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  "type": "article",
  "title": "68 वर्ष की उम्र में रांची विश्वविद्यालय के क्लासरूम पहुंचे कोल इंडिया के पूर्व जीएम, मनोविज्ञान की पढ़ाई के लिए छोड़ी लाखों की नौकरी",
  "summary": "कोल इंडिया में शीर्ष पद और निजी फर्म में चार लाख रुपये के पैकेज पर काम कर चुके डॉ. अशोक कुमार ने 68 वर्ष की आयु में रांची विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में दाखिला लिया है।",
  "content": "जीवन में सीखने की ललक जब किसी पद, प्रतिष्ठा और उम्र के बंधनों से बड़ी हो जाती है, तब कक्षा की सामान्य लकड़ी की बेंच भी कॉर्पोरेट बोर्डरूम से अधिक महत्वपूर्ण लगने लगती है। 68 वर्ष की आयु में रांची विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में स्नातकोत्तर की कक्षा में युवा छात्रों के बीच बैठकर नोट्स तैयार करते डॉ. अशोक कुमार इसी सोच की जीती-जागती तस्वीर हैं। लंबे समय तक सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बड़े औद्योगिक संस्थानों में शीर्ष जिम्मेदारियां संभालने के बाद उन्होंने अपनी पुरानी पहचान को पीछे छोड़कर एक सामान्य छात्र के रूप में नई शुरुआत की है। उनका कहना है कि वे कॉलेज परिसर में किसी पूर्व उच्चाधिकारी की तरह नहीं, बल्कि एक सामान्य अध्येता के रूप में आते हैं, क्योंकि अगले दो वर्षों तक संस्थागत अनुशासन और सीखने की मर्यादा का पालन करना उनका नैतिक कर्तव्य है।\n\nवरिष्ठ पदों पर काम करते हुए मिलने वाली सुविधाएं, आधिकारिक प्रभाव और चार लाख रुपये का मासिक वेतन छोड़कर उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय लौटना कोई साधारण कदम नहीं है। वर्ष 2025 में एक निजी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट और एडवाइजर की अपनी अंतिम नौकरी को अलविदा कहने के बाद उन्होंने मनोविज्ञान में दाखिला लिया। डॉ. अशोक कुमार के अनुसार, जीवन के इस मोड़ पर उनकी पढ़ाई का उद्देश्य किसी नौकरी की तलाश या करियर में पदोन्नति पाना नहीं है। उनका मुख्य ध्येय उस ज्ञान को वैज्ञानिक रूप से समझना है, जिसका अनुभव उन्होंने दशकों तक कारखानों, खनन परियोजनाओं और कॉर्पोरेट कार्यालयों में कर्मचारियों के साथ काम करते हुए व्यावहारिक रूप से महसूस किया था।\n\nकॉर्पोरेट अनुभव और मनोविज्ञान विषय चुनने का कारण\nऔद्योगिक संस्थानों में अपने लंबे कार्यकाल के दौरान डॉ. अशोक कुमार ने यह गहराई से देखा कि किसी भी उद्यम की सफलता केवल मशीनों, वित्तीय पूंजी या तकनीकी रणनीतियों पर निर्भर नहीं होती। संस्थान की असली ताकत वहां काम करने वाले लोग होते हैं। वे यह समझना चाहते थे कि कार्यस्थल पर कर्मचारियों की मानसिक स्थिति, उनके व्यक्तिगत तनाव और उनके व्यवहार का काम की गुणवत्ता पर क्या प्रभाव पड़ता है। उन्होंने महसूस किया कि श्रमिकों और प्रबंधकों को किस तरह प्रेरित किया जाए, उनका मनोबल कैसे ऊंचा रखा जाए और उनके कल्याण को सुनिश्चित करते हुए उनसे संस्थान के हित में सर्वोत्तम कार्य कैसे लिया जाए, यह एक अत्यंत गहरा विषय है।\n\nइसी समझ को अकादमिक और वैज्ञानिक आधार देने के लिए उन्होंने स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए मनोविज्ञान को चुना। उनका मानना है कि कार्यक्षमता और मानसिक संतुलन का गहरा संबंध है। जीवन भर लोगों के प्रबंधन से जुड़े रहने के बाद जब उन्होंने अकादमिक दुनिया में कदम रखा, तो उनका उद्देश्य केवल एक औपचारिक उपाधि लेना नहीं था, बल्कि मानव मन की गहराइयों को समझकर स्वयं के दृष्टिकोण को और समृद्ध करना था। वे मानते हैं कि चार लाख रुपये की नौकरी छोड़ना उनके लिए कोई वित्तीय या व्यक्तिगत घाटा नहीं था, बल्कि यह उनके भीतर लंबे समय से दबी उस आंतरिक इच्छा को पूरा करने की दिशा में उठाया गया कदम था, जो भागदौड़ भरे कामकाजी जीवन में पूरी नहीं हो सकी थी।\n\nखगड़िया से शुरू होकर कोल इंडिया के शीर्ष तक की यात्रा\nडॉ. अशोक कुमार का प्रारंभिक जीवन बिहार के खगड़िया जिले से जुड़ा रहा है, जहां से उन्होंने 1975 में अपनी मैट्रिक की परीक्षा पास की। स्कूली शिक्षा के बाद वे उच्च अध्ययन के लिए रांची आए और 1977 में साइंस कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने इसी कॉलेज में फिजिक्स ऑनर्स में दाखिला लिया, लेकिन परिस्थितियों के कारण वे इस पाठ्यक्रम को पूरा नहीं कर सके। उच्च शिक्षा की दिशा बदलते हुए उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्रवेश लिया और इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान उन्होंने भारतीय इंजीनियरिंग सेवा की लिखित परीक्षा में भी सफलता पाई।\n\nवर्ष 1985 में उन्होंने सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट में अपनी औपचारिक पेशेवर सेवा शुरू की। इसके बाद उन्होंने मेघालय में रीजनल स्टडीज, रांची स्थित मुख्यालय और महानदी कोलफील्ड्स में विभिन्न तकनीकी और प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाईं। अपने समर्पण और कार्यकुशलता के बल पर वे महानदी कोलफील्ड्स में डिप्टी जीएम बने और आगे चलकर जनरल मैनेजर के प्रतिष्ठित पद तक पहुंचे। वर्ष 2018 में कोल इंडिया से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनकी सक्रियता थमी नहीं। शिक्षण के प्रति उनके रुझान को देखते हुए उन्हें केआईटीएस से अध्यापन का प्रस्ताव भी मिला था। हालांकि, इसी दौरान उन्हें एक बड़ी निजी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट का दायित्व मिला, जहां बाद में उन्होंने सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और एडवाइजर के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 2025 में उन्होंने इस कॉर्पोरेट जिम्मेदारी को भी पूरी तरह छोड़ दिया।\n\nकक्षा का माहौल, पारिवारिक संबल और सहपाठियों का साथ\nसेवानिवृत्ति के इतने वर्षों बाद विश्वविद्यालय की नियमित कक्षाओं में शामिल होने के इस निर्णय में उनके पूरे परिवार ने संबल प्रदान किया। उनके दोनों पुत्र विदेशों में रहते हैं और उन्होंने अपने पिता के इस शैक्षणिक संकल्प का पूरा समर्थन किया। दिलचस्प बात यह है कि उनकी पत्नी भी उनके साथ ही मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई शुरू करना चाहती थीं, लेकिन घरेलू और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते वे विश्वविद्यालय में नामांकन नहीं ले सकीं। ऐसे में डॉ. अशोक अकेले ही प्रतिदिन कॉलेज जाते हैं और सामान्य विद्यार्थियों की तरह उपस्थित रहते हैं।\n\nपिछले एक वर्ष से कोई औपचारिक नौकरी न होने के बावजूद उन्हें आर्थिक रूप से किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ रहा है। वे अपनी नियमित पेंशन के माध्यम से अपने दैनिक पारिवारिक खर्च और पढ़ाई का प्रबंध कर रहे हैं, जिसे वे अपनी जरूरतों के लिए पूरी तरह पर्याप्त मानते हैं। विभाग में अपने से उम्र में काफी छोटे सहपाठियों के साथ उनका तालमेल भी बेहद सहज है। कक्षा में शुरुआती दिनों के दौरान जब उन्हें नए पाठ्यक्रम और अकादमिक परिवेश में ढलने में समय लग रहा था, तब जॉय नाम के एक सहपाठी ने विषय की अवधारणाओं को समझने और विभाग के माहौल में सहज होने में उनकी काफी सहायता की थी। आज वे अपने सभी सहपाठियों के साथ मिलकर एक समान अध्येता के रूप में पढ़ाई करते हैं।\n\nनई शिक्षा नीति और जीवन पर्यंत अध्ययन की प्रासंगिकता\nरांची विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. परवेज हसन का कहना है कि डॉ. अशोक कुमार की उपस्थिति विभाग और पूरे विश्वविद्यालय के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका मानना है कि ज्ञान अर्जन की कोई समय सीमा या उम्र तय नहीं की जा सकती। नई शिक्षा नीति का मूल ढांचा भी इसी लचीलेपन को बढ़ावा देता है, ताकि समाज का कोई भी व्यक्ति जीवन के किसी भी पड़ाव पर अपनी रुचि के अनुसार ज्ञान हासिल कर सके।\n\nविभागाध्यक्ष के अनुसार, इस उम्र में विश्वविद्यालय में दाखिला लेने वाले लोग किसी आजीविका या डिग्री आधारित पदोन्नति की होड़ में नहीं होते, बल्कि वे अपनी विशुद्ध बौद्धिक जिज्ञासा और आंतरिक रुचि को संतुष्ट करने आते हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आधुनिक समय में मनोविज्ञान विभाग का महत्व और प्रासंगिकता निरंतर बढ़ रही है। विभिन्न क्षेत्रों के वरिष्ठ पेशेवर मानव मन के व्यवहार को समझने के लिए इस विषय की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इससे पूर्व भी विभाग में भारतीय सेना के सेवारत कर्नल और सेवानिवृत्त कर्नल जैसे उच्च पदों पर रहे लोग उच्च अध्ययन के लिए प्रवेश ले चुके हैं।\n\nइसका आप पर असर\nयह घटना दर्शाती है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी उच्च शिक्षा के दरवाजे किसी भी नागरिक के लिए खुले हैं और उम्र कभी अध्ययन में बाधा नहीं बनती।\n\n• भारत भर में: नई शिक्षा नीति के तहत किसी भी उम्र में औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने की प्रक्रिया अब अधिक सुगम हो चुकी है। वरिष्ठ नागरिक और कामकाजी पेशेवर अपनी पुरानी डिग्रियों से परे जाकर अपनी रुचि के विषयों में उच्च अध्ययन कर सकते हैं।\n• रांची और झारखंड में: रांची विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में वरिष्ठ नागरिकों और अनुभवी अधिकारियों के नामांकन से स्थानीय शैक्षणिक माहौल समृद्ध हो रहा है। इससे कक्षाओं में युवा छात्रों को व्यावहारिक औद्योगिक अनुभवों से रूबरू होने और अनुभवी लोगों के साथ पढ़ने का सीधा अवसर मिलता है।\n• पेशेवरों और सेवानिवृत्त लोगों के लिए: सेवानिवृत्ति का अर्थ सक्रिय जीवन या सीखने की समाप्ति नहीं है। अपनी पेंशन और बचत के सहारे वरिष्ठ नागरिक अपनी अधूरी शैक्षणिक इच्छाओं को किसी भी केंद्रीय या राज्य विश्वविद्यालय में पूरा कर सकते हैं।\n• युवा विद्यार्थियों के लिए: कॉलेज में अनुभवी वरिष्ठ नागरिकों की सहभागिता से युवा पीढ़ी में सीखने के प्रति गंभीरता और सम्मान की भावना बढ़ती है। वे किताबों के साथ-साथ दशकों के जमीनी कार्य अनुभव से जुड़े व्यावहारिक दृष्टिकोण को भी समझ पाते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nडॉ. अशोक कुमार ने अपने लंबे औद्योगिक करियर में यह महसूस किया कि कार्यस्थलों पर मशीनों से अधिक इंसानी मनोविज्ञान और व्यवहार को समझना जरूरी होता है। इसी व्यावहारिक अनुभव को अकादमिक धरातल पर समझने के लिए उन्होंने उच्च वेतन वाली नौकरी छोड़ विश्वविद्यालय में दाखिला लिया।\n\n• कार्यस्थल व्यवहार को समझने की जिज्ञासा: सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में चार दशकों तक उच्च पदों पर रहने के दौरान उन्होंने कर्मचारियों के तनाव और उत्पादकता को करीब से देखा। वे यह समझना चाहते थे कि कर्मियों के कल्याण और उनके मनोबल को मनोवैज्ञानिक रूप से कैसे बेहतर बनाया जा सकता है।\n• लंबे समय से दबी शैक्षणिक इच्छा: इंजीनियरिंग और तकनीकी सेवा में व्यस्त रहने के कारण वे मानवीय व्यवहार से जुड़े विषयों की औपचारिक पढ़ाई नहीं कर सके थे। वर्ष 2025 में कॉर्पोरेट जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद उन्हें इस व्यक्तिगत इच्छा को पूरा करने का उपयुक्त अवसर मिला।\n• विश्वविद्यालय में अध्ययन की लचीली व्यवस्था: नई शिक्षा नीति और रांची विश्वविद्यालय के नियमों के तहत बिना किसी उम्र के प्रतिबंध के उच्च शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा उपलब्ध थी। इस खुलेपन ने उन्हें औपचारिक रूप से नियमित कक्षा में नामांकित होने का मार्ग प्रशस्त किया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. डॉ. अशोक कुमार की उम्र कितनी है और वे किस विषय की पढ़ाई कर रहे हैं?\nडॉ. अशोक कुमार की उम्र 68 वर्ष है और वे रांची विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग से स्नातकोत्तर (पीजी) की नियमित पढ़ाई कर रहे हैं।\n\n2. विश्वविद्यालय में दाखिला लेने से पहले वे किस पद पर कार्यरत थे?\nवे कोल इंडिया के पूर्व जनरल मैनेजर रह चुके हैं और बाद में एक निजी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट, सीनियर वाइस प्रेसिडेंट तथा एडवाइजर के पद पर कार्यरत थे।\n\n3. उन्होंने मनोविज्ञान विषय को ही उच्च शिक्षा के लिए क्यों चुना?\nवे यह समझना चाहते थे कि कार्यस्थल पर कर्मचारियों के व्यवहार, मानसिकता और मनोबल को वैज्ञानिक रूप से कैसे समझा जाए ताकि संस्थानों में बेहतर कार्य संस्कृति बनाई जा सके।\n\n4. उन्होंने पढ़ाई शुरू करने के लिए कितने वेतन वाली नौकरी छोड़ी?\nउन्होंने एक निजी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट और एडवाइजर के पद पर मिलने वाली 4 लाख रुपये प्रति माह के वेतन वाली नौकरी को छोड़ दिया।\n\n5. डॉ. अशोक कुमार का प्रारंभिक करियर और शिक्षा कैसी रही है?\nउन्होंने 1975 में खगड़िया से मैट्रिक, 1977 में साइंस कॉलेज से इंटर और बाद में एनआईटी से इंजीनियरिंग पूरी की तथा 1985 में सीएमपीडीआई से अपना करियर शुरू किया था।\n\n6. क्या उनकी पत्नी ने भी उनके साथ दाखिला लिया है?\nउनकी पत्नी भी उनके साथ पीजी करना चाहती थीं, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते वे विश्वविद्यालय में नामांकन नहीं ले सकीं।\n\n7. डॉ. अशोक कुमार अपनी पढ़ाई और दैनिक खर्चों का प्रबंध कैसे कर रहे हैं?\nनौकरी छोड़ने के बाद वे अपनी मासिक पेंशन से अपनी पढ़ाई और परिवार के दैनिक खर्चों का प्रबंधन सहजता से कर रहे हैं।\n\n8. रांची विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष ने इस दाखिले पर क्या कहा?\nविभागाध्यक्ष डॉ. परवेज हसन ने कहा कि पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती और नई शिक्षा नीति के तहत किसी भी उम्र में रुचि के अनुसार पढ़ाई करने की सुविधा उपलब्ध है।\n\nप्रेरणा और सबक\nडॉ. अशोक कुमार की यह शैक्षणिक पहल दिखाती है कि उम्र, पद और प्रतिष्ठा कभी भी ज्ञान प्राप्ति के रास्ते में बाधा नहीं बन सकते।\n\n• सीखने की कोई उम्र नहीं होती: करियर के किसी भी पड़ाव या सेवानिवृत्ति के बाद भी नई विद्या और विधा सीखी जा सकती है। 68 वर्ष की आयु में नियमित कक्षा में जाना यह साबित करता है कि जिज्ञासा हमेशा जीवित रहनी चाहिए।\n• पद और अहंकार का त्याग: शीर्ष पदों पर रहने के बावजूद कॉलेज में खुद को एक साधारण छात्र मानना विनम्रता की मिसाल है। सीखने के लिए व्यक्ति को अपनी पुरानी उपलब्धियों के अहंकार को पीछे छोड़ना पड़ता है।\n• पैसे से बढ़कर बौद्धिक संतुष्टि: चार लाख रुपये महीने की नौकरी छोड़कर अपनी आंतरिक रुचि को प्राथमिकता देना बताता है कि मानसिक शांति और ज्ञान का मूल्य भौतिक सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक है।\n• सहयोग और अनुकूलन क्षमता: अपनी उम्र से आधे से भी कम उम्र के सहपाठियों के साथ बैठकर पढ़ना और उनसे मदद लेने में झिझक न दिखाना यह सिखाता है कि सीखने के लिए हर माहौल में ढलना जरूरी है।",
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  "publishedAt": "2026-10-24",
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