# देवघर के गोपीडीह में सिंचाई सुविधा मिलने से बंजर जमीन पर लहलहाने लगीं फसलें, किसानों ने शुरू की गन्ने और पपीते की खेती

> देवघर जिले के गोपीडीह गांव में मनरेगा और सरकारी सिंचाई योजना के सहयोग से कुओं का निर्माण होने के बाद किसानों ने गन्ने, पपीते और हल्दी की बहुफसली खेती शुरू कर दी है.

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-09-23 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/deoghar-ke-gopidih-men-sinchai-suvidha-milane-se-bnjara-jamina-para-lahalahane-lagin-phasalen-kisanon-ne-shuru-ki-ganne-aura-papit-36923 · **Language:** Hindi
**Tags:** देवघर, गोपीडीह, सिंचाई योजना, मनरेगा, गन्ना की खेती, पपीता की खेती, झारखंड किसान

झारखंड के देवघर जिले में स्थित गोपीडीह गांव के खेतों की तस्वीर अब तेजी से बदलने लगी है. एक समय था जब पानी की भारी किल्लत के कारण यहां की उपजाऊ जमीन भी बंजर नजर आती थी और किसान चाहकर भी खेतों में मेहनत का फल नहीं ले पाते थे. गांव में लगभग 45 से 50 एकड़ का ऐसा विस्तृत रकबा मौजूद था, जो सिंचाई का कोई पक्का साधन न होने की वजह से पूरी तरह मौसम की मेहरबानी पर निर्भर था. बारिश सामान्य नहीं रहने पर खेतों में धान या साधारण सब्जियां उगाना भी संभव नहीं हो पाता था. मेहनत करने की इच्छा और जमीन की उपलब्धता के बावजूद सिंचाई के बुनियादी इंतजाम के अभाव में इस पूरे क्षेत्र का कृषि दायरा बेहद सीमित बना हुआ था.

## पटवन के अभाव में खाली छूट जाते थे खेत
गोपीडीह के स्थानीय किसान अम्बिका बताते हैं कि उनके पास लगभग 4 से 5 एकड़ कृषि योग्य भूमि है. कुछ वर्ष पहले तक इस जमीन पर नियमित खेती करना एक गंभीर चुनौती बना हुआ था. खेत तक पानी पहुंचाने का कोई स्थायी जरिया मौजूद नहीं था, जिसकी वजह से केवल मानसून के दौरान ही फसल की बुवाई संभव हो पाती थी. ऐसी नकदी फसलें या बागवानी, जिनमें समय-समय पर नमी और पटवन की सख्त दरकार होती है, उनकी बुवाई किसान चाहकर भी नहीं कर सकते थे. जमीन होने के बावजूद पानी के संकट के चलते किसान अपनी मेहनत और जमीन का आर्थिक लाभ हासिल करने में असमर्थ महसूस करते थे.

## मनरेगा और सिंचाई योजना से तैयार हुए तीन कुएं
इस विकट समस्या का समाधान तब निकला जब प्रशासनिक स्तर पर चलाई जा रही योजनाओं का लाभ किसान तक पहुंचा. सिंचाई योजना और मनरेगा के समन्वित प्रयासों के तहत किसान को तीन पक्के कुओं की सुविधा उपलब्ध कराई गई. इन कुओं का निर्माण पूरा होते ही खेतों तक नियमित पानी पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत हो गई. भूमिगत जल की उपलब्धता ने खेतों को स्थायी रूप से सींचने की राह आसान बना दी. अब किसानों को बुवाई या रोपाई के लिए केवल बादलों की ओर देखने की मजबूरी खत्म हो गई, जिससे वे साल भर के चक्र में योजनाबद्ध तरीके से खेती करने में सक्षम हो गए हैं.

## गन्ना, पपीता और हल्दी की बहुफसली खेती से आय में बढ़ोतरी
सिंचाई के पक्के इंतजाम ने फसल चक्र और बुवाई के पारंपरिक ढर्रे को भी बदल दिया है. अम्बिका के अनुसार, अब खेतों में केवल एक पारंपरिक फसल पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं रह गई है. वे मौसम, बाजार की मांग और अपनी सुविधा के अनुसार गन्ने और पपीते जैसी नकदी फसलों की पैदावार ले रहे हैं. इसके साथ ही खेतों में हल्दी की बुवाई भी सफलतापूर्वक की जा रही है. बहुफसली पद्धति अपनाने से किसानों को अलग-अलग समय पर नियमित आमदनी हासिल करने के कई नए विकल्प मिल रहे हैं. पटवन की उपलब्धता ने जोखिम को कम करते हुए किसानों में कृषि को व्यावसायिक रूप से अपनाने का भरोसा जगाया है.

## 45 से 50 एकड़ के दायरे में खेती का विस्तार
पटवन की समुचित व्यवस्था हो जाने से गोपीडीह में खेतों को लंबे समय तक परती या बेकार छोड़ने का संकट अब दूर हो चुका है. अम्बिका जैसे किसानों के लिए बने ये कुएं केवल पानी का साधन नहीं, बल्कि जमीन की उत्पादकता को पुनर्जीवित करने का मजबूत माध्यम साबित हुए हैं. गांव के 45 से 50 एकड़ के दायरे में फैली जमीन पर अब खेती की गतिविधियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं. किसान अपनी जमीन से अधिक से अधिक उत्पादन लेने के लिए आधुनिक तरीकों से जुड़ रहे हैं. जिस मिट्टी पर कभी सिंचाई के अभाव में कुछ भी उगाना मुश्किल था, आज वहां गन्ना, पपीता और हल्दी जैसी उपज लहलहा रही है, जिससे इलाके में ग्रामीण समृद्धि की नई उम्मीद बंधी है.

## इसका आप पर असर
खेतों में स्थायी सिंचाई की व्यवस्था होने से किसानों की आमदनी में सुधार हुआ है और मौसमी अनिश्चितता पर उनकी निर्भरता समाप्त हो गई है.

- **भारत में:** मनरेगा और स्थानीय जल योजनाओं से छोटे किसानों को भूजल स्रोतों के निर्माण में सीधी मदद मिलती है. इससे बारिश कम होने पर भी नकदी और बागवानी फसलों की खेती करना संभव हो जाता है.
- **देवघर में:** गोपीडीह क्षेत्र के किसानों को अब 45 से 50 एकड़ जमीन पर साल भर खेती करने का सुरक्षित विकल्प मिल गया है. किसान अब पारंपरिक फसलों के अलावा गन्ना, पपीता और हल्दी जैसी अधिक लाभ देने वाली फसलों से नियमित आय प्राप्त कर सकते हैं.
- **फसल चक्र में बदलाव:** स्थायी जल स्रोत मिलने के बाद किसान अपनी जमीन पर एक ही समय में कई तरह की फसलें उगा सकते हैं. इससे किसी एक फसल के खराब होने पर भी आर्थिक नुकसान का जोखिम काफी घट जाता है.
- **जमीन का पूरा इस्तेमाल:** पहले जो रकबा पटवन की कमी से खाली रह जाता था, अब वहां साल भर पैदावार ली जा रही है. इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ता है और परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है.

## ऐसा क्यों हुआ
गोपीडीह में जमीन होने के बावजूद पानी पहुंचाने के किसी स्थायी साधन का न होना खेती में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ था.

- **पटवन व्यवस्था का अभाव:** गांव में करीब 45 से 50 एकड़ रकबे में पानी पहुंचाने के लिए कोई पक्की नहर या कुआं नहीं था. इसके चलते किसान केवल बारिश के पानी पर निर्भर रहने को विवश थे और नियमित सिंचाई वाली फसलें नहीं लगा पाते थे.
- **सरकारी योजनाओं का समन्वय:** सिंचाई योजना और मनरेगा के माध्यम से खेत में तीन पक्के कुओं की स्वीकृति दी गई. इस प्रशासनिक सहयोग से जमीन पर पानी का ठोस बंदोबस्त संभव हुआ.
- **तकनीक और फसल चयन में बदलाव:** कुओं से पानी की उपलब्धता सुनिश्चित होने के बाद किसानों ने गन्ने, पपीते और हल्दी जैसी फसलों का चयन किया. स्थायी पानी मिलने से किसानों का भरोसा बढ़ा और उन्होंने जमीन का दायरा बढ़ाकर खेती शुरू की.

## सवाल-जवाब

### 1. गोपीडीह गांव में पहले खेती क्यों नहीं हो पाती थी?
गोपीडीह गांव में सिंचाई का कोई स्थायी साधन नहीं था, जिससे 45 से 50 एकड़ जमीन केवल बारिश के भरोसे थी और पानी की कमी के चलते फसल लगाना मुश्किल था.

### 2. किसान अम्बिका को किस सरकारी योजना से सहायता मिली?
अम्बिका को सरकारी सिंचाई योजना और मनरेगा के तहत अपने खेत के लिए तीन कुओं का लाभ मिला.

### 3. पानी की सुविधा मिलने के बाद खेत में कौन सी फसलें उगाई जा रही हैं?
सिंचाई की व्यवस्था होने के बाद अब खेत में गन्ने, पपीते और हल्दी की फसलें सफलता से उगाई जा रही हैं.

### 4. अम्बिका के पास कुल कितनी खेती योग्य जमीन है?
अम्बिका के पास लगभग 4 से 5 एकड़ खेती की जमीन है.

### 5. कुओं के निर्माण से किसान को मुख्य लाभ क्या हुआ?
अब किसान को बुवाई के लिए बारिश का इंतजार नहीं करना पड़ता और वे जरूरत के मुताबिक पूरे साल नकदी फसलें उगा पा रहे हैं.

## प्रेरणा और सबक
अम्बिका की कहानी यह दर्शाती है कि सही योजना और इच्छाशक्ति से कठिन परिस्थितियों और बंजर जैसी जमीन को भी उपजाऊ बनाया जा सकता है.

- **संसाधनों का सही उपयोग:** सरकारी योजनाओं और मनरेगा का लाभ उठाकर अपने खेतों में स्थायी जल संरचना तैयार करना चाहिए. बुनियादी सुविधाएं मिलते ही खेती की उत्पादकता में बड़ा बदलाव आ सकता है.
- **पारंपरिक ढर्रे से हटकर सोच:** केवल बारिश या एक पारंपरिक फसल पर निर्भर रहने के बजाय बहुफसली खेती अपनानी चाहिए. गन्ना, पपीता और हल्दी जैसी नकदी फसलें आय बढ़ाने का मजबूत साधन बनती हैं.
- **धैर्य और निरंतर प्रयास:** संसाधनों की कमी के बावजूद उम्मीद न छोड़ना और उपलब्ध जमीन का अधिकतम इस्तेमाल करना सफलता दिलाता है. मेहनत और सही प्रबंधन से खाली पड़े खेतों को भी लहलहाते बागानों में बदला जा सकता है.

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._