# धागे और आईने से संवारी अपनी दुनिया, रांची की बहनों ने हस्तशिल्प से जुटाई कॉलेज की फीस

> रांची की दो बहनें रोजाना महज तीन घंटे काम करके सुई, धागे और आईने से हस्तनिर्मित आभूषण बना रही हैं। इससे होने वाली आय से वे अपनी उच्च शिक्षा की फीस भरने के साथ ही परिवार की आर्थिक मदद भी करती हैं।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-09-23 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/dhage-aura-aine-se-snvari-apani-duniya-ranchi-ki-bahanon-ne-hastashilpa-se-jutai-koleja-ki-phisa-36871 · **Language:** Hindi
**Tags:** रांची, हस्तशिल्प, हैंडमेड ज्वेलरी, सफलता की कहानी, संत जेवियर कॉलेज, झारखंड

झारखंड की राजधानी रांची की रहने वाली दो सगी बहनें अपनी रचनात्मक कला के बल पर आत्मनिर्भरता की शानदार मिसाल पेश कर रही हैं। दीपांशु और प्रियांशु हर दिन केवल तीन घंटे का वक्त निकालकर कॉटन के धागे, सुई, छोटे-छोटे शीशे और समुद्री सीपों से बेहद आकर्षक आभूषण तैयार करती हैं। उनके जरिए बनाए जाने वाले पारंपरिक परांदे, रंग-बिरंगी चूड़ियां और गले के मनमोहक नेकलेस बाजार में काफी पसंद किए जा रहे हैं। बिना किसी आधुनिक मशीन के केवल हाथों की कारीगरी से सजाए जाने वाले ये उत्पाद न केवल दिखने में अलग पहचान रखते हैं, बल्कि पर्यावरण के पूरी तरह अनुकूल भी हैं।

## बचपन के शौक से शुरू हुआ आत्मनिर्भर बनने का सफर
दोनों बहनों के भीतर हस्तशिल्प और कलाकारी की रुचि बचपन से ही मौजूद थी। इसी रचनात्मक सोच को उन्होंने आगे चलकर एक छोटे घरेलू व्यवसाय का रूप देने का फैसला किया। दीपांशु और प्रियांशु रोजमर्रा के घरेलू और अकादमिक कामों के बाद शाम को लगभग तीन घंटे साथ बैठती हैं और सादी चूड़ियों व बेस पर सुई-धागे से जटिल कढ़ाई करती हैं। इनमें छोटे-छोटे शीशे जोड़ना और समुद्री सीप के जरिए अनोखे पैटर्न उकेरना उनकी कला की मुख्य खूबी है। उन्होंने अपने उत्पादों की बिक्री के लिए दोनों माध्यमों को चुना है, जहां वे स्थानीय प्रदर्शनियों में स्टॉल लगाने के साथ-साथ ऑनलाइन प्लैटफॉर्म पर भी ऑर्डर लेती हैं।

## संवेदनशील त्वचा वालों के लिए प्राकृतिक विकल्प
बाजार में उपलब्ध सामान्य मैटेलिक या कृत्रिम गहनों से कई लोगों को एलर्जी अथवा त्वचा से जुड़ी समस्याएं हो जाती हैं। इन बहनों के बनाए गहनों की सबसे बड़ी खासियत उनका प्राकृतिक और हानिरहित होना है। दीपांशु के अनुसार, वे कच्चा माल चुनते समय इस बात का पूरा ख्याल रखती हैं कि उत्पाद पर्यावरण के अनुकूल और त्वचा के लिए सुरक्षित हों। यही वजह है कि जिन महिलाओं और लड़कियों की त्वचा बेहद संवेदनशील होती है, वे इन कॉटन धागे वाले गहनों को प्राथमिकता देती हैं। हाल ही में लगाई गई एक प्रदर्शनी में खरीदारों ने भारी उत्साह दिखाया, जहां कई ग्राहक एक ही बार में 1,000 रुपये तक के उत्पाद खरीदते देखे गए। वर्तमान में झारखंड के लगभग हर जिले से इनके पास ग्राहकों के नियमित ऑर्डर पहुंच रहे हैं।

## पिता के संघर्ष में बनीं मजबूत सहारा
इस हुनर से होने वाली आमदनी दोनों बहनों के जीवन में बहुत बड़ा आर्थिक संबल साबित हो रही है। परिवार में उनके पिता ऑटो रिक्शा चलाकर कठिन परिस्थितियों में घर का गुजारा करते हैं और अक्सर अपनी निजी जरूरतों को नजरअंदाज कर बच्चों का पालन-पोषण करते आए हैं। अब इस हस्तशिल्प के जरिए होने वाली कमाई से प्रियांशु की संत जेवियर कॉलेज की पढ़ाई की फीस आसानी से निकल जाती है। साथ ही दीपांशु की खुद की जरूरतें भी पूरी हो रही हैं। दोनों बहनें अपनी शिक्षा का खर्च खुद उठाने के अलावा घर के दैनिक खर्चों में पिता का हाथ भी बंटा रही हैं, जिससे उनके परिवार को बड़ी आर्थिक राहत मिली है।

## इसका आप पर असर
यह समाचार दर्शाता है कि घरेलू स्तर पर शुरू किए गए छोटे रचनात्मक प्रयास किस प्रकार छात्रों को आर्थिक स्वतंत्रता दिला सकते हैं।

- **भारत में:** कॉलेज के छात्र प्रतिदिन कुछ घंटे व्यावहारिक कौशल में लगाकर अपनी उच्च शिक्षा के खर्च खुद वहन करने के नए रास्ते तलाश सकते हैं। इससे मध्यमवर्गीय परिवारों पर शिक्षा के बढ़ते आर्थिक बोझ को कम करने में प्रत्यक्ष मदद मिलती है।
- **रांची में:** स्थानीय कारीगरों और युवा उद्यमियों को स्थानीय मेलों तथा डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर अपने उत्पादों को जिले से बाहर बेचने का अवसर मिल रहा है। संवेदनशील त्वचा वाले ग्राहकों को स्थानीय स्तर पर सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प आसानी से सुलभ हो रहे हैं।
- **उपभोक्ताओं के लिए:** धातु की एलर्जी से परेशान खरीदार कपड़े और धागे से बने हानिरहित आभूषणों को सुरक्षित विकल्प के रूप में अपना सकते हैं। यह हस्तनिर्मित उत्पादों को बढ़ावा देकर स्थानीय कुटीर शिल्प को जीवंत रखने में भी सहायक बनता है।
- **छात्रों के लिए:** पढ़ाई के साथ समय प्रबंधन सीखकर युवा अपने माता-पिता पर वित्तीय निर्भरता को काफी हद तक घटा सकते हैं। यह अनुभव उन्हें भविष्य में स्वतंत्र उद्यमिता अपनाने का व्यावहारिक आत्मविश्वास प्रदान करता है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह पहल पारिवारिक आर्थिक कठिनाइयों और बहनों की स्वाभाविक रचनात्मक प्रतिभा के आपसी समन्वय के कारण संभव हुई।

- **सीमित पारिवारिक संसाधन:** उनके पिता ऑटो रिक्शा चालक हैं और सीमित आय के कारण परिवार को दैनिक जीवन में कड़ा संघर्ष करना पड़ता था। इस आर्थिक तंगी ने दोनों बहनों को परिवार का हाथ बंटाने के लिए अतिरिक्त आय का रास्ता तलाशने को प्रेरित किया।
- **बचपन का हुनर:** दोनों बहनों में सुई-धागे और सजावट के काम को लेकर बचपन से ही स्वाभाविक रुचि और कौशल मौजूद था। उन्होंने इस रचनात्मकता को सिर्फ मनोरंजन तक सीमित रखने के बजाय एक सुनियोजित व्यवसाय का रूप देने का निर्णय लिया।
- **सुरक्षित आभूषणों की मांग:** आधुनिक बाजार में धातु और रसायनों से बने आभूषणों से कई उपभोक्ताओं को एलर्जी होने की समस्या आम है। प्राकृतिक धागों, सीप और आईने से तैयार किए गए पर्यावरण अनुकूल गहनों ने इस मांग को सफलतापूर्वक पूरा किया।

## सवाल-जवाब

### 1. दीपांशु और प्रियांशु कौन से उत्पाद तैयार करती हैं?
वे कॉटन धागे, सुई, छोटे आईने और समुद्री सीपों से चूड़ियां, गले के नेकलेस और खूबसूरत परांदे तैयार करती हैं।

### 2. वे इस काम के लिए रोजाना कितना समय देती हैं?
दोनों बहनें मिलकर प्रतिदिन केवल 3 घंटे इस हस्तनिर्मित आभूषण व्यवसाय को देती हैं।

### 3. इन आभूषणों की मुख्य विशेषता क्या है?
ये गहने बिना किसी मशीन के पूरी तरह हाथों से बनते हैं, पर्यावरण अनुकूल हैं और संवेदनशील त्वचा वालों के लिए सुरक्षित हैं।

### 4. प्रियांशु किस संस्थान में पढ़ाई कर रही हैं?
प्रियांशु वर्तमान में संत जेवियर कॉलेज में अपनी पढ़ाई कर रही हैं।

### 5. उनकी कमाई का उपयोग कहां किया जाता है?
इस कमाई से कॉलेज की फीस भरी जाती है, बहनों की व्यक्तिगत जरूरतें पूरी होती हैं और ऑटो चालक पिता की आर्थिक मदद की जाती है।

## प्रेरणा और सबक
रांची की इन दो बहनों की लगन यह साबित करती है कि संसाधनों की कमी कभी भी प्रतिभा और स्वाभिमान की राह में बाधा नहीं बन सकती।

- **हुनर को पहचानें:** अपनी स्वाभाविक प्रतिभा या शौक को समय देकर व्यावसायिक क्षमता में बदला जा सकता है। नियमित अभ्यास से कोई भी साधारण कला आमदनी का मजबूत जरिया बन सकती है।
- **समय का सदुपयोग:** प्रतिदिन केवल दो से तीन घंटे का अनुशासित प्रयास भी जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है। पढ़ाई और अन्य जिम्मेदारियों के बीच निकाला गया थोड़ा समय भी आत्मनिर्भरता दे सकता है।
- **पारिवारिक जिम्मेदारी:** माता-पिता के कठिन परिश्रम को पहचानकर उनके संघर्ष में हाथ बंटाना सच्ची परिपक्वता को दर्शाता है। अपनी शिक्षा का खर्च खुद उठाने से परिवार को वास्तविक संबल मिलता है।
- **सकारात्मक सोच:** विषम परिस्थितियों का रोना रोने के बजाय उपलब्ध साधनों से समाधान खोजने की मानसिकता ही स्थायी सफलता दिलाती है।

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