# देवघर के रोहिणी में 9 दशक पुरानी टेलरिंग दुकान आज भी गुलजार, तीन पीढ़ियों से जारी है भरोसे का सफर

> झारखंड के देवघर जिले के रोहिणी में साल 1930 में शुरू हुई एक टेलरिंग दुकान आज भी ग्राहकों का भरोसा जीते हुए है। अंग्रेजों और रियासत कालीन राजा के दौर से लेकर रेडीमेड के इस आधुनिक युग तक, यह दुकान तेजी से कपड़े सिलकर देने की अपनी पहचान बनाए हुए है।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-10-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/deoghar-ke-rohini-men-9-dashaka-purani-telaringa-dukana-aja-bhi-gulajara-tina-pirhiyon-se-jari-hai-bharose-ka-saphara-49865 · **Language:** Hindi
**Tags:** देवघर, रोहिणी, टेलरिंग, कारीगरी, झारखंड, विरासत

झारखंड के देवघर जिले में स्थित रोहिणी कस्बे में एक ऐसी सिलाई की दुकान चल रही है, जिसकी नींव देश की आजादी से भी करीब पौने दो दशक पहले रखी गई थी। पिछले आठ दशकों में भारत के परिधान बाजार में भारी बदलाव आए हैं, फैशन के नए दौर आए और दर्जी से कपड़े सिलवाने के पारंपरिक चलन पर रेडीमेड कपड़ों का दबदबा बढ़ता गया। इस व्यापक बदलाव के बावजूद रोहिणी की इस ऐतिहासिक दुकान पर ग्राहकों का विश्वास आज भी वैसा ही कायम है जैसा शुरुआती दिनों में था। साल 1930 में खुली यह दुकान लगातार चल रही है और आसपास के ग्रामीण अंचलों से लेकर सुदूर इलाकों तक के लोग यहां अपने कपड़े सिलवाने के लिए नियमित रूप से पहुंचते हैं। आम तौर पर दर्जियों के पास कपड़े सिलवाने के लिए ग्राहकों को हफ्तों इंतजार करना पड़ता है, लेकिन इस प्रतिष्ठान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां कुछ ही घंटों के भीतर कपड़े तैयार करके थमा दिए जाते हैं।

## अंग्रेजी हुकूमत के दौर में 2 रुपये से शुरू हुआ था सिलाई का सफर
इस कारोबार की शुरुआत वर्तमान संचालक मोहम्मद वाजिद के पिता ने वर्ष 1930 में की थी। उस समय पूरा भारत ब्रिटिश हुकूमत के अधीन था और रोहिणी क्षेत्र में भी अंग्रेजों की बसावट थी। दुकान से कुछ ही दूरी पर अंग्रेज अधिकारी और परिवार रहा करते थे, जिनके कपड़े सिलने का जिम्मा मोहम्मद वाजिद के पिता के पास ही था। उस दौर में श्रम और कारीगरी का मेहनताना आज के मुकाबले बेहद मामूली हुआ करता था। उस जमाने में एक पूरी शर्ट और पैंट की सिलाई केवल दो रुपये में कर दी जाती थी, जबकि महिलाओं के ब्लाउज की सिलाई का शुल्क महज दो आना तय था। समय गुजरने के साथ देश में मुद्रा का मूल्य बदला, महंगाई बढ़ी और सिलाई की दरें भी धीरे-धीरे बढ़ती चली गईं, लेकिन दुकान के भीतर सुई-धागे की हरकत कभी थमी नहीं। पिता के निधन के बाद इस पुश्तैनी काम को मोहम्मद वाजिद के बड़े भाई ने संभाला और फिर बाद में वाजिद ने खुद इस सिलाई परंपरा की बागडोर अपने हाथों में ली।

## रोहिणी स्टेट के राजा साहब भी यहीं से सिलवाते थे पोशाकें
मोहम्मद वाजिद के अनुसार, जब उन्होंने स्वयं दुकान का कार्यभार पूरी तरह संभाला, उस समय रोहिणी स्टेट के राजा साहब यानी घटवाल साहब भी अपने परिधान इसी दुकान से तैयार करवाते थे। उस कालखंड में समाज के रसूखदार, प्रशासनिक और राजघराने से जुड़े संभ्रांत लोगों से लेकर सामान्य नागरिक तक सभी इसी दुकान पर अपने कपड़े सिलवाने आते थे। बेहतरीन फिटिंग और भरोसेमंद सेवा के चलते दुकान की प्रतिष्ठा धीरे-धीरे रोहिणी की सीमाओं को लांघकर आसपास के कई देहाती क्षेत्रों में फैल गई। आज भी स्थिति यह है कि रोहिणी कस्बे के अलावा सुदूर देहात के लोग यहां कपड़े सिलवाने खिंचे चले आते हैं। सिलाई दरों में भी वक्त के साथ बड़ा अंतर आया है। जिस शर्ट और पैंट की जोड़ी कभी महज दो रुपये में सिली जाती थी, आज उसी जोड़ी की सिलाई का मेहनताना करीब 550 रुपये हो चुका है। पहनावे की शैलियां बदल गईं, कपड़ों का स्वरूप बदला, मगर इस दुकान पर काम की रफ्तार नहीं थमी।

## अब तीसरी पीढ़ी संभाल रही है सिलाई की यह पारिवारिक विरासत
समय के चक्र के साथ अब इस दुकान के संचालन की सीधी जिम्मेदारी मोहम्मद वाजिद के बेटे के हाथों में आ चुकी है। इस तरह एक ही छत के नीचे एक ही परिवार की तीन पीढ़ियां इस पेशे को लगातार आगे बढ़ा रही हैं। दादा ने गुलामी के दौर में इस कारोबार की नींव रखी, फिर बेटों ने इसे विस्तार दिया और अब पोता नई सदी में इस विरासत को संभाल रहा है। आज के उपभोक्तावादी दौर में जब अधिकांश युवा और कामकाजी लोग मॉल व दुकानों से रेडीमेड कपड़े खरीदने को प्राथमिकता देते हैं, तब भी इस पारंपरिक टेलरिंग दुकान पर ग्राहकों की कतारें खत्म नहीं हुई हैं। इस निरंतर आकर्षण का सबसे मजबूत आधार वही पुराना वादा है, जिसके तहत यहां कुछ ही घंटों में कपड़े सिलकर ग्राहकों को सौंप दिए जाते हैं। लगभग एक सदी के अपने ऐतिहासिक सफर में इस प्रतिष्ठान ने कई व्यवस्थागत उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन परिवार का परिश्रम और साख आज भी रोहिणी में जस की तस चमक रही है।

## इसका आप पर असर
इस ऐतिहासिक टेलरिंग परंपरा से स्थानीय ग्राहकों को आज भी बेहद कम समय में किफायती और पारंपरिक सिलाई की सुविधा मिल रही है।

- **देवघर और रोहिणी में:** स्थानीय निवासियों और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को किसी शादी या त्योहार पर नए कपड़े सिलवाने के लिए हफ्तों लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता है। ग्राहक उसी दिन महज कुछ ही घंटों के भीतर लगभग 550 रुपये के उचित शुल्क में अपनी पूरी पोशाक सिलवाकर प्राप्त कर सकते हैं।
- **पारंपरिक कारीगरों के लिए:** यह मिसाल दर्शाती है कि रेडीमेड कपड़ों के भारी चलन के बावजूद अगर काम में तेजी और गुणवत्ता रखी जाए तो पुस्तैनी धंधा बरकरार रहता है। स्थानीय कारीगर अपनी सेवाओं को समयबद्ध बनाकर आधुनिक बाजार में भी अपनी आजीविका सुरक्षित रख सकते हैं।
- **सामान्य पाठकों के लिए:** यह जानकारी सिखाती है कि पारंपरिक हस्तशिल्प और पारिवारिक व्यापार को आधुनिक उपभोक्ता की जरूरत के हिसाब से ढालकर जीवित रखा जा सकता है। ग्राहक स्थानीय छोटे कारोबारियों से जुड़कर व्यक्तिगत फिटिंग और तेज सेवा का लाभ उठा सकते हैं।
- **ग्रामीण अर्थव्यवस्था में:** देहात के लोगों को अच्छे फिटिंग वाले कपड़े सिलवाने के लिए बड़े शहरों के महंगे बुटीक पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। इससे स्थानीय स्तर पर पैसे का परिसंचरण बना रहता है और क्षेत्रीय व्यापारिक पहचान सुरक्षित रहती है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह दुकान लगभग एक सदी से इसलिए लगातार चल रही है क्योंकि इसने बदलते फैशन और समय के साथ अपनी सबसे बड़ी कार्यकुशलता यानी त्वरित सिलाई को कभी कम नहीं होने दिया।

- **शुरुआती पहचान और राजसी संरक्षण:** ब्रिटिश दौर में नजदीकी अंग्रेज अफसरों और बाद में रोहिणी स्टेट के राजा घटवाल साहब के कपड़े सिलने से दुकान को शुरुआती साख मिली। इस उच्च स्तरीय संरक्षण ने आसपास के देहाती इलाकों में दुकान के प्रति अटूट विश्वास पैदा कर दिया।
- **तेज गति से सिलाई की अनूठी नीति:** जहां सामान्य टेलर नए कपड़ों के लिए कई दिनों का समय मांगते हैं, वहीं इस दुकान ने हमेशा कुछ घंटों में सिलाई पूरी करने का नियम बनाए रखा। यही तेज सेवा रेडीमेड कपड़ों के आधुनिक दौर में भी ग्राहकों को खींचने का मुख्य कारण बनी हुई है।
- **पीढ़ी-दर-पीढ़ी कौशल का हस्तांतरण:** पिता से बड़े भाई, फिर मोहम्मद वाजिद और अब उनके बेटे तक यह हुनर स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ता रहा। परिवार की तीन पीढ़ियों ने इस काम को छोड़ने के बजाय इसे अपनी पहचान मानकर लगातार जीवित रखा।

## सवाल-जवाब

### 1. देवघर के रोहिणी में यह टेलरिंग दुकान कब शुरू हुई थी?
इस दुकान की शुरुआत वर्तमान संचालक मोहम्मद वाजिद के पिता ने वर्ष 1930 में ब्रिटिश शासन के दौरान की थी।

### 2. ब्रिटिश काल में यहां शर्ट-पैंट और ब्लाउज की सिलाई का क्या शुल्क था?
उस दौर में शर्ट और पैंट की सिलाई केवल दो रुपये में होती थी, जबकि ब्लाउज सिलने के लिए दो आना मेहनताना लिया जाता था।

### 3. आज इस दुकान पर शर्ट-पैंट की सिलाई के लिए कितने पैसे लिए जाते हैं?
समय बीतने और महंगाई बढ़ने के बाद आज शर्ट-पैंट सिलवाने के लिए लगभग 550 रुपये का शुल्क लगता है।

### 4. इस दुकान पर किन प्रमुख और ऐतिहासिक हस्तियों के कपड़े सिले जाते थे?
शुरुआती दौर में यहां आसपास रहने वाले अंग्रेज अफसरों और बाद में रोहिणी स्टेट के राजा घटवाल साहब के कपड़े सिले जाते थे।

### 5. रेडीमेड कपड़ों के दौर में भी लोग इस दुकान पर क्यों आते हैं?
इस दुकान पर कपड़ों की सिलाई महज कुछ ही घंटों के भीतर तैयार करके दे दी जाती है, जिससे ग्राहकों को लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता।

### 6. वर्तमान में इस दुकान का संचालन परिवार की कौन सी पीढ़ी कर रही है?
वर्तमान में मोहम्मद वाजिद का बेटा दुकान का काम संभाल रहा है, जिससे यह परिवार की तीसरी पीढ़ी बन चुकी है।

## प्रेरणा और सबक
रोहिणी की इस टेलरिंग दुकान का 94 साल पुराना सफर सिखाता है कि ईमानदारी, समर्पण और समयबद्ध सेवा से कोई भी छोटा कारोबार पीढ़ियों तक जीवित रह सकता है।

- **समय की कद्र सबसे बड़ी पूंजी:** ग्राहकों को हफ्तों इंतजार कराने के बजाय कुछ ही घंटों में काम पूरा करके देना इस दुकान की सबसे बड़ी ताकत बनी। व्यापार में समयबद्धता और विश्वसनीयता बनाए रखने से ग्राहक कभी दूर नहीं जाते।
- **पारिवारिक विरासत का सम्मान:** तीन पीढ़ियों ने अपनी पारंपरिक कारीगरी को पिछड़ा मानने के बजाय गर्व से अपनाया और आगे बढ़ाया। अपने पुश्तैनी काम को लगन से करने पर वह सम्मान और पहचान का जरिया बनता है।
- **बदलाव के दौर में अपनी पहचान बचाना:** रेडीमेड और मॉल कल्चर के सामने समर्पण करने के बजाय इस दुकान ने अपनी मौलिक खूबी पर ध्यान केंद्रित रखा। अपनी खासियत को पहचानकर उसी पर टिके रहना किसी भी व्यवसाय को स्थायित्व देता है।

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