देवघर में बाबा बैद्यनाथ मंदिर की बेजोड़ वास्तुकला, लंदन के विशेषज्ञ भी नहीं बना सके दूसरा रास्ता झारखंड के देवघर स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शामिल बाबा बैद्यनाथ मंदिर की अद्भुत संरचना, एकल द्वार और गर्भगृह के पत्थरों की नमी आज भी लोगों के लिए विस्मय का विषय बनी हुई है। झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम भगवान शिव के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है। यह पावन तीर्थ केवल करोड़ों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि अपनी रहस्यमयी स्थापत्य कला और सदियों पुरानी बनावट के कारण भी शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं को अचंभित करता आया है। मंदिर के विशाल प्रांगण में देवाधिदेव महादेव के साथ माता शक्ति और अन्य देवी-देवताओं के देवालय स्थापित हैं। इन सबके बीच मुख्य गर्भगृह की वास्तुकला और उसका निर्माण कौशल आज के आधुनिक दौर में भी लोगों के बीच गहरी जिज्ञासा पैदा करता है। भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्माण से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं धार्मिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पावन धाम में भगवान शिव साक्षात ज्योतिर्लिंग स्वरूप में विराजमान हैं। देश के कोने-कोने से हर वर्ष लाखों भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। मंदिर के निर्माण को लेकर क्षेत्र में अत्यंत रोचक आख्यान प्रचलित हैं। जनश्रुति के अनुसार, पूरे परिसर के पांच अति महत्वपूर्ण देवालयों की रचना स्वयं देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने की थी। इन पांच विशिष्ट निर्माणों में बाबा बैद्यनाथ का मुख्य मंदिर, माता शक्ति का मंदिर और लक्ष्मी नारायण मंदिर प्रमुख रूप से शामिल बताए जाते हैं। एकल द्वार और पत्थरों की बेजोड़ बनावट देवघर के सुप्रसिद्ध तीर्थ पुरोहित प्रमोद श्रृंगारी के अनुसार, मुख्य मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका प्रवेश और निकास द्वार है। गर्भगृह के अंदर भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग प्रतिष्ठित है, लेकिन इस पूरे मुख्य मंदिर में आने-जाने के लिए केवल एक ही दरवाजा मौजूद है। मंदिर का समूचा ढांचा भारी-भरकम पत्थरों को इस जटिल और संतुलित ढंग से परस्पर जोड़कर बनाया गया है कि किसी भी हिस्से में थोड़ा-सा फेरबदल करना भी अत्यंत कठिन जान पड़ता है। इसी कारण मंदिर के मूल स्वरूप को समझे बिना किसी नए रास्ते की कल्पना करना संभव नहीं हो सका है। साल 1962 में लंदन से बुलाए गए थे तकनीकी विशेषज्ञ मंदिर की जटिल वास्तुकला और दूसरे द्वार की आवश्यकता को परखने के लिए कई बार विख्यात अभियंताओं ने स्थल का मुआयना किया। पुरोहित प्रमोद श्रृंगारी के अनुसार, वर्ष 1962 में जब बिहार और झारखंड संयुक्त राज्य के रूप में थे, उस दौरान तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री पंडित विनोदानंद झा ने लंदन से विशेष इंजीनियरों के एक दल को देवघर आमंत्रित किया था। विदेशी विशेषज्ञों के इस दल ने मंदिर के ढांचे का बारीकी से अध्ययन किया और परिसर में एक अतिरिक्त मार्ग निकालने की तमाम वैज्ञानिक संभावनाओं की पड़ताल की। हालांकि, जांच-पड़ताल के बाद वे भी दूसरा रास्ता तैयार करने में सफल नहीं हो सके। विशेषज्ञों और जानकारों का मानना रहा है कि पत्थरों की इस परस्पर जुड़ी संरचना में किसी प्रकार की छेड़छाड़ करने पर पूरे प्राचीन ढांचे के ढहने या उसे भारी क्षति पहुंचने का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। गर्भगृह के पत्थरों से रिसने वाली नमी और सात फीट चौड़ी नींव बाबा बैद्यनाथ मंदिर के आंतरिक गर्भगृह से जुड़ा एक अन्य पहलू भी श्रद्धालुओं के बीच गहरे कौतूहल का कारण रहता है। गर्भगृह की दीवारों पर जड़े विशाल शिलाखंड अक्सर तरबतर या नम नजर आते हैं। वहां जाने वाले कई दर्शनार्थियों को ऐसा प्रतीत होता है मानो ठोस पत्थरों से पसीने की तरह पानी की बूंदें बाहर निकल रही हों। इसके अतिरिक्त, मंदिर की विशाल नींव को लेकर भी कई जानकारियां सामने आती रही हैं। प्रमोद श्रृंगारी के अनुसार, इस पूरे पावन भवन का आधार करीब सात फीट चौड़े पाषाण खंडों पर टिका हुआ है। ये भारी शिलाएं भूमि के भीतर कितनी गहराई तक समाई हुई हैं, इसका कोई स्पष्ट और प्रामाणिक ब्योरा आज तक सामने नहीं आ पाया है। आस्था और प्राचीन भारतीय शिल्पकला का अनूठा संगम यद्यपि मंदिर के निर्माण और इसकी विशेषताओं से जुड़ी अनेक बातें जनश्रुतियों, धार्मिक विश्वासों और स्थानीय परंपराओं का हिस्सा हैं, फिर भी यह प्राचीन वास्तुकला भक्तों और आगंतुकों को समान रूप से सम्मोहित करती है। बाबा बैद्यनाथ धाम में हर मौसम में दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है, जहां वे शिवलिंग पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के साथ-साथ पूर्वजों की इस अद्वितीय और अभेद्य निर्माण कला की भूरि-भूरि प्रशंसा करते नजर आते हैं। इसका आप पर असर बाबा बैद्यनाथ मंदिर की इस ऐतिहासिक और वास्तुकला से जुड़ी जानकारी का श्रद्धालुओं की यात्रा और मंदिर प्रबंधन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। • श्रद्धालुओं के लिए: मुख्य गर्भगृह में एकल द्वार होने के कारण दर्शन के समय कतार प्रबंधन का विशेष ध्यान रखना आवश्यक होता है। भारी भीड़ के दिनों में श्रद्धालुओं को गर्भगृह में प्रवेश और निकास के लिए एक ही मार्ग का उपयोग करते हुए अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है। • देवघर और झारखंड में: मंदिर की प्राचीन वास्तुकला और ऐतिहासिक स्वरूप में किसी भी प्रकार का संरचनात्मक बदलाव संभव नहीं है। स्थानीय प्रशासन को मंदिर के मूल पत्थरों से किसी प्रकार की छेड़छाड़ किए बिना ही बाहर से भीड़ नियंत्रण की वैकल्पिक व्यवस्थाएं करनी होती हैं। • धार्मिक पर्यटन पर असर: मंदिर के इस रहस्यमयी और अभेद्य इतिहास के प्रचार से सांस्कृतिक और पुरातात्विक रुचि रखने वाले पर्यटकों की संख्या में वृद्धि होती है। इससे स्थानीय गाइडों, तीर्थ पुरोहितों और आतिथ्य क्षेत्र से जुड़े कारोबारियों को बेहतर आर्थिक अवसर मिलते हैं। • विरासत संरक्षण: प्राचीन पत्थर की संरचनाओं में नमी और सात फीट चौड़ी नींव का उल्लेख पुरातात्विक संरक्षण के महत्व को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों को समय-समय पर बिना तोड़फोड़ वाली आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर ऐसे धरोहर भवनों का रखरखाव सुनिश्चित करना होता है। ऐसा क्यों हुआ बाबा बैद्यनाथ मंदिर में अतिरिक्त द्वार का निर्माण न हो पाना और गर्भगृह का स्वरूप अपरिवर्तित रहना इसकी विशेष वास्तुकला और तकनीकी सीमाओं का परिणाम है। • आपसी संतुलन पर आधारित संरचना: मंदिर का मुख्य ढांचा प्राचीन शैली के इंटरलॉकिंग पाषाण खंडों पर खड़ा है जो परस्पर एक-दूसरे के भार को संतुलित करते हैं। किसी भी हिस्से से पत्थर हटाने या काटने पर पूरे गर्भगृह के असंतुलित होकर ढहने का प्रत्यक्ष जोखिम बना रहता है। • वर्ष 1962 का तकनीकी आकलन: तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित विनोदानंद झा के कार्यकाल में जब लंदन के इंजीनियरों ने मंदिर का निरीक्षण किया, तो उन्होंने पाया कि मौजूदा बनावट में नया मार्ग निकालना असंभव है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि मुख्य आधारशिलाओं से छेड़छाड़ करने से प्राचीन धरोहर को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। • गर्भगृह की प्राकृतिक नमी: गर्भगृह के पत्थरों से पसीने जैसी बूंदों का दिखना वहां की भूमिगत जल संरचना और पत्थरों की सोखने की प्राकृतिक क्षमता से जुड़ा हो सकता है। यद्यपि इसका कोई सटीक वैज्ञानिक निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं है, फिर भी सात फीट चौड़ी पाषाण नींव जमीन की गहराई से नमी को आकर्षित कर सकती है। सवाल-जवाब 1. बाबा बैद्यनाथ मंदिर किस राज्य और शहर में स्थित है? बाबा बैद्यनाथ मंदिर झारखंड राज्य के देवघर शहर में स्थित है। 2. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मंदिर के मुख्य देवालयों का निर्माण किसने किया था? स्थानीय मान्यताओं के अनुसार बाबा बैद्यनाथ, माता शक्ति और लक्ष्मी नारायण मंदिर सहित परिसर के पांच प्रमुख मंदिरों का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने किया था। 3. मुख्य मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश और निकास की क्या व्यवस्था है? मुख्य मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही दरवाजा मौजूद है। 4. वर्ष 1962 में मंदिर में इंजीनियरों को क्यों बुलाया गया था? वर्ष 1962 में तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री पंडित विनोदानंद झा ने मंदिर की संरचना का अध्ययन करने और दूसरा रास्ता तलाशने के लिए लंदन से इंजीनियरों को बुलाया था। 5. लंदन के इंजीनियर दूसरा दरवाजा क्यों नहीं बना सके? इंजीनियरों ने पाया कि मंदिर की पत्थर वाली संरचना में किसी प्रकार की छेड़छाड़ करने पर पूरे प्राचीन ढांचे को नुकसान पहुंचने का खतरा था। 6. गर्भगृह के पत्थरों को लेकर श्रद्धालुओं के बीच क्या कौतूहल है? गर्भगृह में लगे पत्थर अक्सर गीले दिखाई देते हैं, जिससे श्रद्धालुओं को लगता है कि पत्थरों से पसीने जैसी नमी निकल रही है। 7. मंदिर की नींव को लेकर तीर्थ पुरोहित ने क्या जानकारी दी है? तीर्थ पुरोहित प्रमोद श्रृंगारी के अनुसार मंदिर का ढांचा करीब सात फीट चौड़े पत्थरों के आधार पर टिका हुआ है। https://trendkia.com/jharkhand/deoghar-men-baba-baidyanath-mndira-ki-bejora-vastukala-london-ke-visheshajna-bhi-nahin-bana-sake-dusara-rasta-33826 TrendKia — Har trend, sabse pehle.