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  "type": "article",
  "title": "वेस्ट बैंक में 942 नाकों की सख्त घेराबंदी, रोज 30 साल की जिंदगी गंवा रहे फलस्तीनी",
  "summary": "वेस्ट बैंक में 940 से अधिक इजरायली चेकपॉइंट और अवरोधों के कारण फलस्तीनियों की आवाजाही ठप हो चुकी है, जहां रोज कुल मिलाकर 30 साल का मानवीय समय बर्बाद हो रहा है।",
  "content": "हेब्रोन की संकरी गलियों में 51 वर्षीय आरिफ जाबेर अपने ही घर तक पहुंचने के लिए पड़ोसियों की छतों और दीवारों का सहारा लेने पर मजबूर हैं। उनके इलाके की लगभग हर गली को कंक्रीट के बड़े पत्थरों और कटीले तारों से पूरी तरह सील कर दिया गया है। वहां रहने वाले 140 परिवारों के आने-जाने के लिए केवल एक संकरा रास्ता छोड़ा गया है जिसे चेकपॉइंट 160 के नाम से जाना जाता है। जब भी यह नाका अप्रत्याशित रूप से बंद होता है, तो जाबेर को फोन करके पड़ोसियों से इजाजत लेनी पड़ती है, खिड़कियों से सैनिकों की तैनाती का मुआयना करना पड़ता है और फिर सीढ़ियां चढ़कर घर पहुंचना पड़ता है। किसी सैनिक की मनमर्जी, तकनीकी खराबी या इलाके में किसी हलचल के चलते हफ्ते में कम से कम दो दिन यह नाका बंद मिलता है, जिससे अपने ही घर लौटना किसी जंग जीतने जैसा लगता है।\n\nयह घेराबंदी किसी एक मोहल्ले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे वेस्ट बैंक में 35 लाख फलस्तीनियों के दैनिक जीवन की कड़वी हकीकत बन चुकी है। एक तरफ जहां बस्तियों के हिंसक विस्तार ने जमीनों को छीना है, वहीं दूसरी तरफ इजरायल ने अपने सैन्य नियंत्रण के ढांचे को अभूतपूर्व स्तर पर फैला दिया है। वेस्ट बैंक अब भौगोलिक रूप से एक जुड़ा हुआ भूभाग नहीं रहा, बल्कि अलग-अलग सैन्य छावनियों और टुकड़ों में तब्दील हो चुका है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पूरे क्षेत्र में कम से कम 925 से लेकर 942 तक स्थायी और अस्थायी चेकपॉइंट, लोहे के फाटक, सड़क अवरोध और मिट्टी के ढेर खड़े कर दिए गए हैं। इस विभाजन ने न केवल परिवारों को आपस में मिलने से रोक दिया है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था, अस्पतालों और उच्च शिक्षण संस्थानों तक लोगों की पहुंच को भी बेहद जटिल बना दिया है।\n\nरोजमर्रा के सफर में खोते घंटे और 2.6 अरब लोकेशन सिग्नलों की पड़ताल\nसड़क पर आम फलस्तीनियों के लिए सामान्य डिजिटल नेविगेशन सेवाएं लगभग बेकार साबित होती हैं, क्योंकि वे इन सैन्य फाटकों और पाबंदियों को नहीं दिखा पातीं और अक्सर ऐसे रास्तों का सुझाव देती हैं जो केवल इजरायली नंबर प्लेट वाली गाड़ियों के लिए आरक्षित हैं। लिहाजा नागरिकों ने टेलीग्राम चैनलों पर अपना अनौपचारिक सूचना तंत्र विकसित कर लिया है। ड्राइवर एक-दूसरे को पल-पल की जानकारी भेजते हैं कि हुवारा नाका बंद है या अवारता में भीषण जाम लगा हुआ है, या फिर अल-मुरब्बा नाका चालू है। 2.6 अरब जीपीएस लोकेशन सिग्नलों और हजारों टेलीग्राम संदेशों के विस्तृत विश्लेषण से यह बात सामने आई है कि वेस्ट बैंक में आवाजाही की रुकावटें पिछले तीन वर्षों में उतनी बढ़ गईं जितनी उससे पहले के 18 सालों में भी नहीं बढ़ी थीं।\n\nआम तौर पर हफ्ते में कई बार गाड़ी चलाने वाले एक फलस्तीनी को इन नाकों से बचने और लंबे रास्तों पर चलने के कारण हर हफ्ते लगभग डेढ़ अतिरिक्त घंटा बर्बाद करना पड़ता है, जो साल भर में 77 घंटों के नुकसान के बराबर बैठता है। रामल्लाह से यरुशलम के बाहरी हिस्से अल-इजारिया तक का 27 किलोमीटर का सफर, जो आम दिनों में 48 मिनट का था, अब 45 किलोमीटर के फेर के साथ 100 मिनट से अधिक समय लेता है। हफ्ते में चार दिन रामल्लाह से हेब्रोन के बीच सफर करने वाले मुसाफिर हर हफ्ते 12 घंटे से ज्यादा का अतिरिक्त समय सड़कों पर गंवाते हैं। अनाबता और बेत लिद जैसे कस्बे जो महज 8 किलोमीटर की दूरी पर हैं, उनका 10 मिनट का रास्ता अब 50 मिनट का हो चुका है। अक्टूबर 2023 के बाद से इन नाकों पर लगने वाली देरी में 50 प्रतिशत से अधिक का उछाल आया है, और पूरे वेस्ट बैंक के फलस्तीनी सामूहिक रूप से हर दिन करीब 30 साल के बराबर का समय केवल इन जांच चौकियों पर गंवा रहे हैं।\n\nशिक्षा पर पहरा और उजड़ते परिवारों की व्यथा\nअल-जानिया गांव में अपना घर बनाने वाली अमल के परिवार की कहानी इस बिखराव का सजीव उदाहरण है। अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने यहां सुकून का घर बनाया था, लेकिन गांव का मुख्य पूर्वी रास्ता 2003 से ही बंद था ताकि वहां बनी तालमोन बस्ती को विशेष प्रवेश मिल सके। अमल की बेटियों, लीना और दाना, के लिए विश्वविद्यालय जाना एक अंतहीन संघर्ष बन गया। लीना की सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए जो रास्ता 12 किलोमीटर और 20 मिनट का था, वह घुमावदार चक्करों की वजह से 32 किलोमीटर और 47 मिनट का हो गया। दंत चिकित्सा की पढ़ाई कर रही दाना का 35.5 किलोमीटर और 47 मिनट का सफर अक्सर 90 मिनट से ज्यादा का समय लेने लगा। हर शैक्षणिक सत्र में दोनों बेटियां केवल नाकों और डायवर्जन के चलते करीब तीन-तीन पूरे दिन खो देती थीं।\n\nसर्वेक्षणों के अनुसार वेस्ट बैंक में 30 प्रतिशत लोगों का कहना है कि इन चेकपॉइंट्स ने उन्हें विश्वविद्यालय की शिक्षा शुरू करने या पूरी करने से रोक दिया। प्रमुख शहरों से बाहर रहने वाले अधिकांश छात्रों को नजदीकी संस्थान तक पहुंचने के लिए कम से कम एक सैन्य नाके से गुजरना ही पड़ता है। रोज-रोज के चक्करों, मानसिक तनाव और घुटन से तंग आकर अमल के परिवार को आखिरकार अपना घर छोड़ना पड़ा और वे रामल्लाह के करीब चले गए। पूरे वेस्ट बैंक में 10 में से एक से अधिक लोग इन्हीं नाकों की वजह से अपना मूल निवास छोड़कर दूसरी जगह बसने को मजबूर हुए हैं, जबकि 31 प्रतिशत लोग इसी कारण से पलायन करने पर विचार कर रहे हैं।\n\nऐतिहासिक संदर्भ और सिकुड़ती सीमाओं का भूगोल\nजमीनी पाबंदियों का यह ताना-बाना रातोंरात तैयार नहीं हुआ है, बल्कि दशकों से एक-एक परत जोड़कर बनाया गया है। ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर में भी वाहनों की आवाजाही पर रोक लगाने के लिए परमिट और सड़क अवरोध लगाए जाते थे। इसके बाद 1948 के नकबा के दौरान 750,000 से अधिक फलस्तीनियों को बेदखल किया गया और बचे हुए लोगों पर 18 साल तक फौजी शासन थोपकर बिना परमिट यात्रा करने पर रोक लगा दी गई। 1967 के युद्ध के बाद इजरायल ने बाकी इलाकों पर नियंत्रण करते हुए पहचान पत्रों के रंग के आधार पर नागरिकों की श्रेणियों में बांटने वाला परमिट ढांचा दोबारा लागू कर दिया। संयुक्त राष्ट्र की विशेष समिति ने 1988 में ही इन इलाकों की घेराबंदी को सामूहिक सजा करार दिया था।\n\n1995 की ओस्लो प्रक्रिया, जिसका उद्देश्य एक संप्रभु फलस्तीनी राष्ट्र का निर्माण करना था, उसने वेस्ट बैंक को प्रशासनिक द्वीपों में बांटकर इस बिखराव को और औपचारिक रूप दे दिया। 2002 में इजरायल ने 713 किलोमीटर लंबी पृथक्करण दीवार का निर्माण शुरू किया, जिसका 85 प्रतिशत हिस्सा वेस्ट बैंक की जमीन के भीतर से गुजरता है। 2007 से गाजा पर नाकाबंदी लगाकर उसे बाकी हिस्सों से पूरी तरह काट दिया गया। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया का नतीजा यह हुआ कि 1948 के बाद से फलस्तीनियों की हर नई पीढ़ी ने अपने से पिछली पीढ़ी की तुलना में एक बेहद संकुचित दुनिया पाई है। जहां बुजुर्ग कभी जेद्दा, बेरूत या यरुशलम में दोपहर के भोजन के लिए जाने की बातें याद करते हैं, वहीं आज वेस्ट बैंक की 25 वर्ष से कम उम्र की करीब एक-तिहाई आबादी ने कभी अपने जिले की सीमा तक पार नहीं की है, और 40 प्रतिशत से अधिक लोगों ने अपने जीवन में कभी समुद्र नहीं देखा।\n\nस्वास्थ्य सेवाओं की नाकाबंदी और डॉक्टरों का दर्द\nनब्लस के अन-नजाह नेशनल यूनिवर्सिटी अस्पताल में सीनियर रेजिडेंट एनेस्थिसियोलॉजिस्ट रहीं रीम यासीन के लिए रूट 60 छह साल तक उनकी जिंदगी का हिस्सा रहा। रामल्लाह से नब्लस के बीच 45 किलोमीटर की यह मुख्य सड़क 2020 में लगभग 40 मिनट लेती थी। लेकिन अक्टूबर 2023 के बाद इस रास्ते पर तीन नए चेकपॉइंट खड़े कर दिए गए और पुराने नाकों को अक्सर बंद रखा जाने लगा। अपनी नवजात बेटी यारा को नब्लस के दक्षिण में असीरा अल-किबलिया गांव में अपने माता-पिता के घर छोड़ने के लिए उन्हें अल-मुरब्बा नाके से गुजरना पड़ता था, जो पूरे क्षेत्र में सबसे ज्यादा जाम वाले बिंदुओं में बदल गया। वहां 20 से 30 मिनट का इंतजार सामान्य था, जो कभी-कभी कई घंटों में बदल जाता था।\n\nनाकों पर होने वाले इस भारी विलंब ने कई बार जानलेवा मोड़ लिया। जुलाई 2024 में रीम यासीन के गांव के एक युवक को पैर में गोली लगी थी, जो जानलेवा नहीं थी। लेकिन एम्बुलेंस को नाके पर करीब एक घंटे तक रोके रखने के कारण अत्यधिक खून बहने से वह गंभीर आघात में चला गया और रफिदिया सर्जिकल अस्पताल में खून चढ़ाकर बमुश्किल उसकी जान बचाई जा सकी। फलस्तीन रेड क्रीसेंट सोसाइटी ने अक्टूबर 2023 से अगस्त 2026 के बीच एम्बुलेंसों को रोके जाने की 237 और उनके मिशन में अत्यधिक देरी की 240 घटनाएं दर्ज की हैं। संस्था के अनुसार इस तरह की रुकावटों के कारण 2023 से अब तक 25 लोगों की मौत हो चुकी है। जुलाई 2026 में अहमद जैद नाम के एक दुधमुंहे बच्चे की उस वक्त मौत हो गई जब उसे अस्पताल ले जा रहे वाहन को चेकपॉइंट पर एक घंटे से अधिक समय तक रोके रखा गया।\n\nकारोबार, आजीविका और बेत फुरीक की अनिश्चितता\nनब्लस शहर के पूर्व में स्थित समा फार्मास्यूटिकल्स नामक दवा कारखाने में रखरखाव पर्यवेक्षक अली हज अली पिछले दस वर्षों से काम कर रहे हैं। शाम 4:30 बजे अपनी शिफ्ट खत्म करने के बाद, महज 16 किलोमीटर दूर अपने घर पहुंचने के लिए उन्हें रात के 8:00 बजे तक का इंतजार करना पड़ता है। कई बार जब नाके पूरी तरह ठप हो जाते हैं, तो वे घर नहीं लौट पाते और कारखाने में बने आपातकालीन बिस्तरों पर ही रात गुजारते हैं। अनिश्चितता इतनी अधिक है कि चेकपॉइंट पर घंटों फंसे रहने के बाद लोगों को बीच रास्ते से ही वापस मुड़ना पड़ता है।\n\nइसी कारखाने की गुणवत्ता प्रबंधक 38 वर्षीय उहुद खतातबेह बेत फुरीक कस्बे में रहती हैं, जिसके आने-जाने के लिए केवल एक ही लोहे का फाटक है। कस्बा लगभग 16,000 की आबादी वाला है और पूरे दिन की दिनचर्या उस अकेले गेट की मर्जी पर चलती है। 15 मिनट की सामान्य दूरी को तय करने में उन्हें रोजाना औसतन पांच घंटे लग जाते थे और सबसे खराब दिन पर 10 घंटे का समय लगा। एक बार उनका बेटा स्कूल की जीव विज्ञान की परीक्षा देकर लौटा और दोनों 4:30 बजे से अगली सुबह 3:00 बजे तक उसी कतार में फंसे रहे। यहां तक कि जब उनके एक हफ्ते के नवजात बच्चे अव्स को पीलिया हुआ, तो अस्पताल से लौटते वक्त तैनात फौजी ने गेट बंद कर दिया और आगे बढ़ने पर गोली मारने की धमकी दी, जिसके बाद उन्हें बच्चे के साथ डेढ़ घंटे तक इंतजार करना पड़ा। इन नाकों के चलते स्थानीय कंपनियों ने अब ऐसे उम्मीदवारों को नौकरी देना ही बंद कर दिया है जिन्हें रोज नाके पार करने पड़ते हैं।\n\nकानूनी आपत्तियां और खुली सड़क का एक क्षणभंगुर ख्वाब\nइन तमाम पाबंदियों पर सैन्य प्रशासन का हमेशा से यही आधिकारिक तर्क रहा है कि चौकियों की स्थापना और संचालन विशुद्ध रूप से सुरक्षा आकलन और जमीनी परिचालन के आधार पर किया जाता है। हालांकि स्वयं इजरायली सेना के भीतर से भी इस पर गंभीर सवाल उठे। सेना के कानूनी सलाहकार कर्नल कोबी मार्कस ने जून में शीर्ष सैन्य अधिकारियों को भेजे एक पत्र में चेतावनी दी थी कि अक्टूबर 2023 के बाद से बिना विधिवत अधिकार के लगाई गई आवाजाही की पाबंदियां किसी भी कानूनी औचित्य से परे हैं और यह बुनियादी मानवीय अधिकारों तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकती हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि इस स्तर की सघन और व्यापक नाकाबंदी दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलती।\n\nइस दमघोंटू व्यवस्था के बीच 6 जनवरी 2026 की दोपहर 3:00 बजे वादी अन-नार चेकपॉइंट पर एक अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिला। उत्तर और दक्षिण को जोड़ने वाले इस इकलौते अहम नाके पर अचानक कोई सिपाही मौजूद नहीं था और फाटक पूरी तरह खुले थे। एक ड्राइवर द्वारा बनाया गया 20 सेकंड का वीडियो देखते ही देखते पूरे इलाके में फैल गया और लोगों ने मजाक में नाकों को अपनी सूची से हटाना शुरू कर दिया। हालांकि शाम 6:10 बजे सैनिक वापस लौट आए और दो मिनट बाद गेट दोबारा बंद कर दिए गए। वे तीन घंटे भले ही क्षणिक थे, लेकिन उन्होंने लाखों लोगों को यह एहसास करा दिया कि चेकपॉइंट्स के बिना वेस्ट बैंक की 130 किलोमीटर की कुल लंबाई को महज दो घंटे में नापा जा सकता था, जहां कोई मां अपने बीमार बच्चे को बिना बंदूकों के डर के अस्पताल ले जा सकती थी और कोई इंसान अपने घर लौटने के लिए छतों की सीढ़ियां चढ़ने को मजबूर न होता।\n\nइसका आप पर असर\nवेस्ट बैंक में आवाजाही पर लगे कड़े प्रतिबंधों और नाकों की बढ़ती संख्या ने आम नागरिकों के स्वास्थ्य, रोजगार और दैनिक सुरक्षा को बेहद जोखिम में डाल दिया है।\n\n• दैनिक सफर का समय: आम मुसाफिरों को नाकों से बचने के लिए हर हफ्ते कम से कम डेढ़ घंटा अतिरिक्त सफर करना पड़ता है। इसका सीधा असर रोजमर्रा के काम के घंटों और पारिवारिक जीवन पर पड़ता है।\n• आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं: गंभीर रूप से बीमार और घायल मरीजों को अस्पताल पहुंचने में घंटों की अप्रत्याशित देरी झेलनी पड़ती है। कई मामलों में समय पर इलाज न मिलने से मरीजों की जान जा चुकी है।\n• शिक्षा और रोजगार पर असर: लगभग 30 प्रतिशत युवा विश्वविद्यालयों में अपनी पढ़ाई जारी रखने से वंचित हो रहे हैं। कंपनियों ने नाकों के पार रहने वाले उम्मीदवारों को नौकरी देना बंद कर दिया है।\n• स्थानीय विस्थापन: लगातार लगने वाले जाम और मानसिक प्रताड़ना के चलते 10 प्रतिशत से अधिक परिवार अपने पुश्तैनी गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। अन्य 31 प्रतिशत लोग पलायन की योजना बना रहे हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nवेस्ट बैंक में आवाजाही के अवरोधों का यह विशाल तंत्र सैन्य सुरक्षा के नाम पर दशकों से लागू की जा रही नियंत्रण नीतियों का परिणाम है, जो हाल के संघर्षों के बाद और अधिक सख्त हो चुका है।\n\n• सैन्य सुरक्षा का आधिकारिक तर्क: सैन्य अधिकारियों का दावा है कि इन चौकियों का संचालन और स्थापना पूरी तरह परिचालन स्थिति और सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुसार की जाती है। हालांकि आंतरिक कानूनी सलाहकारों ने इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के विपरीत बताया है।\n• ऐतिहासिक प्रशासनिक विभाजन: 1948 के विस्थापन, 1967 के सैन्य शासन और 1995 के ओस्लो समझौते के तहत पूरे इलाके को अलग-अलग प्रशासनिक श्रेणियों में बांट दिया गया था। इन समझौतों ने वेस्ट बैंक को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित करने की जमीन तैयार की।\n• बस्तियों की सुरक्षा और विस्तार: कई मुख्य रास्तों को केवल इसलिए बंद या डायवर्ट किया गया ताकि यहूदी बस्तियों के निवासियों को निर्वाध आवागमन दिया जा सके। स्थानीय फलस्तीनी आबादी को लंबे और जोखिम भरे वैकल्पिक रास्तों पर धकेल दिया गया।\n• अक्टूबर 2023 के बाद का तनाव: गाजा और क्षेत्रीय तनाव के बाद नाकों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ और निगरानी सख्त कर दी गई। इसके चलते नाकों पर लगने वाला समय 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. वेस्ट बैंक में वर्तमान में कितने चेकपॉइंट और सैन्य अवरोध मौजूद हैं?\nसंयुक्त राष्ट्र के अनुसार कम से कम 925 अवरोध हैं, जबकि फलस्तीनी सरकारी आयोग का ताजा आंकड़ा 942 नाकों और फाटकों का है।\n\n2. इन नाकों की वजह से फलस्तीनियों का रोजाना कितना समय बर्बाद होता है?\nडेटा विश्लेषण के अनुसार सभी नागरिकों का सामूहिक समय मिलाकर हर दिन लगभग 30 साल के बराबर का समय नाकों पर बर्बाद होता है।\n\n3. क्या इन अवरोधों से स्वास्थ्य सेवाओं और एम्बुलेंसों पर असर पड़ा है?\nहां, रेड क्रीसेंट ने 2023 से अब तक 237 बार रास्ता रोके जाने और 240 बार देरी की घटनाएं दर्ज की हैं, जिससे 25 लोगों की जान जा चुकी है।\n\n4. क्या इजरायली सेना के भीतर भी इन नाकों पर सवाल उठाए गए हैं?\nसेना के कानूनी सलाहकार कर्नल कोबी मार्कस ने चेतावनी दी थी कि बिना मंजूरी के बढ़ाई गई ये पाबंदियां अंतरराष्ट्रीय कानून और बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन हो सकती हैं।",
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  "category": "पड़ताल",
  "publishedAt": "2026-09-30",
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