# घाटे की दुकान लेकर शुरू किया जायका, अब रांची में 4 घंटे में बिक जाती है सोनू की 150 लिट्टी

> नवादा के सोनू ने रांची में घाटे में चल रही एक दुकान लेकर कोयले की आंच पर पारंपरिक लिट्टी चोखा बेचना शुरू किया, जहां अब महज तीन से चार घंटे में सारा स्टॉक बिक जाता है।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-11-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/ghate-ki-dukana-lekara-shuru-kiya-jayaka-aba-ranchi-men-4-ghnte-men-bika-jati-hai-sonu-ki-150-litti-55888 · **Language:** Hindi
**Tags:** रांची, लिट्टी चोखा, स्ट्रीट फूड, नवादा, झारखंड खानपान, सोनू लिट्टी

झारखंड की राजधानी रांची की गलियों में कोयले की धीमी आंच पर सिकने वाली पारंपरिक लिट्टी का स्वाद इन दिनों लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। बिहार के नवादा जिले के मूल निवासी सोनू के इस ठेले पर हर दिन कुछ ही घंटों में लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है। यहां रोजाना केवल 3 से 4 घंटे के भीतर लगभग 150 पीस लिट्टी पूरी तरह बिक जाती है और दुकान पर माल आउट ऑफ स्टॉक हो जाता है। खाने के शौकीनों के लिए यह थाली 30 से ₹40 के किफायती बजट में उपलब्ध कराई जाती है, जिसमें स्वाद और पारंपरिकता का पूरा मेल नजर आता है।

## स्वाद की थाली में क्या है खास
सोनू की दुकान पर परोसी जाने वाली लिट्टी की सबसे बड़ी खासियत इसे पकाने का पारंपरिक अंदाज है। इसे किसी आधुनिक ओवन या गैस पर नहीं, बल्कि शुद्ध कोयले की धीमी आंच पर धीरे-धीरे पकाया जाता है। इस पारंपरिक तरीके से पकने के कारण लिट्टी में एक खास सौंधापन आ जाता है, जिसे लोग बेहद पसंद करते हैं। ग्राहकों की थाली में लिट्टी के साथ बैंगन का भर्ता, चोखा, दो अलग-अलग तरह की चटनियां, बारीक कटा प्याज और हरी मिर्च दी जाती है। यह पूरा संयोजन मिलकर लिट्टी के स्वाद को कई गुना बढ़ा देता है।

## गोलगप्पे से लिट्टी बनाने तक का सफर
खानपान के कारोबार में सोनू का सफर काफी दिलचस्प रहा है। उन्होंने शुरुआत में गोलगप्पे तैयार करना सीखा था और उनका वह काम काफी हिट भी रहा। हालांकि, उनका संबंध बिहार के नवादा जिले से है, जहां लिट्टी चोखा लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और संस्कृति का अटूट हिस्सा माना जाता है। सोनू ने बचपन से अपने घर में मां को लिट्टी बनाते हुए देखा था। वहीं से उन्होंने लिट्टी तैयार करने का हुनर सीखा। सोनू बताते हैं कि अभ्यास करते-करते वह अपनी मां से भी बेहतर स्वाद वाली लिट्टी पकाने लगे, जिसे उनके परिचित और ग्राहक खूब पसंद करने लगे।

## घाटे की दुकान से नया कारोबार
पहले सोनू अपने बड़े भाई के साथ मिलकर काम संभाला करते थे, लेकिन उनके मन में हमेशा से खुद का स्वतंत्र उद्यम शुरू करने की इच्छा थी। इसी दौरान उन्हें इलाके में एक ऐसी दुकान के बारे में पता चला जो लगातार घाटे में चल रही थी। सोनू ने उस नुकसान में जा रही दुकान की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली और वहां कोयले की आंच पर लिट्टी तैयार करने का काम शुरू किया।

गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सोनू की कार्यशैली भी बेहद अनूठी है। वह पहले से बहुत सारी लिट्टी बनाकर स्टॉक करके नहीं रखते हैं। वह एक बार में सिर्फ 10 से 12 पीस लिट्टी ही तैयार करते हैं, ताकि हर ग्राहक को सीधी आंच से उतरी हुई एकदम गर्म और ताजा लिट्टी खाने को मिले। यही वजह है कि दुकान खुलते ही 4 से 5 घंटे में पूरा सामान खत्म हो जाता है।

## स्टाफ की दिक्कतों के बाद पत्नी बनीं ताकत
कारोबार की राह सोनू के लिए बिल्कुल आसान नहीं रही। जब उनकी दुकान पर ग्राहकों की भीड़ बढ़ने लगी और काम रफ्तार पकड़ने लगा, तब साथ में काम करने वाले लोगों ने कर्मचारियों को भड़का दिया, जिसके बाद स्टाफ अचानक काम छोड़कर चला गया। इसके बाद सोनू ने दूसरा स्टाफ रखा, लेकिन वह भी महज एक महीने बाद काम छोड़ गया। बार-बार कर्मचारियों के चले जाने के बाद सोनू निराश नहीं हुए। उन्होंने खुद अकेले दुकान की कमान संभाली। अब सोनू की पत्नी इस पूरे काम में उनका हाथ बंटाती हैं और दोनों पति-पत्नी मिलकर दुकान का संचालन करते हैं तथा लोगों को गर्मागर्म लिट्टी परोस रहे हैं।

## इसका आप पर असर
रांची में मिलने वाला यह पारंपरिक और किफायती स्ट्रीट फूड आम लोगों और कामगारों को कम कीमत में ताजा व पौष्टिक खानपान का विकल्प देता है।

- **रांची में:** स्थानीय भोजन प्रेमियों और दफ्तर आने-जाने वालों को मात्र 30 से ₹40 में ताजा व पारंपरिक थाली मिल रही है। अगर आप यहां का स्वाद चखना चाहते हैं, तो समय पर पहुंचना जरूरी है क्योंकि 3 से 4 घंटे में 150 पीस का पूरा स्टॉक खत्म हो जाता है।
- **छोटे कारोबारियों के लिए:** घाटे में चल रही दुकान को छोटे स्तर के फूड वेंचर में बदलकर सफल बनाने की यह एक व्यावहारिक मिसाल है। सीमित बजट में बेहतर गुणवत्ता और ताजी पेशकश से ग्राहक का भरोसा आसानी से जीता जा सकता है।
- **स्वाद और सेहत के लिहाज से:** कोयले की धीमी आंच पर पकी लिट्टी और बैंगन-चोखा बिना तली हुई शुद्ध देसी थाली उपलब्ध कराता है। यह जंक फूड के मुकाबले कम खर्च में एक संतुलित और पारंपरिक विकल्प साबित होता है।
- **ग्राहकों के अनुभव पर:** एक बार में केवल 10 से 12 पीस तैयार होने के कारण हर खरीदार को हमेशा गर्मागर्म भोजन मिलता है। हालांकि, सीमित संख्या होने की वजह से ग्राहकों को कभी-कभी अपनी बारी के लिए इंतजार करना पड़ सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
नवादा के सोनू ने अपनी मां से सीखे पारंपरिक हुनर और कोयले की धीमी आंच पर पकाने के तरीके को अपनी ताकत बनाया, जिसने घाटे में चल रही दुकान को भी लोकप्रिय बना दिया।

- **पारंपरिक तैयारी का आकर्षण:** लिट्टी को सीधे कोयले की धीमी आंच पर पकाया जाता है, जिससे इसमें प्राकृतिक सौंधापन आता है। यह स्वाद आम गैस चूल्हों पर नहीं मिल पाता, जिससे ग्राहकों का जुड़ाव तेजी से बढ़ा।
- **ताजा परोसने की रणनीति:** सोनू एक साथ बहुत सारी लिट्टी बनाकर रखने के बजाय सिर्फ 10 से 12 पीस ही तैयार करते हैं। इस तरीके से हर आने वाले ग्राहक को ताजा और गर्म खाना मिला, जिससे दुकान की प्रतिष्ठा मजबूत हुई।
- **पारिवारिक सहयोग:** बाहरी कर्मचारियों के भड़कावे में आकर काम छोड़ने के बाद सोनू और उनकी पत्नी ने खुद पूरी व्यवस्था संभाली। स्टाफ पर निर्भरता खत्म होने से दुकान का संचालन बिना किसी रुकावट के सुचारू रूप से चलने लगा।

## सवाल-जवाब

### 1. रांची में सोनू की दुकान पर प्रतिदिन कितनी लिट्टी बिक जाती है?
सोनू की दुकान पर रोजाना महज 3 से 4 घंटे के भीतर लगभग 150 पीस लिट्टी बिक जाती है।

### 2. इस लिट्टी की थाली की कीमत कितनी है?
यहां लिट्टी की थाली की कीमत 30 से ₹40 के बीच रखी गई है।

### 3. सोनू की लिट्टी के साथ खाने में क्या-क्या मिलता है?
लिट्टी के साथ बैंगन का भर्ता, चोखा, दो तरह की चटनियां, प्याज और हरी मिर्च परोसी जाती है।

### 4. सोनू ने लिट्टी बनाना किससे सीखा था?
सोनू मूल रूप से बिहार के नवादा जिले के रहने वाले हैं और उन्होंने अपनी मां से लिट्टी बनाना सीखा था।

### 5. सोनू एक बार में कितनी लिट्टी तैयार करते हैं?
वह एक बार में सिर्फ 10 से 12 लिट्टी ही बनाते हैं ताकि ग्राहकों को एकदम ताजा और गर्म खाना दिया जा सके।

### 6. स्टाफ के जाने के बाद अब दुकान कौन संभालता है?
स्टाफ के काम छोड़ने के बाद अब सोनू अपनी पत्नी के साथ मिलकर पूरी दुकान का संचालन संभालते हैं।

## प्रेरणा और सबक
घाटे में चल रही एक गुमनाम दुकान को अपनी लगन और पारिवारिक हुनर के दम पर कामयाब बनाना छोटे उद्यमियों के लिए बड़ी सीख पेश करता है।

- **हुनर को पहचानें:** मां से सीखी पारंपरिक रेसिपी को सोनू ने अपने करियर का आधार बनाया। बुनियादी हुनर को निरंतर अभ्यास से निखारना किसी भी नए काम की नींव मजबूत करता है।
- **गुणवत्ता से समझौता न करें:** ज्यादा बिक्री के लालच में बासी या पहले से बनी लिट्टी रखने के बजाय सोनू हर बार 10-12 ताजी लिट्टी ही बनाते हैं। काम में ईमानदार रवैया ग्राहकों का स्थायी भरोसा पैदा करता है।
- **संकट में आत्मनिर्भरता:** जब स्टाफ अचानक छोड़ गया, तो सोनू ने हार मानने के बजाय पत्नी के साथ मिलकर खुद काम संभाला। बाहरी निर्भरता को कम करके ही विपरीत परिस्थितियों से सफलतापूर्वक उबरा जा सकता है।

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