आधुनिक चाक और पग मिल ने आसान बनाई पलामू के कारीगरों की राह, दीयों की बंपर बिक्री से बढ़ी आमदनी माटी कला बोर्ड की 90 प्रतिशत अनुदान योजना से पलामू के पारंपरिक कुम्हारों को मोटर चालित चाक और पग मिल मशीनें मिली हैं, जिससे उत्पादन बढ़ने के साथ मासिक कमाई 40 हजार रुपये तक पहुंच गई है। झारखंड के पलामू जिले में पारंपरिक शिल्पकला से जुड़े ग्रामीण कारीगरों के जीवन में आधुनिक उपकरणों के आगमन से बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। माटी कला बोर्ड की पहल के तहत पारंपरिक कुम्हारों को तकनीक से लैस किया जा रहा है, जिससे उनकी शारीरिक मशक्कत में भारी कमी आई है और उत्पादों की क्षमता में तेज इजाफा हुआ है। खासकर दीपावली जैसे प्रमुख त्योहारों के समय, जब पारंपरिक मिट्टी के दीयों की मांग अपने चरम पर होती है, इन नई मशीनों की बदौलत ग्रामीण कारीगर स्थानीय और शहरी दोनों बाजारों की जरूरतों को तेजी से पूरा कर पा रहे हैं। लकड़ी के डंडे वाले चाक से लेकर मोटर चालित तकनीक तक का सफर पलामू जिले के लेस्लीगंज क्षेत्र के रहने वाले कृष्ण प्रजापति पिछले करीब छह वर्षों से मिट्टी के दीये, पारंपरिक घड़े और विभिन्न प्रकार के सजावटी सामान तैयार करने के काम में लगे हुए हैं। शुरुआती वर्षों में उनका यह काम बेहद थकाऊ और धीमी गति वाला था। वे मिट्टी के बर्तन और दीये गढ़ने के लिए लकड़ी के डंडे की सहायता से पारंपरिक चाक को हाथ से घुमाते थे। इस पुराने ढर्रे पर काम करने में चाक की रफ्तार काफी धीमी रहती थी और उसे निरंतर गतिमान बनाए रखने के लिए अत्यधिक शारीरिक ऊर्जा खर्च करनी पड़ती थी। एक बार पूरी ताकत से चाक घुमाने के बाद मुश्किल से 10 से 12 पीस ही तैयार हो पाते थे। सारा काम अकेले अपने बलबूते पर करने के कारण दिनभर में बहुत कम उत्पादन हो पाता था और समय की भी भारी बर्बादी होती थी। माटी कला बोर्ड की 90 प्रतिशत सब्सिडी योजना से मिली नई रफ्तार करीब एक वर्ष पहले सरकारी स्तर पर संचालित माटी कला बोर्ड की योजना का लाभ कृष्ण प्रजापति को मिला। इस योजना के अंतर्गत उन्हें कुल लागत पर 90 प्रतिशत के भारी अनुदान के साथ आधुनिक मोटर चालित चाक और मिट्टी मिलाने वाली पग मिल मशीन उपलब्ध कराई गई। इन दो आधुनिक मशीनों के कार्यशाला में आते ही उनके काम करने की पूरी कार्यप्रणाली ही बदल गई। पहले जहां मिट्टी को गूंधने और तैयार करने के लिए हाथों और पैरों से घंटों मशक्कत करनी पड़ती थी, वहीं अब पग मिल मशीन की सहायता से मिट्टी को एक समान और उत्तम गुणवत्ता में मिलाने का काम बेहद कम समय में पूरा हो जाता है। इसके बाद बिजली से चलने वाले मोटर चालित चाक पर बिना किसी शारीरिक थकावट के एक समान रफ्तार से मिट्टी को अलग-अलग रूप और आकार दिए जा रहे हैं। दीयों के निर्माण की प्रक्रिया और बाजार में बिक्री मिट्टी के उत्पादों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आज भी अपनी पारंपरिक गरिमा बनाए हुए है। पग मिल में तैयार मिट्टी को मोटर चालित चाक पर तराशने के बाद, गढ़े गए सभी दीयों और बर्तनों को धूप में एक से दो दिनों तक अच्छी तरह सुखाया जाता है। इसके बाद इन सूखे उत्पादों को लकड़ी जलाकर पारंपरिक आग की भट्ठी में पकाया जाता है। इस पूरी निर्माण प्रक्रिया में भले ही समय और धैर्य की आवश्यकता होती है, लेकिन मशीनों के सहयोग से टूटन कम हुई है और फिनिशिंग में जबर्दस्त सुधार आया है। कृष्ण प्रजापति वर्तमान समय में 100 रुपये में 100 मिट्टी के दीये बेच रहे हैं। उनके बनाए गए उत्पादों की आपूर्ति सिर्फ लेस्लीगंज के आसपास के ग्रामीण बाजारों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मेदिनीनगर (डालटनगंज) के प्रमुख थोक और खुदरा बाजारों में भी इनके उत्पादों की भारी खपत हो रही है। मासिक आय 30 से 40 हजार रुपये तक पहुंची तकनीक के समावेश से कारीगरों की आर्थिक स्थिति में भी ठोस सुधार दर्ज किया गया है। कृष्ण प्रजापति बताते हैं कि नियमित कामकाज से अब वे महीने में करीब 30 से 40 हजार रुपये तक की कमाई आसानी से कर लेते हैं। त्योहारी मौसम में दीयों की अत्यधिक मांग होने से उनका कारोबार और अधिक फल-फूल रहा है। आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता ने न केवल ग्रामीण कारीगरों की उत्पादकता और आय को बढ़ाया है, बल्कि युवाओं को अपनी पारंपरिक विरासत और मिट्टी कला को सम्मानजनक आजीविका के रूप में अपनाने की नई प्रेरणा भी दी है। इसका आप पर असर पारंपरिक मिट्टी शिल्प से जुड़े ग्रामीण कारीगरों के लिए आधुनिक मशीनों की उपलब्धता ने कार्यकुशलता और घरेलू आमदनी को सीधे तौर पर बढ़ा दिया है। • शारीरिक मेहनत में राहत: मोटर चालित चाक और पग मिल मिलने से कारीगरों को मिट्टी गूंधने और चाक घुमाने की भारी शारीरिक मेहनत से मुक्ति मिली है। इससे लंबे समय तक काम करने पर भी थकावट कम होती है और सेहत पर विपरीत असर नहीं पड़ता। • उत्पादन क्षमता में वृद्धि: पहले एक बार चाक घुमाने पर केवल 10 से 12 पीस बनते थे, जबकि अब लगातार गति के कारण कम समय में सैकड़ों दीये तैयार हो रहे हैं। त्योहारों के दौरान कारीगर बिना देरी किए थोक ऑर्डरों की आपूर्ति कर पा रहे हैं। • लागत और बचत: माटी कला बोर्ड द्वारा मशीनों पर 90 प्रतिशत तक का अनुदान मिलने से कारीगरों को बहुत कम पूंजी लगानी पड़ी है। न्यूनतम लागत में आधुनिक उपकरण मिलने से उनका मुनाफा सुरक्षित रहता है। • आय में स्थिरता: नियमित उत्पादन और मेदिनीनगर जैसे बड़े बाजारों तक पहुंच बनने से कुम्हारों की मासिक आमदनी 30 से 40 हजार रुपये तक पहुंच गई है। इससे पारंपरिक ग्रामीण पेशा आर्थिक रूप से टिकाऊ बन रहा है। • पलामू में: लेस्लीगंज और आसपास के कुम्हार परिवारों के लिए स्थानीय स्तर पर ही सम्मानजनक आजीविका के साधन मजबूत हुए हैं। स्थानीय कारीगर 100 रुपये में 100 दीये की किफायती दर पर उपभोक्ताओं को उत्पाद उपलब्ध करा रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ पलामू के पारंपरिक कुम्हारों के कामकाज में बदलाव सरकारी योजना के तहत आधुनिक उपकरणों पर दिए गए भारी अनुदान के कारण संभव हुआ है। • माटी कला बोर्ड का सरकारी सहयोग: राज्य सरकार की योजना के माध्यम से कारीगरों को आधुनिक तकनीक से लैस करने के लिए मोटर चालित चाक और पग मिल मशीन पर 90 प्रतिशत अनुदान दिया गया। इसी वित्तीय सहायता के कारण ग्रामीण कारीगर आधुनिक मशीनें खरीदने में सक्षम हुए। • पारंपरिक तरीकों की सीमाएं: हाथ से लकड़ी के सहारे चाक घुमाने में अत्यधिक समय और शारीरिक ताकत लगती थी, जिससे दिनभर में सीमित संख्या में ही दीये बन पाते थे। उत्पादन कम रहने से कारीगरों का मुनाफा बहुत सीमित रह जाता था। • दीपावली पर मिट्टी के सामानों की मांग: त्योहारी सीजन के दौरान दीयों और सजावटी बर्तनों की मांग अचानक कई गुना बढ़ जाती है। पुरानी तकनीक से इस मांग को पूरा करना संभव नहीं था, जिसके चलते आधुनिक तकनीक अपनाना अनिवार्य हो गया। सवाल-जवाब 1. माटी कला बोर्ड की योजना के तहत कारीगरों को क्या उपकरण मिले हैं? इस योजना के अंतर्गत कारीगरों को मोटर चालित चाक और मिट्टी मिलाने वाली पग मिल मशीन 90 प्रतिशत के सरकारी अनुदान पर उपलब्ध कराई गई है। 2. मोटर चालित चाक से पहले कृष्ण प्रजापति किस प्रकार दीये बनाते थे? पहले वे लकड़ी के डंडे की सहायता से चाक घुमाकर दीये और बर्तन बनाते थे, जिसमें एक बार चाक घुमाने पर केवल 10 से 12 पीस ही तैयार हो पाते थे। 3. मिट्टी मिलाने के लिए किस मशीन का उपयोग किया जा रहा है? कारीगर अब मिट्टी को अच्छी तरह और तेजी से मिलाने के लिए पग मिल मशीन का उपयोग कर रहे हैं, जिससे हाथ-पैर की मेहनत बचती है। 4. पलामू में तैयार मिट्टी के दीयों की बाजार कीमत क्या है? कारीगर कृष्ण प्रजापति वर्तमान समय में 100 रुपये में 100 मिट्टी के दीये बेच रहे हैं। 5. तैयार दीयों और बर्तनों की बिक्री किन बाजारों में की जा रही है? इन सामानों की बिक्री स्थानीय ग्रामीण हाटों के अलावा मेदिनीनगर (डालटनगंज) के प्रमुख बाजारों में की जा रही है। 6. आधुनिक मशीनों की मदद से कारीगर की मासिक आय कितनी हो रही है? इस काम से कृष्ण प्रजापति हर महीने लगभग 30 से 40 हजार रुपये तक की कमाई कर लेते हैं। प्रेरणा और सबक लेस्लीगंज के कृष्ण प्रजापति की कहानी दर्शाती है कि पारंपरिक कौशल को जब आधुनिक तकनीक और सरकारी मदद का साथ मिलता है, तो मेहनत सफलता में बदल जाती है। • आधुनिक तकनीक अपनाने की तत्परता: वर्षों पुरानी पारंपरिक कार्यशैली को छोड़कर नई मशीनों को अपनाना विकास की पहली सीढ़ी है। कृष्ण प्रजापति ने मोटर चालित चाक और पग मिल अपनाकर अपने काम को नई दिशा दी। • सरकारी योजनाओं की जानकारी और लाभ: प्रगति के लिए उपलब्ध योजनाओं के प्रति जागरूक रहना आवश्यक है। माटी कला बोर्ड से 90 प्रतिशत सब्सिडी लेकर उन्होंने अपने सीमित संसाधनों में आधुनिक कार्यशाला तैयार की। • परंपरा और गुणवत्ता का संतुलन: मशीनों से काम आसान करने के बावजूद उन्होंने धूप में सुखाने और भट्ठी में पकाने की पारंपरिक गुणवत्ता से समझौता नहीं किया। इसी संतुलन ने उनके उत्पादों को बड़े बाजारों में पहचान दिलाई। • कड़ी मेहनत से आत्मनिर्भरता: शारीरिक सीमाओं के आगे झुकने के बजाय कृष्ण ने उत्पादन बढ़ाया और अपनी मासिक आय 30 से 40 हजार रुपये तक पहुंचाई। यह साबित करता है कि पारंपरिक शिल्प भी सम्मानजनक कमाई का जरिया बन सकता है। https://trendkia.com/jharkhand/adhunika-chaka-aura-paga-mila-ne-asana-banai-palamu-ke-karigaron-ki-raha-diyon-ki-bnpara-bikri-se-barhi-amadani-55634 TrendKia — Har trend, sabse pehle.