# जमशेदपुर के ग्राम नाला बाजार में चंदनक्यारी के कारीगर लाए गंगा मिट्टी के घरौंदे, 200 रुपये से शुरुआती कीमत

> दीपावली की सजावट के लिए जमशेदपुर के ग्राम नाला में चंदनक्यारी से आए कारीगर गंगा मिट्टी के एक से चार मंजिला घरौंदे बेच रहे हैं, जिनकी कीमत मात्र 200 रुपये से शुरू होती है।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-11-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/jamshedpur-ke-gram-nala-bajara-men-chandankyari-ke-karigara-lae-ganga-mitti-ke-gharaunde-200-rupaye-se-shuruati-kimata-56662 · **Language:** Hindi
**Tags:** जमशेदपुर, दीपावली, मिट्टी के घरौंदे, चंदनक्यारी, ग्राम नाला, पारंपरिक शिल्प

दीपावली के आगमन के साथ ही चारों तरफ उत्सव की रौनक नजर आने लगी है और लोग अपने घरों को संवारने में जुट गए हैं। पर्यावरण के अनुकूल और पारंपरिक तरीके से पर्व मनाने की चाह रखने वाले लोगों के लिए जमशेदपुर के ग्राम नाला में एक विशेष बाजार लगा है। झारखंड के प्रसिद्ध चंदनक्यारी क्षेत्र से पहुंचे हुनरमंद शिल्पकार यहाँ गंगा की मिट्टी से तैयार किए गए बेहद आकर्षक और पारंपरिक घरौंदे लेकर आए हैं।

## 200 रुपये से शुरुआत और चार मंजिला तक के विकल्प
इस बाजार में मिल रहे घरौंदों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें पूर्ण रूप से प्राकृतिक मिट्टी की मदद से गढ़ा गया है। यह न केवल त्योहार पर घर के आंगन को पारंपरिक रूप देते हैं, बल्कि बच्चों के उत्साह को भी दोगुना करते हैं। यहाँ खरीदारों के लिए 200 रुपये की शुरुआती कीमत में घरौंदे उपलब्ध कराए गए हैं। विभिन्न परिवारों की पसंद और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कारीगरों ने एक मंजिल से लेकर चार मंजिल तक की भव्य बनावट वाले घरौंदे तैयार किए हैं, जिन्हें लोग अपने बजट के अनुसार चुन सकते हैं।

## दीयों और सजावटी सामानों की भी विस्तृत श्रृंखला
घरौंदों के अतिरिक्त इस बाजार में गंगा मिट्टी से गढ़े गए दीये और गृह सज्जा से जुड़ी कई सामग्रियां भी मिल रही हैं। इनकी बनावट और सूक्ष्म नक्काशी इतनी आकर्षक है कि यहाँ आने वाले ग्राहक बरबस ही इनकी ओर खिंचे चले आ रहे हैं। दीपावली के अवसर पर अपने आशियाने को सादगी और प्राकृतिक खूबसूरती से सजाने के इच्छुक परिवारों के लिए यह बाजार एक आदर्श स्थान साबित हो रहा है।

## चंदनक्यारी के शिल्पकारों की पूरे साल की मेहनत
कारीगर सुबोध के अनुसार उनका परिवार झारखंड के चंदनक्यारी इलाके का रहने वाला है और वे पूरे वर्ष मिट्टी के ऐसे ही उत्पाद बनाने के काम में लगे रहते हैं। दिवाली के दिनों में मिट्टी के इन पारंपरिक घरौंदों की मांग में भारी उछाल आता है और जमशेदपुर के नागरिक भी इनके काम को खूब सराह रहे हैं। प्रत्येक घरौंदे को हाथों से गढ़ने में लंबा समय और विशेष धैर्य लगता है, जिससे यह देखने में सुंदर लगने के साथ-साथ टिकाऊ और मजबूत भी बने रहते हैं।

## थर्माकोल और प्लास्टिक के मुकाबले प्राकृतिक मिट्टी की पहचान
सुबोध बताते हैं कि आधुनिक समय में बाजार थर्माकोल और प्लास्टिक से बने चमकीले घरौंदों से भरे रहते हैं, लेकिन जो बात और पहचान प्राकृतिक मिट्टी के बने उत्पादों में है, वह कृत्रिम चीजों में नहीं मिल सकती। उनका मानना है कि अभिभावकों को अपने बच्चों को त्योहारों की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के लिए इस बार प्लास्टिक या थर्माकोल के बजाय मिट्टी के घरौंदे उपहार में देने चाहिए। इससे नई पीढ़ी अपनी लोक परंपराओं को करीब से समझ पाएगी और अपनी कला को जीवित रखने वाले पारंपरिक कारीगरों के परिश्रम को भी सीधा सम्मान मिलेगा। इस दिवाली मिट्टी के इन उत्पादों को चुनना पर्यावरण सुरक्षा के साथ स्थानीय हुनर को मजबूती देने की दिशा में एक सार्थक कदम है।

## इसका आप पर असर
जमशेदपुर के खरीदारों को इस दिवाली प्लास्टिक उत्पादों का टिकाऊ और किफायती विकल्प मिल रहा है।

- **जमशेदपुर में:** ग्राम नाला के बाजार से स्थानीय निवासी मात्र 200 रुपये में हस्तनिर्मित घरौंदे और दीये खरीद सकते हैं। इससे घरों में बिना प्लास्टिक कचरा बढ़ाए पर्यावरण अनुकूल सजावट करना संभव होगा।
- **पारंपरिक कारीगरों के लिए:** चंदनक्यारी के कुम्हारों को बिचौलियों के बिना अपनी साल भर की कला सीधे ग्राहकों तक पहुंचाने का अवसर मिल रहा है। इससे स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था और हस्तशिल्प को सीधा आर्थिक संबल मिलता है।
- **अभिभावकों और बच्चों के लिए:** बच्चों को थर्माकोल और प्लास्टिक के बजाय मिट्टी से बने खिलौनों से खेलने का मौका मिलेगा। इससे नई पीढ़ी को मिट्टी के महत्व और पारंपरिक त्योहारों की जड़ों को सीखने की प्रेरणा मिलेगी।
- **पर्यावरण संरक्षण पर प्रभाव:** मिट्टी के बर्तन और घरौंदे पानी में आसानी से घुल जाते हैं और कोई प्रदूषण नहीं फैलाते। त्योहार के बाद भी इनके निपटान में प्लास्टिक कचरे जैसी कोई समस्या पैदा नहीं होगी।

## ऐसा क्यों हुआ
त्योहारी सीजन में पर्यावरण अनुकूल सजावट की मांग बढ़ने और पारंपरिक कुम्हार परिवारों द्वारा आजीविका के नए बाजार तलाशने के कारण यह बाजार सजा है।

- **दीपावली पर बढ़ती मांग:** दीपावली पर घरों की सजावट और बच्चों के पूजन के लिए मिट्टी के घरौंदे बनाने की प्राचीन लोक परंपरा रही है। त्योहार नजदीक आते ही ऐसी पारंपरिक सामग्रियों की मांग बाजार में अचानक बढ़ जाती है।
- **चंदनक्यारी कारीगरों का प्रयास:** ग्रामीण इलाकों में सीमित खरीदार होने के कारण चंदनक्यारी के शिल्पकार जमशेदपुर जैसे बड़े शहरों का रुख करते हैं। शहरी बाजारों में सीधी दुकान लगाने से उन्हें अपनी साल भर की मेहनत का बेहतर पारिश्रमिक मिलता है।
- **पर्यावरण के प्रति जागरूकता:** हाल के वर्षों में प्लास्टिक और थर्माकोल से होने वाले प्रदूषण को लेकर परिवारों में सतर्कता बढ़ी है। लोग अब उत्सवों में भी प्राकृतिक और पारंपरिक मिट्टी के उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. जमशेदपुर में मिट्टी के घरौंदे किस स्थान पर बिक रहे हैं?
यह विशेष बाजार जमशेदपुर के ग्राम नाला इलाके में लगाया गया है।

### 2. इन घरौंदों को बनाने में किस प्रकार की मिट्टी का उपयोग किया गया है?
इन खूबसूरत घरौंदों को पूरी तरह से गंगा मिट्टी से तैयार किया गया है।

### 3. ग्राम नाला में घरौंदों की शुरुआती कीमत क्या रखी गई है?
यहाँ मिट्टी के घरौंदों की शुरुआत मात्र 200 रुपये से हो रही है।

### 4. यहाँ किस आकार और मंजिल के घरौंदे उपलब्ध हैं?
खरीदार अपनी पसंद के अनुसार एक मंजिल से लेकर चार मंजिल तक के घरौंदे चुन सकते हैं।

### 5. यह घरौंदे बनाने वाले कारीगर कहाँ से आए हैं?
कारीगर सुबोध और उनका परिवार झारखंड के चंदनक्यारी क्षेत्र से जमशेदपुर पहुंचे हैं।

### 6. घरौंदों के अलावा बाजार में और क्या सामान मिल रहा है?
यहाँ मिट्टी के आकर्षक दीये और घर की सजावट से जुड़ी विभिन्न हस्तशिल्प सामग्रियां भी मिल रही हैं।

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