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  "type": "article",
  "title": "स्क्रीन की लत छुड़ाने जमशेदपुर पहुंचे चित्रकूट के लकड़ी के खिलौने, बच्चों में बढ़ा क्रेज",
  "summary": "उत्तर प्रदेश के चित्रकूट से पारंपरिक काष्ठ खिलौने लेकर जमशेदपुर पहुंचे हिमांशु के स्टॉल पर बच्चों की भारी भीड़ उमड़ रही है। बिना बैटरी और स्क्रीन वाले ये हस्तनिर्मित खिलौने बच्चों के मानसिक विकास और एकाग्रता को निखार रहे हैं।",
  "content": "स्मार्टफोन, इंटरनेट वीडियो और सोशल मीडिया रील्स की दुनिया में उलझे बच्चों को वास्तविक खेलकूद की ओर लौटाने की एक अनोखी पहल जमशेदपुर में देखने को मिल रही है। उत्तर प्रदेश स्थित चित्रकूट धाम से आए हिमांशु शहर में लकड़ी के पारंपरिक और आकर्षक खिलौने लेकर पहुंचे हैं। आधुनिक गैजेट्स के दौर में काष्ठ कला से बने ये खिलौने बच्चों का ध्यान अपनी ओर खींचने में पूरी तरह कामयाब हो रहे हैं। इन खिलौनों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि बच्चों की मानसिक एकाग्रता, रचनात्मक सोच और शारीरिक संतुलन को बेहतर बनाने में भी मदद करते हैं।\n\nकारीगरों के हुनर और मेहनत से तराशे गए उत्पाद\nहिमांशु के अनुसार, आज के समय में छोटे बच्चों की दिनचर्या का एक बड़ा हिस्सा मोबाइल फोन की स्क्रीन के सामने बीत जाता है। ऐसे माहौल में हस्तनिर्मित लकड़ी के खिलौने बच्चों को स्क्रीन की आभासी दुनिया से बाहर निकालकर एक नया और स्वाभाविक अनुभव प्रदान करते हैं। यहां प्रदर्शित खिलौनों में लकड़ी से तैयार बेब्लेड, फिरकनी यानी लट्टू, पक्षियों की मधुर आवाज निकालने वाली विशेष सीटियां, तीर-धनुष और विभिन्न प्रकार के दिमागी पजल बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं। इन सभी खिलौनों का निर्माण चित्रकूट और उसके नजदीकी इलाकों के कुशल कारीगरों द्वारा पूरी तरह हाथों से किया जाता है। एक-एक खिलौने को तराशने, उसे चिकना रूप देने और उस पर प्राकृतिक रंगों की फिनिशिंग करने में शिल्पकार अपनी पीढ़ियों पुरानी पारंपरिक कला का इस्तेमाल करते हैं।\n\nमानसिक विकास और आंखों व हाथों का सटीक समन्वय\nइस प्रदर्शनी में अलग-अलग आयु वर्ग के बच्चों के लिए विशेष उत्पाद रखे गए हैं। नन्हे बच्चों के लिए लकड़ी की गाड़ियां, रंग-बिरंगे ब्लॉक्स, संतुलन बनाने वाले बैलेंसिंग गेम्स और मैग्नेटिक रोलर कोस्टर उपलब्ध कराए गए हैं। मैग्नेटिक रोलर कोस्टर की सहायता से बच्चे एकाग्रचित्त होकर वस्तुओं की दिशा और गति को समझना सीखते हैं। वहीं लकड़ी के जटिल पजल को हल करते समय बच्चों में तर्कशक्ति और किसी समस्या का समाधान खोजने का कौशल विकसित होता है। इसके अलावा लट्टू नचाने और बेब्लेड घुमाने जैसी गतिविधियों से बच्चों के हाथों की मांसपेशियों और आंखों के बीच का तालमेल (हैंड-आई कोऑर्डिनेशन) काफी मजबूत होता है।\n\nस्क्रीन और बैटरी की झंझट से पूरी तरह मुक्त\nखिलौनों की इस श्रृंखला में लकड़ी के हाथी, घोड़े, रेलगाड़ी, छोटी कारें, घूमने वाला चक्र, पारंपरिक झुनझुने और रिंग फेंकने वाले खेल भी शामिल हैं। इन खिलौनों की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि इनमें किसी प्रकार की इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन, चिप या बैटरी की जरूरत नहीं पड़ती। कई खेल ऐसे तैयार किए गए हैं जिन्हें बच्चे अकेले खेलने के स्थान पर अपने भाई-बहनों और मित्रों के समूह में खेल सकते हैं। इससे बच्चों में आपसी संवाद, साझा करने की भावना और मिलजुलकर खेलने की सामाजिक आदतें भी विकसित होती हैं। मशीन निर्मित प्लास्टिक के खिलौनों की तुलना में ये उत्पाद बच्चों को भारतीय लोककला और सांस्कृतिक धरोहर के करीब ले जाने का माध्यम बन रहे हैं।\n\nगोपाल मैदान में लगा है विशेष स्टॉल\nमाता-पिता के लिए भी अपने बच्चों को गैजेट्स की लत से बचाने के लिहाज से ये खिलौने एक बेहतरीन और सुरक्षित विकल्प साबित हो रहे हैं। जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में आयोजित प्रदर्शनी में हिमांशु का यह स्टॉल लगाया गया है। यह प्रदर्शनी दोपहर 1 बजे से लेकर रात 10 बजे तक आम लोगों के लिए खुली रहती है। स्थानीय अभिभावक और बच्चे अगले 15 दिनों तक यहां जाकर इन पारंपरिक हस्तनिर्मित काष्ठ खिलौनों को देख और खरीद सकते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nयह प्रदर्शनी अभिभावकों और बच्चों को स्क्रीन की लत से दूर ले जाकर सुरक्षित और रचनात्मक विकल्प मुहैया कराती है।\n\n• जमशेदपुर के निवासियों के लिए: बिष्टुपुर के गोपाल मैदान में अगले 15 दिनों तक चलने वाली इस प्रदर्शनी में दोपहर 1 बजे से रात 10 बजे तक जाकर खरीदारी की जा सकती है। माता-पिता अपने बच्चों को हस्तनिर्मित भारतीय खिलौने दिलाकर स्थानीय दस्तकारों को बढ़ावा दे सकते हैं।\n• बच्चों के मानसिक विकास पर: बिना स्क्रीन और बैटरी वाले ये लकड़ी के खिलौने एकाग्रता और हाथ-आंख के तालमेल को सुधारने में मददगार हैं। जटिल पजल और बैलेंसिंग गेम से बच्चों में तार्किक सोच और समस्या निवारण क्षमता का विकास होता है।\n• सामाजिक व्यवहार में सुधार: समूह में खेले जाने वाले लकड़ी के खेल बच्चों में आपसी संवाद और साझेदारी की आदत बढ़ाते हैं। इससे अकेले मोबाइल देखने की प्रवृत्ति पर प्रभावी रोक लगती है।\n• सुरक्षित और टिकाऊ सामग्री: पारंपरिक लकड़ी के खिलौने प्लास्टिक और केमिकल मुक्त होने के कारण छोटे बच्चों के स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित हैं। साथ ही यह कला बच्चों को भारतीय हस्तशिल्प और लोक संस्कृति से जोड़ती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nस्मार्टफोन और डिजिटल स्क्रीन्स पर बच्चों की बढ़ती निर्भरता के बीच पारंपरिक कारीगर प्राकृतिक और शिक्षाप्रद विकल्प लेकर सामने आ रहे हैं।\n\n• स्क्रीन टाइम का अत्यधिक बढ़ना: आजकल बच्चे दिनभर मोबाइल फोन, ऑनलाइन गेम्स और वीडियो रील्स में उलझे रहते हैं, जिससे उनकी शारीरिक सक्रियता घट रही है। इसी समस्या को देखते हुए चित्रकूट के कारीगरों ने बच्चों का ध्यान वास्तविक खेल की ओर मोड़ने का प्रयास किया है।\n• पारंपरिक काष्ठ कला को बढ़ावा देना: चित्रकूट धाम क्षेत्र में कुशल शिल्पकार पीढ़ियों से लकड़ी के खिलौने तैयार करते आ रहे हैं। बड़े शहरों और प्रदर्शनियों में स्टॉल लगाने से इन ग्रामीण दस्तकारों को सीधा बाजार और उचित पारिश्रमिक मिलता है।\n• शिक्षाप्रद खिलौनों की मांग: अभिभावक ऐसे खिलौनों की तलाश में रहते हैं जो बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ उनके दिमागी विकास में भी योगदान दें। इस मांग को पूरा करने के लिए कारीगरों ने बैलेंसिंग गेम्स, मैग्नेटिक रोलर कोस्टर और पजल जैसे बौद्धिक खिलौने तैयार किए हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. जमशेदपुर में लकड़ी के खिलौने कहां से लाए गए हैं?\nये विशेष पारंपरिक लकड़ी के खिलौने उत्तर प्रदेश के चित्रकूट धाम से लाए गए हैं।\n\n2. जमशेदपुर में यह प्रदर्शनी किस स्थान पर लगी है?\nयह प्रदर्शनी जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में आयोजित की जा रही है।\n\n3. प्रदर्शनी का समय क्या है और यह कितने दिनों तक चलेगी?\nस्टॉल दोपहर 1:00 बजे से रात 10:00 बजे तक खुले रहते हैं और यह प्रदर्शनी अगले 15 दिनों तक जारी रहेगी।\n\n4. इस स्टॉल पर किस तरह के खिलौने उपलब्ध हैं?\nयहां लकड़ी के लट्टू, बेब्लेड, सीटी, तीर-धनुष, पजल, मैग्नेटिक रोलर कोस्टर, कार, हाथी, घोड़े और बैलेंसिंग गेम उपलब्ध हैं।\n\n5. ये खिलौने बच्चों के विकास में कैसे सहायक हैं?\nये खिलौने बच्चों की एकाग्रता, समस्या सुलझाने की क्षमता और हाथ-आंख के समन्वय (हैंड-आई कोऑर्डिनेशन) को बेहतर बनाते हैं।\n\n6. क्या इन खिलौनों में बैटरी या स्क्रीन का इस्तेमाल होता है?\nनहीं, ये पूरी तरह हस्तनिर्मित लकड़ी के खिलौने हैं जिनमें किसी बैटरी या इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन की आवश्यकता नहीं होती।\n\nप्रेरणा और सबक\nचित्रकूट के हिमांशु और क्षेत्रीय कारीगरों का यह प्रयास दिखाता है कि पारंपरिक हुनर को आधुनिक जरूरतों के अनुसार ढालकर समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।\n\n• समस्या का रचनात्मक समाधान: बच्चों की स्क्रीन लत की आधुनिक समस्या का समाधान खोजने के लिए कारीगरों ने प्राचीन काष्ठ शिल्प का प्रभावी उपयोग किया। उद्यमी अपनी पारंपरिक विद्या से भी समकालीन चुनौतियों का उत्तर ढूंढ सकते हैं।\n• मेहनत और हस्तशिल्प का सम्मान: मशीनी दौर में भी हाथों से की गई नक्काशी और फिनिशिंग की महत्ता बरकरार है। लगन और प्रामाणिक हुनर से बने उत्पादों की कद्र आज भी बाजार में होती है।\n• सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव: विदेशी और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के मुकाबले स्थानीय खिलौनों को लोकप्रिय बनाकर कारीगर अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रख रहे हैं। अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सहेजना नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक है।",
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  "category": "झारखंड",
  "publishedAt": "2026-09-21",
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