# देवघर के गोपीडीह में मनरेगा और सिंचाई योजना से सुधरे हालात, किसान ने शुरू की गन्ना, पपीता और हल्दी की पैदावार

> झारखंड के देवघर जिले स्थित गोपीडीह गांव में सिंचाई की पुख्ता व्यवस्था होने से बंजर जैसी जमीन पर नकदी फसलों की पैदावार शुरू हो गई है। मनरेगा और सिंचाई योजना के तहत बने तीन कुओं ने बारिश पर निर्भरता खत्म कर किसानों के लिए आय के नए रास्ते खोल दिए हैं।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-10-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/deoghar-ke-gopidih-men-mgnrega-aura-sinchai-yojana-se-sudhare-halata-kisana-ne-shuru-ki-ganna-papita-aura-haldi-ki-paidavara-42226 · **Language:** Hindi
**Tags:** देवघर, गोपीडीह, मनरेगा, सिंचाई योजना, झारखंड कृषि, गन्ना की खेती, हल्दी की खेती, पपीता की खेती

झारखंड के देवघर जिले में स्थित गोपीडीह गांव के किसान अम्बिका के लिए खेती अब घाटे का सौदा नहीं रही। उनके पास लगभग 4 से 5 एकड़ कृषि योग्य भूमि मौजूद है, लेकिन कुछ वर्ष पहले तक यह पूरी जमीन पानी के अभाव में बेकार साबित हो रही थी। खेतों तक पानी पहुंचाने का कोई स्थायी साधन न होने के कारण उन्हें पूरी तरह मानसूनी बारिश पर ही निर्भर रहना पड़ता था। जिन फसलों को नियमित पटवन की आवश्यकता होती थी, किसान चाहकर भी उन्हें अपने खेतों में नहीं लगा पाते थे। जमीन का मालिकाना हक होने के बावजूद पर्याप्त सिंचाई नेटवर्क न होने से उसका वाजिब आर्थिक लाभ परिवार को नहीं मिल पा रहा था।

## मनरेगा और सिंचाई योजना से हुआ तीन कुओं का निर्माण
जल संकट के इस लंबे दौर के बीच सरकारी योजनाओं के तालमेल ने किसान की तकदीर बदलने की नींव रखी। अम्बिका को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) और सरकारी सिंचाई योजना के संयुक्त प्रावधानों के जरिए तीन पक्के कुओं की सुविधा उपलब्ध कराई गई। इन कुओं का निर्माण कार्य पूरा होते ही खेतों तक नियमित पानी पहुंचाने की व्यवस्था पूरी तरह सुदृढ़ हो गई। खेतों के पास ही जल स्रोत तैयार हो जाने से अब फसलों की बुआई के लिए आकाश की ओर टकटकी लगाकर बारिश का इंतजार करने की मजबूरी समाप्त हो गई। जब भी फसल को पानी की जरूरत होती है, किसान तुरंत पटवन का प्रबंध कर लेते हैं।

## पारंपरिक ढर्रे से हटकर नकदी फसलों का चुनाव
सिंचाई की पुख्ता सुविधा मिलने के बाद अम्बिका ने अपनी 4 से 5 एकड़ जमीन पर फसल चक्र को पूरी तरह बदल दिया है। अब वे अपने खेतों में पारंपरिक खेती के स्थान पर बाजार की मांग और मौसम के अनुकूल नकदी फसलें उगा रहे हैं। वर्तमान में उनके खेतों में गन्ने की खेती के साथ-साथ बड़े पैमाने पर पपीता भी लगाया गया है। इसके अलावा उन्होंने अतिरिक्त आमदनी सुनिश्चित करने के लिए हल्दी की खेती भी सफलतापूर्वक शुरू की है। विभिन्न प्रकार की इन फसलों के उत्पादन से किसान के लिए साल भर कमाई के कई स्वतंत्र रास्ते खुल गए हैं।

## गोपीडीह क्षेत्र में 45 से 50 एकड़ भूमि पर बढ़ा भरोसा
अम्बिका के अनुसार, सरकारी मदद का सबसे बड़ा सकारात्मक असर यह हुआ है कि अब किसी भी मौसम में खेत को परती या बेकार छोड़ने की नौबत नहीं आती। पानी का स्थायी बंदोबस्त होने से खेती में पूंजी और श्रम लगाने का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ गया है। इस सफल बदलाव की गूंज पूरे इलाके में सुनाई दे रही है और गोपीडीह में 45 से 50 एकड़ के दायरे में फैली कृषि भूमि पर भी काश्तकारी की गतिविधियों में तेजी आई है। जो जमीन कभी सिंचाई के अभाव में वीरान नजर आती थी, आज उसी मिट्टी से गन्ना, पपीता और हल्दी जैसी उपज लेकर किसान बेहतर मुनाफे की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।

## इसका आप पर असर
सरकारी योजनाओं से सिंचाई के स्थायी साधन विकसित करने से छोटे किसानों की बारिश पर निर्भरता समाप्त होती है और वे नकदी फसलों से अपनी आमदनी कई गुना बढ़ा सकते हैं।

- **भारत में:** मनरेगा और सरकारी सिंचाई योजनाओं का लाभ उठाकर किसान अपने खेतों में कुएं और जल संरचनाएं बनवा सकते हैं। इससे भूजल का समुचित उपयोग करके साल भर में दो से तीन फसलें लेना संभव हो जाता है।
- **देवघर में:** गोपीडीह और आसपास के गांवों में 45 से 50 एकड़ भूमि पर पानी का प्रबंध होने से जमीन बेकार नहीं छूटेगी। स्थानीय किसान अब पारंपरिक अनाज के बजाय गन्ना, पपीता और हल्दी जैसी नकदी फसलें बेचकर बाजार से बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।
- **फसल विविधीकरण:** एक ही फसल पर निर्भर रहने का जोखिम खत्म होता है और अलग-अलग फसलों से पूरे साल नकदी प्रवाह बना रहता है। किसान बाजार की मांग देखकर अपनी बुआई का फैसला स्वतंत्र रूप से कर सकते हैं।
- **बंजर जमीन का उपयोग:** जिन खेतों में पानी की कमी से खेती बंद हो गई थी, वे दोबारा उपजाऊ बन जाते हैं। इससे ग्रामीण इलाकों में पलायन रुकता है और स्थानीय स्तर पर कृषि रोजगार बढ़ता है।

## ऐसा क्यों हुआ
गोपीडीह में कृषि संकट का मुख्य कारण खेतों में पानी पहुंचाने की किसी स्थायी व्यवस्था का न होना था, जिसे सरकारी योजनाओं के संयुक्त सहयोग से दूर किया गया।

- **सिंचाई की अनुपलब्धता:** किसान के पास 4 से 5 एकड़ जमीन होने के बावजूद पानी का कोई पक्का स्रोत नहीं था। इस वजह से खेती पूरी तरह मानसूनी बारिश पर टिकी थी और नियमित पानी मांगने वाली फसलें लगाना असंभव था।
- **सरकारी योजनाओं का समन्वय:** मनरेगा और सिंचाई योजना के तहत किसान को तीन कुओं की स्वीकृति मिली। इनके निर्माण से खेतों के पास ही भरपूर पानी उपलब्ध हो गया और पानी का संकट हमेशा के लिए खत्म हो गया।
- **फसल प्रणाली में बदलाव:** पानी की निश्चित आपूर्ति मिलने के बाद किसान ने जोखिम उठाकर नकदी फसलों का रुख किया। गन्ना, पपीता और हल्दी जैसी फसलों की बुआई से जमीन का व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू हो सका।
- **व्यापक असर:** इस व्यक्तिगत सफलता से प्रेरित होकर पूरे गोपीडीह में 45 से 50 एकड़ क्षेत्र में खेती का रकबा और किसानों का भरोसा मजबूत हुआ है।

## सवाल-जवाब

### 1. यह मामला किस जिले और गांव का है?
यह मामला झारखंड के देवघर जिले के अंतर्गत आने वाले गोपीडीह गांव का है।

### 2. किसान अम्बिका के पास कुल कितनी खेती योग्य जमीन है?
किसान अम्बिका के पास लगभग 4 से 5 एकड़ खेती की जमीन मौजूद है।

### 3. पहले इस जमीन पर खेती करना क्यों मुश्किल था?
खेत में पटवन या सिंचाई का कोई स्थायी साधन नहीं था, जिसके चलते खेती केवल बारिश होने पर ही संभव हो पाती थी।

### 4. किसान को किन सरकारी योजनाओं से मदद मिली?
किसान को सरकारी सिंचाई योजना और मनरेगा के तहत तीन कुओं की सुविधा का लाभ मिला।

### 5. कुएं बनने के बाद किसान ने कौन-कौन सी फसलें लगाना शुरू किया?
सिंचाई की व्यवस्था होने के बाद किसान ने मौसम के हिसाब से गन्ना, पपीता और हल्दी की फसलें लगाना शुरू किया।

### 6. गोपीडीह में कुल कितने क्षेत्र में खेती की गतिविधियां आगे बढ़ रही हैं?
गोपीडीह गांव में लगभग 45 से 50 एकड़ के दायरे में मौजूद कृषि भूमि पर अब खेती का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है।

## प्रेरणा और सबक
अम्बिका की कहानी यह साबित करती है कि सही सरकारी मदद और योजनाबद्ध मेहनत से पानी की कमी से जूझ रही बंजर जमीन को भी मुनाफे के केंद्र में बदला जा सकता है।

- **सरकारी योजनाओं का लाभ उठाएं:** केवल संसाधनों की कमी का रोना रोने के बजाय मनरेगा और सिंचाई योजनाओं जैसी कल्याणकारी नीतियों की जानकारी लेकर उनका सक्रिय लाभ लेना चाहिए।
- **परंपरागत ढर्रे से बाहर निकलें:** सिर्फ बारिश के भरोसे पारंपरिक फसलें उगाने के बजाय बाजार की जरूरत के हिसाब से गन्ना, हल्दी और पपीता जैसी नकदी फसलों का चुनाव करें।
- **संसाधनों का पूर्ण उपयोग:** उपलब्ध जमीन को परती या बेकार छोड़ने के बजाय साल भर चलने वाले फसल चक्र की योजना बनाएं ताकि आमदनी के निरंतर साधन बने रहें।
- **धैर्य और विविधीकरण:** एक ही फसल पर सारा दांव लगाने के बजाय बहु-फसली मॉडल अपनाएं, जिससे मौसम या बाजार का जोखिम कम हो सके।

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