# देवघर में पांच दशक से महक रहा पारंपरिक मोहनभोग, दर्शनार्थियों की पहली पसंद बनी यह खास मिठाई

> बाबा मंदिर के सिंह दरवाजा के पास स्थित 50 साल पुरानी दुकान में शुद्ध घी, सूजी, खोवा और मेवों से बना मोहनभोग तैयार होता है, जिसकी रोजाना 50 किलो तक बिक्री होती है।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-10-11 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/deoghar-men-pancha-dashaka-se-mahaka-raha-parnparika-mohanbhog-darshanarthiyon-ki-pahali-pasnda-bani-yaha-khasa-mithai-46537 · **Language:** Hindi
**Tags:** देवघर, मोहनभोग, बाबा मंदिर, सिंह दरवाजा, पारंपरिक मिठाई, झारखंड खानपान

झारखंड के देवघर में स्थित प्रसिद्ध बाबा मंदिर के सिंह दरवाजा के निकट पहुंचते ही घी और भुनी हुई सूजी की महक आने-जाने वालों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। यहां मिलने वाला पारंपरिक मोहनभोग अपने खास जायके और बनावट के कारण वर्षों से लोगों का पसंदीदा बना हुआ है। शुद्ध घी, सूजी, खोवा और मेवे के मेल से तैयार होने वाला यह व्यंजन आम मिठाइयों की तुलना में बिल्कुल अलग पहचान रखता है। इस मिठाई को बनाने में किसी तरह की जल्दबाजी नहीं की जाती, बल्कि कारीगर इसे धीमी आंच और पूरी सावधानी के साथ करीब 6 से 7 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद तैयार करते हैं। लंबे समय तक पकाए जाने के कारण इसका स्वाद गहरा और टेक्सचर एकदम अनूठा हो जाता है। स्थानीय निवासियों के अलावा मंदिर में पूजा-अर्चना करने पहुंचे श्रद्धालु भी यहां पहुंचकर गर्मागर्म मोहनभोग का लुत्फ उठाते हैं। व्रत और उपवास के नियमों का पालन करने वाले लोग इसे फलाहारी व्यंजन के रूप में भी चाव से खाते हैं।

## पचास साल पुरानी विरासत और पारंपरिक बनाने का तरीका
दुकान का संचालन करने वाले ज्ञानदेव जजवारे के अनुसार, इस प्रतिष्ठान से मोहनभोग की यह यात्रा आज की नहीं, बल्कि 50 वर्ष से भी अधिक पुरानी है। आधी सदी से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी इसे पकाने की पारंपरिक पद्धति में कोई फेरबदल नहीं किया गया है। देवघर के सिंह दरवाजा से सटी संकरी गलियों में यह व्यंजन अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। बदलते दौर के साथ बाजार में खान-पान के कई आधुनिक विकल्प आए, लेकिन इस पुराने व्यंजन की लोकप्रियता जरा भी कम नहीं हुई। यही वजह है कि आज भी स्थानीय नियमित ग्राहकों के साथ-साथ शहर से बाहर से आने वाले लोगों का तांता इस दुकान पर लगा रहता है।

## प्रतिदिन पचास किलो की खपत और दूर-दराज तक मांग
दुकानदार बताते हैं कि प्रतिदिन लगभग 50 किलो मोहनभोग की खपत आसानी से हो जाती है। बाबा मंदिर में पूजा संपन्न करने के उपरांत कई भक्त इसे पावन प्रसाद समझकर अपने साथ घर ले जाते हैं। देवघर से बाहर रहने वाले कई लोग भी विशेष रूप से यहां से मोहनभोग मंगवाते हैं। सिंह दरवाजा की संकरी गली से शुरू हुआ यह पारंपरिक व्यंजन अब केवल देवघर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दूसरे शहरों में बसे लोगों के बीच भी इसकी मांग निरंतर बनी हुई है।

## दो सौ रुपये प्रति किलो दाम और अन्य लोकप्रिय व्यंजन
दुकान पर आने वाले एक ग्राहक अमन द्वारी का कहना है कि वे बीते करीब 20 सालों से नियमित रूप से यहां के मोहनभोग का स्वाद ले रहे हैं। शुद्ध खोवा और देसी घी की प्रचुर मात्रा होने की वजह से यह मुंह में रखते ही घुल जाता है और इसकी मिठास लंबे समय तक बनी रहती है। वर्तमान समय में यह मोहनभोग करीब 200 रुपये प्रति किलो के भाव पर उपलब्ध कराया जा रहा है। मोहनभोग के अलावा इस दुकान पर देवघर की गाढ़ी लस्सी और गाजर का हलवा भी ग्राहकों के बीच काफी लोकप्रिय है। इस प्रकार बाबा धाम में पूजा-अर्चना के साथ-साथ इस पारंपरिक स्वाद का आनंद लेने की परंपरा आज भी बदस्तूर जारी है।

## इसका आप पर असर
देवघर आने वाले तीर्थयात्रियों और भोजन प्रेमियों के लिए यह पारंपरिक मिठास पूजा यात्रा का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है।

- **तीर्थयात्रियों के लिए:** बाबा मंदिर में दर्शन के बाद श्रद्धालु इसे शुद्ध प्रसाद के रूप में आसानी से खरीद सकते हैं। शुद्ध सामग्री से तैयार होने के कारण यह फलाहार और उपवास के दौरान भी खाने योग्य विकल्प प्रदान करता है।
- **किफायती मूल्य:** करीब 200 रुपये प्रति किलो की दर पर मिलने से यह आम बजट के लिए बेहद सुलभ है। परिवार और सगे-संबंधियों को भेंट देने के लिए यात्री बड़ी मात्रा में इसे साथ ले जा सकते हैं।
- **देवघर में स्थानीय स्तर पर:** सिंह दरवाजा की पुरानी गलियों में स्थित यह दुकान दशकों से प्रामाणिक स्वाद का केंद्र बनी हुई है। यहां आने वाले लोग मोहनभोग के साथ गाजर के हलवे और लस्सी का आनंद भी ले सकते हैं।
- **बाहरी शहरों के लिए:** शहर से बाहर रहने वाले प्रशंसक भी विशेष रूप से इस मिठाई को अपने घरों तक मंगवाते हैं। इससे देवघर की पारंपरिक पाक कला की पहचान दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच रही है।

## ऐसा क्यों हुआ
मोहनभोग की इस दीर्घकालिक सफलता और आकर्षण के पीछे इसकी प्राचीन निर्माण विधि और बाबा मंदिर की निकटता प्रमुख कारण हैं।

- **धीमी और जटिल पकाने की प्रक्रिया:** इसे बनाने में कारीगर लगभग 6 से 7 घंटे का निरंतर समय लगाते हैं। धीमी आंच पर सूजी, खोवा और मेवे को घी में भूनने से इसकी सुगंध और स्वाद आम मिठाइयों से काफी अलग हो जाते हैं।
- **पवित्र स्थल से जुड़ाव:** दुकान बाबा मंदिर के सिंह दरवाजा के समीप स्थित है, जहां हर रोज हजारों श्रद्धालु आते हैं। पूजा के बाद गुजरने वाले भक्तों के लिए यह स्वाभाविक रूप से प्रसाद और अल्पाहार का प्रमुख केंद्र बन गया।
- **अपरिवर्तित पारंपरिक विधि:** पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से इस व्यंजन की मूल रेसिपी में कोई बदलाव नहीं किया गया है। नए व्यंजनों के आगमन के बावजूद ग्राहकों को दशकों पुराना वही प्रामाणिक स्वाद लगातार मिलता रहा है।

## सवाल-जवाब

### 1. देवघर का यह प्रसिद्ध मोहनभोग किन चीजों से तैयार किया जाता है?
यह खास मोहनभोग शुद्ध घी, सूजी, खोवा और विभिन्न प्रकार के सूखे मेवों को मिलाकर तैयार किया जाता है।

### 2. इस पारंपरिक मोहनभोग को पकाने में कितना समय लगता है?
इसकी विशिष्ट बनावट और स्वाद पाने के लिए कारीगरों को इसे तैयार करने में करीब 6 से 7 घंटे की कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।

### 3. सिंह दरवाजा स्थित इस दुकान का इतिहास कितना पुराना है?
दुकानदार ज्ञानदेव जजवारे के अनुसार, यह दुकान 50 साल से भी अधिक समय से पारंपरिक विधि से मोहनभोग बना रही है।

### 4. बाजार में मोहनभोग किस कीमत पर बेचा जा रहा है?
वर्तमान में यह पारंपरिक मोहनभोग लगभग 200 रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर उपलब्ध है।

### 5. दुकान में रोजाना कितने किलो मोहनभोग की खपत होती है?
दुकानदार के अनुसार, यहां प्रतिदिन लगभग 50 किलो मोहनभोग की बिक्री हो जाती है।

### 6. मोहनभोग के अलावा इस दुकान पर कौन-से अन्य व्यंजन मिलते हैं?
ग्राहक यहां मोहनभोग के साथ देवघर की प्रसिद्ध लस्सी और गाजर के हलवे का भी स्वाद ले सकते हैं।

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