रखने वाली सीमा खन्ना की कार्यशैली पर पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने फरवरी में तीखे आरोप लगाए थे। सॉफ्टवेयर को लेकर तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद साकेत गोखले द्वारा 17 अप्रैल को मांगी गई आरटीआई जानकारी को व्यापारिक गोपनीयता का हवाला देकर खारिज कर दिया गया था।\n\nपांचवें प्रमुख अधिकारी कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन हैं, जिन्हें चुनाव आयुक्तों द्वारा आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर औपचारिक पत्र भेजे गए। प्रशासनिक सेवा के सबसे शीर्ष पद पर 30 अगस्त 2024 को देश के 33वें कैबिनेट सचिव बने सोमनाथन तमिलनाडु कैडर के 1987 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट होने के साथ अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट सोमनाथन अप्रैल 2021 से अगस्त 2024 तक वित्त सचिव और दिसंबर 2019 से व्यय सचिव रहे। जुलाई 2017 में जीएसटी नीति के क्रियान्वयन में उनकी केंद्रीय भूमिका रही। 2011 से 2015 तक वॉशिंगटन में विश्व बैंक के निदेशक रहे सोमनाथन चेन्नई मेट्रो के पहले प्रबंध निदेशक और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि के सचिव भी रह चुके हैं। उनका मूल कार्यकाल 30 अगस्त 2026 को समाप्त होना था, जिसे सरकार ने एक साल का सेवा विस्तार दिया है।\n\nआगे की कानूनी राह और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं\nवर्ष 2023 में संसद द्वारा निर्वाचन आयुक्तों से संबंधित कानून में किए गए संशोधनों के बाद, आधिकारिक कर्तव्यों के पालन के दौरान आयुक्तों द्वारा कही या की गई किसी भी बात पर कोई आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इस विधिक सुरक्षा के कारण मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने का एकमात्र संवैधानिक रास्ता संसद के भीतर महाभियोग चलाना ही बचता है। विपक्षी दल संसद में महाभियोग का औपचारिक नोटिस लाने की तैयारी में जुटे हैं, हालांकि यह एक अत्यंत लंबी और जटिल संसदीय प्रक्रिया है। इससे पूर्व अप्रैल में भी ऐसा ही एक नोटिस लाया गया था, जिसे लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने स्वीकार नहीं किया था।\n\nसंसदीय मोर्चे के समानांतर अब यह मामला न्यायपालिका के दरवाजे पर भी पहुंच गया है। अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की है। इस कानूनी पहलू पर सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का मानना है कि यदि फॉर्म 6 के नियमों में फेरबदल करते समय निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है, तो शीर्ष अदालत इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर सकती है।\n\nबढ़ते राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद के बीच निर्वाचन आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया है कि उसके सभी फैसले कानून और संस्थागत मर्यादाओं के पूर्ण अनुकूल रहे हैं और ये कदम तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से उठाए गए थे। वहीं भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि यह लोकतंत्र का प्रतीक है, जहां विचारों का स्वतंत्र आदान-प्रदान संस्था की जीवंतता को दर्शाता है।\n\nइसका आप पर असर\nमतदाता सूची में बदलाव और आंतरिक प्रशासनिक टकराव का सीधा असर देश के आम नागरिकों के मताधिकार पर पड़ता है।\n\n• नए मतदाताओं के लिए: फॉर्म 6 में पूर्वजों के विवरण मांगने वाले अनिवार्य सवाल से नए मतदाताओं के पंजीकरण में अनावश्यक बाधाएं आ सकती हैं। यदि आप 18 वर्ष के हो चुके हैं, तो आवेदन करते समय अपने दस्तावेजों और पारिवारिक विवरणों की अतिरिक्त पुष्टि रखनी होगी।\n• पश्चिम बंगाल और गोवा के निवासियों के लिए: तकनीकी विसंगतियों और सॉफ्टवेयर बाधाओं के कारण जिन नागरिकों के नाम काटे गए हैं, उन्हें अपनी पात्रता सिद्ध करने के लिए कानूनी या ट्रिब्यूनल प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ सकता है। संबंधित क्षेत्रों के मतदाता स्थानीय चुनाव कार्यालय से अपने पंजीकरण की स्थिति तुरंत जांचें।\n• स्थानीय चुनाव अधिकारियों के लिए: ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर पर पाबंदियों के कारण फील्ड अधिकारियों की कार्यप्रणाली प्रभावित हुई है। स्थानीय स्तर पर समस्याओं के समाधान के लिए अब केंद्रीय तकनीकी अनुमति का इंतजार बढ़ सकता है।\n• समस्त भारतीय मतदाताओं के लिए: मसौदा मतदाता सूची से करोड़ों नाम हटाए जाने के बाद हर नागरिक के लिए अपनी प्रविष्टि जांचना अनिवार्य हो गया है। आयोग के ऑनलाइन पोर्टल या स्थानीय बीएलओ के माध्यम से अपने नाम की पुष्टि समय रहते कर लें।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह विवाद निर्वाचन आयोग के भीतर कार्यप्रणाली, मतदाता सूची संशोधन के तरीकों और बिना आम सहमति के लिए गए एकतरफा फैसलों के कारण उत्पन्न हुआ है।\n\n• एकतरफा संशोधन और नियमों की अनदेखी: फॉर्म 6 में कानूनी नियमों को बदले बिना अनिवार्य सवाल जोड़ने और कमिश्नरों की आपत्तियों को नजरअंदाज करने से आंतरिक विवाद गहराया। आयोग के दो वरिष्ठ सदस्यों ने 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराईं जिन्हें दरकिनार किया गया।\n• सॉफ्टवेयर का केंद्रीकरण और तकनीकी खामियां: ईसीआईनेट प्रणाली के तहत फील्ड स्तर के एसडीएम और ईआरओ के अधिकार सीमित कर दिए गए। गोवा जैसे राज्यों में वैध मतदाताओं को जोड़ने के लिए जरूरी रोलबैक विकल्प उपलब्ध नहीं कराया गया।\n• लाखों बेनामी अपीलों का रहस्य: पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों द्वारा बहाल किए गए मतदाताओं के खिलाफ 16 लाख से अधिक अज्ञात अपीलें दायर की गईं। आयोग ने अदालत को यह स्पष्ट नहीं किया कि इन अपीलों को अधिकृत करने वाला कौन था।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. ज्ञानेश कुमार पर मुख्य आरोप क्या हैं?\nज्ञानेश कुमार पर दो अन्य चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों को दरकिनार कर मतदाता सूची संशोधन में एकतरफा और मनमाने फैसले लेने का आरोप है।\n\n2. एसआईआर प्रक्रिया के तहत कितने मतदाताओं के नाम हटाए गए थे?\nदेश भर में विशेष गहन पुनरीक्षण के पहले मसौदे के दौरान लगभग 13 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे।\n\n3. फॉर्म 6 को लेकर चुनाव आयुक्तों की क्या आपत्ति थी?\nफॉर्म 6 में बिना विधायी संशोधन के माता-पिता के पुराने रिकॉर्ड से जुड़ा अनिवार्य सवाल जोड़ा गया था, जिसे आयुक्तों ने अवैध बताया था।\n\n4. गोवा में 97 योग्य नागरिक मतदाता सूची में क्यों शामिल नहीं हो सके?\nईसीआईनेट सॉफ्टवेयर में नामों को दोबारा बहाल करने का कोई विकल्प मौजूद नहीं था, जिसके चलते कागजात सत्यापन के बाद भी वे छूट गए।\n\n5. क्या चुनाव आयुक्तों के खिलाफ सीधे आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है?\nवर्ष 2023 के संशोधित कानून के तहत चुनाव आयुक्तों को आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान आपराधिक मुकदमों से कानूनी छूट प्राप्त है।\n\n6. मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से कैसे हटाया जा सकता है?\nमुख्य चुनाव आयुक्त को केवल संसद में दोनों सदनों द्वारा पारित महाभियोग प्रस्ताव के माध्यम से ही उनके पद से हटाया जा सकता है।",
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  "publishedAt": "2026-09-24",
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