100 प्रतिशत दृष्टिबाधित शेखर गोप ने लद्दाख की 20 हजार फीट ऊंची डीज़ो-जोंगो चोटी पर फहराया तिरंगा, धीरज कुमार ने भी रचा इतिहास झारखंड के 100 प्रतिशत दृष्टिबाधित युवक शेखर गोप ने लद्दाख की लगभग 20 हजार फीट ऊंची कठिन डीज़ो-जोंगो चोटी को फतह कर नया इतिहास रचा है. इस साहसिक अभियान में उनके साथी धीरज कुमार ने भी 16,732 फीट तक चढ़ाई की. झारखंड के दो दृष्टिबाधित युवाओं ने अपनी अटूट इच्छाशक्ति और कड़ी मेहनत के बल पर एक अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल की है. पश्चिमी सिंहभूम जिले के रहने वाले शेखर गोप ने लद्दाख की लगभग 20 हजार फीट ऊंची कठिन डीज़ो-जोंगो चोटी पर सफलतापूर्वक तिरंगा फहराया है. इस चुनौतीपूर्ण अभियान में उनके साथी धीरज कुमार ने भी 16,732 फीट की ऊंचाई तक पहुंचकर अपनी असाधारण क्षमता और साहस का परिचय दिया. दोनों युवा 100 प्रतिशत दृष्टिबाधित हैं, लेकिन उनकी यह सफलता यह साबित करती है कि हौसले के सामने शारीरिक सीमाएं कभी बाधा नहीं बन सकतीं. लद्दाख की कठिन परिस्थितियों में तिरंगा फहराने की चुनौती हिमालय की गोद में स्थित डीज़ो-जोंगो चोटी की चढ़ाई बेहद चुनौतीपूर्ण मानी जाती है. लगभग 20 हजार फीट की ऊंचाई पर पर्वतारोहियों को अत्यधिक ठंडे मौसम, तेज बर्फीली हवाओं, ऑक्सीजन की भारी कमी और दुर्गम पथरीले रास्तों का सामना करना पड़ता है. इन विषम परिस्थितियों के बावजूद, शेखर गोप ने बिना डिगे हर कदम पर आने वाली कठिनाइयों का मुकाबला किया और अंततः शिखर पर पहुंचकर भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया. वहीं, धीरज कुमार ने भी मजबूत इरादों के साथ 16,732 फीट की ऊंचाई हासिल की. हालांकि, ऊंचाई पर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण उन्हें बेस कैंप से आगे नहीं बढ़ने का फैसला लेना पड़ा, लेकिन उनका यह प्रयास भी सराहनीय रहा. झारखंड के गांवों से शुरू हुआ सशक्तिकरण का सफर दोनों पर्वतारोही झारखंड के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से संबंध रखते हैं. शेखर गोप पश्चिमी सिंहभूम के तोड़ानहातु गांव के रहने वाले हैं, जबकि धीरज कुमार कड़ाजामदा क्षेत्र के निवासी हैं. वर्ष 2022 में दोनों युवाओं के जीवन में एक बड़ा मोड़ आया जब वे टाटा स्टील फाउंडेशन के सबल कार्यक्रम से जुड़े. इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत उन्हें ब्रेल लिपि, स्वतंत्र जीवन जीने के व्यावहारिक कौशल, मोबिलिटी (आवागमन का तरीका) और डिजिटल तकनीक जैसी बुनियादी चीजों का गहन प्रशिक्षण दिया गया. इस संस्थागत सहयोग ने उनके आत्मविश्वास को एक नई उड़ान दी. दलमा की पहाड़ियों में विशेष प्रशिक्षण और फुटबॉल का अनुभव सबल कार्यक्रम से मिले प्रशिक्षण के बाद दोनों युवाओं ने खेल और साहसिक गतिविधियों में अपनी क्षमताओं को तराशना शुरू किया. वे झारखंड की दृष्टिबाधित फुटबॉल टीम का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहे, जिससे उनके भीतर सहभागिता और टीम भावना का विकास हुआ. जब उन्हें लद्दाख की डीज़ो-जोंगो चोटी पर चढ़ाई का अवसर मिला, तो उन्होंने इसे अपनी शारीरिक और मानसिक सीमाओं को परखने का जरिया बनाया. इस कठिन अभियान की पूर्व संध्या पर उन्होंने जमशेदपुर के पास स्थित दलमा की पहाड़ियों में विशेष प्रशिक्षण हासिल किया. इस दौरान फिटनेस, शारीरिक स्टेमिना, धैर्य और मानसिक मजबूती पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिसका सीधा लाभ उन्हें लद्दाख की भीषण ऊंचाइयों पर मिला. इसका आप पर असर यह उपलब्धि शारीरिक चुनौतियों का सामना कर रहे लाखों लोगों और समाज के लिए एक बड़ा प्रेरणादायक उदाहरण पेश करती है. • दिव्यांग समाज के लिए: यह साबित करता है कि सही प्रशिक्षण और अवसरों से किसी भी शारीरिक सीमा को पार किया जा सकता है. • युवाओं के लिए प्रेरणा: विपरीत परिस्थितियों में लक्ष्य प्राप्ति के लिए मानसिक दृढ़ता और अनुशासन की सीख मिलती है. • कौशल विकास का महत्व: सबल जैसे सामाजिक प्रशिक्षण अभियानों की उपयोगिता को रेखांकित करता है, जो जीवन बदलने में सहायक बनते हैं. • साहसिक खेलों में समावेशन: दृष्टिबाधित एथलीटों के लिए उच्च हिमालयी पर्वतारोहण और साहसिक खेलों में नए रास्ते खोलता है. ऐसा क्यों हुआ शेखर गोप और धीरज कुमार की इस सफलता के पीछे वर्षों का कठिन परिश्रम, सही प्रशिक्षण और सामाजिक सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. • सबल कार्यक्रम का प्रशिक्षण: साल 2022 में टाटा स्टील फाउंडेशन के सबल कार्यक्रम से जुड़कर उन्होंने ब्रेल, मोबिलिटी और डिजिटल तकनीक सीखी, जिसने उनके आत्मविश्वास की नींव रखी. • खेलों से मिला आत्मविश्वास: झारखंड की दृष्टिबाधित फुटबॉल टीम में खेलने के अनुभव ने उनके भीतर टीम समन्वय और आत्म-विश्वास को मजबूत किया. • दलमा पहाड़ियों में विशेष तैयारी: हिमालय की कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए उन्होंने दलमा की पहाड़ियों में स्टैमिना, फिटनेस और मानसिक मजबूती का गहन अभ्यास किया. • दृढ़ इच्छाशक्ति: लगभग 20 हजार फीट की ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन और अत्यधिक ठंड के बावजूद लक्ष्य पर डटे रहने के इरादे ने शिखर तक पहुंचाया. सवाल-जवाब 1. शेखर गोप ने लद्दाख की किस चोटी पर तिरंगा फहराया? शेखर गोप ने लद्दाख की लगभग 20 हजार फीट ऊंची डीज़ो-जोंगो चोटी को सफलतापूर्वक फतह कर तिरंगा फहराया. 2. धीरज कुमार इस अभियान में कितनी ऊंचाई तक पहुंचे? धीरज कुमार ने 16,732 फीट की ऊंचाई तक चढ़ाई की, जिसके बाद स्वास्थ्य कारणों से उन्हें आगे की चढ़ाई रोकनी पड़ी. 3. दोनों पर्वतारोही झारखंड के किन क्षेत्रों के निवासी हैं? शेखर गोप पश्चिमी सिंहभूम जिले के तोड़ानहातु गांव के निवासी हैं, जबकि धीरज कुमार कड़ाजामदा क्षेत्र से आते हैं. 4. उन्हें पर्वतारोहण अभियान के लिए पूर्व प्रशिक्षण कहां मिला? उन्होंने टाटा स्टील फाउंडेशन के सबल कार्यक्रम में जीवन कौशल सीखा और लद्दाख के अभियान से पहले दलमा की पहाड़ियों में विशेष फिटनेस और स्टेमिना प्रशिक्षण प्राप्त किया. प्रेरणा और सबक शेखर गोप और धीरज कुमार का यह सफर हर व्यक्ति के लिए जीवन में आने वाली बाधाओं को पार करने के महत्वपूर्ण सबक देता है. • सीमाओं को चुनौती दें: अपनी शारीरिक या मानसिक सीमाओं को अपनी मंजिल का रोड़ा न बनने दें; समर्पण और अभ्यास से हर चुनौती को पार किया जा सकता है. • तैयारी ही सफलता की कुंजी है: किसी भी बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए चरणबद्ध और कठिन अभ्यास करना अनिवार्य है, जैसा कि उन्होंने दलमा की पहाड़ियों में किया. • हर प्रयास का सम्मान करें: धीरज कुमार का 16,732 फीट तक पहुंचने का प्रयास यह सिखाता है कि कठिन स्वास्थ्य परिस्थितियों के बावजूद की गई हर कोशिश अपने आप में जीत है. • कौशल विकास को अपनाएं: व्यावहारिक जीवन कौशल और डिजिटल तकनीक का प्रशिक्षण भविष्य के अप्रत्याशित अवसरों के द्वार खोलता है. https://trendkia.com/jharkhand/100-pratishata-drishtibadhita-shekhar-gop-ne-laddakha-ki-20-hajara-phita-unchi-dzo-jongo-choti-para-phaharaya-tirnga-dheeraj-kumar-29977 TrendKia — Har trend, sabse pehle.