सरहद पर चौकसी के बीच नौशेरा में जवानों ने जलाई उम्मीदों की लौ जम्मू-कश्मीर के नौशेरा सेक्टर में नियंत्रण रेखा पर तैनात भारतीय सेना के जवानों ने कठोर मौसम और कड़ी सतर्कता के बीच दीपोत्सव का पर्व मनाया। त्योहारों के मौसम में जब पूरे देश के गली-मोहल्ले और बाजार रोशनी से जगमगाते हैं, तब देश की सीमाओं पर एक अलग ही दृश्य देखने को मिलता है। जम्मू-कश्मीर के नौशेरा सेक्टर में नियंत्रण रेखा यानी एलओसी पर तैनात सैनिकों का जीवन सामान्य नागरिकों से बिल्कुल जुदा होता है। यहां चारों ओर पसरा सन्नाटा, पथरीले पहाड़ और सीमा पार से होने वाली संभावित घुसपैठ का साया हर समय मंडराता रहता है। आम बस्तियों में जहां आतिशबाजी और मिठाइयों के बीच उल्लास का माहौल रहता है, वहीं इस अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिक हर छोटी से छोटी सरसराहट पर कान लगाए रहते हैं। तेज बर्फीली हवाओं और विपरीत परिस्थितियों के बीच जब सीमा की बाड़ के निकट मिट्टी के दीये रोशन होते हैं, तो वह केवल एक त्योहार मनाने का उपक्रम नहीं होता, बल्कि मातृभूमि की रक्षा के अटूट संकल्प का जीवंत प्रमाण बन जाता है। त्योहार के दौरान भी सख्त निगरानी और गश्त सीमांत क्षेत्रों में त्योहारों के आगमन के साथ सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक कड़ा कर दिया जाता है। नौशेरा सेक्टर के संवेदनशील इलाकों में गश्त के तय समय में त्योहार की वजह से कोई ढिलाई नहीं दी जाती। दिन की शुरुआत से लेकर देर रात तक चौकियां पूरी तरह सक्रिय रहती हैं। इन दुर्गम अग्रिम ठिकानों पर तैनात जवानों के लिए अपने माता-पिता, जीवनसाथी और बच्चों से हजारों किलोमीटर दूर रहकर दीपोत्सव मनाना आसान नहीं होता। घर के पारंपरिक पकवानों, पारिवारिक मेल-मिलाप और बचपन की यादों के बीच ये सिपाही अपने साथी जवानों में ही एक नया परिवार तलाश लेते हैं। मोर्चा संभालते हुए एक-दूसरे को बधाई देना और साथ बैठकर पूजा-अर्चना करना ही उनके जीवन का उत्सव बन जाता है। इस सामूहिकता के बीच भी उनका पहला ध्यान हमेशा अपनी बंदूक के ट्रिगर और सीमा की सुरक्षा पर ही टिका रहता है। 117 किलोमीटर लंबा चुनौतीपूर्ण भौगोलिक दायरा नौशेरा का लगभग 117 किलोमीटर का सीमावर्ती क्षेत्र भौगोलिक दृष्टिकोण से सेना के लिए अत्यंत कठिन और पेचीदा माना जाता है। इस पूरे दायरे में ऊंची-नीची ढलानें, घने जंगल, चट्टानी घाटियां और खुले मैदान मौजूद हैं। कई ठिकाने ऐसे हैं जहां मौसम बदलते ही पहुंचना लगभग नामुमकिन हो जाता है और सामान्य सैन्य गाड़ियां वहां तक नहीं जा सकतीं। ऐसी कठिन परिस्थितियों में भारतीय सेना ऑल-टेरेन व्हीकल यानी एटीवी का सहारा लेती है। विशेष रूप से डिजाइन किए गए ये वाहन जवानों को उन संकरे और ऊबड़-खाबड़ रास्तों तक तेजी से पहुंचाते हैं, जहां पैदल जाना भी जान जोखिम में डालने जैसा होता है। किसी भी संदिग्ध गतिविधि की भनक लगते ही इन विशेष वाहनों के जरिए त्वरित तलाशी अभियान शुरू कर दिए जाते हैं, ताकि दुश्मन को किसी भी तरह की बढ़त न मिल सके। आधुनिक निगरानी तंत्र और तकनीक का समन्वय भौगोलिक विषमताओं से पार पाने के लिए भारतीय सेना अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों और आधुनिक तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रही है। सीमा पार की हर गतिविधि पर नजर रखने के लिए आसमान में ड्रोन और क्वाडकॉप्टर लगातार उड़ान भरते हैं। ये हवाई उपकरण घने जंगलों और दुर्गम खाइयों की ऐसी तस्वीरें मुहैया कराते हैं, जिन्हें जमीन से देख पाना संभव नहीं होता। इसके अलावा नियंत्रण रेखा की फेंसिंग के बिल्कुल पास विशेष रूप से प्रशिक्षित सैन्य दलों को तैनात रखा जाता है। ये दस्ते किसी भी अचानक उत्पन्न होने वाली आपात स्थिति का तुरंत जवाब देने में सक्षम हैं। जमीन पर मुस्तैद जवानों के पास आधुनिक ऑटोमैटिक हथियार और नाइट विजन उपकरण मौजूद रहते हैं, जिससे वे अंधेरे में भी कई सौ मीटर दूर तक की हलचल को साफ-साफ भांप लेते हैं। सूरज ढलते ही बदल जाती है पहरेदारी की रूपरेखा पहाड़ी इलाकों में शाम ढलते ही मौसम तेजी से करवट लेता है। तापमान में भारी गिरावट आती है और ठंडी हवाएं हड्डियों को कंपाने लगती हैं। जैसे ही घाटियों में घना अंधेरा फैलता है, सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है। सामान्य नागरिक जब अपने घरों में त्योहार का आनंद लेकर विश्राम की तैयारी कर रहे होते हैं, तब सीमा पर तैनात संतरी अपनी ड्यूटी के सबसे संवेदनशील चरण में प्रवेश करते हैं। शून्य दृश्यता के बीच नाइट विजन डिवाइसेज के जरिए सीमा पार के हर पेड़-पौधे और पगडंडी पर नजर रखी जाती है। रात का यह वक्त आराम का नहीं बल्कि चौकसी की एक नई और थका देने वाली पारी का होता है, जहां एक पल की भी चूक बहुत भारी पड़ सकती है। फेंसिंग के पास दीये और स्थानीय मंदिर में प्रार्थना कर्तव्य की इस कठोर दिनचर्या के बीच भी मानवीय भावनाएं और सांस्कृतिक आस्थाएं अपनी जगह बना ही लेती हैं। नौशेरा के एक स्थानीय सीमावर्ती गांव में स्थित प्राचीन माता मंदिर जवानों के लिए गहरी श्रद्धा का केंद्र है। दीपोत्सव के दिन सैनिक इस पवित्र स्थल पर एकत्रित होते हैं और विधि-विधान से पूजा करते हैं। उनकी यह प्रार्थना केवल अपने या अपने परिवार के कुशलक्षेम तक सीमित नहीं होती, बल्कि वे पूरे भारतवर्ष की अखंडता, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं। मंदिर में शीश नवाने के बाद जवान नियंत्रण रेखा की बाड़ के पास पहुंचते हैं, जहां मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं और हाथों में फुलझड़ियां लेकर संक्षिप्त समय के लिए खुशियां बांटी जाती हैं। एलओसी से लेकर एलएसी तक फैले दुर्गम मोर्चों पर तैनात इन प्रहरियों का एक ही ध्येय रहता है कि जब तक वे जाग रहे हैं, देश का हर नागरिक बेफिक्र होकर अपने जीवन के उत्सव मना सकता है। इसका आप पर असर नियंत्रण रेखा पर सेना की निरंतर चौकसी देश के नागरिकों की सुरक्षा और सामान्य जीवन के सुचारु संचालन को सीधे प्रभावित करती है। • राष्ट्रीय स्तर पर: सीमा पर जवानों की उच्च स्तरीय सतर्कता से सीमा पार की अवांछित गतिविधियों पर रोक लगती है। इसके फलस्वरूप देश के नागरिक सभी पर्व और उत्सव पूरी तरह भयमुक्त माहौल में मना पाते हैं। • जम्मू-कश्मीर में: नौशेरा जैसे अग्रिम सेक्टरों में सुरक्षा ग्रिड मजबूत रहने से स्थानीय सीमावर्ती आबादी का जीवन सुरक्षित बना रहता है। किसान और ग्रामीण बिना किसी डर के अपनी दैनिक खेती-बाड़ी और आजीविका की गतिविधियां जारी रख सकते हैं। • आपातकालीन प्रतिक्रिया: ऑल-टेरेन व्हीकल्स और ड्रोन की तैनाती से दुर्गम इलाकों में त्वरित कार्रवाई संभव होती है। इससे किसी भी संभावित खतरे को शुरुआती चरण में ही निष्प्रभावी कर दिया जाता है। • सामरिक मनोबल: सुदूर चौकियों पर आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कठिन मौसम में जवानों की कार्यक्षमता बढ़ाता है। इसके चलते किसी भी भौगोलिक चुनौती में सीमा की अभेद्यता सुनिश्चित रहती है। ऐसा क्यों हुआ नौशेरा सेक्टर में त्योहारी मौसम के दौरान सुरक्षा तंत्र को कड़ा करना सीमावर्ती इलाके की सामरिक संवेदनशीलता और भौगोलिक जटिलताओं के कारण अनिवार्य हो जाता है। • त्योहारी समय में घुसपैठ का अंदेशा: त्योहारों के दौरान ध्यान भटकने की आशंका को देखते हुए सीमा पार से आतंकी घुसपैठ कराने के प्रयास बढ़ जाते हैं। इसी जोखिम को समाप्त करने के लिए सैन्य बलों की सतर्कता को दोगुना कर दिया जाता है। • 117 किलोमीटर का दुर्गम भूगोल: नौशेरा का सीमावर्ती क्षेत्र घने जंगलों, खाइयों और चट्टानों से भरा है जहां पैदल पहुंचना बेहद कठिन होता है। इन प्राकृतिक बाधाओं का लाभ उठाकर कोई अवांछित हरकत न हो, इसलिए निरंतर गश्त आवश्यक होती है। • मौसम और रात का अंधेरा: पहाड़ी इलाकों में रात का तापमान तेजी से गिरता है और दृश्यता शून्य के करीब पहुंच जाती है। अंधेरे का फायदा उठाकर होने वाली संदिग्ध गतिविधियों को रोकने के लिए आधुनिक निगरानी उपकरणों का उपयोग जरूरी हो जाता है। सवाल-जवाब 1. नौशेरा सेक्टर में सीमा की लंबाई कितनी है? नौशेरा सेक्टर की ओर नियंत्रण रेखा का दायरा लगभग 117 किलोमीटर लंबा है, जिसमें घने जंगल और ऊंची पहाड़ियां शामिल हैं। 2. दुर्गम इलाकों में निगरानी के लिए सेना किन वाहनों का उपयोग करती है? कठिन और संकरे पहाड़ी रास्तों पर गश्त करने और तलाशी अभियान चलाने के लिए सेना ऑल-टेरेन व्हीकल्स यानी एटीवी का इस्तेमाल करती है। 3. सैनिक रात के समय निगरानी कैसे सुनिश्चित करते हैं? रात के अंधेरे और गिरते तापमान में चौकसी बनाए रखने के लिए जवान नाइट विजन उपकरणों और थर्मल सेंसर्स का सहारा लेते हैं। 4. दिवाली के अवसर पर जवानों ने किस मंदिर में पूजा-अर्चना की? जवानों ने नौशेरा सेक्टर में नियंत्रण रेखा के पास स्थित एक स्थानीय सीमावर्ती गांव के माता मंदिर में जाकर देश की शांति और सुरक्षा के लिए प्रार्थना की। प्रेरणा और सबक कठिन परिस्थितियों और शून्य से नीचे जाते तापमान में जवानों का कर्तव्य-बोध हर नागरिक के लिए अनुशासन और समर्पण का बड़ा उदाहरण प्रस्तुत करता है। • कर्तव्य सर्वोपरि: व्यक्तिगत सुख और त्योहारों से दूर रहकर राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देना यह सिखाता है कि सामूहिक भलाई के लिए निजी सुविधाओं का त्याग करना आवश्यक होता है। • पारस्परिक सहयोग की शक्ति: अपने परिवारों से दूर सैनिक एक-दूसरे का संबल बनकर एक मजबूत टीम भावना का निर्माण करते हैं। यह आपसी सामंजस्य किसी भी कठिन परिस्थिति को आसान बना देता है। • प्रतिकूलताओं में अडिग संकल्प: गोलियों, तूफानों और बीहड़ पहाड़ों के बीच भी मिट्टी का दीया जलाना यह संदेश देता है कि सकारात्मकता और आशा के साथ किसी भी चुनौती का सामना किया जा सकता है। https://trendkia.com/jammu-kashmir/sarahada-para-chaukasi-ke-bicha-nowshera-men-javanon-ne-jalai-ummidon-ki-lau-57863 TrendKia — Har trend, sabse pehle.