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  "type": "article",
  "title": "सुरक्षा बलों की घेराबंदी में घायल लश्कर कमांडर मूसा ने जंगलों में शहद लगाकर भरे थे गोली के घाव",
  "summary": "बडगाम के यूसमर्ग में मारे गए लश्कर कमांडर मोहम्मद आसिफ उर्फ हाशिम मूसा को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। राजौरी मुठभेड़ में गोली लगने के बाद उसने महीनों तक जंगल में छिपकर शहद से अपने घावों का इलाज किया था।",
  "content": "जम्मू-कश्मीर के बडगाम जिले में सेना के उच्च ऊंचाई वाले अभियान के दौरान मार गिराए गए लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख ऑपरेशनल कमांडर मोहम्मद आसिफ उर्फ हाशिम मूसा को लेकर सुरक्षा एजेंसियों ने चौंकाने वाली जानकारी साझा की है। सुरक्षा बलों की सख्त घेराबंदी और लगातार चल रहे तलाशी अभियानों के चलते मूसा को किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सहायता या दवाएं नहीं मिल पा रही थीं। ऐसे में उसने गोली लगने से बने गहरे जख्मों को ठीक करने और संक्रमण से बचने के लिए प्राकृतिक शहद का सहारा लिया था। अधिकारियों के अनुसार, मूसा पाकिस्तान सेना के विशिष्ट स्पेशल सर्विसेज ग्रुप (SSG) का पूर्व कमांडो माना जाता था और वह केंद्र शासित प्रदेश में प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की आतंकी गतिविधियों का मुख्य संचालक था।\n\n \n\nराजौरी में ऑपरेशन शेरुवाली के दौरान लगी थी गोली\n\nअधिकारियों द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, मूसा को जम्मू संभाग के राजौरी जिले में चलाए गए 'ऑपरेशन शेरुवाली' के दौरान गोली लगी थी। यह मुठभेड़ डोरिमल-गंभीर मुगला के घने जंगली इलाके में हुई थी। सुरक्षा बलों ने उस इलाके में छिपे दो आतंकियों को घेरने के लिए 45 दिनों से भी अधिक समय तक लगातार अभियान चलाया था। बाद में जांच और जमीनी खुफिया इनपुट से यह बात स्पष्ट हुई कि जंगलों में घिरे वे दोनों आतंकी कोई और नहीं, बल्कि मूसा और उसका करीबी सहयोगी यासिर ही थे। सुरक्षा बलों के कड़े पहरे के बीच दोनों आतंकी पुंछ और राजौरी के दुर्गम जंगलों में लंबे समय तक छिपते रहे और अपना ठिकाना बदलते रहे।\n\n \n\nसहयोगी यासिर के मोबाइल फोन से बरामद हुईं तस्वीरें\n\nसितंबर के पहले सप्ताह में सुरक्षा बलों ने यूसमर्ग के ऊंचाई वाले इलाके में एक अभियान चलाकर मूसा के साथी यासिर को ढेर कर दिया था। यासिर के शव के पास से बरामद हुए मोबाइल फोन की जब तकनीकी जांच की गई, तो उसमें मूसा के जख्मों की कई तस्वीरें मिलीं। इन तस्वीरों में साफ दिख रहा था कि मूसा के शरीर पर लगे गोली के घावों पर शहद का लेप लगाया गया था। अधिकारियों ने बताया कि ये तस्वीरें सीमा पार पाकिस्तान में बैठे आतंकी आकाओं को भेजी गई थीं, ताकि वे मूसा की शारीरिक स्थिति और घावों के भरने की प्रगति पर नजर रख सकें। इतना ही नहीं, पाकिस्तान में मौजूद हैंडलर लगातार यह निर्देश भी दे रहे थे कि शहद पूरी तरह शुद्ध होना चाहिए, ताकि घाव में मवाद न बने और वह तेजी से भर सके।\n\n \n\nघाव भरने में शहद की भूमिका पर आयुर्वेद विशेषज्ञों की राय\n\nपारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में शहद के उपयोग को लेकर ऑल इंडिया डॉक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन के अध्यक्ष डॉ. आरपी पाराशर ने महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पहलू सामने रखे। उन्होंने बताया कि प्राचीन ग्रंथ 'सुश्रुत संहिता' के 'व्रण चिकित्सा' अध्याय में शहद को घावों के शोधन और रोपण के लिए बेहद गुणकारी माना गया है। शोधन का अर्थ घाव को साफ करना और रोपण का अर्थ नए ऊतकों के निर्माण के जरिए उसे भरना होता है। आधुनिक चिकित्सा अनुसंधानों ने भी यह साबित किया है कि शहद में प्राकृतिक रोगाणुरोधी गुण मौजूद होते हैं। इसकी उच्च ऑस्मोटिक गतिविधि, अम्लीय पीएच मान और कुछ किस्मों में हाइड्रोजन पेरॉक्साइड का बनना बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीवों के पनपने पर रोक लगाता है।\n\n हालांकि डॉ. पाराशर ने स्पष्ट चेतावनी दी कि गोली से लगने वाले घाव साधारण सतही चोटों से काफी भिन्न और जटिल होते हैं। आग्नेयास्त्र से लगी चोट में गोली के बारीक धातु कण, बारूद या कपड़े के रेशे अंदर रह सकते हैं, जिससे गंभीर आंतरिक संक्रमण और सेप्सिस का खतरा बढ़ जाता है। आधुनिक अस्पताल प्रणाली में केवल रोगाणुरहित यानी स्टेराइल मेडिकल-ग्रेड शहद का ही इस्तेमाल सीमित परिस्थितियों में किया जाता है। किसी खुले, गहरे और बिना साफ किए गए गोली के घाव पर सामान्य या अशुद्ध शहद लगाना चिकित्सकीय दृष्टि से बेहद खतरनाक हो सकता है और इसे उचित उपचार का विकल्प नहीं माना जा सकता।\n\n \n\nपशु चिकित्सा विशेषज्ञ का विश्लेषण\n\nपशु चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. जहांजेब सिरवाल ने भी इस जैविक प्रक्रिया की पुष्टि करते हुए बताया कि शहद एक प्रभावी ऑस्मोटिक एजेंट के रूप में काम करता है। यह घाव के आसपास जमा अतिरिक्त द्रव को बाहर खींच लेता है, जिससे सूजन घटती है और मृत ऊतकों को प्राकृतिक रूप से अलग करने में मदद मिलती है। उन्होंने उल्लेख किया कि जंगलों और ग्रामीण अंचलों में जहां आधुनिक दवाएं तुरंत उपलब्ध नहीं होतीं, वहां लोग पारंपरिक रूप से जलने या कटने पर शहद का उपयोग करते रहे हैं। इसके अलावा पशुओं की गहरी चोटों के उपचार में भी ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से शहद का लेप लगाया जाता रहा है।\n\n \n\nपांच साल से सुरक्षा बलों के रडार पर था मूसा\n\nमध्य कश्मीर के बडगाम जिले के यूसमर्ग में मूसा का मारा जाना सुरक्षा बलों के लिए एक बहुत बड़ी रणनीतिक कामयाबी है। इसके साथ ही करीब पांच साल से चल रही उसकी तलाश का अंत हो गया है। अधिकारियों के मुताबिक, मूसा जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों के काफिलों और निर्दोष नागरिकों पर हुए एक दर्जन से ज्यादा बड़े हमलों की साजिश रचने और उन्हें अंजाम देने में सीधे तौर पर शामिल रहा था। उसके आपराधिक रिकॉर्ड में कई भीषण आतंकी घटनाएं दर्ज हैं\n\n• भाटा धुरियां घात लगाकर हमला: अप्रैल 2023 में पुंछ के भाटा धुरियां क्षेत्र में सेना के एक वाहन पर घात लगाकर हमला किया गया था, जिसमें पांच जवान शहीद हो गए थे।\n\n• कांडी जंगल विस्फोट: मई 2023 में राजौरी के कांडी जंगल में आतंकियों की घेराबंदी के दौरान हुए आईईडी विस्फोट में सेना के पांच विशेष कमांडो वीरगति को प्राप्त हुए थे।\n\n• डेरा की गली हमला: दिसंबर 2023 में पुंछ जिले के डेरा की गली इलाके में सैन्य वाहनों पर किए गए हमले में चार सैन्यकर्मियों की जान गई थी।\n\n• वायुसेना के काफिले पर हमला: मई 2024 में शसितार के निकट भारतीय वायुसेना के काफिले को निशाना बनाकर गोलीबारी की गई थी, जिसमें एक वायुसैनिक शहीद हुए थे।\n\n \n\nबुनियादी ढांचे और गैर-सैन्य ठिकानों को बनाया निशाना\n\nसाल 2024 के उत्तरार्ध में मूसा के आतंकी नेटवर्क ने अपनी रणनीति बदलते हुए असैन्य नागरिकों, विकास परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे से जुड़े श्रमिकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया था। 20 अक्टूबर 2024 को गांदरबल जिले के गगनगीर में एक प्रमुख सुरंग निर्माण परियोजना के कैंप पर आतंकियों ने अचानक हमला बोल दिया था। इस कायरतापूर्ण हमले में एक स्थानीय चिकित्सक समेत सात निर्दोष लोगों की जान चली गई थी। इस घटना के महज चार दिन बाद आतंकियों ने बुटापथरी में सेना के एक वाहन पर गोलीबारी की थी, जिसमें दो सैन्य जवान और सेना के साथ काम करने वाले दो स्थानीय नागरिक रक्षा पोर्टर मारे गए थे।\n\n \n\nपहलगाम के बड़े आतंकी हमले का मुख्य षड्यंत्रकारी\n\nअधिकारियों ने यह भी उजागर किया कि मूसा वर्ष 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के मुख्य साजिशकर्ताओं में शामिल था। दक्षिण कश्मीर के पहलगाम स्थित बैसरन के प्रसिद्ध घास के मैदान में हुए इस जघन्य हमले में आतंकियों ने पर्यटकों को निशाना बनाया था। इस भीषण आतंकी वारदात में मुख्य रूप से पर्यटकों समेत 26 लोगों की मौत हुई थी। इस हमले के बाद से ही सुरक्षा बल घाटी के चप्पे-चप्पे पर मूसा की तलाश में जुटे हुए थे, जिसका अंत आखिरकार बडगाम के यूसमर्ग के ऊंचाई वाले पहाड़ों में हुई निर्णायक मुठभेड़ के साथ हुआ।\n\nइसका आप पर असर\nलश्कर के शीर्ष कमांडर के खात्मे से घाटी और सीमावर्ती क्षेत्रों में सक्रिय आतंकी नेटवर्क की रीढ़ टूट गई है, जिससे सुरक्षा स्थिति में बड़ा सुधार होगा।\n\n• राष्ट्रीय स्तर पर: सुरक्षा बलों द्वारा पाकिस्तान समर्थित प्रशिक्षित आतंकी कमांडरों के सफाए से देश के आंतरिक सुरक्षा ढांचे को मजबूती मिली है। सीमा पार से घुसपैठ कर दहशत फैलाने वाले नेटवर्क पर निगरानी तंत्र और अधिक सख्त किया जा रहा है।\n• जम्मू-कश्मीर में: पर्यटन स्थलों और गगनगीर जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर काम करने वाले श्रमिकों तथा पर्यटकों में सुरक्षा की भावना मजबूत होगी। बडगाम, पुंछ और राजौरी के घने वन क्षेत्रों में आम नागरिकों के लिए आवाजाही पहले से अधिक सुरक्षित होगी।\n• खुफिया निगरानी के संदर्भ में: जंगलों में आतंकियों द्वारा अपनाए जाने वाले पारंपरिक तौर-तरीकों और सीमा पार भेजी जाने वाली तस्वीरों के खुलासे से सुरक्षा एजेंसियों को छिपे हुए आतंकियों को ट्रैक करने में नई लीड मिली है। सुरक्षा बल अब जंगलों के प्राकृतिक संसाधनों और संदिग्ध गतिविधियों पर पैनी नजर रख रहे हैं।\n• सुरक्षा बलों के मनोबल पर: पिछले कई सालों में शहीद हुए जवानों और पर्यटकों के गुनहगार के अंत से अभियान में तैनात सुरक्षा बलों का हौसला बढ़ा है। पर्वतीय और दुर्गम इलाकों में हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशंस की प्रभावशीलता फिर से साबित हुई है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nलश्कर कमांडर मूसा द्वारा घावों पर शहद लगाने और लंबे समय तक छिपे रहने का कारण सुरक्षा बलों की अभेद्य घेराबंदी और उसका स्पेशल फोर्सेस का बैकग्राउंड था।\n\n• सख्त सुरक्षा घेराबंदी: राजौरी में 'ऑपरेशन शेरुवाली' के दौरान 45 दिनों से अधिक समय तक चले अभियान ने आतंकियों के सभी आपूर्ति मार्ग और मानवीय संपर्क काट दिए थे। सुरक्षा घेरा इतना कड़ा था कि घायल मूसा को किसी भी प्रकार की चिकित्सीय मदद या पेनकिलर नहीं मिल सके।\n• कमांडो प्रशिक्षण और उत्तरजीविता कौशल: पाकिस्तान सेना के स्पेशल सर्विसेज ग्रुप (SSG) का पूर्व कमांडो होने के कारण मूसा विषम परिस्थितियों में बचने के जंगल सर्वाइवल तरीकों से भलीभांति परिचित था। उसने आधुनिक एंटीबायोटिक दवाओं की अनुपस्थिति में शहद के प्राकृतिक रोगाणुरोधी गुणों का इस्तेमाल किया।\n• सीमा पार से दिशा-निर्देश: बरामद फोन से पता चला कि पाकिस्तान में बैठे हैंडलर नियमित रूप से मूसा की हालत पर नजर रखे हुए थे और शुद्ध शहद के इस्तेमाल की सलाह दे रहे थे। यह साबित करता है कि सीमा पार से इन आतंकियों को लॉजिस्टिक और सर्वाइवल मार्गदर्शन लगातार मिल रहा था।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. मोहम्मद आसिफ उर्फ हाशिम मूसा कौन था?\nवह पाकिस्तान सेना के स्पेशल सर्विसेज ग्रुप (SSG) का पूर्व कमांडो और जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का शीर्ष ऑपरेशनल कमांडर था।\n\n2. मूसा को गोली कब और कहां लगी थी?\nमूसा को जम्मू के राजौरी जिले में डोरिमल-गंभीर मुगला इलाके में 45 दिनों से अधिक चले 'ऑपरेशन शेरुवाली' के दौरान मुठभेड़ में गोली लगी थी।\n\n3. मूसा ने गोली के घावों पर शहद क्यों लगाया?\nसुरक्षा बलों की सख्त घेराबंदी के कारण उसे कोई चिकित्सीय सहायता नहीं मिल सकी, इसलिए उसने घाव साफ करने और संक्रमण रोकने के लिए शहद का लेप लगाया।\n\n4. घावों पर शहद लगाने का खुलासा कैसे हुआ?\nसितंबर के पहले हफ्ते में यूसमर्ग में मारे गए उसके साथी यासिर के पास से मिले मोबाइल फोन में घावों पर शहद लगे होने की तस्वीरें मिलीं।\n\n5. मूसा किन प्रमुख आतंकी हमलों में शामिल था?\nवह पुंछ के भाटा धुरियां हमले, कांडी जंगल विस्फोट, गगनगीर सुरंग कैंप हमले और 2025 के पहलगाम हमले समेत एक दर्जन से अधिक हमलों में शामिल था।\n\n6. मूसा को सुरक्षा बलों ने कहां मार गिराया?\nसुरक्षा बलों ने मूसा को मध्य कश्मीर के बडगाम जिले के यूसमर्ग इलाके में एक उच्च ऊंचाई वाले अभियान में ढेर किया।",
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  "category": "जम्मू-कश्मीर",
  "publishedAt": "2026-10-04",
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