# ड्राइवर से उद्यमी बने दिलीप कुमार: सरकारी सब्सिडी लेकर शुरू की बेकरी, अब हर महीने डेढ़ से दो लाख रुपये का टर्नओवर

> पूर्व में बेकरी में ड्राइवर रहे दिलीप कुमार ने केंद्र सरकार की योजना से 35 प्रतिशत सब्सिडी और बैंक लोन लेकर अपनी खुद की खाद्य प्रसंस्करण इकाई शुरू की, जिससे वह हर महीने 1.5 से 2 लाख रुपये का कारोबार कर रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-10-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/draivara-se-udyami-bane-dilip-kumar-sarakari-sabsidi-lekara-shuru-ki-bekari-aba-hara-mahine-derha-se-do-lakha-rupaye-ka-tarnaovara-42681 · **Language:** Hindi
**Tags:** दिलीप कुमार, कोडरमा, पीएमएफएमई योजना, खाद्य प्रसंस्करण, बेकरी उद्योग, स्वरोजगार

कभी बेकरी गाड़ियों के स्टीयरिंग संभालकर आजीविका चलाने वाले दिलीप कुमार ने आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश करते हुए खुद का बेकरी उद्यम खड़ा कर लिया है। खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में कदम रखने के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना का सहारा लिया। इस सरकारी पहल के तहत उन्होंने विधिवत ऑनलाइन आवेदन दाखिल किया और फिर पूरी बेकरी परियोजना की विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार कराई। प्रशासनिक और वित्तीय औपचारिकताओं को पूरा करते हुए उन्होंने स्वरोजगार की दिशा में ठोस शुरुआत की।

## परियोजना लागत, बैंक लोन और 35 प्रतिशत सब्सिडी
इस नई बेकरी इकाई की स्थापना में कुल 7 लाख रुपये के आसपास का खर्च आया। इस संपूर्ण वित्तीय ढांचे को खड़ा करने के लिए उन्हें बैंकिंग चैनल के माध्यम से लोन स्वीकृत किया गया। इसके साथ ही योजना के प्रावधानों के अंतर्गत दिलीप कुमार को कुल लागत पर 35 प्रतिशत की पूंजीगत सब्सिडी का सीधा लाभ मिला, जिससे शुरुआती निवेश का दबाव काफी कम हो गया। व्यवसाय संचालन के लिए जरूरी तकनीकी ढांचा और मशीनरी जुटाने के क्रम में उन्होंने दरभंगा के एक अधिकृत सप्लायर से संपर्क साधा और वहां से आवश्यक उपकरण मंगवाए।

## आधुनिक मशीनरी और दैनिक उत्पादन का दायरा
बेकरी परिसर में आधुनिक उत्पादन के लिए कई जरूरी मशीनें स्थापित की गई हैं। इनमें तापमान नियंत्रण वाली इलेक्ट्रॉनिक भट्टी, बड़े पैमाने पर मिश्रण तैयार करने वाली मिक्सिंग मशीन, ब्रेड कटिंग मशीन, ट्रे और कई छोटे-बड़े सहायक कलपुर्जे शामिल हैं। इन तकनीकी उपकरणों के जरिए उत्पादन प्रक्रिया को सुगम बनाया गया है। वर्तमान समय में इस सेटअप के जरिए ब्रेड, रस्क टोस्ट, क्रीम केक, मीठी पापड़ी और बिस्किट जैसे दैनिक उपभोग के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। हर दिन इस इकाई में लगभग 60 से 70 किलोग्राम बेकरी आइटम का उत्पादन सफलतापूर्वक किया जा रहा है।

## स्थानीय आपूर्ति, दैनिक कमाई और पारिवारिक श्रम
तैयार माल की बिक्री के लिए कोडरमा जिले के विभिन्न बाजारों और स्थानीय खुदरा दुकानों में सीधी आपूर्ति सुनिश्चित की जाती है। रोजाना के माल की खपत से बेकरी में प्रतिदिन करीब 5 से 6 हजार रुपये का कारोबार दर्ज हो रहा है। इस निरंतर मांग के चलते पूरी इकाई का मासिक टर्नओवर लगभग डेढ़ लाख से दो लाख रुपये तक पहुंच जाता है। इस पूरे उद्यम का सबसे उल्लेखनीय पहलू इसका पारिवारिक श्रम मॉडल है। दिलीप ने बाहर से किसी पेशेवर कारीगर को काम पर नहीं रखा है, बल्कि उनके पिता, भाई और परिवार के अन्य सदस्य ही उत्पादन में हाथ बंटाते हैं। इतना ही नहीं, तैयार खाद्य सामग्री की मार्केटिंग और दुकानों तक डिलीवरी का पूरा जिम्मा भी परिवार के लोग आपस में मिलकर निभाते हैं।

## इसका आप पर असर
सरकारी खाद्य प्रसंस्करण योजना और बैंक लोन का उपयोग करके युवा अपना खुद का विनिर्माण व्यवसाय शुरू कर सकते हैं।

- **भारत में:** केंद्र की योजना के तहत सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां लगाने पर 35 प्रतिशत तक की सरकारी सब्सिडी और आसान बैंक ऋण उपलब्ध होता है। इच्छुक युवा ऑनलाइन पोर्टल पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट के साथ आवेदन करके स्वयं का उद्योग स्थापित कर सकते हैं।
- **कोडरमा में:** स्थानीय बाजार में तैयार ताजे बेकरी उत्पादों की निरंतर आपूर्ति से खुदरा दुकानदारों को सीधा माल मिल रहा है। जिले के अन्य कामगार भी स्थानीय स्तर पर सूक्ष्म उद्यम शुरू करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।
- **लागत और कमाई:** लगभग 7 लाख रुपये की पूंजीगत लागत वाली इकाई से हर महीने डेढ़ से दो लाख रुपये का टर्नओवर प्राप्त किया जा सकता है। परिवार के सदस्यों के सहयोग से बाहरी लेबर खर्च को पूरी तरह बचाया जा सकता है।
- **दुकानदारों के लिए:** स्थानीय स्तर पर रोजाना 60 से 70 किलो माल तैयार होने से खुदरा व्यापारियों को तुरंत डिलीवरी और ताजा स्टॉक मिल रहा है। इससे बाहरी शहरों से माल मंगाने पर होने वाले परिवहन खर्च में कमी आती है।

## ऐसा क्यों हुआ
ड्राइवर के रूप में काम करते समय मिले बेकरी उद्योग के व्यावहारिक अनुभव और सरकारी सब्सिडी योजना की उपलब्धता ने इस उद्यम को जन्म दिया। सही वित्तीय सहायता और पारिवारिक श्रम के तालमेल से यह संभव हुआ।

- **योजनागत वित्तीय प्रोत्साहन:** प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना के तहत 35 प्रतिशत सब्सिडी और बैंक ऋण की सुविधा मिलने से पूंजी की समस्या दूर हुई। कुल 7 लाख रुपये की लागत में से बड़ा हिस्सा सरकारी और संस्थागत मदद से पूरा हो गया।
- **अनुभव और बाजार समझ:** पूर्व में बेकरी वाहन चलाने की वजह से दिलीप को उत्पादन, आपूर्ति श्रृंखला और खुदरा मांग की जमीनी जानकारी पहले से थी। इसी समझ के आधार पर उन्होंने कोडरमा जिले के दुकानों को लक्षित करते हुए प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की।
- **परिवार का प्रत्यक्ष सहयोग:** बाहरी कारीगरों पर निर्भर रहने के बजाय परिवार के सदस्यों ने उत्पादन और मार्केटिंग दोनों की बागडोर संभाली। इससे शुरुआती चरण में परिचालन लागत न्यूनतम रही और लाभ मार्जिन सुरक्षित हुआ।

## सवाल-जवाब

### 1. दिलीप कुमार ने अपनी बेकरी इकाई स्थापित करने के लिए किस योजना के तहत आवेदन किया था?
उन्होंने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना के तहत ऑनलाइन आवेदन किया था।

### 2. इस बेकरी इकाई को शुरू करने में कुल कितनी लागत आई?
इस इकाई की स्थापना में लगभग 7 लाख रुपये की कुल लागत आई।

### 3. योजना के अंतर्गत उन्हें कितनी सब्सिडी का लाभ मिला?
उन्हें बैंक ऋण के साथ परियोजना लागत पर 35 प्रतिशत सब्सिडी का लाभ मिला।

### 4. बेकरी के लिए जरूरी मशीनें कहां से खरीदी गईं?
बेकरी संचालन के लिए आवश्यक मशीनें दरभंगा के एक सप्लायर से खरीदी गईं।

### 5. यूनिट में रोजाना कितना माल तैयार होता है और दैनिक बिक्री कितनी है?
इकाई में प्रतिदिन 60 से 70 किलो खाद्य उत्पाद तैयार होते हैं और रोजाना 5 से 6 हजार रुपये का कारोबार होता है।

### 6. दिलीप कुमार की बेकरी का मासिक कारोबार कितना है?
उनकी बेकरी से हर महीने लगभग डेढ़ से दो लाख रुपये का कारोबार होता है।

### 7. तैयार खाद्य उत्पादों की आपूर्ति किस क्षेत्र में की जाती है?
तैयार सामान की आपूर्ति कोडरमा जिले की विभिन्न दुकानों में की जाती है।

### 8. उत्पादन और विपणन का काम कौन संभालता है?
बिना किसी बाहरी कारीगर के, दिलीप के पिता, भाई और अन्य परिजन मिलकर उत्पादन और मार्केटिंग संभालते हैं।

## प्रेरणा और सबक
सीमित संसाधनों और सामान्य नौकरी के बावजूद सही सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर सफल उद्यमी बना जा सकता है।

- **योजनाओं का सक्रिय लाभ उठाएं:** वित्तीय तंगी होने पर सरकारी उद्यम योजनाओं और बैंक ऋण के विकल्पों का सही प्रोजेक्ट रिपोर्ट के साथ उपयोग करें।
- **मौजूदा अनुभव को ताकत बनाएं:** अपने पिछले काम या नौकरी के दौरान सीखी गई बाजार की बारीकियों को नए व्यापार की नींव बनाएं।
- **पारिवारिक सामंजस्य से लागत घटाएं:** शुरुआती दौर में बाहरी खर्चों को नियंत्रित रखने के लिए परिजनों के सहयोग से काम को आगे बढ़ाएं।
- **स्थानीय बाजार पर ध्यान केंद्रित करें:** बड़े शहरों के बजाय अपने जिले और आस-पास की दुकानों की मांग को पूरा करने पर ध्यान दें।

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