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  "title": "जमशेदपुर में मिट्टी के 50 हजार घड़ों से सजा अनोखा दुर्गा पूजा पंडाल, पर्यावरण संरक्षण का संदेश",
  "summary": "जमशेदपुर के कसीडीह में इस साल ठाकुर प्यार सिंह धुरंधर सिंह स्पोर्टिंग क्लब द्वारा एक अनूठा इको-फ्रेंडली दुर्गा पूजा पंडाल तैयार किया जा रहा है। प्लास्टिक और थर्माकोल से पूरी तरह दूर इस पंडाल को बनाने में करीब 50 हजार मिट्टी के घड़ों और बांस का इस्तेमाल किया जा रहा है।",
  "content": "त्योहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही झारखंड के जमशेदपुर में उल्लास का माहौल देखने को मिल रहा है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में हर साल की तरह इस बार भी भव्य और कलात्मक पूजा पंडालों का निर्माण कार्य जोरों पर चल रहा है। इसी सिलसिले में कसीडीह स्थित ठाकुर प्यार सिंह धुरंधर सिंह स्पोर्टिंग क्लब का आगामी दुर्गा पूजा पंडाल शहरवासियों के बीच विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। इस बार इस पंडाल की रूपरेखा आधुनिक कृत्रिम सजावट से कोसों दूर, पूरी तरह से प्रकृति, माटी और भारतीय परंपराओं के इर्द-गिर्द बुनी गई है।\n\nपर्यावरण प्रेम और पारंपरिक संस्कृति की अनूठी मिसाल\nइस बार इस आयोजन को पूरी तरह से टिकाऊ, प्राकृतिक और पर्यावरण अनुकूल स्वरूप देने का प्रयास किया जा रहा है। इस भव्य रचना की सबसे बड़ी विशेषता इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री है, जिसे करीब 50 हजार मिट्टी के घड़ों को आपस में जोड़कर तैयार किया जा रहा है। पारंपरिक रूप से होने वाली पूजा-अर्चना, धूप और आरती के सांस्कृतिक सार से प्रेरणा लेते हुए इस पूरे ढांचे की परिकल्पना की गई है। बांस और मिट्टी के बर्तनों का यह मेल दर्शकों को अपनी मूल जड़ों और प्राकृतिक परिवेश से फिर से जुड़ने की प्रेरणा देगा।\n\nपश्चिम बंगाल के हुनरमंद कारीगरों की दो महीने की मेहनत\nइस विशाल कलाकृति को मूर्त रूप दे रहे कारीगर दीपू सावन ने बताया कि उनकी यह कुशल टीम विशेष तौर पर पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर से जमशेदपुर पहुंची है। लगभग 25 कारीगरों का यह समूह पिछले दो महीनों से लगातार इस अनूठे ढांचे को खड़ा करने में अपना पसीना बहा रहा है। निर्माण कार्य में केवल मिट्टी के घड़ों और बांस का प्रयोग किया जा रहा है ताकि आधुनिक चकाचौंध से अलग हटकर समाज को पर्यावरण सुरक्षा और प्राकृतिक घटकों के संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा सके।\n\nप्लास्टिक और थर्माकोल मुक्त सजावट\nवर्तमान समय में जब अधिकांश आयोजनों में थर्माकोल, प्लास्टिक और भारी कृत्रिम लाइटों का अंधाधुंध इस्तेमाल होता है, तब यह पंडाल एक अलग ही मिसाल पेश कर रहा है। आयोजकों का मुख्य उद्देश्य ऐसी सामग्रियों को प्राथमिकता देना है जिससे पर्यावरण को न्यूनतम क्षति पहुंचे। मिट्टी के इन बर्तनों और बांस के जरिए तैयार हो रही यह अनूठी शिल्पकारी पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प और कारीगरों की बेजोड़ मेहनत को भी बख़ूबी प्रदर्शित करती है।\n\nमेले जैसा माहौल और पारिवारिक आकर्षण\nपंडाल परिसर में केवल मां दुर्गा के अलौकिक दर्शन ही नहीं होंगे, बल्कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को पारंपरिक मेले का भरपूर आनंद उठाने का मौका भी मिलेगा। दर्शनार्थियों के खानपान के लिए कई स्वादिष्ट व्यंजनों की स्टॉल लगाई जा रही हैं और बच्चों के मनोरंजन के लिहाज से विभिन्न प्रकार के झूले भी स्थापित किए जा रहे हैं। इन सभी व्यवस्थाओं के कारण पूरे उत्सव क्षेत्र में एक जीवंत और उत्सवधर्मी रौनक देखने को मिलेगी, जिससे यह स्थल परिवारों के घूमने और खरीदारी करने का प्रमुख केंद्र बन जाएगा।\n\nआधुनिकता के दौर में धरोहर को बचाने का प्रयास\nआज के इस तकनीकी युग में जहां दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिकता की अंधी दौड़ में आगे बढ़ रही है, कसीडीह का यह आयोजन हमारी सांस्कृतिक धरोहर की याद दिलाता है। मिट्टी के इन घड़ों से गढ़ी गई यह कलाकृति स्पष्ट संदेश देती है कि विकास के पथ पर आगे बढ़ते हुए भी अपनी प्राचीन संस्कृति और पर्यावरण का संरक्षण करना अत्यंत आवश्यक है। यह पंडाल न केवल भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के मन में प्रकृति के प्रति एक सकारात्मक सोच भी पैदा करेगा।\n\nइसका आप पर असर\nयह अनूठा आयोजन पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ स्थानीय स्तर पर छोटे कारोबारियों को बढ़ावा देता है।\n\n• भारत में: यह पहल देश भर के अन्य पूजा आयोजकों को प्लास्टिक और थर्माकोल के उपयोग से बचने के लिए प्रेरित करती है। ऐसे इको-फ्रेंडली प्रयास उत्सवों के दौरान कचरे को कम करने में मदद करते हैं।\n• जमशेदपुर में: कसीडीह इलाके के निवासियों और आने वाले दर्शनार्थियों को पारंपरिक कला का अनुभव मिलेगा। मेले जैसी व्यवस्थाओं से स्थानीय दुकानदारों और विक्रेताओं की बिक्री में बढ़ोतरी होगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nपारंपरिक कला और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने की चाह इस अनोखे निर्माण के पीछे का मुख्य कारण है। आयोजकों ने आधुनिक प्रदूषण फैलाने वाली सामग्रियों से दूर रहकर सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने का यह मार्ग चुना।\n\n• सामग्री का चयन: कृत्रिम सजावट के बजाय मिट्टी और बांस के उपयोग से पर्यावरण को बचाने का स्पष्ट संदेश दिया गया है।\n• सांस्कृतिक प्रेरणा: अनुष्ठानों में उपयोग होने वाले पारंपरिक बर्तनों से प्रेरणा लेकर इस पूरी थीम को डिजाइन किया गया है।\n• कारीगरों की कला: पश्चिम बंगाल के विशेष कारीगरों के हुनर को प्रदर्शित करने के लिए इस दो महीने लंबी परियोजना को अमलीजामा पहनाया गया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. जमशेदपुर में यह अनोखा पंडाल कहाँ बनाया जा रहा है?\nयह पंडाल जमशेदपुर के कसीडीह स्थित ठाकुर प्यार सिंह धुरंधर सिंह स्पोर्टिंग क्लब द्वारा बनाया जा रहा है।\n\n2. इस पंडाल को बनाने में किस मुख्य सामग्री का उपयोग हो रहा है?\nइस पंडाल को तैयार करने के लिए करीब 50 हजार मिट्टी के घड़ों और बांस का इस्तेमाल किया जा रहा है।\n\n3. इस पंडाल को बनाने वाले कारीगर कहाँ से आए हैं?\nइस पंडाल का निर्माण पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर से आए लगभग 25 कारीगरों की टीम द्वारा किया जा रहा है।\n\n4. कारीगरों को इस पंडाल को तैयार करने में कितना समय लगा है?\nकरीब 25 कारीगरों की यह टीम पिछले दो महीनों से इस अनोखे पंडाल को बनाने में जुटी हुई है।\n\n5. पंडाल के आसपास आगंतुकों के लिए क्या विशेष व्यवस्था है?\nदर्शनार्थियों के लिए खाने-पीने की कई दुकानें और बच्चों के मनोरंजन हेतु झूले लगाए जा रहे हैं।",
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  "category": "झारखंड",
  "publishedAt": "2026-10-12",
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