# झारखंड के मूलीबनी गांव में बंगू पत्तों से हस्तनिर्मित टोपियां तैयार कर आर्थिक संबल पा रहीं महिलाएं

> जमशेदपुर से 100 किमी दूर स्थित मूलीबनी की ग्रामीण महिलाएं बिना किसी मशीन के पारंपरिक बंगू पत्तों से धूप और बारिश से बचाने वाली टोपियां बनाकर स्थानीय बाजारों में बेच रही हैं।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-09-30 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/jharkhand-ke-mulibani-ganva-men-bangu-patton-se-hastanirmita-topiyan-taiyara-kara-arthika-snbala-pa-rahin-mahilaen-40445 · **Language:** Hindi
**Tags:** झारखंड, जमशेदपुर, मूलीबनी, बंगू पत्ता, ग्रामीण आजीविका, महिला सशक्तिकरण, हस्तशिल्प

झारखंड के सुदूर ग्रामीण अंचलों में महिलाएं स्थानीय वन संपदा और पारंपरिक हुनर के दम पर अपनी आजीविका का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं। जमशेदपुर शहर से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर बसे मूलीबनी गांव में महिलाओं का एक समूह प्रकृति से सीधे प्राप्त होने वाले बंगू पत्तों का उपयोग करके विशेष प्रकार की सुरक्षात्मक टोपियां तैयार कर रहा है। बिना किसी आधुनिक मशीनरी अथवा कारखाने के चलने वाला यह जमीनी उपक्रम पूरी तरह से हाथों की कारीगरी पर निर्भर है, जिससे ग्रामीणों को तेज धूप और भारी मानसूनी वर्षा से बचाव का प्राकृतिक साधन मिल रहा है।

## सीमित विकल्पों के बीच आजीविका का जरिया बना बंगू पत्ता
मूलीबनी में रोजगार के आधुनिक औपचारिक अवसर न के बराबर हैं, जिसके चलते ग्रामीण आबादी को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए स्थानीय परिवेश पर ही निर्भर रहना पड़ता है। गांव की निवासी जमुना के अनुसार, आजीविका के बहुत सीमित साधन होने की वजह से महिलाओं ने आसपास सहजता से मिलने वाले बंगू पत्तों को अपनी आय का जरिया बनाने का निर्णय लिया। इस पहल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि महिलाओं को अपने घरों और बाल-बच्चों को छोड़कर कहीं दूर पलायन नहीं करना पड़ता, बल्कि वे घरेलू जिम्मेदारियां निभाते हुए अतिरिक्त आय अर्जित कर अपने परिवार का खर्च चलाने में महत्वपूर्ण हाथ बंटा रही हैं।

## कारीगरी, उपयोगिता और हाथ से निर्माण की पूरी प्रक्रिया
वर्तमान समय में इस विशिष्ट हस्तशिल्प कार्य से गांव की करीब 10 से 15 महिलाएं सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं। यह पूरा उद्यम सामूहिक सहयोग के आधार पर संचालित होता है। महिलाएं जंगलों से बंगू के पत्तों को एकत्रित करती हैं, फिर उनकी गुणवत्ता परखकर उन्हें आवश्यक आकार में तराशती हैं और फिर पूरी निपुणता के साथ अपने हाथों से सिलकर टोपी का रूप देती हैं। यह टोपी मुख्य रूप से खेतों में काम करने वाले किसान भाइयों और खेतिहर मजदूरों के लिए अत्यंत व्यावहारिक मानी जाती है, क्योंकि पत्तों की प्राकृतिक परत वर्षा के पानी को सिर पर नहीं ठहरने देती और भीषण गर्मी में चुभती धूप से भी ठंडक प्रदान करती है।

## स्थानीय हाट-बाजारों में बिक्री और व्यापक पहुंच की उम्मीद
तैयार की गई इन टोपियों को महिलाएं स्थानीय ग्रामीण हाटों, साप्ताहिक बाजारों और क्षेत्रीय मेलों में बिक्री के लिए ले जाती हैं। बाजार में एक टोपी की कीमत 10 से 20 रुपये के बीच मिलती है। प्रति टोपी मिलने वाली यह राशि पहली नजर में भले ही सीमित प्रतीत होती हो, लेकिन जब अधिक मात्रा में टोपियों का निर्माण और विक्रय होता है, तो इससे संचित होने वाला कुल लाभ इन महिलाओं के लिए सम्मानजनक आर्थिक संबल बन जाता है। महिलाओं का मानना है कि इस पहल ने न केवल उनकी प्राचीन हस्तकला और पारंपरिक पद्धतियों को विलुप्त होने से बचाया है, बल्कि उन्हें कठिन मजदूरी के लिए भटकने से भी राहत दी है। समूह की आकांक्षा है कि उनके इन पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों को बड़े शहरी बाजारों तक सीधी पहुंच मिले, जिससे उनके उद्यम का विस्तार हो सके और उनकी दैनिक आय में और इजाफा हो सके।

## इसका आप पर असर
प्राकृतिक वन उत्पादों से तैयार यह पारंपरिक हस्तशिल्प ग्रामीण महिलाओं के घरेलू खर्च और स्थानीय श्रमिकों के दैनिक जीवन पर सीधा असर डाल रहा है।

- **भारत में:** देश भर के उपभोक्ताओं के लिए यह पर्यावरण-अनुकूल और शून्य-प्लास्टिक आधारित स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने का बेहतरीन उदाहरण है। शहरों में ऐसे प्राकृतिक उत्पादों की मांग बढ़ने से ग्रामीण कारीगरों के लिए व्यापक आर्थिक संभावनाएं खुल सकती हैं।
- **झारखंड में:** जमशेदपुर के आसपास ग्रामीण हाटों में आने वाले किसान और मजदूर 10 से 20 रुपये के मामूली खर्च में धूप और बारिश से बचाव का साधन पा रहे हैं। इस कार्य में लगी 10 से 15 महिलाओं को अपने ही गांव में रहकर बिना बाहर मजदूरी किए नियमित अतिरिक्त आमदनी मिल रही है।

## ऐसा क्यों हुआ
दूरदराज के इलाकों में औद्योगिक या संगठित रोजगार न होने के कारण ग्रामीण महिलाओं ने अपनी आजीविका चलाने के लिए प्रकृति में आसानी से मिलने वाले पत्तों को माध्यम बनाया।

- **सीमित स्थानीय रोजगार:** मूलीबनी गांव में औपचारिक नौकरियों और फैक्ट्रियों का अभाव है, जिसके कारण महिलाओं को आजीविका के वैकल्पिक साधन तलाशने पड़े। इस कमी ने उन्हें घर के नजदीक उपलब्ध वन संपदा का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया।
- **बंगू पत्तों की प्रचुरता और गुण:** गांव के आसपास बंगू के पत्ते प्रचुर मात्रा में बिना किसी लागत के मिल जाते हैं। पत्तों की प्राकृतिक जलरोधी और धूप-रोधी क्षमता टोपी बनाने के लिए बेहद मुफीद साबित हुई।
- **मशीन-मुक्त निर्माण:** इस काम में किसी महंगी मशीनरी, बिजली या पूंजीगत निवेश की आवश्यकता नहीं होती। महिलाएं आपसी सहयोग से पूरी प्रक्रिया हाथों से संचालित कर लेती हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. मूलीबनी गांव किस शहर से और कितनी दूरी पर स्थित है?
मूलीबनी गांव झारखंड के जमशेदपुर से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

### 2. महिलाएं टोपियां बनाने के लिए किस प्राकृतिक संसाधन का उपयोग करती हैं?
महिलाएं इन टोपियों को बनाने के लिए आसपास आसानी से मिलने वाले बंगू के पत्तों का उपयोग करती हैं।

### 3. इस टोपी की मुख्य उपयोगिता और विशेषताएं क्या हैं?
यह टोपी बरसात के पानी और तेज धूप से सिर का बचाव करती है, जो विशेष रूप से खेतों में काम करने वाले ग्रामीणों के लिए बहुत उपयोगी है।

### 4. इस निर्माण कार्य से गांव की कितनी महिलाएं जुड़ी हुई हैं?
वर्तमान में मूलीबनी गांव की करीब 10 से 15 महिलाएं मिलकर इस काम से जुड़ी हुई हैं।

### 5. बाजार में एक टोपी किस कीमत पर बेची जाती है?
एक टोपी की कीमत स्थानीय हाट और मेलों में लगभग 10 से 20 रुपये के बीच होती है।

### 6. गांव की महिलाएं इस काम को आगे बढ़ाने के लिए क्या चाहती हैं?
महिलाएं चाहती हैं कि उनके इन प्राकृतिक उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंच मिले, ताकि उनकी आमदनी में और वृद्धि हो सके।

## प्रेरणा और सबक
मूलीबनी की महिलाओं का यह प्रयास दर्शाता है कि बिना पूंजी और मशीनरी के भी प्रकृति के सहयोग से आत्मनिर्भरता पाई जा सकती है।

- **स्थानीय संसाधनों का सदुपयोग:** महंगे साधनों का इंतजार करने के बजाय आसपास बिखरी प्राकृतिक संपदा को रोजगार में बदला जा सकता है। महिलाओं ने बंगू पत्तों को बिना किसी लागत के आमदनी का साधन बना दिया।
- **पारंपरिक हुनर का संरक्षण:** आधुनिक मशीनों के बिना केवल हाथों की कारीगरी से ऐसा उपयोगी उत्पाद तैयार किया जा सकता है जो टिकाऊ भी हो। इससे पारंपरिक ज्ञान अगली पीढ़ी तक सुरक्षित रहता है।
- **सामूहिक सहयोग से स्वावलंबन:** 10 से 15 महिलाओं ने समूह बनाकर काम का बंटवारा किया और साथ मिलकर आजीविका खड़ी की। सामूहिक प्रयास व्यक्तिगत कठिनाइयों को आसान बना देता है।

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