झारखंड के दो छात्रों ने जंगली काश घास से तैयार किया टिकाऊ ड्रिंकिंग स्ट्रॉ, प्लास्टिक कचरे से निपटने का निकाला देसी तरीका बोकारो स्थित राजकीय पॉलिटेक्निक के छात्र श्रीशांत और खुशी ने बेकार समझे जाने वाले काश के तनों को प्राकृतिक ड्रिंकिंग स्ट्रॉ में बदल दिया है। छह महीने से एक साल तक चलने वाला यह ईको-फ्रेंडली विकल्प ग्रामीण और आदिवासी परिवारों के लिए आजीविका का नया रास्ता भी खोल सकता है। झारखंड के जंगलों, बंजर खेतों और सड़क किनारों पर स्वतः उगने वाला काश का पौधा अब पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका का बड़ा जरिया बन सकता है। बोकारो स्थित राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज, खुटरी के दो छात्रों ने इस जंगली वनस्पति के तनों का इस्तेमाल करके पीने के लिए पूरी तरह प्राकृतिक और सुरक्षित ड्रिंकिंग स्ट्रॉ तैयार किया है। छात्र श्रीशांत और छात्रा खुशी द्वारा विकसित यह नवाचार प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के साथ-साथ कागज के उन स्ट्रॉ का भी मजबूत विकल्प बनकर उभरा है जो तरल में पड़ते ही गल जाते हैं। कॉलेज प्रोजेक्ट से मिली नई राह इस विचार की शुरुआत कॉलेज के एक नियमित प्रोजेक्ट के दौरान हुई। काश के पौधों का अध्ययन करते समय श्रीशांत ने पाया कि इसका तना बाहर से ठोस और मजबूत होता है, जबकि अंदर से वह प्राकृतिक रूप से खोखला रहता है। इस विशेषता ने उनका ध्यान खींचा और उन्होंने इस पर व्यवस्थित शोध शुरू किया। कई हफ्तों तक चले परीक्षणों और प्रयोगों के बाद छात्रों ने इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि काश के तने को एक टिकाऊ और व्यावहारिक स्ट्रॉ में बदला जा सकता है। बाजार में मौजूद सामान्य पेपर स्ट्रॉ अक्सर ठंडे या गर्म पेय में कुछ ही मिनटों में नरम पड़कर बेकार हो जाते हैं, जबकि प्लास्टिक स्ट्रॉ पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। छात्रों के अनुसार, काश के तने से तैयार स्ट्रॉ ठंडे और गर्म पानी दोनों के संपर्क में आने पर भी अपने आकार और बनावट को पूरी तरह बनाए रखता है। इसके अलावा, इसकी शेल्फ लाइफ छह महीने से लेकर एक साल तक की है, जो इसे व्यावसायिक उपयोग के लिए बेहद मुफीद बनाती है। झारखंड के विभिन्न हिस्सों में काश प्राकृतिक रूप से भरपूर मात्रा में उपलब्ध है, जिससे इसके लिए कच्चा माल न्यूनतम लागत पर आसानी से जुटाया जा सकता है। निर्माण की सरल विधि काश के तने से स्ट्रॉ बनाने की प्रक्रिया को छात्रों ने बेहद सरल और पर्यावरण अनुकूल रखा है। इसके निर्माण में किसी भी प्रकार की भारी मशीनरी या महंगे बिजली उपकरणों की आवश्यकता नहीं पड़ती। पूरी प्रक्रिया को कुछ बुनियादी चरणों में पूरा किया जाता है • कच्चे माल का संग्रह: सबसे पहले खेतों और मैदानी इलाकों से काश के स्वस्थ, मोटे और सीधे तनों को छांटकर काटा जाता है। • धूप में सुखाना: एकत्र किए गए तनों की नमी पूरी तरह खत्म करने के लिए उन्हें धूप में सुखाया जाता है ताकि फफूंद या सड़न का जोखिम न रहे। • अंदर की रुकावट हटाना: सूखे हुए तने के भीतरी रेशों और प्राकृतिक रुकावटों को लोहे की एक पतली स्पोक की मदद से साफ किया जाता है, जिससे वह भीतर से पूरी तरह खुला और हवादार पाइप बन जाता है। • कटाई और सफाई: तनों को मानक स्ट्रॉ की लंबाई के अनुसार काटा जाता है, जिसके बाद उन्हें अच्छी तरह साफ करके पैकेजिंग के लिए तैयार किया जाता है। उचित ब्रांडिंग और स्वच्छता मानकों के साथ इसे सीधे होटलों, कैफे, रेस्टोरेंट, जूस कॉर्नर और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को आपूर्ति किया जा सकता है। भारी पूंजी की जरूरत न होने के कारण यह मॉडल कुटीर उद्योग के रूप में आसानी से स्थापित हो सकता है। समान मोटाई जुटाने की चुनौती इस नवाचार को बड़े पैमाने पर बाजार में उतारने की राह में कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। छात्रा खुशी ने रेखांकित किया कि प्राकृतिक रूप से उगने वाले काश के हर पौधे के तने की मोटाई और गोलाई एक जैसी नहीं होती। किसी तने का व्यास ज्यादा होता है तो किसी का कम, जिसके चलते एक तय मानक आकार के स्ट्रॉ के लिए तनों की छंटाई करना एक जटिल काम बन जाता है। हालांकि, यदि छंटाई और ग्रेडिंग की एक व्यवस्थित प्रणाली बना ली जाए, तो यह समस्या आसानी से हल हो सकती है। छात्रों का विश्वास है कि एक बार आकार का मानकीकरण हो जाने के बाद यह उत्पाद बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन और भारी मुनाफे का आधार बन सकता है। ग्रामीण परिवारों के लिए स्वरोजगार का सपना इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य केवल प्लास्टिक का विकल्प देना नहीं, बल्कि ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए नियमित आय का स्रोत बनाना भी है। झारखंड के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों और आदिवासी समूहों को यदि इस कार्य से जोड़ा जाए, तो वे अपने आसपास उगने वाले प्राकृतिक संसाधनों की मदद से आत्मनिर्भर बन सकते हैं। इसे घर-घर में छोटे स्तर पर शुरू किया जा सकता है, जिससे महिलाओं और युवाओं को अपने गांव में ही सम्मानजनक काम मिल सकेगा। शिक्षिका का सहयोग और सरकारी समर्थन की उम्मीद छात्रों के इस नवाचार को आकार देने में कॉलेज की शिक्षिका सरस्वती कश्यप ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार करने से लेकर परीक्षणों तक छात्रों का लगातार मार्गदर्शन किया। शिक्षिका का मानना है कि सरकारी स्तर पर इस विचार को प्रोत्साहन और वित्तीय सहयोग मिलना चाहिए। यदि प्रशासन और खादी या ग्रामीण विकास विभाग इस तकनीक को मान्यता देकर ग्रामीण प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शामिल करें, तो यह बड़े पैमाने पर जमीनी रोजगार पैदा करने और सिंगल-यूज प्लास्टिक को हटाने में दोहरा लाभ दे सकता है। इसका आप पर असर यह नवाचार आम उपभोक्ताओं को प्लास्टिक और गलने वाले पेपर स्ट्रॉ से मुक्ति दिलाने के साथ ग्रामीण परिवारों के लिए घर बैठे आजीविका कमाने का टिकाऊ साधन देता है। • भारत में: रेस्तरां और कैफे में सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध के बीच उपभोक्ताओं को एक मजबूत और पूरी तरह प्राकृतिक स्ट्रॉ का विकल्प मिलेगा। इससे कागजी स्ट्रॉ के जल्दी गलने की असुविधा खत्म होगी और पर्यावरण में प्लास्टिक कचरा घटेगा। • झारखंड में: जंगलों और ग्रामीण इलाकों में बहुतायत से मिलने वाली काश घास से स्थानीय आदिवासी परिवारों को नई आय मिलेगी। बिना किसी बड़ी मशीनरी के ग्रामीण अपने घरों में यह काम शुरू करके स्थानीय स्तर पर ही अपनी कमाई बढ़ा सकते हैं। • कारोबारियों के लिए: होटल, रेस्टोरेंट और जूस की दुकानों को कम लागत में छह महीने से एक साल तक चलने वाला टिकाऊ सामान मिलेगा। वे पर्यावरण अनुकूल पैकेजिंग अपनाकर अपने ग्राहकों को बेहतर अनुभव दे सकेंगे। • पर्यावरण प्रेमियों के लिए: जैविक कचरे से बना यह उत्पाद जमीन में आसानी से घुल-मिल जाता है और जल स्रोतों को नुकसान नहीं पहुंचाता। प्लास्टिक के बढ़ते ढेर को रोकने की दिशा में यह एक प्रभावी देसी कदम साबित हो सकता है। ऐसा क्यों हुआ सिंगल-यूज प्लास्टिक पर लगी पाबंदियों और पेपर स्ट्रॉ की कमजोर बनावट के कारण बाजार में एक मजबूत, सस्ते और प्राकृतिक विकल्प की तलाश लंबे समय से की जा रही थी। • प्राकृतिक बनावट की पहचान: कॉलेज प्रोजेक्ट के दौरान छात्र श्रीशांत ने गौर किया कि काश घास का तना भीतर से खाली होने के बावजूद असाधारण रूप से मजबूत होता है। इसी प्राकृतिक गुण ने छात्रों को इसे पीने वाले पाइप के रूप में ढालने के लिए प्रेरित किया। • पेपर और प्लास्टिक की कमियां: प्लास्टिक स्ट्रॉ पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाते हैं, जबकि पेपर स्ट्रॉ पेय पदार्थों में डालते ही गलकर मुड़ जाते हैं। छात्रों ने एक ऐसा विकल्प खोजने का लक्ष्य रखा जो गर्म और ठंडे दोनों तरह के पेय में अपनी मजबूती बनाए रख सके। • कच्चे माल की मुफ्त उपलब्धता: झारखंड के जंगलों, सड़कों के किनारे और खाली मैदानों में काश बहुतायत में बिना किसी मानवीय देखरेख के उगता है। इस वजह से इसे बिना किसी बड़ी पूंजीगत लागत के आसानी से इकट्ठा किया जा सकता है। सवाल-जवाब 1. काश के तने से स्ट्रॉ किसने तैयार किया है? यह स्ट्रॉ बोकारो के खुटरी स्थित राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज के छात्र श्रीशांत और छात्रा खुशी ने तैयार किया है। 2. काश से बना स्ट्रॉ पेपर स्ट्रॉ से बेहतर क्यों माना जा रहा है? यह ठंडा और गर्म दोनों तरह के पानी के संपर्क में आने पर भी गलता नहीं है और अपनी बनावट व मजबूती बनाए रखता है। 3. इस प्राकृतिक स्ट्रॉ की शेल्फ लाइफ कितनी है? छात्रों के अनुसार, काश के तने से तैयार स्ट्रॉ की शेल्फ लाइफ छह महीने से लेकर एक साल तक रहती है। 4. काश के तने से स्ट्रॉ बनाने की विधि क्या है? तनों को इकट्ठा करके सुखाया जाता है, फिर लोहे की स्पोक से अंदर की रुकावट हटाकर उसे काटा, साफ और पैक किया जाता है। 5. इस प्रोजेक्ट को बड़े स्तर पर ले जाने में मुख्य चुनौती क्या है? प्राकृतिक रूप से उगने वाले काश के तनों की मोटाई अलग-अलग होती है, इसलिए एक समान मानक आकार के तने जुटाना सबसे बड़ी चुनौती है। 6. छात्रों का इस नवाचार को लेकर मुख्य सामाजिक लक्ष्य क्या है? छात्र इस तकनीक को ग्रामीणों और आदिवासी परिवारों तक पहुंचाना चाहते हैं ताकि वे बिना मशीन के घर पर स्ट्रॉ बनाकर स्वरोजगार पा सकें। प्रेरणा और सबक बोकारो के दो पॉलिटेक्निक छात्रों ने यह साबित किया है कि आसपास बेकार समझी जाने वाली चीजों पर गौर करने से पर्यावरण और समाज दोनों की बड़ी समस्याएं सुलझाई जा सकती हैं। • स्थानीय संसाधनों में समाधान खोजें: छात्रों ने किसी महंगी प्रयोगशाला पर निर्भर रहने के बजाय अपने आसपास उगने वाली जंगली घास का अध्ययन किया और उसमें छुपा उपयोगी गुण पहचान लिया। • सादगी से बड़ी समस्याओं का हल: किसी जटिल मशीनरी के बिना केवल लोहे की स्पोक और धूप का इस्तेमाल करके उन्होंने बाजार की एक बड़ी जरूरत को पूरा करने वाला उत्पाद बना दिया। • समाज के अंतिम व्यक्ति को जोड़ना: सिर्फ मुनाफा कमाने के बजाय छात्रों ने अपनी खोज को ग्रामीण और आदिवासी परिवारों के स्वरोजगार से जोड़ने की प्राथमिकता रखी ताकि जरूरतमंदों की आमदनी बढ़ सके। • शिक्षकों के मार्गदर्शन का महत्व: कॉलेज की शिक्षिका सरस्वती कश्यप के निरंतर प्रोत्साहन और सहयोग ने छात्रों के कच्चे विचार को एक व्यावहारिक परियोजना में बदल दिया। https://trendkia.com/jharkhand/bokaro-ke-koleja-chhatron-ne-jngali-kash-ghasa-se-taiyara-kiya-drinkinga-stro-plastika-ka-desi-vikalpa-55519 TrendKia — Har trend, sabse pehle.