झारखंड की दो बहनों ने हाथों के हुनर से खड़ा किया गहनों का कारोबार, ऑटो चालक पिता का बनीं सहारा धागे, छोटे शीशे और समुद्री सीप के इस्तेमाल से हस्तनिर्मित गहने तैयार कर झारखंड की दो बहनें राज्य भर में पहचान बना रही हैं। इस रचनात्मक उद्यम से होने वाली कमाई से वे कॉलेज फीस भरने के साथ अपने ऑटो चालक पिता का आर्थिक संबल भी बन रही हैं। झारखंड के लगभग हर जिले में हाथ से बने पारंपरिक और पर्यावरण अनुकूल गहनों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इस रचनात्मक पहल को आगे बढ़ाने वाली दीपांशु और उनकी बहन साधारण धागों, बारीक शीशों और समुद्री सीपियों का उपयोग करके आकर्षक आभूषण तैयार कर रही हैं। किसी भी आधुनिक मशीन का सहारा लिए बिना पूरी तरह हाथों से तैयार किए जा रहे इन उत्पादों को ग्राहकों की तरफ से जोरदार समर्थन मिल रहा है। हाल ही में आयोजित एक प्रदर्शनी स्टॉल पर खरीदारों की भारी भीड़ उमड़ी, जहां लोग एक बार में 1000 रुपये तक के आभूषण खुशी से खरीद कर ले गए। बचपन के शौक को दिया आजीविका का रूप दोनों बहनों में रचनात्मकता की यह कला बचपन से ही मौजूद थी, जिसे बाद में उन्होंने एक संगठित व्यवसाय का रूप देने का फैसला किया। वे साधारण चूड़ियों को रंग-बिरंगे धागों से लपेटकर उन पर छोटे-छोटे शीशे सजाती हैं। इसके अलावा समुद्री सीपियों से सजे खूबसूरत हार और चूड़ियों की एक पूरी श्रृंखला तैयार की जाती है। इन आभूषणों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि निर्माण प्रक्रिया में मशीन का कोई उपयोग नहीं किया जाता और सारा काम दोनों बहनें मिलकर स्वयं पूरा करती हैं। पर्यावरण अनुकूल और संवेदनशील त्वचा के लिए सुरक्षित बाजार में बिकने वाले आम धातु या सिंथेटिक गहनों से अलग, यह शिल्प पूरी तरह प्राकृतिक और मूल सामग्रियों से तैयार किया जाता है। पर्यावरण को किसी भी प्रकार का नुकसान न पहुंचे, इसका निर्माण में विशेष ध्यान रखा जाता है। यह संग्रह विशेष रूप से उन महिलाओं और ग्राहकों को खूब आकर्षित कर रहा है जिन्हें मैटेलिक या आर्टिफिशियल गहनों से एलर्जी की समस्या होती है। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों के लिए यह पूरी तरह सुरक्षित विकल्प साबित हो रहा है, जिससे इसकी लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। पिता के संघर्ष में बनीं आर्थिक ढाल इस हुनर से होने वाली कमाई दोनों बहनों के जीवन में बड़ा बदलाव ला रही है। दीपांशु की बहन संत जेवियर कॉलेज में उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही हैं, जिनकी कॉलेज फीस इसी काम से प्राप्त आय से भरी जा रही है। उनके पिता ऑटो रिक्शा चलाकर कठिन संघर्ष के बीच परिवार का भरण-पोषण करते हैं और कई बार परिवार के लिए अपनी जरूरतों को छोड़ देते हैं। ऐसे हालात में दोनों बहनें न केवल अपनी पढ़ाई और व्यक्तिगत खर्च संभाल रही हैं, बल्कि अपने पिता का आर्थिक सहारा बनकर उनके संघर्ष को भी साझा कर रही हैं। इसका आप पर असर स्थानीय स्तर पर हस्तनिर्मित और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों को अपनाकर संवेदनशील त्वचा वाले लोग सुरक्षित विकल्प पा सकते हैं और घरेलू कारीगरों को बढ़ावा दे सकते हैं। • भारत में: प्राकृतिक और धातु-मुक्त गहनों का बढ़ता चलन उन सभी उपभोक्ताओं को राहत देता है जो एलर्जी से जूझते हैं। ऐसे कुटीर उद्योगों से खरीदार सीधे स्थानीय युवाओं और छात्रों के सशक्तिकरण में योगदान दे सकते हैं। • झारखंड में: राज्य के विभिन्न जिलों में लगने वाली प्रदर्शनियों में जाकर नागरिक इन कारीगर बहनों के उत्पादों को खरीद सकते हैं। इस प्रकार की खरीदारी स्थानीय प्रतिभाओं को पढ़ाई जारी रखने और आत्मनिर्भर बनने में सीधी मदद करती है। ऐसा क्यों हुआ पारंपरिक धातु आभूषणों से त्वचा एलर्जी की बढ़ती शिकायतें और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की मांग ने इस अनूठे हस्तशिल्प को लोकप्रियता दिलाई। बहनों ने अपने भीतर छिपी कला को आजीविका में बदलकर पारिवारिक आर्थिक चुनौतियों का हल तलाशा। • रचनात्मक पृष्ठभूमि: दोनों बहनों में बचपन से ही सजावटी काम और हस्तकला के प्रति गहरी रुचि थी। उन्होंने बाजार में अपनी इस कला की संभावनाओं को पहचाना और इसे एक छोटे कारोबार के रूप में शुरू किया। • त्वचा संबंधी जरूरतें: कई उपभोक्ताओं को सामान्य मैटेलिक आभूषणों से एलर्जी और रैशेज की समस्या होती है। धागे, शीशे और सीप जैसे प्राकृतिक तत्वों से बने गहनों ने इस समस्या का सुरक्षित समाधान प्रस्तुत किया। • आर्थिक संबल की आवश्यकता: पिता के ऑटो रिक्शा चालक होने के कारण परिवार को दैनिक खर्चों और कॉलेज की फीस के लिए संघर्ष करना पड़ता था। इस परिस्थिति ने बहनों को पढ़ाई के साथ-साथ आय का स्रोत बनाने के लिए प्रेरित किया। सवाल-जवाब 1. दीपांशु और उनकी बहन किस प्रकार के आभूषण बनाती हैं? वे सुई-धागे, बारीक शीशों और समुद्री सीपियों का इस्तेमाल करके हाथ से चूड़ियां और खूबसूरत हार बनाती हैं। 2. इन आभूषणों की निर्माण प्रक्रिया की मुख्य विशेषता क्या है? यह पूरी तरह हस्तनिर्मित और पर्यावरण अनुकूल हैं, जिनमें किसी भी प्रकार की मशीन का उपयोग नहीं किया जाता। 3. यह गहने किन ग्राहकों के लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त हैं? यह उन लोगों के लिए बेहद मुफीद हैं जिनकी त्वचा संवेदनशील है या जिन्हें मैटेलिक व आर्टिफिशियल गहनों से एलर्जी होती है। 4. प्रदर्शनी स्टॉल पर ग्राहकों की खरीदारी का रुझान कैसा रहा? प्रदर्शनी में ग्राहकों ने जोरदार रुचि दिखाई और लोग एक ही बार में 1000 रुपये तक के आभूषण खरीद कर ले गए। 5. इस काम से होने वाली कमाई का उपयोग कहां किया जा रहा है? इससे संत जेवियर कॉलेज में पढ़ रही बहन की फीस भरी जाती है और ऑटो चालक पिता के घरेलू खर्चों में मदद की जाती है। प्रेरणा और सबक साधारण संसाधनों और घरेलू कला के दम पर आत्मनिर्भरता हासिल करने की यह यात्रा हर युवा के लिए प्रेरणादायक है। • हुनर को बनाएं उद्यम: अपने बचपन के शौक या रचनात्मक कौशल को सिर्फ खाली समय बिताने तक सीमित न रखें। सही दिशा और लगन से किसी भी हुनर को व्यावसायिक रूप दिया जा सकता है। • समस्या का व्यावहारिक समाधान: ग्राहकों की विशिष्ट समस्याओं, जैसे संवेदनशील त्वचा या एलर्जी को ध्यान में रखकर उत्पाद तैयार करना व्यवसाय को तेजी से सफल बनाता है। • पारिवारिक जिम्मेदारी में साझेदारी: माता-पिता के कठिन परिश्रम को देखकर अपनी पढ़ाई के साथ-साथ परिवार का हाथ बंटाना सच्ची परिपक्वता को दर्शाता है। https://trendkia.com/jharkhand/jharkhand-sisters-turn-handcrafted-jewellery-into-thriving-business-to-support-auto-driver-father-41654 TrendKia — Har trend, sabse pehle.