# बरसात में मवेशियों को जकड़ रहा बोवाइन एफिमिरल फीवर, जानिए अढ़ैया बुखार के लक्षण और बचाव

> मानसून के मौसम में मच्छरों और कीटों के जरिए गाय-भैंसों में अढ़ैया बुखार का खतरा बढ़ जाता है, जिससे तेज बुखार, लंगड़ापन और दूध उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-09-19 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/barasata-men-maveshiyon-ko-jakara-raha-bovine-ephemeral-fever-janie-arhaiya-bukhara-ke-lakshana-aura-bachava-33731 · **Language:** Hindi
**Tags:** अढ़ैया बुखार, बोवाइन एफिमिरल फीवर, पशुपालन, गाय भैंस बीमारी, पशु चिकित्सा, मानसून पशु देखभाल

मानसून के आगमन के साथ ही वातावरण में नमी और लगातार बारिश की वजह से दुधारू पशुओं के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है। विशेष रूप से गाय और भैंसों में इस मौसम के दौरान बोवाइन एफिमिरल फीवर के मामले तेजी से बढ़ने की आशंका रहती है। ग्रामीण और स्थानीय बोलचाल में इस बीमारी को अढ़ैया बुखार के नाम से जाना जाता है। जब कोई पशु इस रोग की चपेट में आता है, तो उसके शरीर में अत्यधिक तेज बुखार चढ़ता है, मांसपेशियों में अकड़न आ जाती है और पैरों में लंगड़ापन साफ नजर आने लगता है। इसका सीधा असर पशु की शारीरिक क्षमता और उसकी दूध देने की क्षमता पर पड़ता है, जिससे पशुपालकों को भारी आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए शुरुआती दौर में ही इसके लक्षणों को पहचानना और सतर्कता बरतना बेहद जरूरी है।

## मच्छरों और कीटों के काटने से फैलता है यह वायरल संक्रमण
चास मॉडल पशु चिकित्सालय के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. अजीत शरण ने इस रोग की प्रकृति के बारे में विस्तार से समझाया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बोवाइन एफिमिरल फीवर एक विषाणु जनित यानी वायरस से होने वाला संक्रामक रोग है। यह बीमारी सीधे तौर पर एक मवेशी से दूसरे मवेशी के छूने से नहीं, बल्कि खून चूसने वाले मच्छरों और अन्य परजीवी कीटों के जरिए फैलती है। जब कोई मच्छर या कीट पहले से संक्रमित पशु का खून चूसता है और उसके बाद किसी तंदुरुस्त पशु को काट लेता है, तो यह वायरस स्वस्थ पशु के रक्त प्रवाह में प्रवेश कर जाता है। बरसात में जलजमाव के कारण पनपने वाले कीड़े इस संक्रमण चक्र को बेहद तेजी से आगे बढ़ाते हैं।

## 106 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंच जाता है बुखार, पैरों में दिखता है लंगड़ापन
डॉ. अजीत शरण के मुताबिक इस संक्रामक बुखार के दौरान मवेशियों के शरीर का तापमान तेजी से बढ़ता है और यह करीब 106 डिग्री फारेनहाइट तक जा सकता है। यह तीव्र बुखार आमतौर पर 24 घंटे से लेकर 45 घंटे तक बना रहता है। बुखार के साथ ही पशु के पैरों में गंभीर कमजोरी और लंगड़ापन विकसित हो जाता है। इस बीमारी की एक अनोखी और खास बात यह भी देखने को मिलती है कि लंगड़ापन किसी एक पैर तक सीमित रहने के बजाय समय के साथ अलग-अलग पैरों में बदलता हुआ नजर आ सकता है। पैरों में दर्द और जोड़ों में सूजन की वजह से पशु को खड़े होने और बैठने में बहुत अधिक तकलीफ का सामना करना पड़ता है।

## पाचन पर असर और दूध उत्पादन में अचानक भारी गिरावट
संक्रमण की अवधि के दौरान पशु पूरी तरह सुस्त पड़ जाता है और वह चारा खाना काफी कम कर देता है या बिल्कुल बंद कर देता है। कई मामलों में पशु की आंखों और नाक से लगातार पानी बहने की समस्या उत्पन्न हो जाती है। इसके अतिरिक्त पाचन क्रिया बिगड़ जाने से पेट फूलने लगता है और गोबर में चिपचिपा पदार्थ यानी म्यूकस दिखाई देने लगता है। जब मवेशी खाना-पीना छोड़ देता है और तेज बुखार के कारण उसका शरीर कमजोर होने लगता है, तो दुधारू पशुओं के दूध उत्पादन में अचानक भारी गिरावट दर्ज की जाती है। यदि समय पर ध्यान न दिया जाए, तो दूध का यह नुकसान पशुपालकों की आजीविका को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।

## बरसात के दिनों में पशुशाला की सुरक्षा और देखभाल के उपाय
मवेशियों को इस बीमारी से सुरक्षित रखने के लिए पशुपालकों को अपने प्रबंधन में कुछ बुनियादी बदलाव करने चाहिए। सबसे पहले पशुओं को किसी भी हाल में गीली, कीचड़युक्त या दलदली जगह पर बांधने से बचना चाहिए। पशुशाला को हमेशा पूरी तरह साफ और सूखा बनाए रखें। पशुओं के बाड़े के आसपास किसी भी प्रकार का गंदा पानी जमा न होने दें, क्योंकि जहां नमी और गंदगी होगी, वहां मच्छर व हानिकारक कीट बड़ी संख्या में पनपेंगे और संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।

इसके अलावा बीमार या कमजोर पशुओं को ऐसा चारा देना चाहिए जो पौष्टिक होने के साथ-साथ सुपाच्य भी हो। चारे की नांद ऐसी ऊंचाई और स्थान पर रखी जानी चाहिए जहां पशु बिना अधिक झुके या दर्द सहे आसानी से पहुंच सके। मवेशियों को हमेशा स्वच्छ और ताजा पानी ही पिलाएं। बाड़े की नियमित फिनाइल या कीटनाशक से सफाई करना भी आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बुखार या लंगड़ेपन का कोई भी लक्षण दिखने पर पशुपालक अपने स्तर पर बिना सोचे-समझे घरेलू दवाएं या ओवर-द-काउंटर दवाएं न दें। तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सालय जाकर योग्य पशु चिकित्सक से जांच करानी चाहिए और उनके परामर्श के अनुसार ही पूरा उपचार शुरू करना चाहिए।

## इसका आप पर असर
बरसात के मौसम में मवेशियों में अढ़ैया बुखार फैलने से दूध उत्पादन में भारी गिरावट आती है, जिससे पशुपालकों की दैनिक कमाई सीधे तौर पर प्रभावित होती है।

- **भारत में:** ग्रामीण इलाकों में डेयरी किसान अगर समय रहते मच्छर नियंत्रण नहीं करते हैं तो दूध उत्पादन घटने से बाजार आपूर्ति और घरेलू आमदनी पर असर पड़ता है। पशुपालकों को संक्रमण के लक्षण दिखते ही बिना देरी किए पशु चिकित्सालय में संपर्क करना चाहिए ताकि समय पर दवा मिल सके।
- **बोकारो में:** चास और आसपास के पशुपालकों को मानसून के दौरान मवेशियों को गीली जमीन पर बांधने से बचना होगा। जलजमाव दूर करने और बाड़े की नियमित सफाई से स्थानीय स्तर पर मच्छरों के जरिए बीमारी का फैलाव रोका जा सकता है।
- **पशु स्वास्थ्य पर:** बुखार 106 डिग्री फारेनहाइट तक जाने और पैरों में लंगड़ापन होने से पशु कई दिनों तक चलने-फिरने में असमर्थ हो जाते हैं। समय पर सुपाच्य चारा और ताजा पानी देने से पशु को शारीरिक कमजोरी से जल्दी उबारा जा सकता है।
- **वित्तीय नुकसान से बचाव:** खुद से गलत दवा देने से बीमारी बिगड़ सकती है और इलाज का खर्च कई गुना बढ़ सकता है। डॉक्टर की देखरेख में तुरंत इलाज शुरू कराकर पशुपालक दूध उत्पादन में होने वाले भारी नुकसान को सीमित कर सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
मानसून में लगातार बारिश और वातावरण में भारी नमी के कारण मच्छरों और परजीवी कीटों की तादाद बहुत तेजी से बढ़ जाती है। यही कीट अढ़ैया बुखार के विषाणु को एक संक्रमित मवेशी से स्वस्थ मवेशी के शरीर में पहुंचाते हैं।

- **सीधा कारण:** यह संक्रमण बोवाइन एफिमिरल फीवर वायरस के कारण होता है, जो खून चूसने वाले मच्छरों और कीटों के काटने से पशु के रक्त में फैलता है। जब कोई कीट संक्रमित पशु के बाद स्वस्थ पशु को डंक मारता है, तो बीमारी का प्रसार होता है।
- **अनुकूल परिस्थितियां:** पशुशालाओं में जलभराव, अत्यधिक गंदगी और कीचड़युक्त फर्श की वजह से कीटों को पनपने के लिए मुफीद माहौल मिल जाता है। गीले और अस्वच्छ स्थानों में बंधे पशु आसानी से इन डंक मारने वाले परजीवियों का शिकार बन जाते हैं।
- **पिछला अनुभव और मौसमी चक्र:** हर साल मानसून के आगमन पर नमी बढ़ने से मवेशियों में इस तरह के वायरल बुखार के मामले सामने आते हैं। जिन इलाकों में साफ-सफाई और जल निकासी का प्रबंध नहीं होता, वहां संक्रमण का फैलाव ज्यादा तेजी से देखा जाता है।
- **संभावित परिणाम:** यदि पशुओं को समय पर एंटी-वायरल देखभाल और चिकित्सीय परामर्श न मिले, तो अत्यधिक कमजोरी और लंगड़ेपन के चलते दूध उत्पादन लंबे समय के लिए गिर जाता है। सही समय पर बाड़े की सफाई और इलाज कराने से पशु 2 से 3 दिन में स्वस्थ होने लगते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. अढ़ैया बुखार या बोवाइन एफिमिरल फीवर क्या है?
यह मवेशियों में होने वाली एक विषाणु जनित बीमारी है, जो मच्छरों और खून चूसने वाले कीटों के काटने से फैलती है।

### 2. इस बीमारी में गाय-भैंस के शरीर का तापमान कितना पहुंच सकता है?
इस बुखार में मवेशियों के शरीर का तापमान करीब 106 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंच सकता है और यह 24 से 45 घंटे तक बना रहता है।

### 3. अढ़ैया बुखार के मुख्य लक्षण क्या दिखाई देते हैं?
पशु में तेज बुखार के साथ पैरों में बदलता हुआ लंगड़ापन, आंखों व नाक से पानी आना, चारा न खाना, पेट फूलना और गोबर में म्यूकस आना इसके मुख्य लक्षण हैं।

### 4. बरसात के मौसम में पशुपालक अपने मवेशियों का बचाव कैसे करें?
पशुओं को साफ और सूखी जगह पर रखें, बाड़े के पास पानी जमा न होने दें, पौष्टिक व सुपाच्य चारा दें और लक्षण दिखने पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें।

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