झारखंड के लोकगायक मधु मंसूरी ने लिखे 300 से अधिक नागपुरी गीत, पद्मश्री से हो चुके हैं सम्मानित झारखंड के प्रसिद्ध लोकगायक मधु मंसूरी हंसमुख ने बिना किसी औपचारिक संगीत शिक्षा के 300 से ज्यादा गीत रचे हैं। जल, जंगल और जमीन की रक्षा के आंदोलनों में उनके गीत आज भी गूंजते हैं। गांव छोड़ब नाहीं, जंगल छोड़ब नाहीं जैसे प्रसिद्ध गीतों के रचनाकार मधु मंसूरी हंसमुख आज झारखंड से लेकर ओडिशा और बंगाल तक अपनी खास पहचान बना चुके हैं। उनके द्वारा रचे गए यह गीत पर्यावरण संरक्षण और जल, जंगल, जमीन बचाने के अभियानों की पहचान बन चुके हैं। उनके इस कलात्मक योगदान के लिए उन्हें देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान के साथ-साथ झारखंड रत्न और विभूति रत्न से भी नवाजा जा चुका है। पिता से मिली संगीत की शुरुआती सीख महज आठ वर्ष की उम्र से गायन की शुरुआत करने वाले इस लोक कलाकार ने जीवन में कभी कोई औपचारिक संगीत प्रशिक्षण नहीं लिया है। उन्होंने संगीत की कोई कक्षा ज्वाइन नहीं की और न ही राग-ताल की कोई शास्त्रीय बारीकी सीखी। उन्हें संगीत की शुरुआती शिक्षा अपने पिता से मिली जिन्हें संगीत का गहरा शौक था। वह बताते हैं कि पांच साल की उम्र से ही उनके पिता उन्हें सामने बिठाकर संगीत सिखाते थे और उन्होंने जो कुछ भी सीखा है वह सब अपने पिता से ही सीखा है। उनके पिता पर्यावरण और आसपास के लोगों के दुखों को लेकर बेहद संवेदनशील रहते थे और इन्हीं विषयों पर गीत तैयार करते थे तथा चर्चा करते थे। यही संवेदनशीलता उनकी रचनाओं में भी साफ झलकती है क्योंकि उनका मानना है कि गीत विचारों और संदेशों को दुनिया तक पहुंचाने का सबसे सशक्त माध्यम है। झारखंड आंदोलन में गीतों का गूंजता स्वर उनकी रचनाओं में हमेशा जल, जंगल, जमीन के अधिकार और प्रकृति को बचाने का संदेश प्रमुखता से झलकता है। उनके गानों में अपने वजूद की रक्षा और हक की बात होती है, जिस वजह से पड़ोसी राज्यों में भी उनके गीत काफी लोकप्रिय हैं। उनकी एकमात्र इच्छा यही है कि गीतों के माध्यम से झारखंड को आगे बढ़ाया जाए। संगीत के प्रति उनका समर्पण ऐसा है कि वह रोज सुबह तीन बजे उठकर गीत लिखते हैं और उन्हें सुरों में ढालने का अभ्यास करते हैं। नागपुरी क्षेत्रीय भाषा में आधुनिक राग और रंग लाने वाले वह पहले रचनाकार हैं। उनके लिखे गीत झारखंड के हर गांव और गली में गूंजते हैं। नागपुरी गीतों के आधुनिक पुरोधा राज्य के अलग राज्य आंदोलन में राजनीतिक दिग्गजों के साथ-साथ सांस्कृतिक कर्मियों ने भी अहम भूमिका निभाई थी, जिसमें उनका योगदान अतुलनीय है। उस संघर्ष के दौरान उनका लिखा गीत झारखंड में खेती बाड़ी, पटना में खलिहान काफी लोकप्रिय हुआ था। उन्होंने नागपुरी गीतों का वैज्ञानिक वर्गीकरण भी किया है। पचहत्तर वर्ष की उम्र में भी वह आराम करने के बजाय लगातार सक्रिय हैं ताकि नागपुरी गीतों की यह अनमोल परंपरा जीवित रहे और नई पीढ़ी के लोग इससे प्रेरणा लेकर आगे आएं। नागपुरी मंच के प्रेमी और श्रोता उन्हें प्यार से नागपुरी मंच का राजकुमार कहकर पुकारते हैं। इसका आप पर असर यह समाचार झारखंड की संस्कृति और लोक कला से जुड़े प्रेमियों के लिए विशेष महत्व रखता है। • भारत में: क्षेत्रीय भाषाओं और लोक संगीत के कलाकारों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने से स्थानीय संस्कृतियों को बढ़ावा मिलता है। युवा कलाकारों के लिए पारंपरिक कलाओं को अपनाने के नए अवसर पैदा होते हैं। • झारखंड में: राज्य की सांस्कृतिक धरोहर और आंदोलन के इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिलती है। नागपुरी भाषा और साहित्य के संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ती है। सवाल-जवाब 1. मधु मंसूरी हंसमुख कौन हैं? वह झारखंड के एक प्रसिद्ध नागपुरी लोकगायक और गीतकार हैं, जिन्हें उनके योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। 2. उन्होंने कुल कितने गीत लिखे हैं? उन्होंने अब तक 300 से अधिक नागपुरी गीत लिख डाले हैं। 3. उन्होंने संगीत की शिक्षा किससे ली थी? उन्होंने कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया, बल्कि बचपन में उनके पिता ने उन्हें संगीत सिखाया था। 4. उनके कौन से गीत सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हैं? गांव छोड़ब नाहीं, जंगल छोड़ब नाहीं और झारखंड में खेती बाड़ी, पटना में खलिहान उनके सबसे मशहूर गीतों में शामिल हैं। 5. उन्हें कौन-से प्रमुख सम्मान मिले हैं? उन्हें पद्मश्री के अलावा झारखंड रत्न और विभूति रत्न से भी सम्मानित किया जा चुका है। प्रेरणा और सबक मधु मंसूरी हंसमुख का जीवन संघर्ष और कला के प्रति समर्पण कई महत्वपूर्ण सीख देता है। • बिना संसाधनों के शुरुआत: औपचारिक प्रशिक्षण के अभाव को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया और अपनी पारिवारिक सीख को ही अपनी ताकत बनाया। • समाज से जुड़ाव: कला का उपयोग केवल मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि समाज के अधिकारों और प्रकृति की रक्षा के लिए किया। • निरंतरता और अनुशासन: जीवन के हर पड़ाव में अपने काम के प्रति वफादार रहना और रोज अभ्यास करना सफलता की कुंजी है। • युवाओं के लिए प्रेरणा: अपनी संस्कृति और मातृभाषा से जुड़ाव बनाए रखते हुए उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है। https://trendkia.com/jharkhand/jharkhand-ke-lokagayaka-madhu-mansuri-ne-likhe-300-se-adhika-nagapuri-gita-padma-shri-se-ho-chuke-hain-sammanita-28748 TrendKia — Har trend, sabse pehle.