झारखंड की सोहराय चित्रकला को दैनिक उपयोगी उत्पादों से जोड़कर नई पहचान दे रही हैं जमशेदपुर की सीता मोनी सोरेन जमशेदपुर की सीता मोनी सोरेन ने झारखंड की पारंपरिक सोहराय पेंटिंग को डायरी, बैग और कॉरपोरेट गिफ्ट पर बनाकर दैनिक जीवन का हिस्सा बना दिया है। जमशेदपुर की रहने वाली सीता मोनी सोरेन ने झारखंड की सदियों पुरानी पारंपरिक सोहराय चित्रकला को नए दौर की व्यावहारिक जरूरतों के साथ जोड़कर एक खास मुकाम हासिल किया है। मिट्टी की दीवारों तक सिमटी रहने वाली इस प्राचीन लोक कला को वह हस्तनिर्मित डायरी, बैग और कॉरपोरेट उपहारों पर बनाकर लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बना रही हैं। उनका यह कदम न केवल पारंपरिक कला को नया बाज़ार दे रहा है, बल्कि स्थानीय कारीगरों के लिए रोजगार और पहचान के नए रास्ते भी खोल रहा है। ग्रामीण परिवेश और वन्यजीवों की मनमोहक झलक सीता मोनी सोरेन द्वारा तैयार किए जाने वाले उत्पादों पर उकेरी गई हर एक पेंटिंग में झारखंड के प्राकृतिक सौंदर्य और ग्रामीण जीवन की गहरी छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इन चित्रों में गांव की महिलाओं के रोजमर्रा के जीवन के दृश्य बखूबी बयां होते हैं। चूल्हा जलाती हुई महिलाएं, जंगलों से सूखी लकड़ियां चुनकर लाती ग्रामीण औरतें और कुएं से पानी खींचने की तस्वीरें इस कला का मुख्य आकर्षण हैं। ये पेंटिंग रंगों और पारंपरिक आकृतियों के मेल से ग्रामीण समाज की वास्तविक कहानियों को बड़ी सादगी से बयां करती हैं। इसके साथ ही, सीता मोनी की चित्रकारी में वन्यजीवों और घने जंगलों को भी विशेष प्राथमिकता दी जाती है। उनकी कलाकृतियों में हाथी, मोर, शेर और भालू जैसे विविध जानवरों को पारंपरिक सोहराय शैली में बहुत ही खूबसूरती से बनाया जाता है। इन कलाकृतियों के माध्यम से वह संदेश देना चाहती हैं कि जंगल, जीव-जंतु और प्रकृति झारखंड के सांस्कृतिक एवं सामाजिक अस्तित्व के सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं। दीवारों से निकलकर रोजमर्रा के सामान तक का सफर सोहराय चित्रकला की सबसे बड़ी विशेषता इसका पारंपरिक अंदाज है, जिसमें प्रकृति, पशु-पक्षियों और इंसान के सह-अस्तित्व को दर्शाया जाता है। सीता मोनी ने इस सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक समय की मांग के अनुरूप नया रूप दिया है। अब लोग सोहराय कला की खूबसूरती को केवल तस्वीरों या दीवारों पर देखने के बजाय अपनी दैनिक उपयोगी डायरी, झोले और कॉरपोरेट गिफ्टिंग आइटम के रूप में अपने पास रख सकते हैं। इस नवाचार से पारंपरिक लोक कला को एक नया व्यावसायिक मंच मिल रहा है। सीता मोनी सोरेन का स्पष्ट मानना है कि किसी भी लोक कला को लंबे समय तक जीवित रखने के लिए उसे केवल आर्ट गैलरी, प्रदर्शनी या दीवारों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। जब कला लोगों के रोज़मर्रा के जीवन और उपयोग का हिस्सा बनती है, तो अधिक से अधिक लोग उसके सांस्कृतिक महत्व से रूबरू हो पाते हैं। इसी दूरदर्शी सोच के साथ वह सोहराय पेंटिंग की इस अनूठी परंपरा को आधुनिक बाज़ार में आगे बढ़ा रही हैं। इसका आप पर असर पारंपरिक लोक कलाओं का रोजमर्रा की चीजों में समावेशन भारतीय हस्तशिल्प और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहा है। • भारत में: देश भर के कला प्रेमियों और खरीदारों को अब पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प से जुड़े टिकाऊ उत्पाद आसानी से उपलब्ध हो रहे हैं। इससे स्वदेशी निर्मित वस्तुओं के प्रति जागरूकता और मांग दोनों बढ़ रही हैं। • झारखंड में: राज्य के स्थानीय सोहराय चित्रकारों और कारीगरों को साल भर स्थायी आय और नया बाज़ार मिल रहा है। दीवार चित्रों तक सीमित रहने वाली लोक कला को अब कॉरपोरेट जगत और बड़े शहरों में व्यावसायिक पहचान मिल रही है। ऐसा क्यों हुआ सदियों पुरानी सोहराय कला केवल त्योहारों और मिट्टी के मकानों की दीवारों तक सीमित थी, जिससे कलाकारों के पास सीमित अवसर थे। • सीमित बाज़ार का दायरा: पारंपरिक रूप से सोहराय चित्रकारी केवल विशेष मौकों पर घरों की दीवारों पर की जाती थी, जिससे कारीगरों को नियमित आय नहीं मिल पाती थी। • आधुनिक उत्पादों की मांग: बाज़ार में हस्तनिर्मित और सांस्कृतिक महत्व वाले उत्पादों जैसे डायरी और बैग की बढ़ती मांग ने लोक कला के इस व्यावसायीकरण को प्रेरित किया। • कला के संरक्षण की जरूरत: नई पीढ़ी के बीच लोक कला को लोकप्रिय बनाने के लिए इसे रोजमर्रा की जीवनशैली से जोड़ना बेहद प्रभावी माना गया। सवाल-जवाब 1. सीता मोनी सोरेन किस कला पर काम करती हैं? वह झारखंड की पारंपरिक सोहराय चित्रकला पर काम करती हैं। 2. वह सोहराय पेंटिंग को किन-किन उत्पादों पर बना रही हैं? वह सोहराय पेंटिंग को हैंडमेड डायरी, बैग और कॉरपोरेट गिफ्टिंग बैग जैसे उत्पादों पर बना रही हैं। 3. उनकी पेंटिंग्स में मुख्य रूप से क्या दर्शाया जाता है? उनकी पेंटिंग्स में झारखंड के प्राकृतिक सौंदर्य, ग्रामीण महिलाओं के जीवन और हाथी, मोर, शेर व भालू जैसे वन्यजीवों को दर्शाया जाता है। 4. सीता मोनी सोरेन का इस पहल के पीछे क्या उद्देश्य है? उनका उद्देश्य सोहराय कला को दीवारों तक सीमित न रखकर लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना और इसे नया बाज़ार उपलब्ध कराना है। प्रेरणा और सबक सीता मोनी सोरेन की यह पहल यह दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक कला को आधुनिक समय की जरूरतों से जोड़कर एक सफल मॉडल तैयार किया जा सकता है। • सोच में नवाचार लाएं: अपनी पुरानी या पारंपरिक कला को केवल पुरानी पद्धतियों तक सीमित रखने के बजाय आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप ढालें। • उपयोगिता का ध्यान रखें: जब कोई वस्तु कलात्मक होने के साथ-साथ दैनिक उपयोग की भी होती है, तो उसकी स्वीकार्यता और बाज़ार मूल्य काफी बढ़ जाता है। • संस्कृति का संरक्षण: अपनी जड़ों और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए व्यावसायिक सफलता हासिल की जा सकती है। • समुदाय को सशक्त बनाना: व्यक्तिगत प्रयास से पूरी बिरादरी और स्थानीय कारीगरों के लिए नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। https://trendkia.com/jharkhand/jharkhand-ki-sohrai-chitrakala-ko-dainika-upayogi-utpadon-se-jorakara-nai-pahachana-de-rahi-hain-jamshedpur-ki-sita-moni-soren-32914 TrendKia — Har trend, sabse pehle.