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  "type": "article",
  "title": "झारखंड में साड़ी पहनकर नंगे पैर 1600 मीटर दौड़ीं विधवा कविता महतो, होमगार्ड भर्ती ट्रायल में हासिल की एक्सीलेंट श्रेणी",
  "summary": "झारखंड के रामगढ़ की 27 वर्षीय विधवा कविता महतो ने बिना जूते और खाली पेट होमगार्ड बहाली ट्रायल में 1600 मीटर दौड़ 6 मिनट 40 सेकंड में पूरी कर ली। कर्ज और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उनकी यह उपलब्धि प्रेरणा बन गई है।",
  "content": "झारखंड के रामगढ़ जिले की एक साधारण महिला ने विपरीत हालात के सामने घुटने टेकने के बजाय अपनी मेहनत से एक मिसाल पेश की है। दुलमी प्रखंड की रहने वाली 27 वर्षीया कविता महतो ने होमगार्ड भर्ती के फिजिकल ट्रायल में भाग लेकर सबको चौंका दिया। खेल परिधान और महंगे जूतों से लैस अन्य महिला उम्मीदवारों के बीच कविता केवल एक साधारण साड़ी बांधकर, खाली पेट और नंगे पैर मैदान में उतरी थीं। उन्होंने 1600 मीटर की चुनौतीपूर्ण दौड़ महज 6 मिनट 40 सेकंड में पूरी करके चयन प्रक्रिया की 'एक्सीलेंट' श्रेणी में अपना नाम दर्ज कराया। सोशल मीडिया पर उनकी इस दौड़ की चर्चा फैलने के बाद लोग उनके साहस की सराहना कर रहे हैं।\n\nखाली पेट और नंगे पैर दौड़ने की मजबूरी\nआमतौर पर किसी भी लंबी दौड़ या पुलिस बहाली के शारीरिक परीक्षण के लिए धावकों को पौष्टिक खानपान, विशेष अभ्यास, ट्रैक सूट और दौड़ने वाले जूतों की सख्त जरूरत होती है। इंटरमीडिएट तक पढ़ाई करने वाली कविता के पास इनमें से किसी भी बुनियादी साधन की सुविधा नहीं थी। ट्रायल वाले दिन मैदान में अन्य प्रतिभागी खेल के कपड़े पहने हुए थीं और शारीरिक ऊर्जा बनाए रखने के लिए सेब, केला तथा भीगे चने जैसे पौष्टिक आहार ले रही थीं। इसके विपरीत कविता घर से बिना ब्रश किए और पूरी तरह खाली पेट परीक्षा केंद्र तक पहुंची थीं। उनके पैरों में टूटी चप्पलें थीं, जिन्हें देखकर उनके मन में संकोच भी हुआ, लेकिन अपने दो मासूम बच्चों के भविष्य और उनके भरण-पोषण की चिंता ने उनके कदम रुकने नहीं दिए।\n\nपति की बीमारी और सिर पर पांच से छह लाख का कर्ज\nकविता का पारिवारिक जीवन पिछले कुछ वर्षों में गहरे संकट से गुजरा है। लगभग तीन वर्ष पूर्व उनके पति दीपक महतो गुजरात में मजदूरी का काम करते थे, जहां उन्हें पीलिया और अन्य गंभीर बीमारियों ने जकड़ लिया। पति के इलाज के दौरान कई यूनिट खून चढ़वाना पड़ा और भारी चिकित्सा खर्च उठाना पड़ा। तमाम प्रयासों और अत्यधिक कर्ज के बावजूद दीपक महतो की जान नहीं बचाई जा सकी। पति के देहांत के महज छह महीने बाद ही उनके भैसुर की भी बीमारी से मृत्यु हो गई। इन लगातार त्रासदियों और लंबी बीमारियों के इलाज के कारण परिवार पर करीब 5 से 6 लाख रुपये का भारी कर्ज चढ़ गया, जिसे चुकाने का पूरा दायित्व अब कविता पर आ चुका है।\n\nईंट-भट्ठे पर मजदूरी और सुबह चार बजे का कड़ा अभ्यास\nवर्तमान समय में कविता अपने परिवार की एकमात्र कमाने वाली सदस्य हैं। उनके कंधों पर 12 साल के बेटे, 9 साल की बेटी और वृद्ध सास-ससुर की पूरी जिम्मेदारी है। उनके ससुर उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी पुरानी बीमारियों से ग्रस्त हैं, जिसके चलते हर माह उनकी दवाओं का खर्च बना रहता है। इस कठिन परिस्थिति में परिवार का पेट भरने और कर्ज की किस्तें चुकाने के लिए कविता हर प्रकार का श्रम करती हैं। वे गर्मी के महीनों में ईंट-भट्ठों पर भारी ईंटें ढोने का काम करती हैं, धान के मौसम में रोपाई और कटाई करती हैं, दूसरों के घरों में झाड़ू-बर्तन का काम संभालती हैं और घर में एक गाय तथा बकरी पालकर गुजर-बसर करती हैं। इन व्यस्तताओं के बीच होमगार्ड बनने के अपने सपने को पूरा करने के लिए वे हर रोज तड़के 4 बजे उठकर अपने दोनों बच्चों के साथ गांव के मैदान में अभ्यास करने जाती रही हैं।\n\nस्थानीय स्तर पर रोजगार की उम्मीद और मदद के हाथ\nपारिवारिक मजबूरियों के कारण कविता अपने गांव और जिले से बाहर जाकर काम करने में असमर्थ हैं, क्योंकि घर पर बच्चों और बीमार सास-ससुर की देखभाल करने वाला कोई अन्य सदस्य मौजूद नहीं है। होमगार्ड की यह बहाली उनके लिए एक सुरक्षित मासिक आय और गृह जिले या ब्लॉक में ही सेवा देने का अंतिम बड़ा अवसर है। उनकी इस दौड़ और जज्बे की जानकारी मिलने के बाद खेल जगत से जुड़े लोग भी सहायता के लिए आगे आए हैं। अंकित रनर एकेडमी के अजय करमाली सहित अन्य लोगों ने कविता से संपर्क कर उन्हें अभ्यास के लिए ट्रैक सूट और दौड़ने वाले जूते उपलब्ध कराए हैं। आगामी 24 तारीख से शुरू होने वाले अगले चरण के लिए अब वे जूतों के साथ अपनी तैयारी मजबूत कर रही हैं, ताकि अंतिम चयन सूची में अपनी जगह पक्की कर सकें।\n\nइसका आप पर असर\nयह घटना दिखाती है कि बुनियादी संसाधनों और खेल सुविधाओं के अभाव के बावजूद दृढ़ संकल्प से सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में सफलता पाई जा सकती है।\n\n• ग्रामीण अभ्यर्थियों के लिए: यह मामला साबित करता है कि महंगे उपकरणों की कमी प्रतिभा और कठोर अभ्यास के आड़े नहीं आती। जो युवा शारीरिक दक्षता परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, वे सीमित संसाधनों में भी निरंतर अभ्यास जारी रखकर परिणाम दे सकते हैं।\n• झारखंड और रामगढ़ में: स्थानीय स्तर पर प्रशासन और खेल अकादमियों का ध्यान अभावग्रस्त महिला अभ्यर्थियों की तरफ गया है। इससे अन्य जरूरतमंद उम्मीदवारों को बुनियादी खेल किट और सहायता मिलने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।\n• आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए: सरकारी बहालियों में स्थानीय स्तर पर मिलने वाला रोजगार विधवा और संकटग्रस्त महिलाओं को कर्ज के जाल से बाहर निकलने का बड़ा सहारा बन सकता है। इससे परिवार पर आश्रित बच्चों और वृद्धों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित होती है।\n• खेल प्रशिक्षण व्यवस्था के लिए: जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को समय पर पहचानना और उन्हें शुरुआती चरण में ही जूते तथा पोषण उपलब्ध कराना बेहद आवश्यक है। अगर अकादमियां ऐसे युवाओं को पहले से प्रशिक्षित करें, तो उनके चयन की संभावनाएं और बढ़ सकती हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह स्थिति गरीबी, अचानक आई पारिवारिक आपदाओं और अपने आश्रितों के भरण-पोषण की अनिवार्यता के कारण उत्पन्न हुई। पति के इलाज के दौरान हुए भारी कर्ज और आय के किसी स्थाई साधन की अनुपस्थिति ने एक मां को इस कठिन डगर पर चलने के लिए विवश किया।\n\n• गंभीर बीमारी और पारिवारिक संकट: तीन वर्ष पूर्व गुजरात में मजदूरी के दौरान पति दीपक महतो की पीलिया से मृत्यु हो गई और छह महीने बाद भैसुर का भी देहांत हो गया। इसके चलते परिवार का आर्थिक आधार पूरी तरह बिखर गया।\n• उपचार के दौरान चढ़ा भारी कर्ज: पति के लंबे इलाज और रक्त आधान की व्यवस्था के कारण परिवार पर करीब 5 से 6 लाख रुपये का कर्ज चढ़ गया। इस कर्ज को चुकाने का पूरा भार कविता के कंधों पर आ पड़ा।\n• पारिवारिक निर्भरता और स्थानीय रोजगार की आवश्यकता: दो छोटे बच्चों और बीमार सास-ससुर की नियमित देखभाल के कारण कविता बाहर जाकर काम नहीं कर सकती थीं। इसी वजह से उन्हें अपने ही जिले और ब्लॉक में स्थाई आमदनी के लिए होमगार्ड की बहाली में शामिल होना पड़ा।\n• कठोर परिश्रम और सुबह का अभ्यास: दिनभर ईंट-भट्ठों और खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। हर सुबह 4 बजे उठकर गांव के मैदान में नंगे पैर नियमित दौड़ लगाने के अभ्यास ने उन्हें यह सफलता दिलाई।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. कविता महतो कौन हैं और वे क्यों चर्चा में हैं?\nकविता महतो झारखंड के रामगढ़ जिले के दुलमी प्रखंड की रहने वाली 27 वर्षीया विधवा महिला हैं, जिन्होंने होमगार्ड बहाली में साड़ी पहनकर और नंगे पैर दौड़ पूरी की।\n\n2. होमगार्ड बहाली ट्रायल में कविता का प्रदर्शन कैसा रहा?\nउन्होंने 1600 मीटर की दौड़ 6 मिनट 40 सेकंड में पूरी की और चयन प्रक्रिया की एक्सीलेंट श्रेणी में स्थान प्राप्त किया।\n\n3. कविता महतो पर कितना कर्ज है?\nअपने पति और भैसुर के गंभीर बीमारी के इलाज के दौरान उन पर लगभग 5 से 6 लाख रुपये का कर्ज हो गया था।\n\n4. परिवार चलाने के लिए कविता क्या-क्या काम करती हैं?\nवे ईंट-भट्ठों पर ईंटें ढोने, खेतों में धान की रोपाई-कटाई, दूसरों के घरों में बर्तन-झाड़ू करने तथा गाय और बकरी पालकर घर का खर्च चलाती हैं।\n\n5. कहानी सामने आने के बाद उन्हें क्या सहायता मिली है?\nअंकित रनर एकेडमी के अजय करमाली सहित स्थानीय लोगों ने उन्हें आगे के अभ्यास के लिए ट्रैक सूट और रनिंग शूज भेंट किए हैं।\n\n6. कविता की अगली दौड़ कब प्रस्तावित है?\nउनकी अगली दौड़ 24 तारीख से शुरू होने वाले भर्ती के अगले चरण में प्रस्तावित है।\n\nप्रेरणा और सबक\nकविता महतो का संघर्ष सिखाता है कि भीषण अभाव और विपत्तियों के बावजूद अपनी इच्छाशक्ति से अपनी राह बनाई जा सकती है।\n\n• संकट में हिम्मत न हारना: भारी कर्ज और परिवार में दो मौतों के बाद भी निराशा में डूबने के बजाय कविता ने मजदूरी और अभ्यास का रास्ता चुना।\n• संसाधनों के अभाव को बहाना न बनाना: जूते और खेल के कपड़े न होने के बावजूद उन्होंने नंगे पैर दौड़ने का फैसला किया और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया।\n• कठोर अनुशासन का पालन: दिनभर कड़ी मजदूरी करने के बाद भी रोज सुबह 4 बजे उठकर अभ्यास करना यह साबित करता है कि निरंतरता ही सफलता की कुंजी है।\n• पारिवारिक दायित्वों के प्रति समर्पण: बच्चों और बीमार सास-ससुर की जिम्मेदारी को बोझ मानने के बजाय उन्होंने इसे अपनी ताकत और प्रेरणा में बदल दिया।",
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  "category": "झारखंड",
  "publishedAt": "2026-10-07",
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