चाय के ठेले पर हाथ बंटाने वाले रांची के अंकित मिश्रा बने गजेटेड अफसर, यूपीएससी सीएपीएफ में पाई 236वीं रैंक रांची के रहने वाले 23 वर्षीय अंकित मिश्रा ने पारिवारिक गरीबी, पिता की नौकरी जाने के बाद चाय का ठेला लगाने और रिश्तेदारों की उपेक्षा को अपनी ताकत बनाकर यूपीएससी सीएपीएफ परीक्षा 2025 में 236वीं रैंक हासिल की है. कठिन परिस्थितियों और सीमित साधनों के बावजूद अगर मन में दृढ़ संकल्प हो, तो कोई भी मुकाम हासिल किया जा सकता है. झारखंड के रांची के रहने वाले 23 साल के अंकित मिश्रा ने इस बात को पूरी तरह साबित कर दिखाया है. आर्थिक तंगी, कच्चे मकान में गुजर-बसर, पिता की नौकरी छूटने के बाद चाय की दुकान लगाने की मजबूरी और रिश्तेदारों के तीखे व्यवहार के बीच उन्होंने अपनी लगन को कमजोर नहीं पड़ने दिया. संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी की केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) परीक्षा 2025 में ऑल इंडिया 236वीं रैंक लाकर अंकित ने क्लास-1 गजेटेड अफसर बनने की उपलब्धि हासिल की है. गरीबी के बीच बीता बचपन और स्कूली शिक्षा की चुनौती अंकित मिश्रा का बचपन बेहद साधारण और अभावों से घिरे माहौल में बीता. उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि उनके पास रहने के लिए अपना पक्का मकान तक नहीं था. उनके पिता एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षक के तौर पर पढ़ाते थे, जिससे मिलने वाली मामूली आमदनी से किसी तरह घर का खर्च चलता था. इन तमाम मुश्किलों के बीच भी अंकित ने कभी अपनी पढ़ाई को प्रभावित नहीं होने दिया. वे शुरू से ही मेधावी छात्र रहे और 10वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में पूरे जिले में अव्वल आए. इसके बाद जब उनका दाखिला अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में हुआ, तो भाषा और नए माहौल के साथ सामंजस्य बिठाना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया. हालांकि, अपनी कड़ी मेहनत के बल पर उन्होंने 11वीं और 12वीं में भी शानदार अंक हासिल किए और यह दिखा दिया कि प्रतिभा किसी संसाधन की मोहताज नहीं होती. रिश्तेदार की शादी का बहिष्कार बना जीवन का निर्णायक मोड़ हर सफल व्यक्ति के जीवन में कोई ऐसा अनुभव जरूर आता है जो उसकी दिशा बदल देता है. अंकित के साथ भी ऐसा ही एक वाकया पेश आया. परिवार की कमजोर माली हालत और चाय बेचने के काम को देखकर एक रिश्तेदार ने उन्हें और उनके माता-पिता को शादी के समारोह में आमंत्रित तक नहीं किया. इस उपेक्षा और अपमानजनक व्यवहार ने अंकित के मन को भीतर तक झकझोर दिया. उसी दिन उन्होंने यह संकल्प लिया कि वे समाज के इस संकीर्ण नजरिए को अपनी मेहनत और सफलता से बदलकर दिखाएंगे. यह टीस उनके भीतर एक गहरी जिद बन गई, जिसने उन्हें सिविल सेवा परीक्षा की कठिन राह पर आगे बढ़ने का अटूट हौसला दिया. कोविड काल का संकट और जिम्मेदारियों का बोझ साल 2020 में जब कोरोना महामारी का दौर शुरू हुआ, तो देश भर के कई परिवारों की तरह अंकित के परिवार पर भी बड़ा आर्थिक संकट टूट पड़ा. उनके पिता की प्राइवेट स्कूल वाली नौकरी छूट गई, जिससे घर का चूल्हा जलना भी मुश्किल हो गया. ऐसे नाजुक मोड़ पर अंकित ने खुद को बिखरने नहीं दिया. उन्होंने घर-घर जाकर छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया ताकि परिवार को सहारा मिल सके. ट्यूशन से होने वाली छोटी-छोटी बचत से उन्होंने अपने पिता को चाय का ठेला लगाने में भी मदद की. वे खुद भी दुकान के कामकाज में हाथ बंटाते और बचे हुए समय में अपनी पढ़ाई को पूरी निष्ठा से जारी रखते. एक तरफ घर चलाने की फिक्र और दूसरी तरफ अपनी पढ़ाई का तालमेल बिठाना बेहद चुनौतीपूर्ण था, लेकिन वे पीछे नहीं हटे. दिल्ली का सफर, नाकामी से सीख और अंतिम सफलता कालेज की पढ़ाई पूरी करने के दौरान जहां अधिकांश युवा मौज-मस्ती और दोस्तों के साथ समय बिताने में व्यस्त रहते हैं, वहीं अंकित ने अनुशासन और संयम की राह चुनी. उन्होंने बाहरी दुनिया से दूरी बनाकर अपना पूरा ध्यान लक्ष्य पर केंद्रित कर दिया. इसके बाद वे आगे की तैयारी के लिए दिल्ली पहुंचे. बड़े और महंगे कोचिंग संस्थानों की फीस भरने की क्षमता न होने के कारण उन्होंने पुराने नोट्स और चुनिंदा किताबों की मदद से अपनी रणनीति तैयार की. अपने पहले प्रयास में वे अंतिम चयन से महज 7 अंकों से चूक गए थे. इस नाकामी से निराश होने के बजाय उन्होंने अपनी कमियों को सुधारा. आखिरकार, अपनी शारीरिक और मानसिक चुनौतियों पर विजय पाते हुए उन्होंने 2025 की सीएपीएफ परीक्षा में ऑल इंडिया 236वीं रैंक हासिल की और महज 23 साल की आयु में राजपत्रित अधिकारी बनकर इतिहास रच दिया. इसका आप पर असर अंकित मिश्रा की यह यात्रा दिखाती है कि आर्थिक तंगी या सामाजिक भेदभाव किसी भी युवा के बड़े सपनों की राह में स्थायी रुकावट नहीं बन सकते. • सीमित संसाधनों में तैयारी: महंगे कोचिंग संस्थानों के बिना भी पुराने नोट्स और एकाग्रता के बल पर बड़ी राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में शीर्ष स्थान हासिल किया जा सकता है. छात्रों को महंगे संस्थानों पर निर्भर रहने के बजाय सेल्फ स्टडी और सही दिशा पर भरोसा रखना चाहिए. • असफलता से सीख: पहले प्रयास में सिर्फ 7 अंकों से चूकने के बाद भी निरंतर अभ्यास जारी रखकर सफलता पाई जा सकती है. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं को एक विफलता के बाद हिम्मत हारने से बचना चाहिए. • पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ पढ़ाई: ट्यूशन पढ़ाने और पारिवारिक व्यवसाय में मदद करते हुए भी सिविल सेवा की तैयारी को संतुलित किया जा सकता है. यह कहानी साबित करती है कि समय प्रबंधन से रोजगार और अध्ययन दोनों एक साथ संभव हैं. • नकारात्मक अनुभवों का सकारात्मक उपयोग: सामाजिक उपेक्षा या अपमान को अपनी हीनभावना बनाने के बजाय उसे मेहनत और लक्ष्य प्राप्ति का ईंधन बनाया जा सकता है. प्रतिकूल परिस्थितियों से गुजर रहे युवाओं के लिए यह एक व्यावहारिक सीख है. ऐसा क्यों हुआ यह सफलता वर्षों की कड़ी मेहनत, प्रतिकूल पारिवारिक परिस्थितियों और सामाजिक अपमान से उपजी गहरी जिद का परिणाम है. • निर्णायक अपमान का असर: एक रिश्तेदार द्वारा शादी समारोह में केवल इसलिए न बुलाना क्योंकि परिवार गरीब था और चाय बेचता था, अंकित के लिए जीवन की दिशा बदलने वाला धक्का साबित हुआ. इसी चोट ने उनके भीतर अफसर बनने का दृढ़ संकल्प जगाया. • कोरोना काल का आर्थिक संकट: 2020 में पिता की प्राइवेट नौकरी जाने के बाद परिवार के सामने आजीविका का बड़ा संकट खड़ा हो गया था. इस आपात स्थिति ने अंकित को बच्चों को पढ़ाने और पिता के चाय के ठेले पर काम करने के लिए मजबूर किया, जिसने उनके धैर्य को तराशा. • रणनीतिक सुधार: पहले प्रयास में महज 7 अंकों से चयन से वंचित रह जाने के बाद अंकित ने अपनी कमजोरियों की पहचान की और उन्हें दूर कर 2025 में 236वीं रैंक हासिल की. सवाल-जवाब 1. अंकित मिश्रा ने कौन सी परीक्षा पास की है और उनकी रैंक क्या रही? अंकित मिश्रा ने यूपीएससी सीएपीएफ 2025 परीक्षा में ऑल इंडिया 236वीं रैंक हासिल की है. 2. अंकित मिश्रा किस शहर के रहने वाले हैं? अंकित मिश्रा झारखंड के रांची के रहने वाले हैं. 3. अंकित मिश्रा के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट क्या था? एक रिश्तेदार ने आर्थिक तंगी और चाय बेचने के कारण उनके परिवार को शादी में नहीं बुलाया था, जिसके अपमान ने उन्हें अफसर बनने की प्रेरणा दी. 4. कोविड-19 के दौरान अंकित के परिवार पर क्या संकट आया था? साल 2020 में उनके पिता की प्राइवेट स्कूल शिक्षक की नौकरी चली गई थी, जिसके बाद अंकित ने ट्यूशन पढ़ाकर और चाय का ठेला लगाने में पिता की मदद की. 5. क्या अंकित मिश्रा ने पहले प्रयास में ही यह परीक्षा पास कर ली थी? नहीं, वे अपने पहले प्रयास में फाइनल सिलेक्शन से महज 7 अंकों से चूक गए थे और बाद में 2025 की परीक्षा में सफल हुए. 6. अंकित मिश्रा ने परीक्षा की तैयारी के लिए किन साधनों का इस्तेमाल किया? उन्होंने महंगे कोचिंग संस्थानों के बजाय पुराने नोट्स और सीमित किताबों के सहारे दिल्ली में रहकर अपनी रणनीति बनाई थी. प्रेरणा और सबक अंकित मिश्रा का जीवन संघर्ष और सफलता युवाओं को यह सिखाती है कि बाधाएं कितनी भी बड़ी हों, अनुशासन और धैर्य से उन्हें पार किया जा सकता है. • अपमान को संकल्प में बदलना: दूसरों की उपेक्षा या कड़वे व्यवहार से निराश होने के बजाय उसे अपनी सबसे बड़ी प्रेरणा बनाएं. • संसाधनों से बड़ा जज्बा: महंगे संस्थानों या आलीशान सुविधाओं के अभाव को अपनी कमजोरी न बनने दें, सीमित साधनों में भी सर्वश्रेष्ठ परिणाम दिए जा सकते हैं. • जिम्मेदारियों से न भागना: परिवार के कठिन समय में सहारा बनना और अपनी पढ़ाई को भी जारी रखना चरित्र और इच्छाशक्ति को मजबूत करता है. • असफलता के बाद वापसी: मामूली अंकों से लक्ष्य से चूकने पर टूटने के बजाय नए सिरे से मेहनत कर इतिहास रचा जा सकता है. https://trendkia.com/jharkhand/chaya-ke-thele-para-hatha-bntane-vale-ranchi-ke-ankit-mishra-bane-gajeteda-aphasara-upsc-capf-men-pai-236vin-rainka-45949 TrendKia — Har trend, sabse pehle.