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  "type": "article",
  "title": "देवघर की 114 साल पुरानी चाय दुकान, जहां अंग्रेज भी पीने आते थे; आज भी बरकरार है वही स्वाद",
  "summary": "झारखंड के देवघर के जसीडीह में स्थित यह चाय दुकान 1912 से चली आ रही है, जिसे अब चौथी पीढ़ी संभाल रही है। अंग्रेजों के जमाने से मशहूर इस दुकान की केसर चाय का स्वाद लेने दूर-दूर से लोग आते हैं।",
  "content": "झारखंड के देवघर जिले में एक ऐसी अनोखी चाय की दुकान मौजूद है जिसका इतिहास 114 साल से भी अधिक पुराना है। समय के साथ भले ही लोगों के काम और तौर-तरीके बदल गए हों, लेकिन जसीडीह इलाके में आरोग्य भवन के समीप स्थित इस प्रसिद्ध दुकान ने अपनी पुश्तैनी विरासत और स्वाद को आज भी पूरी शिद्दत के साथ संजोकर रखा है। इस दुकान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका कारोबार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपते हुए लगातार आगे बढ़ाया गया है। शुरुआत में परदादा ने इसकी नींव रखी थी और अब चौथी पीढ़ी के वंशज इस पूरी जिम्मेदारी को संभाल रहे हैं, जिससे इस जगह से लोगों की गहरी पुरानी यादें जुड़ी हुई हैं।\n\nवर्तमान में इस ऐतिहासिक दुकान की कमान चौथी पीढ़ी के रूप में छोटू कुमार के हाथों में है, जो पिछले 28 सालों से इसे पूरी निष्ठा से चला रहे हैं। छोटू कुमार जसीडीह के संथाली इलाके के रहने वाले हैं और उनके परिवार का यह व्यवसाय साल 1912 में शुरू हुआ था। उनके परदादा जयकांत रामानी ने इस दुकान की स्थापना की थी, उस दौर में एक कप चाय की कीमत मात्र 2 पैसे हुआ करती थी। उनके परदादा के बाद दादाजी ने इस कारोबार को आगे बढ़ाया और फिर उनके पिता ने इसकी कमान संभाली। छोटू कुमार बताते हैं कि उनके दादाजी अक्सर उन्हें पुराने दिनों के दिलचस्प किस्से सुनाया करते थे, जिनमें अंग्रेजों के समय की कई बातें शामिल थीं।\n\nइतिहास के पन्नों को पलटे तो पता चलता है कि जिस आरोग्य भवन के पास यह दुकान स्थित है, वहां अंग्रेजी हुकूमत के दौरान अंग्रेज अधिकारी आकर ठहरते थे। वे सभी इसी दुकान पर चाय की चुस्कियां लेने के लिए पैदल चलकर आते थे। उस ब्रिटिश काल में इस दुकान पर काफी अच्छी कमाई हुआ करती थी, जिसके चलते परिवार का हर नया सदस्य गर्व के साथ इस पुश्तैनी काम से जुड़ता चला गया। छोटू कुमार ने कभी भी इस खानदानी काम को छोड़कर किसी अन्य दिशा में जाने का नहीं सोचा, क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ आजीविका कमाने का साधन नहीं बल्कि उनके पूर्वजों की अनमोल धरोहर है।\n\nसमय के पहिए के साथ लोगों की पसंद और महंगाई के आंकड़े जरूर बदले हैं, लेकिन इस परिवार का अपनी दुकान से जुड़ाव बिल्कुल नहीं बदला। कभी महज दो पैसे में बिकने वाली चाय की कीमत आज बढ़कर 25 रुपये हो चुकी है, पर गुणवत्ता और जायके में कोई फर्क नहीं आया है। इस दुकान की सबसे खास पहचान यहां मिलने वाली विशेष केसर वाली चाय है, जिसे चखने के लिए स्थानीय लोग ही नहीं बल्कि सुदूर इलाकों से भी शौकीन ग्राहक खींचे चले आते हैं। ग्राहकों का मानना है कि यहां की चाय पीना सिर्फ एक पेय का आनंद लेना नहीं, बल्कि पुरानी यादों को ताजा करने और एक ऐतिहासिक पहचान से जुड़ने जैसा अनुभव है।\n\nआज के दौर में जहां अधिकांश युवा पीढ़ी बेहतर कमाई की चाह में अपने पारिवारिक व्यवसायों को छोड़कर आधुनिक नौकरियों की तरफ रुख कर रही है, वहीं छोटू कुमार की यह दुकान एक अनूठी मिसाल कायम कर रही है। साल 1912 में दो पैसे से शुरू हुआ यह सफर आज 25 रुपये की केसर चाय तक सफलतापूर्वक पहुंच चुका है। चार पीढ़ियों का लंबा अंतराल बीत चुका है, देश और दुनिया का वक्त बदल चुका है, लेकिन इस परिवार ने अपनी पुरानी जड़ों से कभी नाता नहीं तोड़ा। यही मुख्य वजह है कि जसीडीह की यह दुकान आज केवल अपने अनोखे स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि सौ साल से भी अधिक पुरानी गौरवशाली विरासत के लिए पूरे क्षेत्र में जानी जाती है।\n\nइसका आप पर असर\nइस ऐतिहासिक दुकान से जुड़ी यह खबर पाठकों को यह सिखाती है कि कैसे पारंपरिक मेहनत और ईमानदारी से पुश्तैनी विरासत को जीवित रखा जा सकता है।\n\n• झारखंड में: जसीडीह और देवघर के स्थानीय लोग इस पुरानी दुकान पर जाकर ऐतिहासिक केसर चाय का स्वाद ले सकते हैं और इसकी विरासत से जुड़ सकते हैं।\n• व्यापार के दृष्टिकोण से: नई पीढ़ी के युवाओं के लिए यह एक बड़ी सीख है कि पुश्तैनी और पारंपरिक कारोबार को भी आधुनिक समय में सफलतापूर्वक चलाया जा सकता है।\n• दाम और खर्च: कभी 2 पैसे में मिलने वाली यह चाय आज 25 रुपये प्रति कप में उपलब्ध है, जो समय के साथ आए महंगाई के बदलाव को दर्शाती है।\n• खान-पान के शौकीनों के लिए: दूर-दूर से आने वाले पर्यटक और फूड लवर्स देवघर आने पर इस खास केसर वाली चाय का आनंद ले सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nइस पुश्तैनी दुकान के इतने लंबे समय तक टिके रहने के पीछे पारिवारिक समर्पण और ग्राहकों के बीच इसकी विश्वसनीयता मुख्य कारण रहे हैं।\n\n• पारिवारिक प्रतिबद्धता: छोटू कुमार और उनके पूर्वजों ने इस व्यवसाय को सिर्फ कमाई का जरिया नहीं माना, बल्कि इसे पूर्वजों की अमूल्य धरोहर समझकर आगे बढ़ाया।\n• ऐतिहासिक जुड़ाव: आरोग्य भवन के पास स्थित होने के कारण ब्रिटिश काल से ही अंग्रेज अधिकारी यहां आते थे, जिससे इस दुकान को शुरुआती दौर में ही विशेष पहचान मिल गई थी।\n• विशिष्ट उत्पाद: देवघर में सबसे पहले केसर वाली चाय परोसने की शुरुआत इसी दुकान ने की, जो ग्राहकों को बार-बार यहां खींचकर लाती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. देवघर की यह चाय दुकान कितने साल पुरानी है?\nयह चाय दुकान 114 साल पुरानी है और इसकी शुरुआत साल 1912 में हुई थी।\n\n2. इस दुकान की शुरुआत किसने की थी?\nइस दुकान की शुरुआत छोटू कुमार के परदादा जयकांत रामानी ने की थी।\n\n3. वर्तमान में इस दुकान को कौन संभाल रहा है?\nवर्तमान में चौथी पीढ़ी के रूप में छोटू कुमार इस दुकान को संभाल रहे हैं।\n\n4. शुरुआत में चाय की कीमत कितनी थी और अब कितनी है?\nशुरुआत में चाय की कीमत महज 2 पैसे हुआ करती थी, जो अब बढ़कर 25 रुपये हो गई है।\n\n5. इस दुकान की सबसे खास चाय कौन सी है?\nइस दुकान की सबसे खास पहचान केसर वाली चाय है, जिसे परोसने वाली यह देवघर की पहली दुकान है।\n\nप्रेरणा और सबक\nदेवघर के छोटू कुमार और उनके परिवार की यह यात्रा संघर्ष, समर्पण और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती है।\n\n• विरासत का सम्मान: पुरखों के द्वारा शुरू किए गए काम को पूरी ईमानदारी और लगन के साथ आगे बढ़ाना चाहिए।\n• बदलाव के साथ निरंतरता: समय के साथ भले ही कीमतें और तौर-तरीके बदले हों, लेकिन अपनी गुणवत्ता से समझौता नहीं करना चाहिए।\n• समर्पण का महत्व: किसी भी काम को सिर्फ पैसे कमाने का जरिया न मानकर उसे अपनी पहचान बनाना सफलता की कुंजी है।",
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  "publishedAt": "2026-11-08",
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    "झारखंड समाचार"
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