# जमशेदपुर में नवरात्रि पर सजी सीढ़ियां, तमिल परिवार ने जीवंत की बोम्मई गोलू की अनूठी परंपरा

> दुर्गा पूजा के उत्सव के बीच जमशेदपुर में तमिल परंपरा के अनुसार बोम्मई गोलू की पूजा की गई, जहां सीढ़ीनुमा ढांचों पर देवी-देवताओं और पौराणिक पात्रों की प्रतिमाएं सजाई गईं।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-10-19 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/jamshedpur-men-navaratri-para-saji-sirhiyan-tamila-parivara-ne-jivnta-ki-bommai-golu-ki-anuthi-parnpara-49406 · **Language:** Hindi
**Tags:** जमशेदपुर, बोम्मई गोलू, गोलू पूजा, नवरात्रि, तमिल परंपरा, दुर्गा पूजा, सुंडल प्रसाद

शारदीय नवरात्रि के अवसर पर जहां औद्योगिक नगरी जमशेदपुर में भव्य दुर्गा पूजा पंडालों की रौनक छाई हुई है, वहीं शहर में बसे दक्षिण भारतीय समुदाय के लोग भी अपनी अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ कर रहे हैं। इसी क्रम में जमशेदपुर निवासी सुधा और दिलीप जी के आवास पर पारंपरिक तमिल विधि-विधान से गोलू पूजा का आयोजन किया गया। इस धार्मिक आयोजन में घर के भीतर विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के साथ-साथ पारंपरिक गुड़ियों को बहुत ही सुरुचिपूर्ण ढंग से स्थापित किया गया, जिसने यहां पहुंचे लोगों को दक्षिण भारतीय आस्था और समृद्ध विरासत का जीवंत अनुभव कराया।

## सीढ़ीनुमा व्यवस्था और विषम संख्याओं का विधान
तमिलनाडु की लोक संस्कृति में इस विशेष अनुष्ठान को बोम्मई गोलू अथवा कोलू के नाम से पहचाना जाता है। नवरात्रि के पावन दिनों में मनाए जाने वाले इस पर्व की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें लकड़ी या अन्य वस्तुओं की मदद से एक सीढ़ीनुमा ढांचा तैयार किया जाता है। इन सीढ़ियों पर देवी-देवताओं, महान संतों, पौराणिक आख्यानों से जुड़े चरित्रों तथा जनसाधारण के दैनिक जीवन से संबंधित विभिन्न गुड़ियों को सजाया जाता है। इस सजावट में सीढ़ियों की संख्या को लेकर एक खास नियम का पालन किया जाता है, जिसके तहत सीढ़ियां सदैव विषम संख्या जैसे तीन, पांच, सात या नौ के क्रम में ही रखी जाती हैं। श्रद्धालु अपनी पारिवारिक आस्था, श्रद्धा और घर में उपलब्ध जगह के अनुसार इन सीढ़ियों का निर्धारण करते हैं।

## पौराणिक कथाओं और नई पीढ़ी के बीच सेतु
सुधा और दिलीप जी ने अपने निवास पर इस पारंपरिक आयोजन के लिए विशेष व्यवस्था की, जहां मुख्य सीढ़ियों पर भगवान की प्रतिमाओं को प्रमुखता से स्थान दिया गया। इस रीति-रिवाज का प्राथमिक ध्येय मात्र गृह सज्जा करना नहीं है, अपितु इसके जरिए भावी पीढ़ी को सनातन धर्म के नैतिक मूल्यों, धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक गाथाओं से परिचित कराना भी है। प्रदर्शित की जाने वाली प्रत्येक गुड़िया और कलाकृति के पीछे कोई न कोई गूढ़ सांस्कृतिक, ऐतिहासिक अथवा धार्मिक संदेश छिपा होता है, जिससे बच्चों को अपनी जड़ों की जानकारी सहज रूप से मिलती है।

## नौ दिनों का अनुष्ठान और पारंपरिक खानपान
नवरात्रि के पूरे नौ दिनों तक चलने वाली इस पूजा के दौरान शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा के विविध रूपों की नियमित उपासना की जाती है। इस अवधि में प्रतिदिन विशेष नैवेद्य अथवा भोग तैयार करने की प्रथा है। दक्षिण भारतीय पाक परंपरा के अनुसार इस अवसर पर विशेष रूप से चना और विभिन्न दालों के सम्मिश्रण से तैयार किया जाने वाला स्वादिष्ट व्यंजन सुंडल प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। पूजा के दिनों में सगे-संबंधियों, पड़ोसियों और मित्रों को गृह प्रवेश के लिए आमंत्रित किया जाता है। इस दौरान महिलाएं एक-दूसरे के निवास पर जाकर हल्दी और कुमकुम लगाने की मंगल रस्म अदा करती हैं और परस्पर प्रसाद का आदान-प्रदान कर सौहार्द बढ़ाती हैं।

## विविधता में एकता का जीवंत उदाहरण
जमशेदपुर जैसे बहुसांस्कृतिक औद्योगिक नगर में देश के विभिन्न राज्यों से आए लोग परस्पर सद्भाव के साथ निवास करते हैं। ऐसे परिवेश में आयोजित यह गोलू पूजा स्थानीय नागरिकों को दक्षिण भारतीय जीवन शैली और आस्था को अत्यंत निकट से देखने तथा समझने का अवसर प्रदान करती है। इस प्रकार के सांस्कृतिक उत्सव प्रवासी परिवारों को अपनी पैतृक जड़ों से मजबूती से जोड़े रखने का कार्य करते हैं। यह आयोजन स्पष्ट करता है कि पर्व केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे विभिन्न संस्कृतियों के लोगों और परिवारों को प्रेम तथा आत्मीयता के सूत्र में पिरोने का सशक्त माध्यम हैं।

## इसका आप पर असर
यह आयोजन बताता है कि प्रवासी समुदाय अपने गृह राज्यों से दूर रहकर भी अपनी प्राचीन सांस्कृतिक पहचान को कैसे सुरक्षित और जीवंत रख सकते हैं।

- **जमशेदपुर में:** शहर के बहुसांस्कृतिक समाज को दक्षिण भारत की समृद्ध लोक परंपराओं और अनुष्ठानों को प्रत्यक्ष रूप से जानने का अवसर मिलता है। स्थानीय निवासी इस अवसर पर अंतर-सांस्कृतिक मेलजोल को बढ़ावा देकर सामाजिक सद्भाव को सुदृढ़ कर सकते हैं।
- **भारत में:** देश के विभिन्न कोनों में बसे परिवारों के लिए यह आयोजन अपनी क्षेत्रीय जड़ों और लोक कलाओं को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने की प्रेरणा देता है। लोग अपने घरों में इस प्रकार के पारंपरिक आयोजनों के माध्यम से बच्चों को प्राचीन कथाओं और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ सकते हैं।
- **सांस्कृतिक जागरूकता:** त्योहारों के दौरान केवल पंडाल भ्रमण के बजाय पारिवारिक और लोक अनुष्ठानों में भागीदारी बढ़ती है। इससे नई पीढ़ी किताबों से बाहर निकलकर व्यावहारिक रूप से भारतीय विविधता को समझ पाती है।
- **पारंपरिक खानपान:** त्योहारों पर बनने वाले पारंपरिक व्यंजनों जैसे सुंडल के पोषण और सांस्कृतिक महत्व के प्रति आम लोगों की रुचि जागृत होती है। इससे स्वस्थ खानपान की प्राचीन परंपराओं को दैनिक जीवन में अपनाने की प्रेरणा मिलती है।

## ऐसा क्यों हुआ
जमशेदपुर में यह आयोजन नवरात्रि उत्सव के दौरान दक्षिण भारतीय परंपराओं के संरक्षण और उनके प्रसार की आवश्यकता के तहत किया गया।

- **सांस्कृतिक निरंतरता की चाह:** औद्योगिक नगर जमशेदपुर में बसे दक्षिण भारतीय परिवारों ने अपनी पैतृक पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए इस अनुष्ठान को आयोजित किया। अपने मूल राज्य से दूर रहने के बावजूद परिवार अपनी सदियों पुरानी प्रथाओं को जारी रखना चाहते हैं।
- **आगामी पीढ़ी को संस्कार:** आधुनिक जीवनशैली के बीच बच्चों को भारतीय संस्कृति, पौराणिक कथाओं और महापुरुषों के जीवन मूल्यों की जानकारी देने के उद्देश्य से गुड़ियों की सीढ़ी सजाई गई। यह दृश्य रूप से इतिहास और धर्म को सिखाने का एक पारंपरिक साधन है।
- **सामुदायिक एकजुटता:** नवरात्रि का पर्व सामाजिक संपर्क का श्रेष्ठ अवसर प्रदान करता है, जहां हल्दी-कुमकुम और प्रसाद वितरण के जरिए लोग एक-दूसरे के घर आते-जाते हैं। इससे पड़ोसियों और रिश्तेदारों के बीच परस्पर सौहार्द और आत्मीय संबंध मजबूत होते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. जमशेदपुर में गोलू पूजा का आयोजन किसने किया?
जमशेदपुर में गोलू पूजा का आयोजन स्थानीय निवासी सुधा और दिलीप जी के घर पर किया गया।

### 2. तमिलनाडु में गोलू पूजा को किन अन्य नामों से जाना जाता है?
तमिलनाडु में इस पारंपरिक पूजा को बोम्मई गोलू या कोलू के नाम से जाना जाता है।

### 3. गोलू पूजा में सीढ़ियों की संख्या का क्या नियम है?
गोलू पूजा की सजावट में सीढ़ियों की संख्या हमेशा विषम रखी जाती है, जैसे तीन, पांच, सात या नौ सीढ़ियां।

### 4. इस पूजा में सीढ़ियों पर क्या सजाया जाता है?
सीढ़ियों पर देवी-देवताओं की प्रतिमाओं, महापुरुषों, पौराणिक चरित्रों और दैनिक जीवन को दर्शाने वाली विभिन्न पारंपरिक गुड़ियों को सजाया जाता है।

### 5. गोलू पूजा के दौरान कौन सा पारंपरिक प्रसाद विशेष रूप से बनता है?
इस अवसर पर चना और दालों के मिश्रण से तैयार किया जाने वाला पारंपरिक दक्षिण भारतीय व्यंजन सुंडल विशेष रूप से बनाया जाता है।

### 6. इस उत्सव के दौरान महिलाएं कौन सी रस्म निभाती हैं?
महिलाएं एक-दूसरे के घर जाकर हल्दी-कुमकुम की रस्म अदा करती हैं और प्रसाद का आदान-प्रदान करती हैं।

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