# देवघर के रोहिणी में हस्तनिर्मित चमड़े के जूते गढ़ रहे 62 वर्षीय रामदास, 14 गांवों और पुलिस महकमे में कायम है भरोसा

> झारखंड के देवघर स्थित रोहिणी में 62 वर्षीय रामदास आज भी अपने हाथों से चमड़े के मजबूत जूते तैयार कर रहे हैं, जिनकी मांग पुलिसकर्मियों और 14 गांवों के ग्राहकों के बीच बनी हुई है।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-10-18 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/deoghar-ke-rohini-men-hastanirmita-chamare-ke-jute-garha-rahe-62-varshiya-ramdas-14-ganvon-aura-pulisa-mahakame-men-kayama-hai-bha-49043 · **Language:** Hindi
**Tags:** देवघर, रोहिणी, झारखंड, रामदास, हस्तनिर्मित जूते, चमड़े के जूते, पारंपरिक कारीगर, फैशन शू

झारखंड के देवघर जिले में स्थित रोहिणी कस्बे की एक छोटी सी दुकान आज भी पारंपरिक दस्तकारी की मिसाल बनी हुई है। जब आधुनिक बाजार पूरी तरह से स्वचालित मशीनों से तैयार जूते और चप्पलों से भरा पड़ा है, तब भी यहां के लोग एक अनुभवी कारीगर के हाथों की तराश पर गहरा भरोसा जताते हैं। रोहिणी में संचालित फैशन शू नाम की यह दुकान किसी कारखाने की तरह नहीं दिखती, बल्कि यहां शुद्ध चमड़े की कटाई से लेकर जूते को मुकम्मल शक्ल देने तक का हर चरण कारीगर अपने हाथों से पूरा करता है। यह दुकान केवल चमड़े के उत्पाद बेचने की जगह नहीं है, बल्कि उस पुश्तैनी महारत का जीवंत उदाहरण है जिसे एक हुनरमंद ने अपनी जिंदगी के कई दशक समर्पित करके संजोया है। आज के मशीनी युग में हस्तशिल्प भले ही चुनौतियों से जूझ रहा हो, लेकिन हाथों से बने उत्पादों की अपनी अलग पहचान और मजबूती अब भी बरकरार है।

## पिता से सीखी कला और 47 वर्षों का अटूट सफर
इस हुनर को जीवित रखने वाले 62 वर्षीय कारीगर रामदास हैं, जिनका जीवन चमड़े के काम से गहराई से जुड़ा हुआ है। रामदास ने केवल 15 वर्ष की कच्ची उम्र में अपने पिता के मार्गदर्शन में जूते बनाने की बारीकियाँ सीखनी शुरू कर दी थीं। आज वे जीवन के छठे दशक को पार कर चुके हैं और पिछले करीब 47 वर्षों से लगातार इसी व्यवसाय में पसीना बहा रहे हैं। उनका मानना है कि चमड़े का जूता या चप्पल तैयार करना साधारण काम नहीं है, बल्कि इसमें बेहद धैर्य और शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है। चमड़े की सटीक नाप, उसकी धारदार कटाई और फिर उसे तलवे के साथ जोड़ना बेहद बारीकी की मांग करता है। रामदास के अनुसार, एक जोड़ी चमड़े का जूता शुरू से अंत तक अपने हाथों से तैयार करने में लगभग 40 से 45 मिनट का समय लगता है।

## मशीनों की कमी और हस्तनिर्मित पेस्टिंग की मजबूती
वर्तमान समय में जूता निर्माण उद्योग पूरी तरह आधुनिक और स्वचालित मशीनों पर निर्भर हो चुका है। रामदास का कहना है कि मशीनी सेटअप स्थापित करने के लिए भारी-भरकम पूंजी की जरूरत होती है। पर्याप्त आर्थिक संसाधन और पूंजी का अभाव होने के कारण वे महंगी मशीनें लगाने में असमर्थ रहे। इसी मजबूरी के बीच उन्होंने अपने पारंपरिक हुनर को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया और घंटों बैठकर हाथों से जूते गढ़ने का सिलसिला जारी रखा। रामदास स्पष्ट करते हैं कि मशीनों से दूरी उनके काम के लिए एक तरह से वरदान भी साबित हुई है। उनके अनुभव के मुताबिक, तलवे और चमड़े को जोड़ते समय हाथों से की जाने वाली पेस्टिंग जो पकड़ और मजबूती देती है, वह मशीन से तैयार जूतों में नहीं मिल पाती। यही कारण है कि स्थानीय आबादी का विश्वास फैक्ट्री में बने उत्पादों की तुलना में उनके हाथों के बने जूतों पर अधिक दृढ़ है।

## किफायती दाम और पुराने जूतों की मरम्मत
रोहिणी स्थित फैशन शू की विशेषता सिर्फ नए जूते बनाना ही नहीं है, बल्कि यहां पुराने और टूटे जूतों की कुशल मरम्मत भी की जाती है। रामदास अपनी दुकान पर आने वाले ग्राहकों को किफायती विकल्प उपलब्ध कराते हैं। उनकी दुकान में हस्तनिर्मित चमड़े के जूतों की शुरुआती कीमत लगभग 500 रुपये है, जबकि उच्च गुणवत्ता वाले जूतों के दाम 1000 रुपये तक जाते हैं। आज के दौर में जब ब्रांडेड लेदर शूज हजारों रुपये में बिकते हैं, तब 500 से 1000 रुपये की श्रेणी में शुद्ध चमड़े का टिकाऊ जूता मिलना आम लोगों के लिए बहुत बड़ी राहत साबित होता है। इसके अलावा जिन लोगों के पास नए जूते खरीदने का बजट नहीं होता, वे नाममात्र के खर्च पर अपने पुराने जूतों की मरम्मत कराकर उन्हें दोबारा इस्तेमाल के लायक बनवा लेते हैं।

## 14 गांवों का दायरा और पुलिसकर्मियों की पहली पसंद
रामदास के बनाए जूतों की ख्याति केवल रोहिणी कस्बे तक सीमित नहीं है। उनके काम की मजबूती के चलते आसपास के लगभग 14 गांवों के ग्रामीण नियमित रूप से जूते बनवाने और खरीदने यहां आते हैं। इस ग्राहक वर्ग में एक बड़ा हिस्सा पुलिसकर्मियों का भी है। थानों और चौकियों में तैनात पुलिस जवानों को अपनी नियमित ड्यूटी के दौरान लंबे समय तक चमड़े के जूते पहनने पड़ते हैं। पुलिस की कठिन ड्यूटी के लिए ऐसे जूतों की दरकार होती है जो घंटों चलने पर भी न फटें और पैरों को पूरा सहारा दें। यही वजह है कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी विशेष रूप से रामदास की दुकान पर पहुंचकर अपनी पसंद के जूते तैयार करवाते हैं। ग्राहकों को पूरा विश्वास रहता है कि यहां किसी प्रकार की मिलावट या सिंथेटिक सामग्री का प्रयोग नहीं होता बल्कि शुद्ध चमड़ा ही इस्तेमाल किया जाता है। रामदास का कहना है कि उन्होंने अपने काम के प्रचार के लिए कभी कोई विज्ञापन नहीं किया, बल्कि दशकों से दी जा रही ईमानदारी और मजबूती ही ग्राहकों को उनकी दुकान तक खींच लाती है।

## मशीनी दौर में परंपरा को थामे रखने का संकल्प
बाजार में स्वचालित मशीनों के प्रवेश ने पारंपरिक दस्तकारों के कारोबार पर गहरा असर डाला है। मशीनों के जरिए जूते बनाना काफी तेज और आसान हो गया है, जिससे बड़े पैमाने पर सस्ते जूते बाजार में उतारे जा रहे हैं। इसकी तुलना में हाथों से काम करने वाले कारीगर को अधिक समय, शारीरिक मेहनत और एकाग्रता खर्च करनी पड़ती है। इन तमाम व्यावसायिक प्रतिकूलताओं के बावजूद रामदास अपने पारंपरिक तरीके से विचलित नहीं हुए हैं। उनके लिए यह काम केवल दो वक्त की रोटी कमाने का साधन नहीं है, बल्कि यह वह अमूल्य पैतृक धरोहर है जिसे उन्होंने बचपन में अपने पिता से हासिल किया था। 62 वर्ष की उम्र में भी वे अपनी छोटी सी कार्यशाला में बैठकर उसी लगन के साथ चमड़े को तराशते हैं, ताकि रोहिणी की फैशन शू पर ग्राहकों का दशकों पुराना भरोसा हमेशा अटूट बना रहे।

## इसका आप पर असर
हाथ से बने चमड़े के जूतों की यह उपलब्धता स्थानीय खरीदारों को टिकाऊ और किफायती फुटवियर का सीधा विकल्प देती है।

- **देवघर और आसपास के 14 गांवों में:** स्थानीय निवासियों और पुलिसकर्मियों को मात्र 500 से 1000 रुपये में असली चमड़े के मजबूत जूते आसानी से मिल जाते हैं। इससे ब्रांडेड जूतों पर होने वाले हजारों रुपये के भारी खर्च की बचत होती है।
- **पारंपरिक दस्तकारों के लिए:** हस्तनिर्मित काम में मशीनों की तुलना में बेहतर मजबूती साबित होने से छोटे कारीगरों की प्रासंगिकता बनी रहती है। यह पारंपरिक कौशल को मशीनी युग में भी आजीविका का जरिया बनाए रखने का भरोसा देता है।
- **पुराने जूतों की मरम्मत:** सीमित बजट वाले ग्रामीण मामूली खर्च में अपने पुराने जूतों की मरम्मत कराकर उन्हें लंबे समय तक चला सकते हैं। इससे अनुपयोगी समझकर जूते फेंकने की बर्बादी रुकती है और पैसे की बचत होती है।
- **पुलिस और फील्ड कर्मियों के लिए:** कठिन शारीरिक ड्यूटी करने वाले कर्मियों को पैरों के अनुकूल और लंबे समय तक चलने वाले मजबूत जूते उपलब्ध होते हैं। इससे ड्यूटी के दौरान पैरों में होने वाली तकलीफ और बार-बार जूता बदलने की परेशानी खत्म होती है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह स्थिति आधुनिक औद्योगीकरण के दौर में भी पारंपरिक हस्तकला के टिके रहने और स्थानीय जरूरतों के कारण बनी है। बड़े कारखानों के आने के बावजूद हाथ से बने जूतों की मजबूती और विश्वसनीयता ने इस कारोबार को जिंदा रखा है।

- **पूंजीगत साधनों का अभाव:** स्वचालित निर्माण मशीनरी स्थापित करने के लिए भारी निवेश की आवश्यकता होती है, जो छोटे ग्रामीण कारीगरों के पास उपलब्ध नहीं होता। इसी वित्तीय कमी के कारण कारीगरों ने मशीन के बजाय अपने पारंपरिक हाथों के हुनर को ही आगे बढ़ाया।
- **हस्तनिर्मित पेस्टिंग की उच्च मजबूती:** मशीनों की तुलना में हाथों से तलवे और चमड़े की पेस्टिंग करने पर पकड़ ज्यादा मजबूत और टिकाऊ बनती है। इस तकनीकी खूबी के कारण ग्राहकों का विश्वास औद्योगिक उत्पादों की जगह हाथ के काम पर अधिक रहता है।
- **पुलिस ड्यूटी की व्यावहारिक जरूरतें:** थाने और गश्त में तैनात पुलिसकर्मियों को रोजाना कई घंटे खड़े रहने और चलने के लिए मजबूत लेदर फुटवियर की दरकार होती है। असली चमड़े की विश्वसनीयता के कारण वे स्थानीय कारीगर से जूते बनवाना पसंद करते हैं।
- **किफायती मूल्य निर्धारण:** बिना किसी बड़े ब्रांड मार्कअप और विज्ञापन खर्च के असली चमड़े के उत्पाद 500 से 1000 रुपये में उपलब्ध कराना इस दुकान की निरंतर सफलता का मुख्य आधार रहा है। यह कम लागत आसपास के 14 गांवों के ग्राहकों को लगातार आकर्षित करती है।

## सवाल-जवाब

### 1. रोहिणी में हाथ से जूते बनाने वाले कारीगर कौन हैं?
झारखंड के देवघर जिले के रोहिणी में 62 वर्षीय कारीगर रामदास फैशन शू नाम की दुकान में हाथों से चमड़े के जूते और चप्पल बनाते हैं।

### 2. रामदास ने जूते बनाने का काम कब और किससे सीखा था?
रामदास ने महज 15 वर्ष की उम्र में अपने पिता के मार्गदर्शन में जूते और चप्पल बनाने का यह पारंपरिक हुनर सीखा था।

### 3. हाथ से एक जोड़ी चमड़े का जूता बनाने में कितना समय लगता है?
चमड़े की कटाई, आकार देने और हाथ से पेस्टिंग करने के पूरे काम में एक जोड़ी जूता बनाने में करीब 40 से 45 मिनट का समय लगता है।

### 4. फैशन शू दुकान पर जूतों की कीमत क्या है?
उनकी दुकान पर हस्तनिर्मित चमड़े के जूतों की कीमत लगभग 500 रुपये से शुरू होकर 1000 रुपये तक जाती है, साथ ही पुराने जूतों की मरम्मत भी की जाती है।

### 5. रामदास के जूतों के मुख्य ग्राहक कौन हैं?
उनकी दुकान पर आसपास के करीब 14 गांवों के निवासी और थानों में ड्यूटी करने वाले कई पुलिसकर्मी नियमित रूप से जूते बनवाने आते हैं।

### 6. मशीनों के दौर में भी लोग हाथ से बने जूतों पर भरोसा क्यों करते हैं?
रामदास के अनुसार, हाथों से की गई पेस्टिंग मशीन की तुलना में कहीं अधिक मजबूती देती है और ग्राहकों को असली चमड़े की शुद्धता पर पूरा भरोसा होता है।

## प्रेरणा और सबक
62 वर्षीय रामदास की जीवन यात्रा यह साबित करती है कि ईमानदारी, धैर्य और पुश्तैनी हुनर के बल पर मशीनी युग की बड़ी चुनौतियों का भी डटकर मुकाबला किया जा सकता है।

- **संसाधनों की कमी से हार न मानना:** महंगी मशीनें खरीदने के लिए पर्याप्त पूंजी न होने के बावजूद उन्होंने अपना काम बंद नहीं किया, बल्कि अपने हाथों के हुनर को ही सबसे मजबूत हथियार बना लिया।
- **गुणवत्ता को ही विज्ञापन बनाना:** बिना किसी प्रचार या विज्ञापन के उन्होंने सिर्फ अपने काम की मजबूती और असली चमड़े के दम पर 14 गांवों और पुलिसकर्मियों का अटूट भरोसा जीता।
- **परंपरा और हुनर का सम्मान:** 15 साल की उम्र में पिता से सीखी गई कला को उन्होंने 47 वर्षों तक पूरी निष्ठा के साथ संजोकर रखा और आजीविका का सम्मानजनक जरिया बनाया।
- **ग्राहकों के प्रति समर्पण:** बाजार में बढ़ती महंगाई के बावजूद 500 से 1000 रुपये के किफायती दाम में शुद्ध चमड़े के उत्पाद देकर उन्होंने आम जनता के साथ अपना रिश्ता कभी टूटने नहीं दिया।

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