देवघर के रोहिणी दुर्गा मंदिर में जब अंग्रेज अफसरों ने लगाई थी पूजा पर रोक, फिर प्रतिमाओं के रहस्य ने बदल दिया फैसला देवघर के रोहिणी स्टेट दुर्गा मंदिर में औपनिवेशिक दौर के दौरान मिट्टी की प्रतिमाओं की पूजा रोकने का हुक्म जारी हुआ था, जिसके बाद घटी एक ऐतिहासिक घटना ने ब्रिटिश अधिकारियों को हैरान कर दिया। झारखंड के देवघर जिले को पौराणिक काल से ही आस्था और धार्मिक मान्यताओं का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। इस पावन धरती पर स्थित हर धार्मिक स्थल का अपना विशिष्ट अतीत और पूजा विधान है। देवघर के ऐतिहासिक रोहिणी स्टेट में स्थापित मां दुर्गा का मंदिर भी अपनी सदियों पुरानी पूजा पद्धति और ब्रिटिश हुकूमत से जुड़ी एक अनोखी घटना के लिए विख्यात है। मुगल काल से चली आ रही मान्यताओं के बीच नवरात्रि के पावन दिनों में इस धर्मस्थल पर श्रद्धालुओं का भारी जमावड़ा लगता है। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां न तो सार्वजनिक चंदा लिया जाता है और न ही प्रतिमाओं की स्थापना अन्य दुर्गा मंदिरों की तरह पारंपरिक क्रम में दिखती है। 1700 ईस्वी पूर्व की विरासत और रामकृष्ण परमहंस का आगमन रोहिणी स्टेट के इस प्राचीन मंदिर की ऐतिहासिक नींव 1700 ईस्वी से भी पहले रखी गई थी। मंदिर के सेवायत जागेश्वर पांडेय के अनुसार, इस स्थल की आध्यात्मिक आभा ने युगों से संतों और साधकों को अपनी ओर आकर्षित किया है। वर्ष 1868 में आध्यात्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस ने स्वयं इस मंदिर परिसर में पहुंचकर मां दुर्गा के दर्शन किए थे। सदियों से संजोए गए इस मंदिर का आध्यात्मिक प्रभाव केवल रोहिणी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समय के साथ पूरे क्षेत्र के श्रद्धालुओं की अगाध निष्ठा का केंद्र बनता चला गया। जब गौराडीह छावनी के अंग्रेज अफसरों ने दिया था पाबंदी का आदेश इस धार्मिक स्थल से जुड़ा सबसे चर्चित प्रसंग ब्रिटिश हुकूमत के समय का है। उस दौर में मंदिर परिसर से महज 200 मीटर की दूरी पर स्थित गौराडीह इलाके में अंग्रेज सैनिकों और अधिकारियों का नियमित शिविर लगता था। मंदिर में पारंपरिक रूप से मिट्टी से निर्मित प्रतिमाएं स्थापित कर मां दुर्गा की उपासना की जाती थी। ब्रिटिश अधिकारियों को मिट्टी की मूर्तियों की पूजा अर्चना के तौर-तरीकों पर भारी आपत्ति थी। इसी नाराजगी के चलते हुकूमत के अफसरों ने मंदिर के तत्कालीन पुजारी चक्रधर चक्रवर्ती को मिट्टी की मूर्तियों से पूजा तुरंत प्रभाव से बंद करने का कड़ा फरमान जारी कर दिया था। तांत्रिक साधना और मंदिर के कपाट खुलते ही हुआ रहस्यमयी घटनाक्रम प्रशासनिक दबाव और प्रतिबंध के बावजूद पुजारी चक्रधर चक्रवर्ती ने अपनी साधना नहीं रोकी। उन्होंने मां भगवती की उपासना तांत्रिक पद्धति से पूरी निष्ठा के साथ निरंतर जारी रखी। जब विशेष अनुष्ठान संपन्न हुआ और पूजा के बाद मंदिर के कपाट खोले गए, तो वहां मौजूद अंग्रेज अधिकारी भीतर का दृश्य देखकर दंग रह गए। कपाट खुलते ही मूर्तियों की स्थिति पूरी तरह बदली हुई नजर आई। भगवान गणेश की प्रतिमा दाईं ओर से खिसककर बाईं ओर स्थापित हो चुकी थी, जबकि भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा बाईं ओर से दाईं दिशा में पहुंच चुकी थी। प्रतिमाओं का बदला क्रम और हुकूमत का बदला रुख परिसर में मौजूद अंग्रेज अधिकारी मूर्तियों की इस रहस्यमयी उलटफेर को देखकर इस कदर भौंचक्के रह गए कि कुछ अधिकारी मौके पर ही अचेत होकर जमीन पर गिर पड़े। इस अलौकिक अनुभव के बाद ब्रिटिश हुकूमत के अधिकारियों ने मां दुर्गा की आध्यात्मिक शक्ति को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही उन्होंने पूजा रोकने का अपना फरमान वापस ले लिया और मंदिर में बिना किसी अवरोध के प्राचीन परंपरा से पूजा करने की अनुमति बहाल कर दी। आज भी इस मंदिर में भगवान गणेश दाईं तरफ और भगवान कार्तिकेय बाईं तरफ विराजमान दिखाई देते हैं, जो देश के सामान्य दुर्गा पंडालों और मंदिरों से बिल्कुल उलट है। बिना सार्वजनिक चंदे के स्टेट परिवार निभाता है पूरी जिम्मेदारी आजकल अधिकांश स्थानों पर दुर्गा पूजा के भव्य आयोजनों के लिए व्यापक स्तर पर चंदा संग्रह किया जाता है, लेकिन रोहिणी स्टेट का यह मंदिर अपनी आत्मनिर्भर परंपरा के लिए अलग पहचान रखता है। इस मंदिर में कभी भी आम जनता से चंदा नहीं लिया जाता। पूजा का समस्त वित्तीय और प्रबंधकीय दायित्व रोहिणी स्टेट परिवार ही उठाता है। वर्तमान समय में परिवार के प्रतिनिधि संजीव कुमार देव और चिरंजीव कुमार देव मंदिर की संपूर्ण व्यवस्थाओं का संचालन कर रहे हैं। वे पूर्वजों के समय से चली आ रही धार्मिक मर्यादाओं, प्राचीन तांत्रिक विधि-विधानों और रीति-रिवाजों का पूरी निष्ठा से पालन सुनिश्चित करते हैं। दर्जनों गांवों के श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और नवमी की परंपरा इस मंदिर के प्रति स्थानीय ग्रामीणों की निष्ठा इतनी गहरी है कि केवल रोहिणी ही नहीं, बल्कि आसपास के दर्जनों गांवों से भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां पहुंचते हैं। विशेष रूप से शारदीय और वासंतिक नवरात्रि के अवसर पर मंदिर प्रांगण में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। जिन श्रद्धालुओं की मन्नतें पूरी हो जाती हैं, वे अपनी पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार महानवमी के दिन मंदिर में बलि अर्पित करते हैं। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी पूरी धार्मिक पवित्रता के साथ निरंतर प्रवाहमान है। इसका आप पर असर देवघर के रोहिणी दुर्गा मंदिर का इतिहास श्रद्धालुओं के लिए आस्था, स्थानीय संस्कृति और धार्मिक पर्यटन के दृष्टिकोण से विशेष महत्व रखता है। • भारत में: देश भर के धार्मिक पर्यटकों को झारखंड के देवघर में स्थित इस सदियों पुराने मंदिर की अनूठी मूर्तिकला और इतिहास को जानने का अवसर मिलता है। नवरात्रि या देवघर यात्रा के दौरान श्रद्धालु इस प्राचीन धरोहर के दर्शन की योजना बना सकते हैं। • देवघर में: स्थानीय ग्रामीणों और आसपास के दर्जनों गांवों के निवासियों के लिए यह मंदिर नवरात्रि अनुष्ठान और मन्नत पूरी करने का प्रमुख केंद्र है। श्रद्धालु महानवमी पर पारंपरिक विधियों में सम्मिलित होने के लिए पूर्व निर्धारित समय पर यहां पहुंच सकते हैं। • पूजा व्यवस्था: आम जनता पर इस मंदिर के आयोजन को लेकर किसी प्रकार का आर्थिक भार या चंदा देने का दायित्व नहीं पड़ता है। मंदिर का समस्त खर्च स्टेट परिवार वहन करता है, जिससे दर्शनार्थियों को पूरी तरह सहज वातावरण मिलता है। • धार्मिक परंपरा: यहां भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय की विशिष्ट दिशा और तांत्रिक पूजा पद्धति का पालन शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं के लिए विशेष अध्ययन का विषय है। आगंतुक सामान्य मंदिरों से अलग इस विन्यास को स्वयं प्रत्यक्ष देख सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ रोहिणी स्टेट के मंदिर में यह ऐतिहासिक टकराव औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा स्थानीय धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप करने के कारण उत्पन्न हुआ था। • मिट्टी की मूर्तियों पर आपत्ति: पास के गौराडीह शिविर में तैनात अंग्रेज अफसरों को मिट्टी से बनी प्रतिमाओं की पूजा पद्धति स्वीकार्य नहीं थी। इसी असहमति के चलते उन्होंने पुजारी चक्रधर चक्रवर्ती को अनुष्ठान बंद करने का प्रशासनिक आदेश दिया था। • पुजारी की तांत्रिक साधना: प्रशासनिक रोक के बाद भी पुजारी ने अपनी धार्मिक परंपरा को नहीं छोड़ा और गुप्त रूप से तांत्रिक विधि से मां दुर्गा की आराधना पूरी की। इसी निरंतर साधना के समापन पर कपाट खोले गए थे। • प्रतिमाओं का दिशा परिवर्तन: कपाट खुलते ही भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय की प्रतिमाओं की दिशा आपस में बदली हुई पाई गई। इस अकल्पनीय दृश्य ने अफसरों को अपना आदेश वापस लेने पर मजबूर किया। • पारिवारिक संकल्प: स्टेट परिवार ने शुरुआत से ही मंदिर को सार्वजनिक चंदे से दूर रखकर निजी स्तर पर व्यवस्था चलाने का नियम बनाया। यही कारण है कि आज भी संजीव कुमार देव और चिरंजीव कुमार देव इस परंपरा को जारी रखे हुए हैं। सवाल-जवाब 1. देवघर का रोहिणी स्टेट दुर्गा मंदिर कितना पुराना है? इस मंदिर की स्थापना 1700 ईस्वी से पहले हुई थी और यहां मुगल काल से ही पूजा की परंपरा चली आ रही है। 2. क्या किसी महान संत ने इस मंदिर के दर्शन किए थे? हां, वर्ष 1868 में आध्यात्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस ने इस मंदिर में पहुंचकर मां दुर्गा के दर्शन किए थे। 3. अंग्रेज अफसरों ने इस मंदिर में पूजा रोकने का आदेश क्यों दिया था? निकटवर्ती गौराडीह शिविर के अंग्रेज अधिकारियों को मिट्टी की प्रतिमाओं की पूजा किए जाने पर आपत्ति थी, इसलिए उन्होंने रोक लगाई थी। 4. पूजा पर रोक लगने के बाद मंदिर में क्या चमत्कार हुआ था? तांत्रिक पूजा के बाद जब कपाट खुले तो भगवान गणेश की प्रतिमा दाईं से बाईं ओर और भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा बाईं से दाईं ओर पहुंच गई थी। 5. इस मंदिर में प्रतिमाओं की वर्तमान स्थिति क्या है? मंदिर में भगवान गणेश दाईं ओर और भगवान कार्तिकेय बाईं ओर विराजमान हैं, जो अन्य मंदिरों से अलग व्यवस्था है। 6. क्या इस मंदिर में दुर्गा पूजा के लिए चंदा लिया जाता है? नहीं, इस मंदिर में किसी से चंदा नहीं लिया जाता और पूजा का संपूर्ण खर्च रोहिणी स्टेट परिवार द्वारा उठाया जाता है। 7. वर्तमान में मंदिर की देखरेख कौन कर रहा है? वर्तमान में स्टेट परिवार के संजीव कुमार देव और चिरंजीव कुमार देव मंदिर की संपूर्ण व्यवस्था और परंपराओं को संभाल रहे हैं। 8. मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु किस दिन बलि देते हैं? जिन श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, वे अपनी मान्यता के अनुसार महानवमी के दिन मंदिर में बलि अर्पित करते हैं। 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