# जमशेदपुर में चार दशक से अटूट है रो बाबू और श्रवण कुमार की दोस्ती, मिट्टी के चूल्हे पर आज भी परोस रहे लजीज डोसा

> जमशेदपुर के रो बाबू और श्रवण कुमार की 42 साल पुरानी दोस्ती आज भी मिसाल बनी हुई है। दोनों 18 साल की उम्र से मिलकर मिट्टी के चूल्हे पर डोसा बेच रहे हैं और उनका यह सफर आज भी जारी है।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-10-27 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/jamshedpur-me-char-dashak-se-atut-hai-ro-babu-aur-shravan-kumar-ki-dosti-52094 · **Language:** Hindi
**Tags:** जमशेदपुर, डोसा, दोस्ती, झारखंड, वायरल स्टोरी

झारखंड के जमशेदपुर शहर में जब भी पक्की और सच्ची यारी का जिक्र होता है, तो रो बाबू और श्रवण कुमार की जोड़ी का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। इन दोनों मित्रों का साथ कोई साल-दो साल का नहीं, बल्कि पूरे बयालीस साल पुराना है। जब इन दोनों की उम्र महज अट्ठारह वर्ष थी, तब इन्होंने जीवन संघर्ष की शुरुआत एक छोटे से ठेले के साथ की थी। आज भले ही दोनों की उम्र साठ बरस से अधिक हो चुकी है, लेकिन इनके बीच का प्रेम और डोसे के स्वाद का जादू जस का तस बना हुआ है। वक्त के पहिए के साथ बहुत कुछ बदल गया, मगर इनके हाथ का जायका और एक-दूसरे के प्रति समर्पण में कोई फर्क नहीं आया है। आज भी दोनों मिलकर पारंपरिक तरीके से काम संभालते हैं और ग्राहकों को पुराना स्वाद परोस रहे हैं।

## शुरुआती दिनों का संघर्ष और पुराने दिन
पुराने दिनों को याद करते हुए रो बाबू बताते हैं कि जब उन्होंने यह काम शुरू किया था, तब बाजार में एक डोसे का दाम मात्र एक रुपया हुआ करता था। उस दौर में बुनियादी संसाधन बेहद सीमित हुआ करते थे, लेकिन मजबूत इरादे और दोस्त का साथ होने के कारण हर मुश्किल आसान लगती थी। धीरे-धीरे उनके बनाए गए डोसे का स्वाद आसपास के लोगों को भाने लगा और उनकी छोटी सी दुकान की शोहरत बढ़ने लगी। हालांकि वक्त के साथ महंगाई बढ़ी और आज एक डोसे की कीमत चालीस रुपये हो गई है, परंतु ग्राहकों की संख्या और दीवानगी में कोई कमी नहीं आई है। सबसे खास बात यह है कि इतने लंबे अंतराल के बाद भी उन्होंने अपने काम के पुराने अंदाज से कभी समझौता नहीं किया।

## कोयले की आंच और मिट्टी के चूल्हे का कमाल
इस ठेले पर बिकने वाले डोसे की सबसे बड़ी यूएसपी इसका पारंपरिक ढंग से तैयार किया जाना है। आज के आधुनिक दौर में जहां ज्यादातर खाने-पीने की दुकानों पर गैस या आधुनिक चूल्हों का इस्तेमाल किया जाता है, वहीं ये दोनों आज भी कोयले की आंच और मिट्टी के चूल्हे का ही प्रयोग करते हैं। यहाँ मिलने वाला हल्का मसाला, लाजवाब चटनी और बेहद कुरकुरा डोसा खाने वालों को अपनी ओर खींच लेता है। यही वजह है कि शहर के दूर-दराज के इलाकों से लोग इसका स्वाद चखने खिंचे चले आते हैं। कई स्थानीय लोगों के लिए यहाँ आकर डोसा खाना केवल पेट भरने का जरिया नहीं, बल्कि अपनी पुरानी यादों को ताजा करने का एक खूबसूरत अनुभव बन चुका है।

## चार दशक से अटूट साझेदारी
यह कहानी केवल एक साधारण डोसे के ठेले की नहीं है, बल्कि यह भरोसे, कठिन परिश्रम और वर्षों से चली आ रही दोस्ती की एक अनूठी दास्तान है। चार दशक से ज्यादा का लंबा समय गुजर जाने के बाद भी दोनों दोस्त हर सुख-दुख में एक-दूसरे के मजबूत संबल बनकर खड़े हैं। उम्र के इस पड़ाव पर पहुँचने के बावजूद वे हर दिन समय पर अपनी दुकान पर आते हैं और मिलकर ग्राहकों की सेवा करते हैं। शहरभर में उनकी इस अटूट मित्रता की अक्सर चर्चा होती है। उन्होंने यह साबित कर दिखाया है कि सच्ची दोस्ती केवल मौज-मस्ती तक सीमित नहीं होती, बल्कि जिंदगी के हर उतार-चढ़ाव में एक-दूसरे का हाथ थामे रहने का नाम है।

## कहाँ और कैसे लें इस जायके का लुत्फ
यदि आप भी जमशेदपुर में पुराने दौर के स्वाद का आनंद लेना चाहते हैं और मिट्टी के चूल्हे पर बने भोजन की खुशबू महसूस करना चाहते हैं, तो आपको बीएसएनएल एक्सचेंज के पास पहुँचना होगा। यहाँ हर रोज ठीक शाम के छह बजते ही रो बाबू और श्रवण कुमार का ठेला सज जाता है। ठेला लगते ही वहाँ खानेशौकीनों की भीड़ जुटनी शुरू हो जाती है। मात्र चालीस रुपये में मिलने वाला यह डोसा स्वाद के साथ-साथ दो दोस्तों के कड़े संघर्ष और अटूट रिश्ते की कहानी भी बयां करता है। चार दशकों से अधिक पुराना यह सफर आज भी उतनी ही मेहनत और अपनेपन के साथ आगे बढ़ रहा है।

## सवाल-जवाब

### 1. रो बाबू और श्रवण कुमार की दोस्ती कितने साल पुरानी है?
इन दोनों की दोस्ती करीब 42 साल पुरानी है और दोनों 18 साल की उम्र से साथ हैं।

### 2. यह ठेला कहाँ और किस समय लगता है?
यह ठेला जमशेदपुर में बीएसएनएल एक्सचेंज के समीप हर रोज शाम ठीक 6 बजे लगता है।

### 3. डोसा बनाने के लिए किस चीज का इस्तेमाल किया जाता है?
ये दोनों आज भी गैस की बजाय कोयले की आंच और मिट्टी के चूल्हे का इस्तेमाल करते हैं।

### 4. शुरुआत में एक डोसे की कीमत क्या थी और अब कितनी है?
शुरुआत में एक डोसे की कीमत महज 1 रुपये हुआ करती थी, जो अब बढ़कर 40 रुपये हो गई है।

## प्रेरणा और सबक
रो बाबू और श्रवण कुमार की यह कहानी दर्शाती है कि सच्ची लगन और अटूट मेहनत से किसी भी व्यवसाय को लंबी उम्र दी जा सकती है। इस प्रेरणादायक सफर से निम्नलिखित मुख्य सबक सीखे जा सकते हैं:

- **साझेदारी में वफादारी:** किसी भी रिश्ते या बिजनेस को टिकाए रखने के लिए आपसी भरोसा और वफादारी सबसे जरूरी होती है।
- **पारंपरिक पहचान:** समय चाहे कितना भी बदल जाए, अपनी मौलिकता और पारंपरिक तौर-तरीकों को बनाए रखना ही असली सफलता है।
- **कड़ी मेहनत का महत्व:** संसाधनों की कमी होने के बावजूद निरंतर मेहनत करने से जीवन में मुकाम हासिल किया जा सकता है।
- **सादा जीवन:** सादगी के साथ काम करते हुए लंबे समय तक ग्राहकों का विश्वास जीता जा सकता है।

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