बाबा बैद्यनाथ के दरबार का पचास साल पुराना मोहनभोग, सिंह दरवाजा की गली में महकती है खास मिठास देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ मंदिर के सिंह दरवाजा के पास मिलने वाला पारंपरिक मोहनभोग आधी सदी से श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों का पसंदीदा स्वाद बना हुआ है। छह से सात घंटे की धीमी आंच पर तैयार होने वाली इस मिठाई की प्रतिदिन पचास किलो तक खपत होती है। झारखंड का देवघर शहर अपनी गहरी आध्यात्मिक पहचान और बारह ज्योतिर्लिंगों में शामिल बाबा बैद्यनाथ धाम के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। वर्ष भर देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु यहां बाबा भोलेनाथ के दर्शन, जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। हालांकि देवघर की पहचान सिर्फ उसके भव्य मंदिरों, धार्मिक अनुष्ठानों और पवित्र वातावरण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां की गलियों में बसने वाली खान-पान की सदियों पुरानी परंपरा भी उतनी ही विशिष्ट है। इन संकरी गलियों में मिलने वाले कई पारंपरिक पकवान अपनी अनूठी बनावट और खास स्वाद के कारण अन्य शहरों की तुलना में बिल्कुल अलग पहचान बनाते हैं। ऐसे ही चुनिंदा और मशहूर व्यंजनों में बाबा मंदिर के सिंह दरवाजा के पास मिलने वाला मोहनभोग सबसे प्रमुख माना जाता है, जिसकी भीनी-भीनी सुगंध मंदिर परिसर से बाहर निकलने वाले हर राहगीर को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। धीमी आंच पर छह से सात घंटे की कड़ी मेहनत से संवरता है स्वाद बाबा बैद्यनाथ मंदिर के सिंह दरवाजा के समीप पहुंचते ही शुद्ध देसी घी की सोंधी महक वातावरण में घुलती महसूस होने लगती है। यह पारंपरिक मोहनभोग मुख्य रूप से उत्तम गुणवत्ता वाली सूजी, शुद्ध घी, गाढ़े खोवा और भरपूर सूखे मेवों के सटीक मिश्रण से पकाया जाता है। हलवाई इसे तैयार करने में किसी तरह की जल्दबाजी नहीं दिखाते, बल्कि इस पकवान को अपनी वास्तविक बनावट और गहरा स्वाद पाने के लिए लगभग 6 से 7 घंटे तक धीमी आंच पर लगातार भूनना और पकाना पड़ता है। यही लंबी और धैर्यपूर्ण प्रक्रिया इस मिठाई को बाजार में मिलने वाली सामान्य मिठाइयों से एकदम जुदा और खास बना देती है। बाबा मंदिर में पूजा-अर्चना संपन्न करने के बाद श्रद्धालु जब सिंह दरवाजा की ओर बढ़ते हैं, तो वे यहां रुककर गर्मागर्म ताजे मोहनभोग का आनंद लेना नहीं भूलते। इस व्यंजन की एक और बड़ी विशेषता यह है कि कई लोग इसे उपवास के दिनों में फलाहारी व्यंजन के रूप में भी चाव से खाते हैं। ज्ञानदेव जजवारे की दुकान और पांच दशकों की अटूट परंपरा सिंह दरवाजा के पास इस दुकान का संचालन करने वाले दुकानदार ज्ञानदेव जजवारे बताते हैं कि उनके यहां मोहनभोग तैयार करने का यह सिलसिला कोई नया नहीं है, बल्कि यह यात्रा 50 साल से भी अधिक पुरानी हो चुकी है। आधी सदी से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी इस दुकान पर उसी पुरानी पारंपरिक विधि और शुद्ध सामग्री के अनुपात का कड़ाई से पालन किया जा रहा है। ज्ञानदेव जजवारे के अनुसार, यह खास मिठास विशेष रूप से देवघर के सिंह दरवाजा के आसपास की गलियों में ही अपनी असली पहचान बनाए हुए है। बदलते दौर के साथ बाजार में खान-पान के कई आधुनिक विकल्प और नए स्वाद आए, परंतु मोहनभोग का वही पुराना और विश्वसनीय स्वाद आज भी पुरानी पीढ़ी से लेकर नई पीढ़ी तक के लोगों को खींच लाता है। यही कारण है कि यहां केवल स्थानीय निवासियों का ही जमावड़ा नहीं रहता, बल्कि बाहरी राज्यों और शहरों से आने वाले तीर्थयात्रियों की भी नियमित रूप से भारी भीड़ देखने को मिलती है। प्रतिदिन 50 किलो की खपत और दूर-दराज तक मांग दुकानदार के दिए गए आंकड़ों के अनुसार, इस छोटी सी दुकान पर रोजाना करीब 50 किलो मोहनभोग की खपत बहुत आसानी से हो जाती है। बाबा बैद्यनाथ के दर्शन करने पहुंचे श्रद्धालु न सिर्फ मौके पर इसका स्वाद चखते हैं, बल्कि इसे पवित्र प्रसाद मानकर डिब्बों में पैक करवाकर अपने साथ घर भी ले जाते हैं। इसके अतिरिक्त देवघर से दूर अन्य शहरों में रहने वाले कई लोग, जो किसी कारणवश मंदिर नहीं पहुंच पाते, वे भी यहां से विशेष रूप से मोहनभोग मंगवाकर इसका लुत्फ उठाते हैं। इस तरह सिंह दरवाजा की तंग गलियों में बनने वाला यह पारंपरिक स्वाद अब केवल स्थानीय भूगोल तक बंधा नहीं रह गया है, बल्कि बाहरी क्षेत्रों में भी इसकी मजबूत मांग बनी हुई है। बीस साल पुराना भरोसा और किफायती दाम दुकान पर नियमित आने वाले ग्राहक अमन द्वारी बताते हैं कि वे पिछले लगभग 20 वर्षों से निरंतर इस दुकान के मोहनभोग का आनंद ले रहे हैं। उनका अनुभव है कि शुद्ध घी और भरपूर खोवा के मेल से तैयार होने के कारण इसका स्वाद मुंह में रखते ही घुल जाता है और एक अलग ही तृप्ति देता है। मौजूदा समय में बाजार में यह पारंपरिक मोहनभोग करीब 200 रुपये प्रति किलो की किफायती दर पर उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके साथ ही इस दुकान पर मिलने वाली देवघर की गाढ़ी लस्सी और सर्दियों में गर्मागर्म गाजर का हलवा भी आने वाले ग्राहकों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। इस प्रकार बाबा की इस पावन नगरी में पूजा-अर्चना के साथ-साथ पारंपरिक व्यंजनों का लुत्फ उठाने की यह सांस्कृतिक परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी निरंतर आगे बढ़ रही है। इसका आप पर असर देवघर आने वाले तीर्थयात्रियों और पारंपरिक मिठाइयों के शौकीनों के लिए यह खबर सीधे तौर पर यात्रा और खान-पान के अनुभव से जुड़ी है। • देवघर में: बाबा मंदिर के सिंह दरवाजा के पास सिर्फ 200 रुपये प्रति किलो में शुद्ध पारंपरिक मोहनभोग उपलब्ध है। दर्शन के उपरांत तीर्थयात्री इसे ताजे प्रसाद अथवा घर ले जाने के लिए आसानी से खरीद सकते हैं। • भारत में: झारखंड के देवघर की यात्रा की योजना बना रहे श्रद्धालु अपने धार्मिक प्रवास में इस पांच दशक पुराने प्रामाणिक फलाहारी स्वाद को शामिल कर सकते हैं। यह बिना किसी मिलावट के छह से सात घंटे की पारंपरिक विधि से तैयार किया जाता है। • खाद्य गुणवत्ता: शुद्ध देसी घी, सूजी और खोवा से बनने के कारण यह उपवास के दौरान भी एक पौष्टिक और सुरक्षित फलाहारी विकल्प प्रदान करता है। व्रत रखने वाले भक्त बिना किसी संकोच के इसका उपभोग कर सकते हैं। • अन्य विकल्प: मोहनभोग के अलावा उसी दुकान पर स्थानीय लस्सी और गाजर के हलवे का भी पारंपरिक स्वाद मिलता है। पर्यटक एक ही स्थान पर देवघर के कई प्रतिष्ठित स्वादों का आनंद उठा सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ सिंह दरवाजा के पास मोहनभोग की लोकप्रियता किसी आकस्मिक प्रचार का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे पांच दशकों की निरंतरता और विशिष्ट पाक कला का इतिहास रहा है। • कठिन निर्माण प्रक्रिया: साधारण मिठाइयां जहां बहुत कम समय में तैयार हो जाती हैं, वहीं मोहनभोग को धीमी आंच पर छह से सात घंटे तक पकाया जाता है। इस सघन परिश्रम की वजह से इसका स्वाद और शुद्धता दशकों से एक समान बनी हुई है। • मंदिर का रणनीतिक स्थान: यह दुकान सीधे बाबा बैद्यनाथ मंदिर के मुख्य सिंह दरवाजा के समीप स्थित है। मंदिर से दर्शन करके बाहर निकलने वाले लाखों श्रद्धालुओं का इस मार्ग से नियमित आवागमन इसकी निरंतर बिक्री और पहचान का मुख्य जरिया बनता है। • अपरिवर्तित पारंपरिक विधि: पचास वर्षों के दौरान बाजार में कई आधुनिक बदलाव आए, लेकिन दुकानदार ज्ञानदेव जजवारे ने अपनी प्राचीन निर्माण विधि में कोई फेरबदल नहीं किया। यही प्रामाणिकता ग्राहकों के अटूट विश्वास का कारण बनी। सवाल-जवाब 1. देवघर का प्रसिद्ध मोहनभोग कहां मिलता है? यह विशेष पारंपरिक मोहनभोग बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर के सिंह दरवाजा के पास स्थित ज्ञानदेव जजवारे की दुकान पर मिलता है। 2. मोहनभोग को तैयार करने में कितना समय लगता है? इस पारंपरिक मिठाई को धीमी आंच पर पूरी तरह तैयार करने में करीब 6 से 7 घंटे की कड़ी मेहनत लगती है। 3. मोहनभोग बनाने में किन सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है? इसे मुख्य रूप से शुद्ध देसी घी, सूजी, खोवा और विभिन्न प्रकार के सूखे मेवों से तैयार किया जाता है। 4. दुकान पर रोजाना कितने किलो मोहनभोग की खपत होती है? दुकानदार के अनुसार यहां प्रतिदिन लगभग 50 किलो मोहनभोग की बिक्री हो जाती है। 5. बाजार में मोहनभोग की वर्तमान कीमत क्या है? वर्तमान में यह पारंपरिक मोहनभोग करीब 200 रुपये प्रति किलो के भाव पर उपलब्ध है। 6. क्या मोहनभोग को उपवास में खाया जा सकता है? हां, इसे फलाहारी व्यंजन के रूप में भी खाया जाता है और श्रद्धालु इसे व्रत में उपयोग करते हैं। 7. इस दुकान पर मोहनभोग के अलावा और क्या मिलता है? इस दुकान पर मोहनभोग के साथ देवघर की प्रसिद्ध लस्सी और गाजर का हलवा भी परोसा जाता है। https://trendkia.com/jharkhand/baba-baidyanath-ke-darabara-ka-pachasa-sala-purana-mohanbhog-singh-darwaza-ki-gali-men-mahakati-hai-khasa-mithasa-40429 TrendKia — Har trend, sabse pehle.